कल्पना कीजिए अथाह सागर की. दूर-दूर तक सिर्फ पानी. सिर्फ लहरें और कुछ नहीं. ऐसा लगे कि पानी के पार कोई दुनिया ही नहीं है. जमीन का एक टुकड़ा नजर से इतनी दूर हो कि कल्पना तक से गायब हो जाए. विशाल समुद्र के बीच में एक छोटी-सी नाव बह रही है. पानी पर तैरती ये नाव लहरों के उतार-चढ़ाव से ऊपर-नीचे होती है. लगता है अब डूबी-तब डूबी. इसी का एकदम जुड़वा सीन आसमान में होता है, जब उसमें कोई हवाई जहाज उड़ता है. वहां लहरें हवा की बनती हैं. उनमें भंवर बनते हैं. इस भंवर में हवाई जहाज फंसते भी हैं. तब जो उथल-पुथल मचती है, वो कहलाता है ‘एयर टर्बुलेंस’.
क्या होता है टर्बुलेंस जिसके झटके ने एयर इंडिया विमान में यात्रियों को घायल कर दिया?
फुकेट से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट AI2379 टर्बुलेंस की चपेट में आने से 17 लोग घायल हो गए. आइए समझते हैं कि एयर टर्बुलेंस क्या होता है, इसके पीछे क्या वजहें होती हैं और क्या इससे विमान के क्रैश होने का खतरा रहता है.

वही एयर टर्बुलेंस जो मंगलवार, 4 अगस्त की सुबह एयर इंडिया की फ्लाइट AI2379 के साथ हुआ तो 13 यात्री और 4 क्रू मेंबर घायल हो गए. ये फ्लाइट थाईलैंड के फुकेट से दिल्ली आ रही थी. उड़ान के दौरान अचानक कुछ देर के लिए ऊंचाई (Altitude) खो बैठी. हालांकि, इसके बाद भी विमान सामान्य रूप से उड़ता रहा और सुबह 11:07 बजे सुरक्षित दिल्ली में लैंड कर गया. इस फ्लाइट में कुल 137 यात्री और 8 क्रू मेंबर सवार थे. टर्बुलेंस की वजह से इनमें से 17 घायल हो गए, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. इनमें से 5 पैसेंजर ठीक होकर अस्पताल से डिस्चार्ज हो गए हैं.
टर्बुलेंस इतना ही खतरनाक होता है. बहुत रेयर केस को छोड़ दें तो सिर्फ टर्बुलेंस या हवा के तेज झटकों की वजह से कोई जहाज कभी उल्टा नहीं हो सकता. न बेकाबू होकर घूमने (टेलस्पिन) लगता है. न ही आसमान से गिर जाता है. टर्बुलेंस यात्रियों को परेशान कर सकता है. उन्हें चोट लग सकती है, लेकिन इससे प्लेन क्रैश का कोई खतरा नहीं होता है. ये ऐसी चीज है जो यात्रियों की जान भले अटका दे, लेकिन एविएशन की भाषा में यह एक नॉर्मल सिचुएशन मानी जाती है.

