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तीन दशक पहले मतदान की उम्र सीमा 21 से घटाकर 18 वर्ष क्यों की गई?

20 दिसंबर 1988 को संसद ने 61वें संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दी थी.

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युवा वोटर्स का जोश सरकार बनाने और गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

आज से ठीक 32 साल पहले, यह 1988 का साल था और तारीख थी 20 दिसंबर 1988. इस दिन भारतीय संसद ने एक ऐतिहासिक संविधान संशोधन विधेयक पारित किया जिसके दूरगामी सियासी परिणाम सामने आने वाले थे. यह बात दीगर है कि इस कानून को बनाने वाली सरकार को ही आगामी चुनाव में इसका नुकसान उठाना पड़ा था. आप सोच रहे होंगे कि आखिर हम किस कानून कि बात कर रहे हैं?

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तो चलिए हम आपको बता देते हैं कि आज हम आपको रूबरू कराने जा रहे हैं 61वें संविधान संशोधन विधेयक और उसके पीछे के सियासी मंतव्यों की.
राजीव गांधी की सरकार ने मतदान की उम्र सीमा को 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दिया था.
राजीव गांधी की सरकार ने मतदान की उम्र सीमा को 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दिया था.

क्या था इस संविधान संशोधन विधेयक में?
इस विधेयक के द्वारा देश में मतदान करने के लिए न्यूनतम उम्र सीमा को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया था, जबकि लोकसभा चुनाव में एक साल से भी कम का वक्त बचा था.
क्या थी उस वक्त मतदाताओं की संख्या?
1979-80 के लोकसभा चुनाव के समय देश में वोटरों की कुल संख्या लगभग 35.5 करोड़ थी जो 1984 के लोकसभा चुनावों के समय तक बढ़ कर 37.9 करोड़ हो गई थी. 1989 में इसे  बढ़ कर 40 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा था. लेकिन जैसे ही 18 से 21 वर्ष के लोगों को वोटर लिस्ट में जोड़ा गया, देश में वोटरों की संख्या बढ़ कर 44.7 करोड़ तक पहुंच गई. यानी इस नए कानून की वजह से तकरीबन साढ़े चार करोड़ नए लोग वोटर बन गए.
उस वक्त की सरकार ने ऐसा क्यों किया था?
देश में उस वक्त राजीव गांधी की सरकार थी, जिसे 1984 के लोकसभा चुनाव में कुल 513 सीटों (तब असम, पंजाब एवं 3 अन्य लोकसभा सीटों पर चुनाव नही हुए थे) सीटों में से 404 सीटें हासिल हुई थी. इतना प्रचंड बहुमत जो आज तक किसी अन्य पार्टी को या खुद कांग्रेस पार्टी को कभी हासिल नही हुआ. और इसकी वजह थी चुनाव के ठीक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या जिस वजह से देश में कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की एक लहर चल गई थी. ऐसी लहर जिसमें बड़े-बड़े सियासी सूरमा धाराशायी हो गए थे. वाजपेयी, चंद्रशेखर, जार्ज फर्नांडीस, बहुगुणा, सोमनाथ चटर्जी - सब के सब खेत रहे थे.
लेकिन राजीव गांधी की असल परेशानी इसके बाद शुरू हुई जब सत्ता संचालन और पार्टी संचालन - दोनों मोर्चे पर उनकी समस्याएं बढ़ने लगी. नौबत यहां तक पहुंच गई कि राष्ट्रपति के साथ भी प्रधानमंत्री के मतभेद शुरू हो गए और राजीव के कुछ करीबी लोग राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह पर जुबानी तीर चलाने लग गए.
लेकिन 1987 आते-आते राजीव गांधी के सामने सबसे बड़ी मुसीबत तब खड़ी हो गई जब उनकी अपनी ही पार्टी के लोग उनपर बोफ़ोर्स तोप सौदे और जर्मन पनडुब्बी खरीद के मामले में कथित कमीशनखोरी के आरोप लगाने लगे.
1988-89 के दौर में राजीव गांधी की सरकार पर बोफ़ोर्स तोप खरीद मामले में कथित कमीशनखोरी के आरोप लग रहे थे.
1988-89 के दौर में राजीव गांधी की सरकार पर बोफ़ोर्स तोप खरीद मामले में कथित कमीशनखोरी के आरोप लग रहे थे.

