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जिस जगह पर पहले चीन की सेना अधिकार जमाने वाली थी, वहां अब प्रधानमंत्री मोदी भारतीय सेना बैठाएंगे

इतनी ना नुकुर के बाद ये डील हुई है, बड़ी बात है!

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फोटो - thelallantop
भारत और सेशेल्‍स आखिरकार एजम्‍शन आईलैंड पर इंडियन नेवी बेस बनाने पर राजी हो गए हैं.
खबर छोटी सी है मगर 'दूर तलक जाएगी'. असर के आधार पर भी, समय के आधार पर भी. आइए समझते हैं कैसे -
राजू बेंगलुरु में रहता है, वहीं उसका सारा बिज़नस फैला हुआ है. लेकिन उसकी जितनी भी राइवल यानी प्रतिस्पर्धी कंपनियां हैं वो सब दिल्ली में हैं. राजू उन सब कंपनियों पर नज़र रखना चाहता है, क्यूंकि उनकी प्लानिंग के हिसाब से ही वो भी अपना अलग कदम उठाएगा. साथ ही ये भी जान जाएगा कि मार्केट में नया क्या चल रहा है. बेंगलुरु से दिल्ली की कंपनियों पर पल-पल की नज़र रखना संभव नहीं. साथ ही उसका दिल्ली में होना प्रतिस्पर्धी कंपनियों को अखरता है. इसलिए उसने एक छोटा सा ऑफिस गुरुग्राम में खोल लिया है. जहां उसका बहुत कम स्टाफ रहता है, और इस स्टाफ का काम ही दिल्ली की प्रतिस्पर्धी कंपनियों पर नज़र रखना है. ये ऑफिस है गुरुग्राम में ही लेकिन आदेश सीधे बेंगलुरु से लेता है.



दुनिया में नॉर्थ कोरिया और अमेरिका के बीच के रिश्ते को कौन नहीं जानता?
दुनिया में नॉर्थ कोरिया और अमेरिका के बीच के रिश्ते को कौन नहीं जानता?

अमेरिका को नॉर्थ कोरिया से खतरा है और नॉर्थ कोरिया पर नज़र रखना उसके लिए बहुत मुश्किल है क्यूंकि नॉर्थ कोरिया अमेरिका से न केवल कोसों दूर है बल्कि बीच में गहरा समुद्र भी है.
लेकिन नॉर्थ कोरिया के साथ अपना बॉर्डर शेयर करने वाला साउथ कोरिया, अमेरिका का बहुत अच्छा दोस्त है. इसलिए वो अमेरिका को अपनी ज़मीन में एक सैनिक टुकड़ी रखने की इज़ाज़त दे देता है. ऐसी सैनिक टुकड़ी जो अमेरिका की होगी लेकिन रहेगी साउथ कोरिया में. ये टुकड़ी अमेरिका में बैठे अपने बॉस की आज्ञा का पालन करेगी. ‘साउथ कोरिया और अमेरिका के बीच हुए किसी समझौते के तहत’ साउथ कोरिया का इस सेना पर ‘नहीं के बराबर’ हस्तक्षेप होगा. लेकिन साउथ कोरिया को इससे कोई दिक्कत नहीं है, बल्कि वो ऐसी व्यवस्था से खुश ही है.
ऐसा कई कारणों के चलते है - एक तो उसे पता है कि चाहे ये टुकड़ी सीधे अमेरिका से आदेश ले रही है, लेकिन फिर भी इसके यहां होने का साउथ कोरिया को भी फायदा ही है, क्यूंकि दोनों का दुश्मन एक ही है. साथ ही अमेरिका जहां पर अपना मिलिट्री बेस स्थापित करेगा उस जगह को खुद डिवेलप करेगा. दूसरी तरफ साउथ कोरिया का एहसान भी वो कई अन्य तरीकों से चुकाएगा – जैसे आर्थिक सहायता देकर, अमेरिका आने पर साउथ कोरिया के लोगों को वीज़ा में छूट देकर या कोरियन (साउथ) कंपनियों को अमेरिका में ‘इज़ ऑफ़ बिज़नस’ उपलब्ध करवाकर.
क्या ये इत्तेफ़ाक है कि अमेरिका में अगर अमेरिकन कंपनी को कोई टक्कर दे पाया तो वो कोरियन कंपनी है? क्या ये भी इत्तेफ़ाक है कि पिछले कुछ सालों में 'कोरियन पॉप' संगीत अमेरिका में काफी फेमस हुआ है. गंगनम स्टाईल तो याद ही होगा.
क्या ये इत्तेफ़ाक है कि अमेरिका में अगर अमेरिकन कंपनी को कोई टक्कर दे पाया तो वो कोरियन कंपनी है? क्या ये भी इत्तेफ़ाक है कि पिछले कुछ सालों में 'कोरियन पॉप' संगीत अमेरिका में काफी फेमस हुआ है? गंगनम स्टाईल तो याद ही होगा.

