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किला बनाने की अनुमति के बाद भी पुर्तगालियों ने बहादुर शाह को क्यों मार डाला?

एक ऐसा सुल्तान जिसके पहनने के बाद कपड़े जहरीले हो जाते थे

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बहादुर शाह (फोटो सोर्स - Social Media)
चित्तौड़ की रानी कर्णावती और मुग़ल बादशाह हुमायूं की कहानी आपने सुनी होगी. कहा जाता है, साल 1535 में हुमायूं को रानी कर्णावती का पत्र और राखी मिली. गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया था. हुमायूं अपना भाई धर्म निभाने निकल पड़े. लेकिन पहुंचते-पहुंचते बहुत देर हो गई. और राजकुमार उदय सिंह को सुरक्षित स्थान पर भेजकर राणा सांगा की पत्नी कर्णावती को जौहर करना पड़ा.
ऐसा ही कुछ लेफ्टिनेंट जनरल जेम्स टॉड ने अपनी किताब ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ में लिखा है. टॉड 19 वीं शताब्दी में मेवाड़ की अदालत में एक अंग्रेज अफसर के बतौर तैनात थे.
लेकिन इसी घटना के बारे में ‘History of Medieval India’ में लेखक सतीशचंद्र बताते हैं कि किसी भी तत्कालीन लेखक ने चित्तौड़ की रानी कर्णावती द्वारा हुमायूं को राखी भेजने का ज़िक्र नहीं किया था. हो सकता है इस कहानी में कोई भी सच्चाई न हो.
लेकिन इतना तो तय है बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर हमला किया था और कर्णावती ने जौहर. और इसी हमले के बाद गुजरात की सल्तनत भी खात्मे की कगार पर पहुंच गई. कंफ्यूज न होइएगा ये कहानी गुजरात के सुलतान कुतुबुद्दीन बहादुरशाह की है, मुग़ल बादशाह बहादुरशाह जफ़र की नहीं. उल्टा कुतुबुद्दीन बहादुरशाह ने तो मुगलों की नाक में दम कर दी थी.
आज 14 फरवरी है और आज की तारीख़ का सम्बन्ध है गुजरात सल्तनत के सुल्तान बहादुर शाह की हत्या से. महमूद बेगढ़ा- गुजरात की मुजफ्फरीद डायनेस्टी के सुल्तान महमूद शाह प्रथम की कहानी रोचक है. इसलिए शुरुआत यहीं से. साल 1459 में महमूद शाह ने गुजरात सल्तनत की गद्दी संभाली. उम्र थी सिर्फ 13 साल. इसके बाद महमूद ने जब चंपानेर और ‘गिरनार’ जूनागढ़ के किलों को जीता. तब उन्हें ‘बेगढ़ा’ की उपाधि दे दी गई. ‘बे’ का मतलब ‘दो’ और ‘गढ़’ माने ‘किला’. कहा जाता है ये वक़्त गुजरात सल्तनत का सुनहरा दौर था. 52 वर्ष के अपने लंबे शासनकाल में महमूद बेगढ़ा ने गुजरात सल्तनत को शिखर तक पहुंचा दिया था. इसलिए आज भी बेगढ़ा के बारे में कहानियां कही-सुनी जाती हैं. कहते हैं, बेगढ़ा की दाढ़ी इतनी बड़ी थी कि कमर तक आती थी. और मूछें इतनी लंबी  कि वह उन्हें अपने सिर के ऊपर बांधते थे. बेगढ़ा के बारे में एक बात और प्रचलित रही कि, वो एक दिन में कम से कम 35 किलो खाना खाते थे. नाश्ते में एक कटोरा शहद, एक कटोरा मक्खन और करीब सौ केले. ये भी कहा जाता है कि सुल्तान बेगड़ा को बचपन से ही किसी तरह का जहर दिया जाता था. और वह हर रोज खाने के साथ भी जहर की थोड़ी मात्रा लेते थे. जिससे सुल्तान का शरीर इतना जहरीला हो गया था कि अगर मक्खी भी बैठ जाती तो पल भर में दम तोड़ देती. उनके इस्तेमाल किए हुए कपड़ों को सीधे आग के हवाले कर दिया जाता था. खैर, इन बातों में कितनी सच्चाई है, कितनी नहीं. ये बहस का मुद्दा हो सकता है. आगे बढ़ते हैं.