'टर्बुलेंस' (Turbulence) शब्द का इतिहास काफी पुराना है. फ्रेंच, अंग्रेजी और जर्मन जैसी भाषाओं में इसका इस्तेमाल लंबे समय से ‘हलचल, उथल-पुथल और अव्यवस्था’ बताने के लिए होता रहा है. यह लैटिन भाषा के 'टर्बुलेंशिया' (Turbulentia) से आया हुआ शब्द है. इसका मतलब होता है अशांति, परेशानी या गड़बड़ी. बताते हैं कि सदियों पहले इस शब्द का इस्तेमाल जानवरों, भीड़ या शरारती बच्चों के बेचैन व्यवहार को बताने के लिए किया जाता था. बाद में समुद्र की लहरों और नदियों के तेज बहाव को वैज्ञानिक लेखों में टर्बुलेंस कहा जाने लगा.
आज के समय में टर्बुलेंस बोलते ही एक ही चीज ध्यान में आती है. विमान में ‘खबड़-खबड़’ हुई होगी. यानी एयर टर्बुलेंस.
एयर टर्बुलेंस क्या है?एयर टर्बुलेंस ऐसी घटना है, जिससे हर पायलट बचना चाहता है. हर यात्री के लिए ये बेहद खराब अनुभव होता है. इससे बचने के लिए क्रू मेंबर कहते भी हैं कि सीट में लगी बेल्ट कसकर बांध लीजिए.
टर्बुलेंस असल में एयर फ्लो में दबाव और रफ्तार में आया अचानक परिवर्तन होता है, जिससे विमान को धक्का लगता है. विमान चलते-चलते ऊपर-नीचे हिलने लगता है, जिसे Aircraft Shaking कहते हैं. टर्बुलेंस की वजह से मामूली झटकों से लेकर तेज और लंबे झटके महसूस किए जा सकते हैं. जिसके नतीजे बेहद भयावह भी हो सकते हैं. हवा की स्थिरता के आधार पर टर्बुलेंस को हल्के, मध्यम, गंभीर या एक्सट्रीम टर्बुलेंस में बांटा जाता है.
मध्यम टर्बुलेंस के दौरान, विमान पर नियंत्रण बनाए रखा जाता है. यात्रियों को सीट बेल्ट के खिलाफ तनाव महसूस होता है, जबकि गंभीर टर्बुलेंस से विमान की एयर स्पीड में बदलाव होता है. साथ ही, उसके एल्टिट्यूड और एटिट्यूड में भी तेजी से बदलाव आ सकता है. एक्सट्रीम टर्बुलेंस में विमान हवा में गोते खाने लगता है.

समुद्र की लहरों की तरह जब हवा किसी पहाड़ या ऊंची इमारत से टकराती है तो हवा में भी लहरें बनती हैं. हवा में टर्बुलेंस कई पर्यावरणीय कारकों की वजह से होता है. जैसे तेज हवा या फिर मौसम में अचानक हुआ बदलाव. शेफील्ड स्कूल ऑफ एयरोनॉटिक्स के मुताबिक, टर्बुलेंस के मुख्य कारण हैंः
– कम ऊंचाई पर तेज हवा से घर्षण होता है और एयर फ्लो सतह से प्रभावित होता है. चूंकि यह सीधा और स्थिर नहीं होता, इसलिए दिशा में वेरिएशन के साथ, एयरस्पीड में बदलाव होता है. विमान हिलने लगते हैं.
– दूसरे विमानों से भी टर्बुलेंस होता है. इस घटना को वेक टर्बुलेंस (Wake Turbulence) कहते हैं. यह तब होता है जब एक हवाई जहाज के पास से दूसरा हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर गुजरता है. इससे विमान दूसरे विमान की हवा में फंस जाता है. विमान जितना बड़ा होगा, टर्बुलेंस उतना ही गंभीर होगा.
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– कई बार सूरज की गर्मी से भी टर्बुलेंस होता है. ऐसा इसलिए, क्योंकि यह थर्मल या गर्म हवा की पॉकेट्स को ट्रिगर करती है, जो वर्तमान हवाओं के साथ टकराती हैं तो उड़ान में झटके लगते हैं.
अब सबसे बड़ी बात ये कि एयर टर्बुलेंस एक आम घटना है. ऐसा नहीं है कि एयर टर्बुलेंस के दौरान विमान दुर्घटना का शिकार हो जाए. जानकारों का मानना है कि जब तक प्लेन में कोई तकनीकी खराबी नहीं होती, या पायलट से कोई गलती नहीं होती या फिर प्लेन किसी बड़ी आपदा का शिकार नहीं होता, तब तक प्लेन क्रैश नहीं हो सकता.
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