' मैं क्या खाऊंगा, ये सरकार तय नहीं कर सकती'. यह लाइन गुजरात हाई कोर्ट की एक तल्ख टिप्पणी के बाद से खूब चर्चा में है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि कोई चीज आप 'कहां' और 'कैसे' खाएंगे, यह भी सरकार तय करती है. घबराएं नहीं, मामला उस तरह का नहीं है. यह आपकी जेब से ताल्लुक रखता है. मसलन, अगर आप रेस्टोरेंट में बैठकर आइसक्रीम खाएंगे तो उस पर 5 फीसदी जीएसटी (GST) लगता है, लेकिन यही आइसक्रीम पॉर्लर में खाएं या वहां से खरीदकर लाएं तो 18 फीसदी जीएसटी चार्ज होगा. फूड आइटम्स में इस तरह की विसंगतियों या विवादों की फेहरिस्त लंबी है, जिस पर अब तक रस्साकशी हो रही है.
एक बार फिर, इसी महीने होने जा रही जीएसटी काउंसिल (GST Council) की बैठक में आइसक्रीम सहित कई फूड आइटमों के टैक्स रेट पर चर्चा होगी. जीएसटी पर रेट फिटमेंट कमेटी की सिफारिशों पर टैक्स एसटी के स्लैब में भी बड़े बदलाव के आसार हैं. लेकिन यहां हम कुछ खास फूड आइटमों पर जीएसटी रेट से जुड़े वो दिलचस्प मामले पेश कर रहे हैं, जिन पर विवाद अभी थमा नहीं है.
पार्लर में महंगा, रेस्तरां में सस्ता क्यों ?
पिछले दो महीने से जीएसटी काउंसिल के एक फैसले ने आइसक्रीम पार्लर चलाने वालों से लेकर बड़े मैन्यूफैक्चरर्स तक की नींद उड़ा रखी है. वजह है, इस पर जीएसटी की अलग-अलग दरें. अगर कोई रेस्टोरेंट में आइसक्रीम खाता है तो वहां 5 फीसदी जीएसटी लगेगा, लेकिन किसी आइसक्रीम पार्लर में रेट 18 फीसदी हो जाएगा. इसके पीछे सरकारी दलील यह है कि पार्लर खुद की आइसक्रीम नहीं बनाते, बल्कि मैन्यूफैक्चर्ड गुड्स बेचते हैं. ऐसे में उनकी सप्लाई सर्विसेज नहीं मानी जा सकती, चाहे उसमें सर्विसेज के कुछ लक्षण शामिल ही क्यों न हों. सितंबर 2021 से पहले तक आइस्क्रीम पार्लर को भी रेस्टोरेंट्स की ही कैटेगरी (सर्विसेज) में शामिल माना जा रहा था. रेस्टोरेंट सर्विसेज पर 5 फीसदी जीएसटी की किफायती दर लागू है. किफायत इस शर्त पर मिली है कि ये ग्राहक से तो 5 फीसदी टैक्स चार्ज करते हैं, लेकिन इन्हें सरकार से इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) नहीं मिलता. इनपुट क्रेडिट को इस तरह समझिए कि रेस्टोरेंट जो भी कच्चा माल खरीदते हैं, जैसे तेल, चीनी, घी, मसाले, आटा-दाल, गैस सिलिंडर वगैरह, उस पर जो टैक्स चुकाते हैं, वो वापस नहीं मिलता यानी इनके आउटपुट टैक्स में एडजस्ट नहीं होता. हालांकि पार्लर वालों को 18 फीसदी टैक्स चुकाने के बाद ITC मिलेगा, लेकिन फिर भी वे इतने ज्यादा रेट को बड़ा बोझ मानते हैं. पार्लर ओनर्स के एक संगठन ने तो वित्त मंत्रालय से यह सवाल पूछा है कि अगर हम अपने परिसर में कुर्सी-टेबल, म्यूजिक, वेटर्स लगा लें, तो क्या हमें रेस्टोरेंट मान लिया जाएगा ? 23 दिसंबर को काउंसिल की बैठक में इस मसले पर चर्चा होगी.
रोटी टैक्स फ्री, पराठे पर 18% क्यों ?
गुजरात की अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग (AAR) ने सितंबर में एक चौंकाने वाला फैसला दिया. अथॉरिटी ने माना कि टैक्स के मामले में पराठे को रोटी या चपाती जैसी रियायत नहीं मिल सकती, बल्कि यह प्रोसेस्ड फूड माना जाएगा. जीएसटी रूल्स के तहत खाने के लिए तैयार (cooked/ready to eat) खाद्य सामग्री पर टैक्स रेट रेट शून्य है. इससे पहले कर्नाटक के AAR ने एक अन्य फैसले में मालाबार पराठा को 'रेडी टू ईट' मानने से इनकार कर दिया था. उसकी दलील थी कि इस पैकेज्ड पराठे को खाने से पहले गर्म करना पड़ता है. हालांकि बाद में अपीलेट अथॉरिटी ने इस फैसले को खारिज कर दिया था. केंद्रीय स्तर पर भी सफाई जारी की गई कि पाराठे पर टैक्स के दायरे में सिर्फ प्रोसेस्ड और पैकेज्ड पराठे आएंगे न कि ढाबे या रेस्टोरेंट में परोसे जाने वाले पराठे. अब इसे लेकर भी कई राज्यों में असमंजस जारी है. कुछ जगहों पर पराठों के मशहूर आउटलेट्स को टैक्सेबल सप्लाई का नोटिस भी मिल चुके हैं.