महमूद शाह प्रथम (फोटो सोर्स- Social Media)
महमूद शाह प्रथम (फोटो सोर्स- Social Media)
शमसुद्दीन मुजफ्फर शाह- महमूद बेगढ़ा और उनकी राजपूत पत्नी रानी हीराबाई की चार औलादें थीं. खलील खान, मुहम्मद कला, आपा खान और अहमद खान. महमूद शाह की मौत के बाद 1511 में सबसे बड़ा बेटा खलील खान गद्दी पर बैठा. ताजपोशी के बाद खलील खान का नाम हो गया शमसुद्दीन मुजफ्फर शाह द्वितीय. इस वक़्त तक गुजरात में पुर्तगाली दखल भी काफी बढ़ चुका था. दीव की लड़ाई में पुर्तगाली मामलूकों को हरा चुके थे. बिना रोक-टोक उनका व्यापार चल रहा था. साल 1514 की शुरुआत में, पुर्तगाली जनरल अल्फ़ान्सो डी अल्बुकर्क दीव आइलैंड पर एक किला बनाना चाहता था. उसने अनुमति लेने के लिए मुजफ्फर शाह द्वितीय के पास अपने राजदूत भेजे. हालांकि, उन्हें इजाज़त नहीं मिली और दूत बिना किसी समझौते के वापस लौट आए.
इसके बाद शमसुद्दीन मुजफ्फर शाह ने जीवित रहते हुए अपने बड़े लड़के सिकंदर शाह को वारिस घोषित कर दिया था. कुतुबुद्दीन बहादुर शाह- सिकंदर की ताजपोशी, मुजफ्फर शाह के छोटे बेटे बहादुर शाह को नागवार गुजरी. पिता मुजफ्फर शाह और बड़े भाई सिकंदर के साथ उसकी तल्ख़ी बढ़ने लगी. सिकन्दर जान से न मरवा दे इसलिए बहादुरशाह ने गुजरात से निकल लेना ठीक समझा. कहा जाता है, जब पानीपत के मैदान में मुग़ल बादशाह बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच दिल्ली के तख़्त के लिए जंग चल रही थी. उस वक़्त बहादुर शाह वहीं मौजूद था. हालांकि जंग से उसका कोई लेना-देना नहीं था. और जब पिता मुजफ्फर शाह की अहमदाबाद में मौत की खबर मिली. तब बहादुर शाह वापस गुजरात आ गया.
इधर सिर्फ डेढ़ महीने सल्तनत की गद्दी पर रहने के बाद 30 मई 1526 को चंपानेर के किले में सिकंदर शाह की भी हत्या कर दी गई. ह्त्या करने वाला था सिकंदर का ही एक गुलाम इमाद-उल-मुल्क खुशकदम. खुशकदम ने मुजफ्फर शाह के सबसे छोटे बेटे महज 6 साल के नासिर को सुल्तान की गद्दी पर बैठा दिया. और उसके नाम पर खुद मनमानी करने लगा.
अब बारी थी बहादुर शाह की. उसने अपने लोगों को इकट्ठा किया और धीरे-धीरे गुजरात में अपने सभी प्रतिद्वंदियों को खत्म कर करके सुल्तान की गद्दी पर कब्जा कर लिया. अब बहादुर शाह का नाम हो गया कुतुबुद्दीन बहादुर शाह. इस वक़्त तक पुर्तगालियों की तरफ़ से चुनौती बढ़ गई थी. 1531 में पुर्तगाली गवर्नर निनो-डि कुन्हा ने गुजरात सल्तनत की सीमा में आने वाले दीव पर हमला बोल दिया जबाब में बहादुर शाह ने तुर्किश नौसेना की मदद ली और पुर्तगाली सेना को बुरी हार का मुंह देखना पड़ा. पुर्तगालियों ने वापस गोवा की का रुख कर लिया. और मदद के बदले बहादुर शाह ने तुर्किश नौसेना के चीफ मुस्तफा खां को गुजरात के तोपखाने की कमान सौंप दी.
इसी तरह साल 1532 में बहादुर शाह ने सिलहदी को बंदी बनाकर रायसेन पर अधिकार जमा लिया. और उसका कंट्रोल आलम खां लोदी के हाथों में सौंप दिया. आलम खां लोदी, इब्राहिम लोदी का चाचा था. और दिल्ली पर कब्ज़ा करना चाहता था. जिसके चलते आलम खां की मुगल शासक हुमायूं से दुश्मनी हो गई थी. इस तरह दुश्मन का दोस्त यानी कि बहादुर शाह भी हुमायूं का दुश्मन बन गया.
कहते हैं जब मार्च 1534 में बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला किया. उस वक्त हुमायूं ग्वालियर किले में ठहरा हुआ था. उसने वहां से आगरा और दिल्ली हरकारे भेज कर फौज जुटाने का आदेश दिया. लेकिन जब तक वह फौज लेकर चित्तौड़ पहुंचा, देर हो चुकी थी.
रानी कर्णावती महल की सभी स्त्रियों सहित जौहर कर चुकी थीं. राजकुमार उदय सिंह को बूंदी किले में भेज दिया गया था. कर्णावती के जौहर की खबर से गुस्साए हुमायूं ने गुजरात पर हमला कर दिया और बहादुरशाह के सेनापति तातारखां को बुरी तरह हराया. इसके बाद मंदसौर के पास बहादुरशाह और हुमायूं का भी सामना हुआ. जिसमें बहादुरशाह की भी हार हुई और जान बचाने के लिए उसे यहां से भागना पड़ा.
