20 मार्च 2003 की रात वाइट हाउस में स्टाफ़्स तेज़ी से इधर-उधर भाग रहे थे. वाइट हाउस के प्रवक्ता एरी फ़्लिशर को ये ऐलान करने के लिए कहा गया कि आधे घंटे बाद राष्ट्रपति देश के नाम संबोधन देंगे. अमेरिका में राष्ट्रपति का देश के नाम संबोधन देना एक आम घटना है. मगर इतने शॉर्ट नोटिस पर कम बार ही ऐसा होता है. और, जब-जब ऐसा होता है, तब-तब अमेरिका में बड़े फ़ैसले लिए जाते रहे हैं.
इराक़ में श्रीलंका वाला कांड किसने किया?
मुक़्तदा अल-सद्र ने राजनीति से संन्यास क्यों लिया?


उस रात भी वैसा ही हुआ. जॉर्ज डब्ल्यु बुश ने चार मिनट में अपना संबोधन खत्म कर दिया. लेकिन इसमें जो बातें कही गईं थी, वो अगले कई दशकों तक मिडिल-ईस्ट समेत पूरी दुनिया की दशा और दिशा तय करने वाला था. बुश ने कहा था,
अमेरिका और गठबंधन देशों की सेनाओं ने मिलकर इराक़ को हथियारमुक्त करने, इराक़ी जनता को आज़ाद कराने और दुनिया को एक बड़े ख़तरे से बचाने का ऑपरेशन शुरू कर दिया है.
हमारे मन में इराक़ी नागरिकों, उनकी महान सभ्यता और उनकी धार्मिक आस्था के प्रति सम्मान है. ख़तरे को मिटाने और देश का नियंत्रण वाजिब लोगों के हाथों में देने के अलावा हमारा कोई स्वार्थ नहीं है.
संबोधन के अंत में बुश बोले,
हम इस मुश्किल समय को पार कर लेंगे और शांति के लक्ष्य की तरफ़ बढ़ जाएंगे. हम अपनी आज़ादी की रक्षा करेंगे. हम दूसरों के लिए आज़ादी लेकर आएंगे. हम विजयी होंगे. May God bless our country and all those who defend her.

जिस समय बुश अपना संबोधन खत्म कर सोने की तैयारी करने जा रहे थे, उस समय इराक़ में भोर हो चुकी थी. उस रोज़ मुर्गे की बांग एयर रेड साइरन की तेज़ आवाज़ के नीचे दब गई थी. सद्दाम हुसैन को कुर्सी छोड़ने के लिए मिला डेडलाइन खत्म हो चुका था. सद्दाम ने टीवी पर बुश को बुरा-भला कहा. उसने ये भी कहा कि इराक़ की फौज़ सामना करने के लिए तैयार है.
खैर, युद्ध शुरू हो चुका था. शुरुआती दिनों में ही सद्दाम और उसके वफ़ादार राजधानी छोड़कर भाग गए. 09 अप्रैल को राजधानी बग़दाद के फिरदौस चौक पर लगी सद्दाम की आदमकद मूर्ति गिरा दी गई. ये सद्दाम-युग के अंत का संकेत था. 01 मई 2003 को एयरक्राफ़्ट करियर यूएसएस अब्राहम लिंकन पर सवार होकर बुश ने कहा, मिशन पूरा हुआ.
लेकिन क्या सच में मिशन पूरा हो चुका था?कतई नहीं. असल में, ये इराक़ में एक ख़ूनी अशांति और तबाही के युग की शुरुआत थी. जिसने लोगों को ये सोचने पर मज़बूर किया कि क्या सद्दाम का शासन इससे बेहतर था?
अमेरिका को इराक़ में वेपंस ऑफ़ मास डिस्ट्रक्शन (WMD) का एक टुकड़ा तक नहीं मिला. जनवरी 2004 में WMD को खोजने का काम बंद कर दिया गया. 2005 में प्रेसिडेंशियल कमीशन ने माना कि इराक़ युद्ध से पहले WMD को लेकर मिली इंटेलिजेंसी रिपोर्ट में रत्ती भर की सच्चाई नहीं थी.
