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पटाखे बैन होने पर जिन्हें बकरीद में कटते बकरे याद आते हैं, वो ये पढ़ लें

सुप्रीम कोर्ट का आदेश आते ही इस देश का युवा जाग उठा.

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फोटो - thelallantop

ये चू*यापा देख के तमाम कोर्ट भी हैरान हो गए कि अब पटाखे हिंदू और बकरे मुसलमान हो गए

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सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को एक काम किया. दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर बैन लगा दिया. पिछले साल की दिवाली की अगली सुबह जब याद करता हूं तो इन्द्रलोक याद आता है. नहीं, मैं कभी इंद्रलोक गया नहीं हूं लेकिन हां, डीडी 1 पर 'ॐ नमः शिवाय' देखता था. उसमें इन्द्रलोक देखा था. इंद्र अपने सिंहासन पर बैठे रहते थे. छोटे-छोटे कपड़ों में लड़कियां आइटम डांस कर रही होती थीं. चूंकि वो एक भक्ति वाला चैनल था इसलिए लड़कियों के कपड़े छोटे होने पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होती थी. साथ ही डांस को नृत्य और लड़कियों को अप्सरा कहा जाता था. और यही सब कुछ ठीक कर देता था. ठीक वैसे ही जैसे अखंड रामायण के नाम पर एक घर की छत पर चारों कोनों (पढ़ें दिशाओं) में लाउडस्पीकर रखे जाते हैं और 10 बजे तो छोड़िये, देर रात में भी उनकी आवाज़ कम या बंद नहीं की जाती है. उनसे उपजे शोर को जस्टिफाई कर दिया जाता है. क्यूंकि उसमें भगवान जुड़ा है. और इस देश में भगवान और सीमा पर खड़ा जवान किसी भी सवाल के घेरे में नहीं आ सकता. आप ऐसा करने की कोशिश कीजिये और मुंह में डेढ़ पाव गुटखा भरे हुए एक न्यूज़ ऐंकर आपको बतलायेगा, "मैं हूं सच्चा देशभक्त." अगर आपके इलाके में लाइट नहीं आती है या देशभक्ति के गुबार के कारण डिश टीवी सिग्नल नहीं पकड़ पा रहा है तो एक आकाशवाणी होगी जो आपसे कहेगी, "एस चीज़ के बारे में कोछ नहीं बोलने का!"

कभी उस लाउडस्पीकर से आती आवाज़ को कम या बंद करवाने की कोशिश करियेगा. आपसे पूछा जायेगा कि क्या आपने अजान और दिन भर लाउडस्पीकर पर चीखी जाने वाली नमाज़ को बंद करवाने की कोशिश की है? मेरी बात मानिए और कभी भी किसी भी धार्मिक (उद्दंडता के?) उद्देश्य से लगे लाउडस्पीकर बंद करवाने की कोशिश मत करियेगा. ऐसे स्टंट जानलेवा हो सकते हैं. किसी भी एक्सपर्ट की मौजूदगी में भी इसे करने की कोशिश न करें.

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खैर, हम बात कर रहे थे 'ॐ नमः शिवाय' में दिखने वाले इन्द्रलोक की. मैंने इंद्र के सिंहासन को देखा है. मगर पूरे 'ॐ नमः शिवाय' में मैं कभी भी इन्द्रलोक की फ़र्श नहीं देख पाया. मुझे नहीं मालूम चल पाता था कि फ़र्श पर मोज़ैक है या टाइल्स लगी हुई हैं. मेरे घर (किराए वाले) में भी अभी काम चल रहा है. पूरे घर में धूल-मिट्टी फ़ैली हुई है. दो बाथरूम हैं. दोनों की मोज़ैक की फ़र्श उखाड़ी जा रही है और टाइल्स बिछ रही हैं. दीवारों पर भी नई टाइल्स लग रही हैं. और जब मैं ये बता रहा हूं तो मैं भटक रहा हूं. ठीक वैसे ही जैसे पटाखे बिकने पर बैन लगने के बाद पूरे डिस्कोर्स से जनता भटक गई और बकरे पर आ गई. मेरे बाथरूम में पानी के लीकेज की बड़ी समस्या थी. ठीक वैसे ही जैसे इस देश में लॉजिक के लीकेज की समस्या है.  लॉजिक लीक हो गया है. अब जब मुंह रूपी नलके की टोंटी खोलो तो बस हवा निकलती है.