अमेरिका की इस सैनिक टुकड़ी को ही - मिलिट्री बेस कहा जाता है.
ज़्यादा स्पेसिफिक होकर कहें तो –
अमेरिका की इस सैनिक टुकड़ी को अमेरिका का साउथ कोरिया में स्थित मिलिट्री बेस कहा जाता है.
परिभाषा के हिसाब से देखें तो -
किसी राष्ट्र (माना A) का किसी दूसरे राष्ट्र (माना B) में मिलिट्री बेस होने का अर्थ है कि A राष्ट्र के सेना की एक शाखा को B राष्ट्र आश्रय देता है, साथ ही उस शाखा के प्रशिक्षण और संचालन को सुविधाजनक बनाता है. मिलिट्री बेस सेना की एक या एक से यूनिट्स के लिए आश्रय बनता है, लेकिन इसका उपयोग कमांड सेंटर या ट्रेनिंग ग्राउंड के रूप में भी किया जा सकता है.
मिलिट्री बेस अगर नौसेना के लिए हों तो उन्हें नेवल बेस और वायु सेना के लिए हों तो एयर बेस कहा जाता है.
नोट: कई बार ये मिलिट्री बेस अस्थाई भी होते हैं. जैसे गल्फ युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिका को एयर बेस बनाने की इजाज़त दी थी. और ये व्यवस्था केवल युद्ध के दौरान ही मान्य थी.


अमेरिका के विश्व में सबसे अधिक मिलट्री बेस हैं. ये वाली फोटो इज़रायल स्थित उनके पहले मिलट्री बेस की है,
अमेरिका के विश्व में सबसे अधिक मिलट्री बेस हैं. ये वाली फोटो इज़रायल स्थित उनके पहले मिलट्री बेस की है.

यूं मिलिट्री बेस का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य अपने किसी मित्र देश के माध्यम से शांति काल में दुश्मन देशों पर नज़र रखना और युद्ध काल में लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन को मज़बूत बनाना है.
इसके अलावा दो देशों की सेनाओं के बीच सामंजस्य और देशों के बीच आपसी निर्भरता में वृद्धि करने में भी मिलिट्री बेस महत्वपूर्ण योगदान देता है. जहां पर मिलिट्री बेस स्थापित होता है, ज़्यादातर मामलों में वो देश तुलनात्मक रूप से उस देश से कमज़ोर होता है जिस देश का बेस स्थापित किया गया है. इसलिए इस ‘बेस की स्थापना’ के चलते, उसका केवल सैन्य ही नहीं चहुंमुखी विकास भी सुनिश्चित होता है.
दुनिया में सबसे ज़्यादा मिलिट्री बेस अमेरिका के हैं. रूस, यूके, फ्रांस के भी विश्व भर में काफी मिलिट्री बेस हैं.
ये विडंबना है कि ज़्यादा मिलिट्री बेस होने से क्या सिद्ध होता होगा –
क्या अमेरिका के दुनिया में सबसे ज़्यादा दुश्मन हैं, इसलिए ही उसे इतने मिलिट्री बेस बनाने की ज़रूरत पड़ी?
या
अमेरिका के दुनिया में सबसे ज़्यादा दोस्त हैं, इसलिए ही उसे इतने मिलिट्री बेस बनाने की इजाज़त मिली?
या फिर,
अमेरिका के दुनिया में सबसे ज़्यादा दोस्त और दुश्मन हैं.



# बहरहाल, अब हम बात करते हैं भारत की -

भारत के कुल चार जगहों पर मिलिट्री बेस हैं –
भूटान, मेडागास्कर, मॉरिशस और सेशल्स.
फोटो मेडागास्कर के स्वघोषित राजा - किंग जूलियन की है. लेकिन ये वो मेडागास्कर जिसकी लेख में बात की जा रही है. बस एक नोस्टेलजिक फील आ रही थी.
फोटो मेडागास्कर के स्वघोषित राजा - किंग जूलियन की है. लेकिन ये वो मेडागास्कर नहीं जिसकी लेख में बात की जा रही है. फोटो बस एक नोस्टेलजिक फील के चलते 'विषयांतर' लगाई गई है.



