साल 2003. एक किताब आई. नाम था Shivaji: Hindu King in Islamic India. लेखक थे अमेरिका के प्रोफेसर जेम्स लेन. पब्लिशर था ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इंडिया. किताब छपी, पढ़ी गई और फिर ऐसा बवाल मचा कि पुणे में मारपीट, तोड़फोड़, केस और कोर्ट तक बात पहुंच गई. और अब पूरे 20 साल बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने सार्वजनिक माफी मांगी है. आइए पूरा मामला आसान भाषा में समझते हैं.
छत्रपति शिवाजी महाराज पर ऐसा क्या छप गया था कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस को 20 साल बाद माफी मांगनी पड़ी
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस को छत्रपति शिवाजी महाराज पर 2003 में छपी जेम्स लेन की किताब में कथित अपमानजनक और बिना पुष्टि वाले बयान छापने के लिए 20 साल बाद माफी मांगनी पड़ी. किताब को लेकर पुणे में हिंसा, तोड़फोड़ और कानूनी लड़ाई चली. 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देश के बाद ओयूपी इंडिया ने सार्वजनिक माफी जारी की.


जेम्स लेन की इस किताब में छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ बातें लिखी गई थीं. खासकर उनके जन्म और निजी जीवन को लेकर.
मराठी समाज और कई राजनीतिक संगठनों को लगा कि ये बातें न तो पक्के सबूतों पर आधारित हैं और न ही शिवाजी महाराज के सम्मान के अनुरूप हैं. लोगों का कहना था कि एक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक नायक के बारे में ऐसी बातें लिखना अपमान है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जब विरोध बढ़ा तो जेम्स लेन ने 2003 में ही माफी जारी की. उन्होंने कहा कि भारत से उन्हें प्यार है. उनका मकसद कभी भी शिवाजी महाराज को बदनाम करना नहीं था. अगर किसी की भावना आहत हुई है तो वे दुखी हैं. लेकिन मामला यहीं शांत नहीं हुआ.
किताब के विरोध में कुछ संगठनों ने पुणे में उग्र प्रदर्शन किए. संस्कृत के विद्वान डॉ. श्रीकांत बहुलकर के साथ बदसलूकी हुई. वजह सिर्फ इतनी थी कि उनका नाम किताब के आभार वाले पन्ने में था.

इसके बाद पुणे के मशहूर भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में तोड़फोड़ हुई. वहां मौजूद दुर्लभ पांडुलिपियां और ऐतिहासिक सामग्री को नुकसान पहुंचा.
कानूनी लड़ाई कहां से कहां तक गई?2004 में शिवाजी महाराज के वंशज और सांसद उदयनराजे भोसले ने मानहानि का केस दर्ज कराया. लेखक जेम्स लेन पर एफआईआर हुई, किताब पर बैन लगा. लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर रद्द कर दी. किताब पर लगा बैन भी हट गया. जिन लोगों ने लेखक की भाषा या रिसर्च में मदद की थी, उनके खिलाफ केस चलता रहा.
दिसंबर 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट की कोल्हापुर बेंच ने इस पुराने केस को निपटाते हुए सुझाव दिया कि जिन लोगों का इससे सीधा लेना देना नहीं था, वे माफी दे दें.
इसके बाद जनवरी 2026 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इंडिया ने अखबार में सार्वजनिक माफी छापी. उन्होंने माना कि किताब में शिवाजी महाराज को लेकर कुछ बातें बिना पुख्ता जांच के छापी गई थीं. इसके लिए उन्हें अफसोस है.

ओयूपी इंडिया ने कहा कि किताब बहुत कम समय के लिए छपी थी और 20 साल पहले ही बाजार से वापस ले ली गई थी. उन्होंने यह भी कहा कि वे हमेशा सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखते हैं और भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसका प्रयास करेंगे.
इस पूरे विवाद से क्या समझ आता है?ये मामला सिर्फ एक किताब का नहीं है. ये दिखाता है कि इतिहास, आस्था और पहचान जब आपस में टकराते हैं, तो मामला कितनी दूर तक जा सकता है.
साथ ही ये भी कि अकादमिक आज़ादी और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कितना जरूरी है. छत्रपति शिवाजी महाराज सिर्फ इतिहास नहीं, भावनाओं का विषय हैं. और इसी वजह से यह विवाद 20 साल बाद भी खत्म होने में वक्त लगा.
वीडियो: तारीख: छत्रपति शिवाजी ने मुगलों को इतना परेशान कैसे किया?













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