ये 1930 का दिसम्बर था. गंगा के किनारे इलाहाबाद में एक शायर बड़े जोश में अपनी तक़रीर पेश कर रहा था. ये तक़रीर 17 साल के बाद होने वाले इंसानी तारीख के सबसे बड़े और खूनी पलायन की बुनियाद रखने जा रही थी. तक़रीर कुछ यूं थी-
'सारे जहां से अच्छा' लिखने वाला अलग पाकिस्तान क्यों मांगने लगा था?
आज के दिन 1938 में अल्लामा इकबाल का निधन हो गया था.

" मैं पंजाब, नार्थ वेस्ट फ्रंटियर, सिंध और बलूचिस्तान को एक संयुक्त राज्य के रूम में देखना चाहता हूँ. ब्रिटिश राज के तहत या फिर उससे बिना भी एक खुद-मुख्तार नार्थ-वेस्ट भारतीय मुस्लिम राज्य ही मुसलमानों का आखिरी मुस्तकबिल है."
इस शायर का नाम था अल्लामा इकबाल. मौका था ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के 25 वें सालाना जलसे का. इकबाल इसके अध्यक्ष थे. अपने भाषण में देश के भीतर ही एक स्वायत्त मुस्लिम राज्य की मांग कर रहे थे. हालांकि वो मुल्क के बंटवारे को देखने के लिए जिन्दा नहीं बचे लेकिन आज भी पाकिस्तान में "मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान" के तौर पर याद किए जाते हैं.
आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो इकबाल 1904 में कह रहे थे, "कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहां हमारा" वो इकबाल 1930 में देश के बंटवारे की नींव रखते देखे जा सकते हैं? इस सवाल का जवाब हमें उनके जीवन के उतार-चढ़ाव से मिलता है.

अल्लामा इक़बाल
9 नवम्बर 1887 को सियालकोट में पैदा हुए इकबाल मूलतः कश्मीर के रहने वाले थे. उनके पुरखों ने उनके जन्म से तीन सदी पहले इस्लाम स्वीकार कर लिया था. 19वीं शताब्दी में कश्मीर पर सिक्खों का कब्ज़ा होने के बाद उनका परिवार पंजाब आ गया. उनके पिता शेख नूर मोहम्मद सियालकोट में दर्जी का काम करते थे. महज़ चार साल की उम्र में उनका दाखिला मदरसे में करवा दिया गया. तालीम का यह सिलसिला लम्बा चला. इकबाल ने कानून, दर्शन, फारसी और अंग्रेजी साहित्य की पढाई की.
1904 में इकबाल अपने तराने “सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” लिख चुके थे और मशहूर हो चुके थे. अगले साल इकबाल तालीम हासिल करने के लिए लंदन रवाना हुए. उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से वजीफ़ा मिला था. यहां उन्होंने कला में स्नातक किया. 1907 में वो म्यूनिख चले गए और वहां लुडविंग मेक्समिलियन विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की.
1908 में वापस लौटे इकबाल वो इकबाल नहीं थे जो 1905 में यहां से रवाना होते वक्त थे. अपने इंग्लैंड दौरे के दौरान ही आजादी के आन्दोलन और मुसलमानों के अधिकारों को लेकर उनके विचारों में बदलाव शुरू हुए.
जब इकबाल से मिले नेहरू
1938 में लाहौर के स्थानीय वकील मोहम्मद आलम ने सिविल एंड मिलेट्री गजेट के खिलाफ मानहानि का मुक़दमा कर रखा था. इस मुकदमे में गवाही के सिलसिले में पंडित नेहरू लाहौर गए थे. ये वही लाहौर था जहां नौ साल पहले रावी नदी के तट पर हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पेश हुआ था. इसी शहर में एक शायर था जोकि बीमार हाल बिस्तर में पड़ा था.