# क्या है नए मिलिट्री बेस की कहानी?

ऊपर की लिस्ट में चार देश हैं. इन चार देशों में सेशल्स भी है. क्यूं?
क्यूंकि भारत का एक मिलिट्री बेस सेशल्स में पहले ही है – होने को ये पहले से स्थित मिलिट्री बेस, मिलिट्री बेस कम और एक सर्विलांस सिस्टम अधिक है जो सेशल्स के समुदी तट में भारत द्वारा तैनात किया गया है और उसके रखरखाव का जिम्मा भी भारत का ही है.
भारतीय नौसेना
भारतीय नौसेना

तो अब जिस मिलिट्री बेस की इजाज़त भारत को मिली है वो है एजम्शन आईलैंड पर इंडियन नेवी का मिलिट्री बेस.
इस नेवल मिलिट्री बेस (या नेवी के मिलिट्री बेस या नेवी बेस) के अप्रूवल से पहले बहुत ना नुकुर हुई थी.


# टाइमलाइन -

सबसे पहले जब 2015 में प्रधानमंत्री सेशेल्स की यात्रा में गए थे तो एक एमओयू भी साइन हुआ था कि भारत सेशल्स के ‘एजम्शन आईलैंड’ पर (सेशल्स की सहायता से) एक मिलिट्री बेस बनाएगा.
इसको लेकर काम शुरू होता उससे पहले ही विरोध के स्वर ऊंचे हो गए. विरोध का कारण सेशेल्से की विपक्षी सरकार और चीन के साथ सेशल्स के मज़बूत हो रहे रिश्ते थे.
सेशेल्स के राष्ट्रपति डैनी फॉरे
सेशेल्स के राष्ट्रपति डैनी फॉरे

असल में चीन और सेशल्स के रिश्ते कभी कमज़ोर रहे ही नहीं थे. चीन ने तो 2011 में ही घोषित कर दिया था कि वो अपना पहला मिलिट्री बेस सेशल्स में ही स्थापित करेगा. लेकिन ये पोस्ट लिखे जाने तक चीन का केवल एक जगह मिलिट्री बेस है जो पिछले साल ही स्थापित किया गया था. और वो जगह सेशल्स न होकर जिबूती (Djibouti) है.
तो जैसे ही चीन ने 2015 में भारत और सेशल्स के डील की बात सुनी उसने सेशल्स पर अप्रत्यक्ष दबाब डालना शुरू कर दिया. चीन और सेशल्स के पुराने रिश्तों की दुहाई देने लगा. यूं सेशल्स, भारत के साथ साइन की गई डील से पीछे हटने लगा.
एकाधिक बार भारत के विदेश सचिव को इस डील को बचाने के लिए सेशल्स जाना पड़ा. और अंततः इस साल 27 जनवरी को भारत के विदेश सचिव सुब्रमनियम जयशंकर और सेशेल्स के राज्य सचिव, बैरी फाउरे ने एक समझौते पर दस्तखत किए थे. जिसके अंतर्गत सेशल्स द्वारा भारतीय नौसेना को सेशल्स के ‘एजम्शन आईलैंड’ में नौसेना बेस और एयरस्ट्रिप बनाने की अनुमति मिली थी.
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सेशल्स (साभार - गूगल मैप्स)

और इस राष्ट्र का ‘एजम्शन आईलैंड’ तो और भी छोटा सा द्वीप है.
एजम्शन आईलैंड (साभार: गूगल मैप्स)
एजम्शन आईलैंड (साभार: गूगल मैप्स)

जहां सेशल्स हिंद महासागर के दक्षिणी भाग में स्थित है और अफ्रीका के बहुत करीब है वहीं ‘एजम्शसन आईलैंड’ हिंद महासागर के और भी दक्षिणी भाग में स्थित है और अफ्रीका के और भी करीब है.
तो इस मिलिट्री बेस के जरिए भारतीय नौसेना के जहाजों की सोमालिया आदि के पाइरेट्स से सुरक्षा सुनिश्चित होगी. इस डील के तहत सेशेल्स की राजधानी विक्टोतरिया के दक्षिण पश्चिम में स्थित 1,135 किलोमीटर की दूरी तक भारतीय सैनिक तैनात होंगे. साथ ही भारत को अपनी नौसेना के विस्तार का मौका भी मिलेगा जिनके अभी तक केवल भारत के तटों पर ही बेस थे.
एजम्शन आईलैंड का नासा द्वारा खींचा गया चित्र
एजम्शन आईलैंड का नासा द्वारा खींचा गया चित्र

सेशल्स के फायदे की बात की जाए तो जिन भारतीय नौसेनिकों की एजम्शलन आईलैंड में ड्यूटी लगेगी, वे सेशेल्स के सैनिकों को भी ट्रेनिंग देंगे. होने को अभी तक लगभग खाली पड़े एजम्शकन आईलैंड के लोग इस डील से उतने खुश नहीं है और उन्हें एजम्शन के इकोसिस्टम के बिगड़ने का भय है.


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