1988 का साल राजीव गांधी के लिए दोहरा झटका लेकर आया. एक तरफ तो उनकी पार्टी इलाहाबाद का लोकसभा उप चुनाव (यह सीट अमिताभ बच्चन के इस्तीफे से खाली हुई थी जिसपर जनमोर्चा उम्मीदवार वी पी सिंह संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार थे) बुरी तरह हारी वहीं दूसरी तरफ किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसानों के मुद्दे पर दिल्ली शहर को लगभग ठप्प कर दिया था. उधर बोफोर्स का मुद्दा गरमाता जा रहा था और साथ ही अयोध्या के मंदिर-मस्जिद विवाद की तपिश भी दिल्ली तक महसूस की जाने लगी थी.
इस मामले पर उस वक्त के राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इन्हीं सब मामलों में उलझे राजीव गांधी की सरकार को युवा वोटरों को आकर्षित करने की सूझी और इसी रणनीति के तहत वोटिंग के लिए निर्धारित न्यूनतम उम्र सीमा को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने का फैसला लिया गया. राजीव गांधी को भरोसा था कि सरकार के इस मास्टर स्ट्रोक से जो साढ़े चार करोड़ नए वोटर जुड़ेंगे वे कांग्रेस पार्टी का साथ देंगे और 1989 की चुनावी नैया पार लगाएंगे. यहां गौर करने लायक बात यह है कि 1984 के चुनाव में 177 लोकसभा सीटें ऐसी थी जिसपर 40 हजार से कम वोटों से हार-जीत का फैसला हुआ था और वहां नए वोटर्स पूरा का पूरा खेल पलट सकते थे.
लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा. वोटिंग राइट मिलने से जोश में आए नौजवान राजीव गांधी की रैली की बजाए विपक्षी गठबंधन रामो-वामो (राष्ट्रीय मोर्चा और वाम मोर्चा) की रैलियों में जुटने लगे और एंटी कांग्रेस- एंटी राजीव गांधी नारे लगाने लगे. नतीजतन राजीव गांधी को 1989 के लोकसभा चुनाव में मुंह की खानी पड़ी और सत्ता फ़िसल कर रामो-वामो के हाथ में चली गई.
1989 के चुनाव में रामो-वामो युवाओं को लुभाने में कामयाब रहा था.
1989 के चुनाव में रामो-वामो युवाओं को लुभाने में कामयाब रहा था.

लेकिन उसके बाद के चुनावों में हर पार्टी ने युवा वोटर्स को खूब भुनाया. 2011 की जनगणना के बाद के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो यह स्पष्ट पता चलता है कि लगभग 2 करोड़ नए वोटर्स हर साल वोटर लिस्ट में जुड़ते हैं. जाहिर सी बात है कि नए वोटरों में वोट डालने को लेकर उत्साह काफ़ी ज्यादा होता है इसलिए राजनीतिक दलों की तरफ से इनके लिए कभी रोजगार का वादा, तो कभी मुफ्त में स्मार्ट फोन और लैपटाॅप देने का वादा कर लुभाया जाता रहा है. हालांकि ऐसे लुभावने वादे कभी काम कर जाते हैं तो कभी फेल भी हो जाते हैं.

 लेकिन यह सियासत है और यहां सियासतदानों के लिए किसान और नौजवान हमेशा से एक ऐसे वोट बैंक रहे हैं जिनके वोट 'अच्छे दिन' और 'युवा जोश' जैसे जुमलों के सहारे अक्सर आसानी से कन्वर्ट कराए जाते रहे हैं.

मोटामोटी कहें तो जिसने इन युवाओं को वोटिंग राइट दिया, उसे तो कुछ हासिल नहीं हुआ, लेकिन बाद के चुनावों में राजनीतिक दलों के लिए ये नए वोटर्स एक हाॅट केक बनते चले गए.

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