
बनारस में थे तो गोदौलिया जाते थे, दिल्ली में सरोजनी को पाया
गोदौलिया एक ज़माने में बनारस के लिए वही था, जो कभी पुरानी दिल्ली के लिए मीना बाज़ार हुआ करता था.
Advertisement

पिक्चर: mapmyindia

Advertisement
संज्ञा पाण्डेय क्योटो से हैं. माने काशी से. बीएचयू में पढ़कर पेट नहीं भरा तो दिल्ली के जेएनयू आ गईं. पीएचडी पूरी होने को है. खूब पढ़ी हैं, तो गाहे बगाहे फिरंगी भी इनसे हिन्दुस्तान का ताना-बाना समझने को आ जाते हैं. स्कॉलरशिप के पैसे सरोजिनी में उड़ाते हुए इन्होंने ज़िन्दगी का फलसफा खूब सीखा है. उनके दिल की बात यहां पेश है.

गोदौलिया मार्केट. पिक्चर: Quora
बचपन में एक दौर था जब हैप्पनिंग वीकेंड का मतलब गोदौलिया शॉपिंग पर जाना होता था. गैर बनारसियों का गोदौलिया से इंट्रो करा दें- गोदौलिया एक ज़माने में बनारस के लिए वही था, जो कभी पुरानी दिल्ली के लिए मीना बाज़ार हुआ करता था. नई सड़क से शुरू हो कर विश्वानाथ मंदिर को टच करते हुए सीधे दशाश्वमेध घाट पर जो रोड ख़तम होती है, उसी रोड को गुलजार करता है गोदौलिया मार्किट. मार्किट क्या पूरा पेरिस ! वेनिस !

गोदौलिया मार्केट. पिक्चर: Quora
मार्किट यूपी हैंडलूम की एक दुकान से शुरू होता था और फिर मार्किट का नशा फैशन साड़ी-घर, माधुरी सूट-घर, हीरालाल-पन्नालाल साडीज़ होते हुए गंगा जमुना फैशन शॉप पर परवान चढ़ता था. पता नहीं होता था कि क्या खरीदना है, पर मां-पापा के साथ जाना बहुत जरूरी था. चाहे वहां जाकर झख ही क्यों न मारें.
Advertisement
गोदौलिया जाने के लिए ताने भी बहुत सुने पड़ते थे. "पकौड़ी की तरह लटक लिए", उनमें सबसे ज्यादा चुभने वाला लगता था.
वक़्त के साथ बदलाव आया और हम बनारस से दिल्ली आ गए. यहां तो गेम ही बदल गया, वहां एक शहर का एक मार्किट और यहां तो एक शहर में कई-कई मार्किट. रेसिडेंशियल एरिया के अन्दर इतना सघन स्वर्ग जैसा मार्किट होगा, हमें तो एहसास ही नहीं था. दिल्ली पहुंचते ही पापा जी से जिद की कि बस यहीं जाना है- सरोजिनी मार्किट.जून की शाम पसीने से तर-बतर होते जब एस एन मार्किट देखा तो आंख फाड़-फाड़ कर देखते ही रह गए. उस दिन तो संकोच रहा पर मार्किट देख कर लगा कि एक सरोजिनी मार्किट में तो 100 गोदौलिया समा जाएगा. एस एन की पूरी महिमा को समझने में तो कई सारी ट्रिप लग गई.

पिक्चर: mapsofindia
मुद्रिका पकड़ के नॉरोजी नगर आते थे और पैदल एस एन मार्किट चल देते थे. मार्किट की जियोग्राफी समझी, फिर मार्किट की इकॉनमी समझी. फिर उसकी सोशियोलॉजी और आज तक सायकोलॉजी समझ रहे हैं. जैसे-जैसे समय बीता और हमारी परिपक्वता बढ़ी, तो लगा एस एन मार्किट बस शॉपिंग का स्वर्ग नहीं है, बल्कि ये अपने अंदर अनेकों समाज-शास्त्रीय सिद्धान्तों को समेटे हुए है और कई प्रचलित पूर्वाग्रहों को भी ध्वस्त करता है. एस एन मार्किट ने एक नए तरह के नारीवाद को बढ़ावा दिया है, जिसमें आज की नारी स्वच्छंदता से शॉपिंग का मजा ले सकती है.
Advertisement
गोदौलिया मार्किट से उलट सरोजिनी मार्किट महिलाओं की सुप्रीमेसी को बढ़ावा देता है. कोई भी साइज़, शेप और स्टाइल हो- यहां सबके लिए सब कुछ है. मार्किट में घुसते ही सब ओर से आवाज आती है “मैडम ज़ारा, डब्ल्यू, औरेलिया, शॉपर्स स्टॉप सबके कुर्ते हैं यहां”, “सेल-सेल, भारी सेल, 1000 की चीज 100 में.”
आश्चर्य तो ये है कि यहां डब्ल्यू के मोज़े भी मिलते हैं (पहली बार सुना, कि डब्ल्यू मोजा भी बनता है). मार्किट की सबसे अच्छी बात ये है कि इसने तय मान्यताओं को तोड़ा है. ये सस्ती और बेहतरीन हाफ-पैंट, पार्टी वियर ड्रेसेस, वन-पीस, यहां तक कि ब्रा और पैंटी को भी खुल्लम-खुल्ला खरीदने की आज़ादी देता है.

सरोजिनी मार्केट. पिक्चर: indianbeautycentral
यहां के दुकानदार बिहार, यूपी के छोटे गांवों और कस्बों से आते हैं. उनका कपड़ों का बखान करने का अपना अलहदा अंदाज है, जो दिल को लुभा जाता है. अगर आप शॉपिंग मूड में न भी हों, तब भी कुछ न कुछ खरीद ही लेती हैं.
शॉपिंग केवल एक फील-गुड फैक्टर ही नहीं दिलाता, बल्कि एक तरह का आत्मविश्वास भी जगाता है. यहां 50 रुपए से हजारों तक के मिलने वाले कपड़ों ने गरीबी-अमीरी की दीवार को तोड़ दिया है. यहां सब औरतें ऊंच-नीच, जात-पांत, हाई क्लास - लो क्लास को दीवार तोड़ कर एक ही दुकान पर बारगेनिंग करती नजर आती हैं. सरोजिनी नगर मार्किट, एक मार्किट बस नहीं है. ये एक नए तरह का नारीवाद है, जिस पर मार्क्स का वो मशहूर आह्वाहन सटीक बैठता है, जिसमें वो दुनिया के मजदूरों को एक होने को कहते हैं.
एस एन मार्किट को देख कर मन से एक ही आवाज़ आती है, "देश की महिलाओं, एक होकर सरोजिनी मार्किट में शॉपिंग करो, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए फैशन का चरम है."
ये भी पढ़ें









