"मैं देशवासियों से क्षमा मांगते हुए, सच्चे मन से कहता हूं कि शायद हमारी तपस्या में भी कोई कमी रह गई थी. हम अपनी बात कुछ किसान भाइयों को समझा नहीं पाए. आज गुरु नानक जी का प्रकाश पर्व है. आज मैं पूरे देश को ये बताने आया हूं, हमने 3 कृषि कानूनों को वापस करने का निर्णय किया है. हम तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की संवैधानिक प्रक्रिया जल्द शुरू करेंगे."PM मोदी के कृषि कानूनों पर फैसले का पूरा विश्लेषण जानने के लिए आप 19 नवंबर, 2021 के लल्लनटॉप शो को देख सकते हैं. बहरहाल, 29 नवंबर को संसद का सत्र शुरू होगा, इस दौरान ही इन तीनों कानूनों को वापस लेने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा. आइये आसान भाषा में समझते हैं कि यह संवैधानिक प्रक्रिया क्या है और कैसे किसी कानून को निरस्त (रिपील) किया जाता है? लेकिन यह समझने से पहले ये जानना भी ज़रूरी है कि कोई ‘कानून’ आख़िर बनता कैसे है.
मोदी जी ने क़ानून वापस लेने की घोषणा की (फोटो सोर्स- PTI )# कोई कानून कैसे बनता है? कानून बनाने का सबसे पहला स्टेप है विधेयक बनाना. अब आप पूछेंगे कि ये विधेयक क्या होता है. तो विधेयक (या आप अंग्रेज़ी में इसे बिल भी कह सकते हैं) किसी भी क़ानून का कच्चा रूप है. मतलब जो क़ानून बनने जा रहा है उसका ‘बीटा वर्ज़न’. कई कानून के जानकार और विशेषज्ञ मिलकर इस बिल को ड्राफ्ट करते हैं. कई बार आम लोगों से भी राय-मशवरा किया जाता है. उसके बाद इस बिल को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा हर पहलू से जांचा परखा जाता है. और इसमें वांछित सुधार किए जाते हैं. फिर अगर ये कैबिनेट से पास हो जाता है तो इसे (यानी विधेयक या बिल को) चर्चा के लिए संसद में भेजा जाता है. 'ज़्यादातर' विधेयकों की चर्चा में विपक्ष आपत्ति दर्ज कराता है और सरकार के मंत्री इस पर अपना जवाब देते है.
आगे बढ़ने से पहले हो सकता है आप जानना चाहें कि हमने ‘ज़्यादातर’ क्यों कहा, ‘सभी’ क्यूं नहीं? यानी वो कौन से विधेयक होते हैं, जिनमें विपक्ष आपत्ति दर्ज नहीं कराता? तो ऐसे विधेयकों में शामिल होते हैं, सांसदों की सैलरी बढ़ाने के लिए लाए गए विधेयक.
ख़ैर आपत्ति, बहस, सवाल-जवाब के अंत में वोटिंग कराई जाती है. अगर ज़्यादा सांसद बिल के पक्ष में होते हैं, तो बिल पास कर दिया जाता है. यही प्रोसेस संसद के दूसरे सदन में भी होती है. अब ये भी जान लीजिए कि विधेयक पहले लोकसभा में भी लाया जा सकता है और राज्यसभा में भी. लेकिन विधेयक दोनों सदनों में पास होना ज़रूरी है. तभी अगला स्टेप लिया जा सकता है. और वो अगला स्टेप होता है बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जाना. राष्ट्रपति ज़्यादा से ज़्यादा दो बार तक ही किसी बिल को रिव्यू करने के लिए वापस भेज सकते हैं. राष्ट्रपति के बिल को साइन करते ही बिल कानून बन जाता है.
लोकसभा में कृषि विधेयकों पर हंगामा (प्रतीकात्मक फोटो - इंडिया टुडे)अब तीनों कृषि विधेयकों को उदाहारण की तरह लें, तो इन्हें लोकसभा द्वारा 17 सितम्बर, 2020 को पास किया गया था और राज्यसभा ने इन्हें 20 सितम्बर, 2020 को पास किया. इसके अगले सात दिनों के भीतर ही राष्ट्रपति ने भी इन विधेयकों को साइन कर दिया, जिससे ये विधेयक से कानून बन गए. यानी कृषि विधेयक से कृषि क़ानून. # रिपील- रिपील (Repeal) शब्द का हिंदी अनुवाद है- किसी कानून को औपचारिक रूप से रद्द करना. यानी अगर सरकार* किसी कानून को देश या देश के लोगों के लिए रिपील या निरस्त कर दे तो फिर वो देश का क़ानून नहीं रहेगा. जैसे- माना सरकार ने ये क़ानून रिपील कर दिया कि हेलमेट न पहनने पर चालान नहीं होगा, तो कल को कोई ट्रैफ़िक इंस्पेक्टर हेलमेट न पहनने पर चालान नहीं कर सकता. हालांकि, दिया गया उदाहरण सिर्फ़ उदाहरण है, कोई विश नहीं, क्यूंकि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी. बट यू गॉट दी पॉईंट. राईट?