पराठे पर जीएसटी का मामला भी काफी गर्म रहा है. (सांकेतिक तस्वीर)
इडली, डोसा पर भी टैक्स की आंच
तमिलनाडु AAR के एक फैसले ने देश भर के इडली, डोसा, मिठाई कारोबारियों के कान खड़े कर दिए थे. यहां सीधे इडली डोसा पर तो टैक्स नहीं लगाया गया, लेकिन उनकी पैकेज्ड सामग्री जैसे इडली मिक्स, डोसा मिक्स, स्वीट मिक्स पर 18% जीएसटी लगा दिया गया. इसके असर को इस तरह समझिए. गुलाब जामुन पर 5% जीएसटी है, लेकिन उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले ब्रांडेड पाउडर या मिक्स अगर 18% जीएसटी हो तो मामला पेचीदा हो जाएगा. इसे टैक्स की किताबों में इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर कहते हैं. आसान भाषा में कहें तो कंपनी या दुकानदार आपसे तो 5% टैक्स वसूलेगा और इसे सरकार के पास जमा कराएगा. लेकिन कच्चे माल पर उसने जो 18% टैक्स दिया है, वह पूरा का पूरा सरकार से नहीं ले पाएगा. यानी उसे इनपुट टैक्स क्रेडिट में बड़ी चपत लगेगी.
आटा-दाल पैक होते ही टैक्सेबल
आटा, चावल, दाल अगर खुले में यानी बिना किसी ब्रांड या पैकेजिंग के बिकते हैं तो उन पर जीसटी नहीं लगता. चाहे बिक्री की मात्रा कितनी भी क्यों न हो. लेकिन पैकिंग और एक ब्रांड नेम के साथ बिकते ही 5% जीएसटी देय होता है. डोसा मिक्स के मामले में भी कंपनियों ने AAR के फैसले को चुनौती देते हुए यही दलील दी थी कि जब इसमें इस्तेमाल होने वाले चावल, ज्वार, दालें, रागी जैसे अनाज टैक्स फ्री हैं, तो डोसा मिक्स पर टैक्स क्यों ? हालांकि ज्यादातर राज्यों की रूलिंग अथॉरिटीज और ट्राइब्यूनल्स ने अनाज के मामले में पैकेज्ड आइटमों को टैक्सेबल ही माना है. यह बात अलग है कि अनाज की पैकिंग पर भी अधिकतम 5फीसदी जीएसटी ही देय है.
कच्चा पापड़, पक्का पापड़
बीते सितंबर में मशहूर उद्योगपति हर्ष गोयंका का एक ट्विट इतना वायरल हुआ कि केंद्र सरकार को भी सफाई देनी पड़ गई. ट्विट कुछ यों था 'क्या आप जानते हैं कि गोल पापड़ तो जीएसटी से मुक्त है, लेकिन चौकोर पापड़ पर जीएसटी लगेगा. क्या कोई मुझे एक बढ़िया सीए बताएगा जो मुझे इसका लॉजिक समझा सके'. असल में गोयंका का ट्विट गुजरात के एक AAR और एक अन्य अथॉरिटी के फैसले के बाद आया, जिसमें बिना फ्राई किए हुए पापड़ पर 5 फीसदी जीएसटी लगाने की बात कही गई थी. बाद में सेंट्रल बोर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्सेस एंड कस्टम्स (CBIC) की ओर से गोयंका के ट्विट का हवाला देते हुए सफाई आ गई कि पापड़ पूरी तरह जीएसटी से मुक्त है. चाहे वह किसी भी नाम से बिके या उसका आकार कुछ भी हो.

सितंबर में हर्ष गोयंका का ट्विट इतना वायरल हुआ कि सरकार को सफाई देनी पड़ गई थी
केले से लेकर पीनट-कैंडी तक
करीब दो साल पहले एक्टर राहुल बोस ने अपने एक ट्विट से सनसनी मचा दी थी. चंडीगढ़ के एक होटल ने उन्हें दो केले सर्व करने के नाम पर 442 रुपये का बिल थमा दिया था. इसमें 18% जीएसटी का भी जिक्र था. इसका असर इतना ज्यादा हुआ कि स्थानीय जीएसटी अधिकारियों ने होटल पर रेड डालकर हिसाब-किताब लेनी शुरू कर दी. आधिकारिक सफाई भी आई कि फ्रेश-फ्रूट पर कोई जीएसटी नहीं लगता. लेकिन कुछ दिन बाद ही कर्नाटक के एक AAR ने फैसला सुनाया कि अगर ताजा फल (कटा हुआ या साबुत) पैकिंग में बेचा जा रहा है तो उस पर 5% जीएसटी लगेगा. इसी तरह गुड़ मिलाकर बनने वाली मुंगफली-पट्टी पर 5% जीएसटी लगाने का फैसला इस आधार पर आया कि कई फर्में इसे बतौर peanut candy पैकेजिंग में बेचती हैं. जीएसटी लागू होने के बाद से देश भर की एडवांस रूलिंग अथॉरिटीज और अपीलेट अथॉरिटीज के पास 200 से ज्यादा मामले पहुंचे हैं, जहां एक ही चीज पर जीएसटी की दर उसके ब्रांड, पैकिंग या सप्लाई की जगह के चलते बदल गई.