फिर से भटक गया. देश के डिस्कोर्स की तरह. बात हो रही थी इन्द्रलोक की. इन्द्रलोक की फ़र्श कभी नहीं दिखती थी. दिखता था तो बस धुआं. एकदम सफ़ेद. बादल थे वो असल में. वही बादल पिछली दीवाली की अगली सुबह मुझे दिखाई दे रहे थे. बस पृथ्वीलोक पर वो बादल नहीं सच में धुआं ही था. अगले 50 मीटर भी दिखाई देने मुश्किल थे. गाड़ी का शीशा खोलो तो सांस लेना मुश्किल था. पूरा दिन लगा उस धुएं को बैठने में. टीवी पर हाहाकार मचा हुआ था. मास्क बिक रहे थे. लोग मुंह पर सफ़ेद पट्टी बांधे घूम रहे थे मानो मूक विरोध दर्ज करवा रहे हों. लेकिन ये मजबूरी थी और मास्क ज़रूरी था. क्यूं? क्यूंकि पटाखे भी ज़रूरी थे. पटाखे नहीं होंगे तो कैसे मालूम चलेगा कि दिवाली है.


एक बात समझ में नहीं आती. राम जी ने धनुष-बाण का सहारा क्यूं लिया? अम-बम क्यूं नहीं मार दिया? एक दिन में कहानी पैक हो जाती? क्या कहा? तब बारूद बनी ही नहीं थी. यानी पहली दीवाली पर पटाखे नहीं फोड़े गए थे? ओह! जाने देते हैं. इस लॉजिक पे झउव्वा ढांप देते हैं.


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सुप्रीम कोर्ट का आदेश आते ही इस देश का युवा जाग उठा. उसने हाथ धोये. उंगलियों में तेल लगाया. वीणावादिनी का आशीर्वाद लिया, की-बोर्ड से धूल झाड़ी और काम पर लग गया. की-बोर्ड पर धूल इसलिए जमा हुई थी क्यूंकि आखिरी बार उसका इस्तेमाल तीन तलाक़ के बैन किये जाने पर कोर्ट को बधाई देने के लिए किया गया था. उसने लिखा, "कोर्ट ने पटाखे बैन करवा दिए गए हैं. वो बकरीद में बेज़ुबान, निर्दोष पशुओं की हत्या पर कब रोक लगाएगा?"

इस देश के युवा की एक बेहतरीन बात है. और ये बात गौर किये जाने लायक है. जैसे मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक होती है वैसे ही हिन्दू की दौड़ मुस्लिम तक होती है या हिन्दू की मुसलमान तक. मुझे लता है कि हिन्दू और मुस्लिम बनकर इस दुनिया का सबसे बेहतरीन पेंडुलम बना सकते हैं. दोनों एक दूसरे की ओर भागते रहते हैं, टकराते हैं, फिर दूर हो जाते हैं. और ये क्रम अनवरत चला आ रहा है. बीच में इंडिया कोई वर्ल्ड कप जीत जाता है तो दोनों सड़क पर आकर नाचते हैं और फिर अगले दिन से पेंडुलम बन जाते हैं.


