दो तारीख़, तीन बयान और विरोधाभास.
पाकिस्तान में इमरान खान ने सेना और TLP से पंगा लिया, आगे क्या खतरे हैं?
कई हलकों में चर्चा है कि इमरान ख़ान की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है.
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पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार कई चुनौतियों का सामना कर रही है.
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25 अक्टूबर 2021. पाकिस्तान के गृहमंत्री शेख रशीद अहमद ने कहा कि तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) के साथ समझौता हो गया है. सरकार TLP के 350 कार्यकर्ताओं को रिहा करेगी. पार्टी पर लगा प्रतिबंध हटाने पर भी विचार किया जाएगा. इसके अलावा, TLP की बाकी मांगों पर कैबिनेट मीटिंग में चर्चा होगी. जिस समय शेख़ राशिद ये बयान दे रहे थे, उस समय प्रधानमंत्री इमरान ख़ान सऊदी अरब में थे.
एक दिन बाद इमरान ख़ान वापस लौटे. 27 अक्टूबर को कैबिनेट की मीटिंग हुई. मीटिंग के ठीक बाद सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस हुई. चौधरी बेतरह नाराज़ थे. उन्होंने कहा कि धैर्य की भी सीमा होती है. TLP को अब चरमपंथी संगठन समझा जाएगा. उन्हें कानून को चुनौती देने की छूट नहीं दी जाएगी.
इसके कुछ देर बाद शेख़ राशीद ने भी मीडिया से बात की. उन्होंने पंजाब सरकार को पैरा मिलिट्री फ़ोर्स उतारने की इजाज़त भी दी. राशिद ने ये भी कहा कि फ़्रेंच दूतावास बंद करने की मांग को नहीं माना जा सकता. TLP उग्रवादी हो चुका है.
दो दिन के अंतराल में सरकार के सुर में इतना बड़ा बदलाव क्यों आया था? TLP के प्रोटेस्ट की पूरी कहानी क्या है और इसने पाकिस्तान सरकार की नाक में दम क्यों कर रखा है?
कुछ दिनों पहले तक इमरान ख़ान ISI चीफ़ का मसला सुलझा रहे थे. वो सुलझा तो आर्थिक मदद के लिए सऊदी अरब गए. इस बीच में TLP उनके सिर पर सवार हो गया. कई हलकों में चर्चा चल रही है कि इमरान ख़ान की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. उनकी सरकार ने जनता और सेना, दोनों का समर्थन खो दिया है. इन दावों में कितना दम है? क्या इमरान ख़ान पाकिस्तान में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन पाएंगे? आज इन्हीं सवालों पर विस्तार से बात करेंगे. कहानी शुरू करने से पहले बैकग्राउंड पाकिस्तान में एक ईसाई महिला रहा करती थी. आसिया बीबी. उसकी जीवनचर्या दिहाड़ी मज़दूरी पर टिकी थी. जून 2009 में एक दिन साथी मज़दूरों के साथ पानी पीने को लेकर झगड़ा हो गया. उन मज़दूरों ने उस पर ईशनिंदा का आरोप लगा दिया. 2010 में निचली अदालत ने आसिया बीबी को मौत की सज़ा सुना दी. जेल में रहने के दौरान एक फ़्रेंच पत्रकार ने आसिया बीबी से बात कर एक किताब लिखी. ब्लासफ़ेमी: अ मेमॉयर. ये किताब 2013 में आई थी. इसमें उसने अपनी आपबीती इस तरह बताई थी,
आसिया बीबी
चार जनवरी 2011 को इस्लामाबाद में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई. सलमान तासीर का हत्यारा और कोई नहीं, बल्कि उनका अपना बॉडीगार्ड था. मुमताज़ क़ादरी. उसको तुरंत गिरफ़्तार कर लिया गया. क़ादरी को हत्या का कोई अफ़सोस नहीं था. उसने कहा कि ईशनिंदा का विरोध करने वाला भी ईशनिंदा का दोषी है. मैंने तो बस मुसलमान होने का फ़र्ज़ अदा किया है.
मुमताज क़ादरी का मसला कठमुल्लों को लुभाने लगा. इस मौके पर चौका मारा, एक इस्लामिक नेता ख़ादिम हुसैन रिज़वी ने. उन्होंने पाकिस्तान की सड़कों पर उतरकर प्रोटेस्ट किए. मुमताज़ क़ादरी के समर्थन में. कट्टर मुस्लिमों का एक बड़ा धड़ा उनसे जुड़ा. इसके बाद का इतिहास ये है कि जैसे-जैसे मुमताज़ क़ादरी और आसिया बीबी का केस आगे बढ़ा, ख़ादिम रिज़वी का ग्राफ़ भी ऊपर जाता रहा.