*अभी हम सरकार शब्द का यूज़ कर रहे हैं लेकिन जब हम रिपील करने की प्रोसेस जानेंगे तो आप इस शब्द को उस पूरी प्रोसेस से रिप्लेस कर लीजिएगा. पर रिपील की प्रोसेस समझने से पहले एक और टर्म समझ लिया जाए. # अबेयॉन्स- थोड़ा बैक डेट में चलते हैं. जनवरी 2021. दरअसल ये वो समय था जब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद किसानों के आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार ने कानूनों को '18 महीनों के लिए लागू न करने’ की बात कही. मतलब ठंडे बस्ते में डाल देने की. इसी को ‘अबेयॉन्स’ कहते हैं.
लेकिन यहां पर दिक्कत थी. दिक्कत ये कि सरकार किसी भी कानून पर ‘रोक’ नहीं लगा सकती थी.
तो क्या कर सकती है? उसे निरस्त या अमेंड. मतलब एक बार क़ानून बन गया तो उसे संसद द्वारा ‘स्टॉप’ तो किया जा सकता है, लेकिन ‘पॉज़’ नहीं. मतलब ‘रिपील’ किया जा सकता है ‘अबेयॉन्स’ नहीं. ज्यादा आसान भाषा में कहें तो निरस्त कर सकते हैं, कुछ बदलाव भी कर सकते हैं, लेकिन क़ानून बनाने के बाद उसके प्रभावी होने पर रोक नहीं लगा सकते. अब जब हमने ‘अबेयॉन्स’ और ‘रिपील’ के बीच अंतर जान लिया, तो आइए अंत में ‘रिपील’ करने का प्रोसेस भी जान लें.
क़ानून बनाने और उसे लागू करने के बीच या तो निरस्तीकरण आ सकता है या फिर बदलाव. अन्यथा उसका प्रभाव में आना रोक नहीं सकते (प्रतीकात्मक फोटो- आज तक)# दी एंड- आज तक को दिए एक इंटरव्यू में संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं-
'तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए सरकार को संसद में बिल पेश करना होगा.'मतलब साफ़ है कि क़ानून बनाने के लिए भी विधेयक पेश करना होता है और उसे निरस्त करने के लिए भी. और हां किसी क़ानून को अमेंड करने के लिए भी. इसलिए ही तो हमने आपको शुरू में ही बता दिया था कि क़ानून कैसे बनाया जाता है. मतलब पहले संसद (लोकसभा, राज्यसभा) फिर राष्ट्रपति. लेकिन ये क़ानून तो निरस्त किए जा रहे हैं. यानी 'दी एंड'. तो अब हम यहां पर स्टोरी का भी दी एंड कर सकते हैं.
अरे, रुकिए! कुछ और चीज़ें बोनस में समझते जाइए.
सबसे पहले ये जान लीजिए कि किसी क़ानून को निरस्त करने के लिए जो बिल या विधेयक लाया जाता है, उसे निरस्तीकरण विधेयक कहते हैं. अब आप कहेंगे हाऊ क्रिएटिव. साथ ही आपने ये भी गेस कर लिया होगा कि किसी क़ानून को अमेंड करने के लिए जो बिल लाया जाता है, उसे ‘अमेंडमेंट बिल’ कहा जाता होगा. यू आर राईट!
और दूसरी बोनस इंफ़ोर्मेशन ये कि संविधान का एक आर्टिकल है- ‘आर्टिकल 245’. और इसी आर्टिकल के तहत संसद न केवल किसी क़ानून को लागू कर सकती है, बल्कि अमेंड और रिपील भी. हालांकि, 1950 से पहले ये आर्टिकल सिर्फ़ क़ानून को लागू करने की इजाज़त देता था. लेकिन फिर इसमें भी अमेंडमेंट किया गया. अब ये जानना भी इंट्रेस्टिंग है कि अगर 1950 तक आर्टिकल अमेंड करने की संविधान इजाज़त ही नहीं देता था तो अमेंड करने वाला रूल कैसे अमेंड किया गया. मतलब ये सवाल वैसा ही विशियस सर्कल बनाता है. जैसा, ‘पहले मुर्गी आई या अंडा?’ वाला सवाल बनाता है. पर हम इसमें नहीं जाएंगे और वन लाइनर में ये समझ लेंगे कि: आर्टिकल 245 के चलते संसद किसी क़ानून को बना, हटा या संशोधित कर सकती है.