लेकिन तब तक चिड़िया खेत चुग चुकी थी. लाखों की संख्या वाली इराक़ी आर्मी सड़कों पर थी. उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था. उनके पास हथियार थे, प्रशिक्षण था, मगर उन्हें कंट्रोल करने वाला कोई नहीं था. नतीजा ये हुआ कि कुछ ही समय में इराक़ में शिया-सुन्नी दंगे शुरू हो गए. आतंकी संगठन अलक़ायदा ने शियाओं, उनके धार्मिक-स्थलों और विदेशी सैनिकों और नागरिकों को निशाना बनाना शुरू किया.
इन सबके बीच शियाओं के एक नेता का उभार हुआ. उसका नाम था, मुक़्तदा अल-सद्र. कहा जाता है कि जब सद्दाम को फांसी पर चढ़ाया जा रहा था, तब वहां मौजूद लोगों ने सद्दाम को चिढ़ाने के लिए मुक़्तदा अल-सद्र के नारे लगाए थे. मुक़्तदा अल-सद्र, वो जिसके पिता को सद्दाम की आलोचना करने के लिए मार डाला गया था. कालांतर में उसने अपने पिता की विरासत संभाली. अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी. फिर इराक़ की राजनीति के किंगमेकर बने. उसके बाद प्रधानमंत्री बनने की कगार पर पहुंचे. बन नहीं पाए तो अपने सांसदों से इस्तीफ़ा दिलवा दिया.
अल-सद्र की चर्चा आज क्यों?दरअसल, मुक्तदा अल-सद्र ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है. उनके ऐलान के बाद पूरे इराक़ में हंगामा मच गया है. अल-सद्र के समर्थकों ने गवर्नमेंट पैलेस पर क़ब्ज़ा कर लिया. वे ग्रीन ज़ोन में घुस गए. सेना की गोलीबारी में अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है. सौ से अधिक लोग घायल हैं. देशभर में कर्फ़्यू लगा दिया गया है. हिंसा के बीच अल-सद्र भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं. उनका कहना है कि जब तक हिंसा नहीं रुकेगी, तब तक वे अन्न का एक टुकड़ा ग्रहण नहीं करेंगे.
आज हम जानेंगे,
- मुक़्तदा अल-सद्र ने राजनीति से संन्यास क्यों लिया?
- अल-सद्र के समर्थक गवर्नमेंट पैलेस में क्या कर रहे थे?
- और, इराक़ की राजनीति में आगे क्या हो सकता है?
19 फ़रवरी 1999 की तारीख़ को इराक़ के नज़फ़ में एक काफ़िले पर हमला हुआ. इसमें शिया धर्मगुरु अयातुल्लाह मुहम्मद सादिक अल-सद्र और उनके दो बेटों की मौत हो गई. हमले में सद्दाम का नाम आया. सद्दाम ने सफ़ाई दी. कहा, हम नहीं थे, विदेशी साज़िश थी. लेकिन पता सबको था, इस हत्या के पीछे कौन है.
दरअसल, सद्दाम हुसैन सुन्नी मुसलमान था. 1980 के दशक में ईरान के साथ हुए युद्ध के बाद से वो शिया समुदाय से नफ़रत करता था. ईरान में शिया बहुसंख्यक थे. 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद सत्ता उनके क़ब्ज़े में आ गई थी. सद्दाम को डर था कि इराक़ के शिया ईरान के साथ मिलकर उसकी कुर्सी खिसका सकते हैं. इसी डर में वो शिया लीडर्स को निशाना बना रहा था. इसी क्रम में मुहम्मद सादिक अल-सद्र की भी हत्या हुई थी. मुक़्तदा अल-सद्र उन्हीं सादिक अल-सद्र के बेटे हैं.

अब थोड़ा इराक़ का भूगोल समझ लेते हैं. इराक़ मध्य-पूर्व एशिया में पड़ता है. ईरान, जॉर्डन, सीरिया, सऊदी अरब, तुर्की और कुवैत इसके पड़ोसी हैं.