अगस्त 2015 में ख़ादिम रिज़वी ने तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान की स्थापना की. इसका मकसद पाकिस्तान को एक ऐसा देश बनाना है, जो शरियत-ए-मोहम्मदी के हिसाब से चले.
अगस्त 2015 में ख़ादिम रिज़वी ने तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान की स्थापना की.
सलमान तासीर के मामले में मुमताज़ क़ादरी को मौत की सज़ा सुनाई गई. TLP ने पाकिस्तान सरकार पर बहुत दबाव डाला कि क़ादरी को माफ़ी दी जाए. नवाज़ शरीफ़ उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे. उन्होंने TLP के आगे झुकने से मना कर दिया.
मार्च 2016 में क़ादरी को फांसी पर चढ़ा दिया गया. रावलपिंडी में उसके जनाजे में लाखों लोग इकट्ठा हुए. जनाजे पर फूलों की बारिश की गई. क़ादरी को शहीद का दर्ज़ा दिया गया. जनाजे में जमा हुए लोग सरकार, अदालत और मीडिया से बेतरह नाराज़ थे. इस रैली को TLP के बैनर तले आयोजित किया गया था. इसने पार्टी को पाकिस्तान की मेनस्ट्रीम में ला दिया था. TLP के लिए दूसरा मौका TLP के लिए दूसरा मौका आया, अक्टूबर 2018 में. जब पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने आसिया बीबी की सज़ा को रद्द कर दिया. इस फ़ैसले के विरोध में TLP लाव-लश्कर लेकर इस्लामाबाद की सीमा पर बैठ गई. सरकार ने समझा-बुझाकर प्रोटेस्ट ख़त्म करा दिया. जब-जब कट्टरता का मसला उठता, तब-तब TLP बोरिया-बिस्तर लेकर निकल आती. जब मामला सामान्य होता, तब वो अपने दड़बे में घुस जाती थी.
2019 का पूरा साल और 2020 के शुरुआती कुछ महीने शांतिपूर्वक बीते. फिर आया अक्टूबर 2020. फ़्रांस में एक चेचेन मुस्लिम ने एक स्कूल टीचर सैमुअल पैटी की हत्या कर दी. उस टीचर ने कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद का एक कार्टून क्लास में दिखाया था.
इस हत्या के विरोध में पूरा फ़्रांस एकजुट हो गया. फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ये कह दिया कि कार्टून दिखाए जाते रहेंगे. ये उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. उन्होंने ये भी कहा कि इस्लाम में पुनर्जागरण की ज़रूरत है.
मुस्लिम देशों ने इस बयान को हाथोंहाथ लिया. फ़्रांस का बहिष्कार करने की धमकी दी जाने लगी. पाकिस्तान में इस विरोध का मोर्चा TLP ने संभाला. उसने फ़्रेंच प्रोडक्ट्स को बायकॉट करने और फ़्रेंच दूतावास को बंद करने की मांग रखी. नवंबर 2020 में सरकार ने समझौता कर लिया. सरकार ने 17 फ़रवरी 2021 तक का समय मांगा. फ़्रेच राजदूत को बाहर निकालने के लिए.
पाकिस्तान में फ्रांस का विरोध.
समझौता होने के चार दिन बाद ही ख़ादिम रिज़वी की मौत हो गई. सरकार को लगा कि TLP की लीडरशिप कमज़ोर पड़ गई है. उन्होंने समझौते की शर्तों पर से ध्यान हटा दिया. लेकिन ये उनकी भूल साबित हुई. ख़ादिम रिज़वी की मौत के बाद TLP की कमान उनके बेटे साद रिज़वी के पास आई. साद रिज़वी को उसके बाप से अधिक कट्टर माना जाता है. फ़रवरी 2021 की शुरुआत में उसने धमकी जारी कर दी. तब जाकर सरकार की नींद टूटी. सरकार ने फिर समय मांगा. 20 अप्रैल 2021 तक का. लेकिन पाकिस्तानी एलीट फ़ोर्स की एक टीम ने डेडलाइन से आठ दिन पहले साद रिज़वी को अरेस्ट कर लिया. TLP का प्रोटेस्ट चलता रहा. कई शहरों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक मुठभेड़ भी हुई.