संसद भवन (प्रतीकात्मक फोटो- आज तक)इसी को कन्फ़र्म करते हुए पूर्व केंद्रीय विधि सचिव पीके मल्होत्रा नवभारत टाइम्स को बताते हैं-
"संविधान के तहत किसी कानून को निरस्त करने के लिए संसद की शक्ति, उस कानून को लागू करने के समान ही होती है."# एक और तरीक़े से किया जा सकता है क़ानून निरस्त/रद्द/रिपील- क्या आपको ऑर्डिनेंस के बारे में पता है? ऑर्डिनेंस को एक टेंटेटिव क़ानून समझिए. मतलब ऐसा बिल जो संसद में पास नहीं हुआ, लेकिन क़ानून की तरह लागू कर दिया गया. या दूसरी भाषा में कहें, तो सारा प्रोसिज़र क़ानून बनाने वाला ही इस्तेमाल किया गया, बस संसद में पास होने वाले स्टेप को मिस कर दिया गया.
अब आप कहेंगे फिर तो सरकार हर क़ानून इसी ‘बैक डोर’ से क्यों नहीं ले आती, ऑर्डिनेंस वाले रास्ते से? खामख्वाह की बहस, चिल्ल-पों से बचेगी और वोटिंग के दौरान होने वाली धुक-धुक से भी.
वो इसलिए क्योंकि जैसा पहली लाइन में आपको बताया था, ऑर्डिनेंस एक ‘टेंटेटिव क़ानून’ है. मतलब उसे 6 महीनों के भीतर संसद से पास करवाया जाना ज़रूरी है. साथ ही ऑर्डिनेंस अर्जेंसी में लाया जाता है, मतलब जब संसद सत्र न चल रहा हो.
इसे एक ऐसे उदाहरण से समझिए, जो सत्य घटना से प्रेरित है. देखिए, अभी देश में प्रदूषण अपने चरम पर है. 'बाई दी वे' हालात इमरजेंसी वाले हो जाएं (वैसे तो हैं ही, बट यू गॉट दी पॉईंट. राईट?) और सरकार कहे कि हमें कल से ही कुछ ऐसे क़ानून लागू करने हैं, जिनसे प्रदूषण कम हो. तो सरकार फटाफट एक बिल ड्राफ़्ट करेगी और उसे ऑर्डिनेंस के माध्यम से क़ानून बना देगी. अब जब संसद का अगला सेशन शुरू होगा, तब इसे संसद में पास करवाने का प्रयास किया जाएगा. जैसे ये स्टोरी 22 नवंबर, 2021 को लिखी गई है और संसद का अगला सत्र, शीत सत्र, 29 नवंबर, 2021 से शुरू होगा. तो स्पष्ट है कि उसके बाद ही ये ऑर्डिनेंस वाला टेंटेटिव क़ानून, परमानेंट बन जाएगा. पर सोचिए अगर ये, प्रदूषण कंट्रोल वाला ऑर्डिनेंस परमानेंट न भी बनता, तो भी सही तरीक़े से लागू होने की स्थिति में इसने अपना काम कर दिया.
लेकिन, हमने आपको ऑर्डिनेंस के बारे में क्यूं बताया? क्यूंकि जैसे क़ानून लागू करने के लिए ऑर्डिनेंस लाया जा सकता है. ठीक वैसे ही किसी क़ानून को निरस्त करने के लिए भी. लेकिन, क़ानून को निरस्त करने वाले ऑर्डिनेंस को भी, क़ानून लागू करने वाले ऑर्डिनेंस की तरह ही 6 माह के भीतर संसद में पास करवाना होता है. # दी एंड, लास्ट टाइम- तो साफ़ है कि कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए सरकार के पास दो रास्ते हैं. या तो सरकार एक बिल लाकर तीनों कानूनों को निरस्त कर सकती है या ऑर्डिनेंस के माध्यम से . लेकिन ऑर्डिनेंस वाले रास्ते से कानूनों को निरस्त करने के बाद उसे अगले 6 महीने के भीतर बिल लाना/पास कराना होगा.





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