आज के वक़्त में मेरा सबसे बड़ा डर ये है कि कहीं सुप्रीम कोर्ट या इस देश का कोई भी कोर्ट ये न कह दे कि खुले में हगना गैर कानूनी है. मुझे यकीन है कि इस पर की-बोर्ड धारी इस देश का युवा जाग उठेगा, उंगलियां चिटकाते हुए कहेगा कि इस देश की अदालत कुत्ता प्रेमी और इंसान विरोधी है. वो ये सवाल उठाएंगे कि जब एक कुत्ता सड़क पर खुले में खुद अपनी जगह चुन के, भले ही वो किसी गुस्सैल आंटी के घर का गेट ही क्यूं न हो, हग सकता है तो इंसान क्यूं शौचालय में जाए. मुझे डर है कि मैं किसी रोज़ बिजली के खम्भे पर चढ़े हुए एक नौजवान को देखूंगा और मुझे दिखेगा कि वो वहां बैठा हुआ टट्टी कर रहा है. मैं जब उससे पूछूंगा कि वो अपने घर में इस क्रिया को अंजाम क्यूं नहीं दे रहा है तो वो मुझे भारत माता की दुहाई देते हुए मां-बहन की गालियों से नवाज़ेगा और फिर कहेगा कि जब आधे घंटे पहले कौव्वा उसी खम्भे पर बैठा टट्टी कर रहा था तब मैंने उस कौव्वे से ये सवाल क्यूं नहीं पूछा.


कहना पाणिनी आनंद का कि इस वक़्त 'सारे धर्मों का कम्पटीसन इस बात का है कि तू मुझसे ज़्यादा जाहिल कैसे हो सकता है?' आप एक की ख़ामियां बताइये, वो अगले की ख़ामियों की पावर पॉइंट प्रेज़ेन्टेशन लेकर आ खड़े होंगे और बताएंगे कि अगला भी तो गलतियां कर रहा है. असल में अगला इस सवाल को उठाना चाहता है कि वो जाहिल है तो मैं जाहिल क्यूं नहीं हूं. वो एक दिन ये भी पूछ सकता है कि एक कुत्ता मुझे देख कर भौंकता है तो मैं भी उसकी ओर भौंक क्यूं नहीं सकता? या अगर वो मुझे काटता है तो मैं उसे काट क्यूं नहीं सकता. और यकीन मानिए, इस सवाल को पूछते वक़्त वो कतई मज़ाक के मूड में नहीं होगा. उस वक़्त देश का युवा कुत्ते के साथ पेंडुलम हो जाना चाहता है.

इस देश का ये युवा जिस दिन बाप बनेगा उस दिन सबसे हैरत का काम होगा. बच्चा बिस्तर में पड़ा सूसू करेगा और ये इस चिंता में डूब जायेगा कि इसे खुद को सूसू करने एक बंद कमरे में जाना पड़ता है. और उस दिन इसके जीवन में क्रांति आएगी. उस दिन से देश का ये युवा भी बिस्तर पर पड़ा-पड़ा मूतेगा. जब इससे पूछा जायेगा कि वो ऐसा क्यूं कर रहा है तो ये पूछने वाले से पूछेगा, "पहले मेरे बच्चे से पूछो वो यहां ऐसे क्यूं मूतता है."

जनता पटाखों के लिए दिवाली मना रही है. ऐसा प्रतीत हो रहा है. लोग कहते हैं दीपावली और देश के युवा को पटाखावली सुनाई दे रहा है. उसे अचानक ही निर्दोष जानवर और उनकी निर्मम हत्या याद आ जाती है. देश के युवा की कहानी असल में अगर कोई ठीक कर सकता है तो उसकी मां. मां को 90 के दशक के डायलॉग को वापस से लाने की ज़रूरत है. उसे देश के युवा से पूछना चाहिए, "वो ट्रेन के नीचे आ जायेगा तो तुम भी आओगे?" देश का युवा अपना सा मुंह बनाकर पिकनिक के पैसे मांगना बंद कर देता और होमवर्क करने में मशगूल हो जाता. लेकिन हाय ये देश का युवा. इसका तो होमवर्क ही यही है - पेंडुलम बनना. बने रहिये. पटाखे फोड़ने में संकोच मत बरतिए. बस इतना ध्यान रखिएगा, बहुत कुछ है जो रोज़ बर्बाद हो रहा है लेकिन दिख नहीं रहा. और वो जिस दिन दिखना शुरू हुआ, समझिये कि इस गोले पर रहना मुश्किल हो जायेगा. आपका धर्म आपसे पहले काफ़ूर होगा. उस दिन अगर पटाखे खा भी लेंगे तो भी ज़िन्दा नहीं बचेंगे. बाकी, "84 में कहां थे?" वाला सवाल हमेशा आपका साथ देगा ही.


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