ख़ादिम रिज़वी की मौत के बाद TLP की कमान उनके बेटे साद रिज़वी के पास आई जिसे पिता से भी ज्यादा कट्टर माना जाता है.
15 अप्रैल को सरकार ने TLP पर बैन लगा दिया. पार्टी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को अरेस्ट किया गया. उस समय तो प्रोटेस्ट शांत पड़ गया. लेकिन हमेशा के लिए नहीं. पिछले कुछ दिनों से TLP साद रिज़वी को रिहा करने, प्रतिबंध हटाने और फ़्रेंच राजदूत को निकालने की मांग को लेकर एक बार फिर सड़कों पर है. इसी को लेकर हुकूमत में भगदड़ मची है. गृहमंत्री TLP की मांगों को मानने की बात करते हैं. जबकि दो दिन बाद ही सरकार अपनी बात से मुकर गई. सरकार के सुर में बदलाव की वजह क्या थी? दरअसल, कैबिनट मीटिंग में मंत्रियों के अलावा सैन्य अधिकारी भी शामिल हुए थे. जानकारों का अनुमान है कि इसके पीछे सेना का दबाव है. सेना पाकिस्तानी तालिबान (TTP) से पहले से ही परेशान चल रही है. सेना का संबंध न तो TTP के साथ अच्छा है और ना ही TLP के साथ. सेना कतई नहीं चाहती कि TLP वाली मुसीबत और बढ़े.
मंत्री फवाद चौधरी.
सरकार क्या कर रही है? क्या सरकार TLP के ख़िलाफ निर्णायक अभियान चलाने का मूड बना चुकी है? इसको लेकर भी संशय है. इमरान ख़ान की समस्या ये है कि उन्हें सबको साथ लेकर चलना है. वो TLP पर सख़्त कार्रवाई करके कट्टर धार्मिक वोटर बेस की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहेंगे. प्रधानमंत्री बनने से पहले इमरान ख़ान ने यहां तक कहा था कि उनकी पार्टी के लोग TLP की रैली में शामिल होने के इच्छुक हैं. ऐसा करके वो अपने कैंपेन के लिए समर्थन जुटाना चाहते थे. पाकिस्तान में इस लालच के बुरी बला साबित होने का लंबा इतिहास रहा है. हालांकि, उन्हें उस इतिहास से सबक लेना नहीं सीखा.
फिलहाल, TLP ने दूसरे हफ़्ते भी अपना प्रदर्शन जारी रखा है. उनका मकसद राजधानी इस्लामाबाद को घेरने का है. अभी तक हुई हिंसक झड़प में पांच पुलिसवालों की मौत हो चुकी है. आने वाले दिनों में ये संघर्ष और तेज़ होने की आशंका है. दूसरी तरफ़ से पुलिस और पैरा मिलिटरी ने भी मोर्चा संभाला हुआ है.
पाकिस्तान की इस्लामिक रैली का नजारा.
इस समय इमरान ख़ान के सामने दो विकल्प हैं. एक विकल्प कुएं का है, दूसरा खाई का. अगर वो TLP पर सख़्त होते हैं तो उनका कट्टर वोटर बेस जाएगा. अगर नहीं होते हैं तो आतंकवाद को बढ़ावा मिलेगा. ये पाकिस्तान की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता के लिए नुकसानदेह होगा. पाकिस्तान में ऊंट किस करवट बढ़ता है, उस पर हमारी नज़र बनी रहेगी. इमरान की दूसरी मुसीबत क्या है? ये तो हुई पहली मुसीबत. इमरान ख़ान की दूसरी मुसीबत खुफिया एजेंसी ISI के डायरेक्टर-जनरल की नियुक्ति से जुड़ी है. ISI चीफ़ की नियुक्ति को लेकर एक परंपरा रही है. आर्मी चीफ़ तीन नामों की छंटनी करके प्रधानमंत्री के पास भेजते हैं. फिर प्रधानमंत्री उसमें से अपनी पसंद के व्यक्ति की नियुक्ति करते हैं. लेकिन इस दफा इस परंपरा को किनारे कर दिया गया. 6 अक्टूबर को सीधे ऐलान हुआ. सेना ने फ़ैज हमीद की जगह नदीम अंजुम की सीधी नियुक्ति कर दी. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान इससे नाराज़ हो गए. उन्हें एक भरम हुआ. भरम ये कि वो जनता के समर्थन से सरकार चला रहे हैं. उनकी कुर्सी कायम रखने में सेना की कोई भूमिका नहीं है.