इराक़ की आबादी लगभग चार करोड़ है. लगभग 97 प्रतिशत आबादी इस्लाम मानती है. इनमें से 55 से 60 प्रतिशत आबादी शिया है. 30 प्रतिशत सुन्नी हैं. और, कुर्दों की संख्या 10 से 15 प्रतिशत के बीच है.
इससे आपको इराक़ की राजनीति में शियाओं का प्रभाव समझ आ गया होगा. बहुसंख्यक होने के बावजूद सद्दाम हुसैन ने शियाओं को दबाकर रखा. उसके राज में शिया मुसलमानों को पर्याप्त बुनियादी अधिकार नहीं दिए गए थे.
इसलिए, सद्दाम के तख़्तापलट के बाद जब 2005 में इराक़ का नया संविधान बना, उसमें ये व्यवस्था की गई कि हर तबके को पर्याप्त अधिकार दिए जाएं.
नए संविधान में तय किया गया कि,
अब इराक की संसद के बारे में भी जान लीजिए.देश का राष्ट्रपति कुर्द होगा.
संसद के स्पीकर का पद सुन्नियों को मिलेगा.
और, सरकार का मुखिया यानी प्रधानमंत्री शिया होगा.
इराक में एक सदन वाली व्यवस्था है. भारत की तरह लोकसभा और राज्यसभा नहीं है. वहां सिर्फ़ काउंसिल ऑफ़ रिप्रजेन्टेटिव्स है. जिसे भारत की लोकसभा समझ लीजिए. कुल सदस्यों की संख्या 329 है. ये आम चुनाव में जनता के वोट से चुने जाते हैं.
संसद के दो-तिहाई सदस्य जिसका समर्थन कर दें, वो राष्ट्रपति बनता है. प्रधानमंत्री के लिए साधारण बहुमत यानी 165 सांसदों के समर्थन की ज़रूरत पड़ती है. इसके लिए पार्टियां आपस में गठबंधन भी कर सकतीं है.
इराक़ में पिछला आम चुनाव अक्टूबर 2021 में हुआ था. इसमें मुक्तदा अल-सद्र की ‘सद्री मूवमेंट’ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उन्हें 73 सीट हासिल हुए थे. सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उनके पास बहुमत नहीं था. उन्होंने गठबंधन बनाकर बहुमत जुटाने की कोशिश की. लेकिन वो इसमें कामयाब नहीं हुए. आख़िरकार, जुलाई 2022 में उन्होंने फतवा जारी किया. इसमें उन्होंने अपने सभी सांसदों को इस्तीफ़ा देने के लिए कह दिया. उनके आदेश पर सद्री मूवमेंट के सभी 73 सांसदों ने अपना पद छोड़ दिया. इसके बाद बाकी शिया पार्टियों में नए सिरे से बातचीत शुरू हुई. एक गठबंधन तैयार हुआ. उसका नाम रखा गया, ‘कॉर्डिनेशन फ्रेमवर्क’.
इस नए गठबंधन को ईरान का समर्थन था. दरअसल, इराक़ की लगभग सभी शिया पार्टियों को ईरान का समर्थन है. एक को छोड़कर. सद्री मूवमेंट. हालांकि, हमेशा से ऐसा नहीं था. अल-सद्र अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने वाले शुरुआती लोगों में से था. उसका खौफ इतना था कि अमेरिका ने उसकी मेहदी आर्मी को इराक़ की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा घोषित कर दिया था. अमेरिका ने उसे ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने की कसम खाई थी. लेकिन उन्हें सफ़लता नहीं मिली. अमेरिका से जंग के दौरान ईरान ने अल-सद्र की भरपूर मदद की थी.
2006 से 2008 के बीच इराक़ में सांप्रदायिक लड़ाई शुरू हुई. इस दौरान अल-सद्र की मेहदी आर्मी पर टारगेट किलिंग्स के आरोप लगे. 2008 में इराक़ के प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी ने मेहदी आर्मी को ध्वस्त करने का आदेश दिया. उसी साल अल-सद्र ने अपना प्लान बदल दिया. उन्होंने कहा कि मेहदी आर्मी का स्वरूप बदला जा रहा है. अब ये सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन के तौर पर काम करेगा. इसके बाद मेहदी आर्मी का नाम बदलकर पीस ब्रिगेड्स कर दिया गया.