जवाहरलाल नेहरू
जनवरी की 24वीं तारीख थी. शाम को नेहरू इकबाल से मिलने जावेद मंजिल नाम की इमारत में पहुंचे. उनके साथ उस वक़्त उनके मेजबान इफ्तिकरुद्दीन भी थे. नेहरू के बैठने के लिए कुर्सियों का इन्तजाम था. नेहरू इकबाल के कमरे में पहुंचे और इकबाल के सम्मान में फर्श पर बैठ गए. हालांकि ये एक अनौपचारिक मुलाकात थी लेकिन दोनों के बीच सियासी मसलों पर बात होना लाजमी ही था. नेहरू लगातार जोर देकर कह रहे थे कि मुसलमानों को देश की आजादी की लड़ाई में कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ना चाहिए. यह वो दौर था जब नेहरू कांग्रेस के वामपंथी धड़े का चेहरा माने जाते थे. इकबाल ने उनसे सवाल किया कि कितने कांग्रेसी नेहरू के समाजवादी विचारों पर उनसे सहमत हैं? नेहरू का जवाब था, "आधा दर्जन."
इस पर इकबाल ने नेहरू से कहा कि जब वो अपनी विचारधारा से कांग्रेस के आधा दर्जन से ज्यादा लोग नहीं जोड़ पा रहे हैं तो वो 10 करोड़ मुसलमानों को उनके साथ खड़ा होने के लिए कैसे कह दें? हालांकि नेहरू से वह इस बात पर सहमत थे कि अंग्रेजी राज के खिलाफ लड़ाई ज़रूरी है. मुलाकात के अंत में उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के बारे में अपनी राय रखते हुए कहा कि अगर मुसलमानों को आजादी की कांग्रेस के नेतृत्व वाली लड़ाई में शामिल करना है तो उनके अधिकारों को सुरक्षित किया जाना बेहद ज़रूरी है.
सियासत के खिलाफ खड़ी शायरी
इकबाल की शायरी और उनके राजनीतिक विचार गजब का विरोधाभास खड़ा करते हैं. उम्र के आखिरी पड़ाव में जब राजनीतिक तौर पर वो टू नेशन थ्योरी के बड़े पैरोकार के रूप में वो स्थापित हो चुके थे. ठीक उसी समय वो लिख रहे थे-
"उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो ख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो सुल्तानी-ए-जमहूर का आता है ज़माना जो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आये मिटा दो जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी उस ख़ेत के हर ख़ोशा-ए-गुन्दम को जला दो"
हालांकि पकिस्तान की पाठ्य पुस्तकों में उनके इलाहाबाद में दिए गए भाषण को 'आइडिया ऑफ़ पाकिस्तान' के रूप में पढ़ाया जाता रहा है. लेकिन उनके उस भाषण को सावधानी से पढ़ने पर समझ में आता है कि उन्होंने मुल्क के भीतर ही एक खुदमुख्तार मुस्लिम राज्य की मांग रखी थी. ये अलग मुल्क की मांग से कई मायनों में अलग है.
इकबाल खुद भी अपनी जिंदगी में हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथियों, यानी दोनों पालों के उग्रपंथियों का शिकार रहे. इकबाल खुद कहते हैं-
“जाहिद-ए-तंग नजर ने मुझे काफिर जाना और काफिर ये समझता है मुसलमान हूं मैं.”
हालांकि वो हमेशा से मानते रहे कि हिन्दू और मुसलमान सांस्कृतिक तौर पर बहुत अलग हैं. अलग मुस्लिम राज्य की मांग के पीछे यही सबसे मजबूत तर्क था लेकिन वो राम को ‘इमामे-ए-हिन्द’ भी बताते हैं. -''है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज अहले नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिन्द''
इकबाल अंत तक मुसलमानों के लिए अलग राज्य की लड़ाई लड़ते रहे, लेकिन वो इस दर्दनाक बंटवारे के गवाह नहीं बन सके. 21 अप्रैल 1938 को उन्होंने पठानकोट में आखिरी सांस ली. दरअसल इकबाल को किसी एक खांचे में रख पाना बहुत मुश्किल है. इतिहास अक्सर न्यायपूर्ण नहीं होता है और इकबाल कई मौकों पर इसका शिकार हो जाते हैं.
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