सेना ने ISI चीफ के लिए नदीम अंजुम की सीधी नियुक्ति कर दी
पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान के हालात को देखते हुए इमरान ख़ान फ़ैज़ हमीद को अगले साल तक के लिए पद पर रखना चाहते थे. काबुल की गद्दी पर तालिबान की वापसी में फ़ैज़ हमीद की अहम भूमिका रही है. क़ब्ज़े के कुछ दिनों बाद वो तालिबान लीडरशिप से मिलने काबुल गए थे. इसलिए, पीएमओ ने ISI चीफ़ की नियुक्ति को फंसाए रखा. सरकार की तरफ़ से नोटिफ़िकेशन जारी नहीं किया गया. इससे सेना और सिविलियन सरकार के बीच तनाव बढ़ने लगा. सरकार कहती रही कि सब ठीक चल रहा है. लेकिन पर्दे के पीछे हाई-प्रोफ़ाइल मीटिंग्स का दौर जारी था.
#11 अक्टूबर को आर्मी चीफ़ क़मर जावेद बाजवा और इमरान ख़ान की मीटिंग हुई. इसके बाद बयान आया कि सेना और प्रधानमंत्री के रिश्ते मधुर हैं. कोई भी एक-दूसरे की गरिमा को नीचे नहीं गिराएगा.
#13 अक्टूबर को सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने ट्वीट किया कि चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ और प्रधानमंत्री के बीच बातचीत का दौर पूरा हो गया है. जल्दी ही नई नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी.
उस समय कयास लगे थे कि इमरान ख़ान सेना से अपनी बात मनवाने में कामयाब हो गए हैं. अब वो अपनी पसंद के व्यक्ति को ISI चीफ़ बना सकते हैं.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान.
ये कयास एक अफ़वाह बनकर रह गई. 26 अक्टूबर को पीएमओ ने नोटिफ़िकेशन जारी किया. इसमें नए ISI चीफ़ के तौर पर नदीम अंजुम का ही नाम लिखा था. यानी सेना की नियुक्ति में कोई बदलाव नहीं किया गया था. इस घटना ने एक बार फिर सेना का वरदहस्त साबित कर दिया था. हालांकि, इस चक्कर में इमरान ख़ान ने अपना ही कद घटा लिया. फिलहाल तो तनाव पर विराम लगता दिख रहा है. लेकिन ये कब तक बरकरार रहेगा, ये देखने वाली बात होगी. ये थी चुनौती नंबर दो. तीसरी चुनौती के बारे में भी जान लीजिए पाकिस्तान में महंगाई का ग्राफ़ लगातार ऊपर जा रहा है. ईंधन, खाने की चीज़ों समेत कई और बुनियादी चीज़ों के दाम बढ़ रहे हैं. पाकिस्तानी रुपये का मूल्य नीचे गिर रहा है. इसको लेकर आम जनता में नाराज़गी है. विपक्षी पार्टियां इसको लेकर सरकार को घेर रही है. विपक्षी पार्टियों के गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) ने दो हफ़्ते तक देशव्यापी प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. फ़ाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) मनी-लॉन्ड्रिंग और टेरर फ़ाइनेंशिंग पर नज़र रखने वाली संस्था है. ये दुनियाभर के देशों को पैसे वाले अपराध को रोकने के लिए ज़रूरी उपाय बताती रहती है. FATF मानदंडों पर खरा नहीं उतरने वाले देशों को ग्रे-लिस्ट में डाल देती है. इस लिस्ट में जाने का मतलब ये है कि संबंधित देश में मनी-लॉन्ड्रिंग और टेरर फ़ंडिंग का अपराध चल रहा है.