संगठन का चाल-चरित्र बदलने के बाद अल-सद्र राजनीति में आ गए. उन्होंने इराक़ को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने का वादा किया. जल्दी ही उन्हें पूरे इराक़ में समर्थन मिलने लगा.
2011 में अमेरिका ने इराक़ में अपना मिशन खत्म कर दिया. हालांकि, उनके ढाई हज़ार सैनिक एहतियात के तौर पर बने रहे. इसके बाद इस्लामिक स्टेट का खड़ा हुआ. उस समय भी अल-सद्र की मिलिशिया ने IS के ख़िलाफ़ मोर्चा संभाला था.
फिर आया साल 2016. अल-सद्र के समर्थक संसद में घुस गए. उनका आरोप था कि सरकार राजनैतिक सुधार के नाम पर अपने लोगों को फायदा पहुंचा रही है. आख़िरकार, सरकार को झुकना पड़ा. नई कैबिनेट बनाई गई. तब जाकर अल-सद्र के समर्थकों ने धरना खत्म किया. जिस सरकार के ख़िलाफ़ अल-सद्र प्रोटेस्ट कर रहे थे, उसे ईरान का समर्थन था. धरने के दौरान ईरान के ख़िलाफ़ नारे भी लगे थे. इससे ईरान नाराज़ हुआ.

2018 के बाद से अल-सद्र और ईरान के बीच तल्खियां बढ़ने लगीं थी. ईरान की मीडिया में उनके ख़िलाफ़ काफी लिखा जाने लगा. ईरान सरकार के मंत्री अल-सद्र को काबू में रहने के लिए कहने लगे. लेकिन अल-सद्र नहीं डिगे. उनका कहना था कि इराक़ ईरान और अमेरिका के प्रॉक्सी वॉर का अड्डा बनकर रह गया है. वो इराक़ को तेहरान या वॉशिंगटन के हाथों की कठपुतली नहीं बनने देंगे.
इराक़ में मुक़्तदा अल-सद्र ऐसे नेता के तौर पर उभरे, जो एक साथ ईरान और अमेरिका की मुख़ालफ़त कर रहे थे. ईरान का विरोध बाकी शिया संगठनों को रास नहीं आ रहा था. लेकिन जनता का बड़ा धड़ा अल-सद्र के साथ जुड़ने लगा था. इसी की बदौलत सद्री मूवमेंट अक्टूबर 2021 में हुए चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. लेकिन जब सरकार बनाने की बारी आई, तब गठबंधन की ज़रूरत महसूस हुई. आठ महीनों तक चली कश्मकश के बाद भी सद्री मूवमेंट बहुमत नहीं जुटा पाया. फिर उनकी पार्टी के सभी सांसदों ने इस्तीफ़ा दे दिया. तब को-ऑर्डिनेशन फ़्रेमवर्क नाम का नया गठबंधन बना. इसमें ईरान की चलने वाली थी.
इराक़ में प्रधानमंत्री से पहले राष्ट्रपति का चुनाव होना ज़रूरी है. ये हो पाता, उससे पहले ही अल-सद्र के समर्थकों ने संसद में डेरा जमा लिया. अल-सद्र के कहने पर उनमें से बहुत से लोग वापस लौट गए. लेकिन एक धड़ा टेंट जमाकर बैठा रहा. वे नए चुनाव कराने और संसद को भंग करने की मांग करते रहे. इस जमावड़े की वजह से संसद की कार्यवाही शुरू नहीं हो सकी. जिसके कारण राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव पर डेडलॉक बना रहा.