बहादुरशाह की हार की खबर मिली तो चितौड़ के राजपूत सैनिकों ने चितौड़ पर हमला कर दिया. बहादुरशाह के सैनिक यहां से भी खदेड़ दिए गए और राजपूतों ने राजकुमार उदय सिंह को बूंदी से लाकर महाराणा बना दिया.
कहा जाता है, बहादुर शाह की मेवाड़ पर शुरुआती जीत के पीछे एक तुर्किश तोपची रूमी खां का बड़ा रोल था. लेकिन बहादुर शाह ने रूमी खां को कोई तवज्जोह नहीं दी. और रूठा हुआ रूमी खां बहादुर शाह की साइड छोड़कर हुमायूं से जा मिला. जिसके चलते युद्ध जीतकर भी बहादुरशाह की हार हुई थी.
कुछ इतिहासकार ये भी कहते हैं कि हुमायूं के लिए रानी कर्णावती का पत्र बहादुरशाह पर हमले की अकेली वजह नहीं थी. बल्कि बहादुरशाह ने इब्राहिम लोदी का साथ दिया था, जिसका बदला हुमायूं को लेना था. मेवाड़ की जीत के बाद हुमायूं ने अहमदाबाद सहित गुजरात सल्तनत पर भी कब्ज़ा कर लिया था. लेकिन, हुमायूं जंग लड़ते-लड़ते राजधानी दिल्ली से बहुत दूर आ गया था. फ़ौज को भी नुक्सान हुआ था और पूरब से शेर शाह सूरी के हमले का भी खौफ था. इसलिए मजबूरी में हुमायूं को दिल्ली वापस लौटना पड़ा.
रानी कर्णावती (फोटो सोर्स-Wikimedia)
रानी कर्णावती (फोटो सोर्स-Wikimedia)
बहादुर शाह की हत्या- लूट-पाट और मारकाट मचाने के बाद मुग़ल सेना जब वापस दिल्ली लौट गई तो बहादुर शाह को पुर्तगालियों की मदद लेनी पड़ी. गुजरात का शासन वापस पटरी पर लाने के लिए ये काम जरूरी भी था और मजबूरी भी. बहादुरशाह पुर्तगालियों से भी सीधा मोर्चा नहीं ले सकता था. इसीलिए उसे पुर्तगालियों को किले बनाने की अनुमति देनी पड़ी. जिसके लिए कभी उसके पूर्वजों ने मना कर दिया था.
बहादुर शाह अपनी सल्तनत पर वापस कब्जा तो पा गया था लेकिन पुर्तगाली भांप चुके थे कि बहादुर शाह कमजोर हो चुका है. जबकि पुर्तगालियों का वर्चस्व और ताकत बढ़ रही थी. साल 1936 के आखिर तक स्थिति ये हो गई थी कि अपनी ही सल्तनत में बहादुर शाह को छोटी-छोटी चीजों के लिए पुर्तगालियों से पूछना पड़ता था. बहादुरशाह को पता था किले बनाने की अनुमति देना उसकी बड़ी भूल थी. लेकिन बगावत की हिम्मत बहादुरशाह में नहीं थी. ऐसे में उसने पुर्तगालियों के साथ संधि ही एक रास्ता नजर आया.
एक जहाज पर बहादुरशाह और पुर्तगालियों की मीटिंग तय हुई. मीटिंग में कुछ मुद्दों पर बात अटकी. पुर्तगाली गुजरात के शासन में अपना पूरा दखल चाहते थे. लेकिन बहादुरशाह को ये मंजूर नहीं था. कहने को समझौता तो हो गया, लेकिन मीटिंग के बाद जब बहादुर शाह वहां से निकला तो 14 फरवरी 1537 को यानी आज ही के दिन पुर्तगालियों ने धोखे से उसकी हत्या कर दी. और लाश अरब सागर में फेंक दी.
पुर्तगालियों द्वारा बहादुर शाह की हत्या (फोटो सोर्स- Wikimedia)
पुर्तगालियों द्वारा बहादुर शाह की हत्या (फोटो सोर्स- Wikimedia)

इस वक़्त बहादुरशाह की उम्र 31 साल की थी. साल 1611 में लिखी गई किताब मिरात-ए-सिकंदरी के मुताबिक बहादुर की हत्या की एक वजह और थी. उसने दक्कन के राजाओं को एक पत्र लिखा था. और पुर्तगालियों के खिलाफ़ गठबंधन की गुजारिश की थी. और किसी तरह ये पत्र पुर्तगाली वायसराय के हाथ लग गया, जिसके बाद बहादुरशाह को संधि के लिए बुलाकर उसकी हत्या की साजिश रची गई.

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