ये सब चल ही रहा था कि 29 अगस्त को मुक्तदा अल-सद्र ने एक ट्वीट किया. इसमें उन्होंने कहा कि वो हमेशा के लिए राजनीति छोड़ रहे हैं. अल-सद्र ने ये भी ऐलान किया कि सद्री मूवमेंट से जुड़े सभी संस्थानों पर भी ताला लगा दिया जाएगा. कहने का मतलब ये कि अल-सद्र राजनैतिक जीवन को अलविदा कह रहे हैं.
अल-सद्र के ट्वीट के तुरंत बाद उनके हज़ारों समर्थक ग्रीन ज़ोन में घुस गए. ग्रीन ज़ोन बग़दाद का सबसे सुरक्षित इलाक़ा है. इस इलाके में बहुत सारी सरकारी इमारतें, प्रेसिडेंशियल पैलेस है, देशों के दूतवास हैं, मंत्रालय आदि भी हैं.
प्रोटेस्टर्स की भीड़ ने सबसे पहला धावा प्रेसिडेंशियल पैलेस पर बोला. उन्होंने अंदर घुसकर स्वीमिंग पूल और दूसरे संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर लिया. प्रेसिडेंशियल पैलेस एक समय सद्दाम हुसैन का आधिकारिक घर हुआ करता था. इराक़ वॉर के दौरान ये गठबंधन सेनाओं का हेडक़्वार्टर बना. बाद में इसका इस्तेमाल कैबिनेट की मीटिंग्स के लिए किया जाने लगा.
प्रोटेस्टर्स ने बसरा शहर के पास एक बंदरगाह का कामकाज भी रोक दिया है. इसके अलावा, कई जगहों पर सेना के साथ उनकी मुठभेड़ भी हुई. इस मुठभेड़ में कई लोग मारे गए. सैकड़ों लोग घायल हैं. 29 अगस्त को शाम सात बजे इराक़ी सेना ने पूरे देश में कर्फ़्यू लगा दिया. कर्फ़्यू अनिश्चितकाल के लिए लगाया गया है.

हिंसा पर अल-सद्र का बयान भी आया. उन्होंने अपने विरोधियों की निंदा की. उन्होंने लोगों के गुस्से को नज़रअंदाज़ करने के आरोप लगाए. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अल-सद्र ने भूख हड़ताल का भी ऐलान किया है. ये भूख हड़ताल हिंसा खत्म होने तक जारी रहेगी.
अब सवाल आता है कि अल-सद्र के राजनीति छोड़ने के मायने क्या हैं?- इसे ईरान की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है. अगर अल-सद्र गए तो इराक़ की राजनीति पर ईरान का एकछत्र राज होगा. लेकिन इसकी संभावना कम ही है. जानकारों की मानें तो अल-सद्र इससे पहले भी कई बार राजनीति को अलविदा कह चुके हैं. मगर हर बार वो वापस अवतार ले लेते हैं. ऐसा अक्सर चुनाव के ठीक पहले होता है. मुक्तदा अल-सद्र पुरानी परंपरा को फिर से दुहराएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. वैसे भी अल-सद्र ने सालों की मेहनत के बाद इराक़ की राजनीति में अपनी पहचान बनाई है. वो इसे इतनी आसानी से तो नहीं ही छोड़ेंगे. हालिया ऐलान को सरकार के ऊपर दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है.
इराक़ के ताज़ा हालात क्या हैं?- मुक़्तदा अल-सद्र की अपील के बाद उनके समर्थकों ने ग्रीन ज़ोन को खाली करना शुरू कर दिया है. सेना ने देशभर में लगा कर्फ़्यू भी हटा लिया है.
- हिंसा के दूसरे दिन मरनेवालों की संख्या तीस के पार पहुंच गई. सात सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं.
- हिंसा के बीच ईरान ने इराक़ से लगी अपनी सीमा बंद कर दी है. साथ ही फ़्लाइट्स भी रोक लगा दी है.
- इराक़ की सुप्रीम कोर्ट संसद को भंग करने की याचिका पर सुनवाई कर रही है. शूट होने तक इस मामले में कोई बड़ा फ़ैसला नहीं आया है.
पकिस्तान में बाढ़ से मची तबाही पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है






