Pakistan Rupee Imf Dollar
पाकिस्तान FATF की ग्रे-लिस्ट में पहली बार 2008 में गया था. अगले साल ही वो बाहर निकल आया. फिर 2012 से 2015 तक वो इस लिस्ट में रहा. फिर 2018 से पाकिस्तान लगातार ग्रे-लिस्ट में बना हुआ है. 2019 में उसे 27 ऐक्शन प्लान दिए गए थे. अक्टूबर 2021 में FATF ने अपडेटेड लिस्ट जारी की. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वो इस बार बाहर निकल आएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.FATF ने कहा कि पाकिस्तान ने 27 में 26 ऐक्शन-प्लान पर अमल किया. एक पर नहीं किया, इसलिए उन्हें बरकरार रखा गया. ग्रे-लिस्ट में रहने से पाकिस्तान को क्या नुकसान हो रहा है? जानकारों का कहना है कि इससे सीधे तौर पर कोई प्रतिबंध नहीं लगते. लेकिन इसके साइड-इफ़ैक्ट्स बहुत अधिक हैं. इससे विदेशी निवेश रुकता है. निवेशकों को ये ख़तरा होता है कि संबंधित देश कभी भी ब्लैक लिस्ट में डाला जा सकता है. पाकिस्तान को पिछले 12 सालों में तीन बार FATF की ग्रे-लिस्ट में डाला गया है. स्वतंत्र थिंक-टैंक तबादलब की रिसर्च के अनुसार, इसके चलते 2008 से 2019 के बीच पाकिस्तान को लगभग तीन लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है. पाकिस्तानी अख़बार ‘द न्यूज़ इंटरनैशनल’ के अनुसार, पाकिस्तान को अगले दो साल की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए लगभग चार लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत है.
पाकिस्तान FATF की ग्रे-लिस्ट में पहली बार 2008 में गया था.
इमरान ख़ान अपनी हालिया सऊदी अरब यात्रा से चालीस हज़ार करोड़ रुपये की मदद लेकर आए हैं. उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर लटकी तलवार थोड़े समय के लिए टाल दी है. लेकिन कब तक, ये कहना मुश्किल है. क्या इन मुसीबतों से इमरान ख़ान सरकार को ख़तरा है?
जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान में जो संकट दिख रहा है, उसमें कुछ भी नया नहीं है. ये पहले भी होता रहा है. या यूं कहें कि ये समस्याएं उनके साथ नत्थी हैं. जहां तक सेना की तरफ़ से तख़्तापलट की बात है, इसकी संभावना भी कम है. क्यों?
जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान में पहली बार हाईब्रिड शासन अस्तित्व में आया है. सेना ने ये तय कर लिया है कि वो पर्दे के पीछे से ही सरकार पर नियंत्रण रखेगी. इमरान ख़ान के साथ उनका सफ़र ठीक चला है.
जहां तक दो मुख्य विपक्षी पार्टियों पीएमएल-एन और पीपीपी की बात है, वहां नेतृत्व का संकट चल रहा है. इन दोनों पार्टियों को लेकर सेना बहुत सहज भी नहीं रहती. इसलिए वो इमरान सरकार को अपदस्थ नहीं करना चाहेगी.
एक दिन बाद इमरान ख़ान वापस लौटे. 27 अक्टूबर को कैबिनेट की मीटिंग हुई. मीटिंग के ठीक बाद सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस हुई. चौधरी बेतरह नाराज़ थे. उन्होंने कहा कि धैर्य की भी सीमा होती है. TLP को अब चरमपंथी संगठन समझा जाएगा. उन्हें कानून को चुनौती देने की छूट नहीं दी जाएगी.
इसके कुछ देर बाद शेख़ राशीद ने भी मीडिया से बात की. उन्होंने पंजाब सरकार को पैरा मिलिट्री फ़ोर्स उतारने की इजाज़त भी दी. राशिद ने ये भी कहा कि फ़्रेंच दूतावास बंद करने की मांग को नहीं माना जा सकता. TLP उग्रवादी हो चुका है.
दो दिन के अंतराल में सरकार के सुर में इतना बड़ा बदलाव क्यों आया था? TLP के प्रोटेस्ट की पूरी कहानी क्या है और इसने पाकिस्तान सरकार की नाक में दम क्यों कर रखा है?
कुछ दिनों पहले तक इमरान ख़ान ISI चीफ़ का मसला सुलझा रहे थे. वो सुलझा तो आर्थिक मदद के लिए सऊदी अरब गए. इस बीच में TLP उनके सिर पर सवार हो गया. कई हलकों में चर्चा चल रही है कि इमरान ख़ान की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. उनकी सरकार ने जनता और सेना, दोनों का समर्थन खो दिया है. इन दावों में कितना दम है? क्या इमरान ख़ान पाकिस्तान में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन पाएंगे? आज इन्हीं सवालों पर विस्तार से बात करेंगे. कहानी शुरू करने से पहले बैकग्राउंड पाकिस्तान में एक ईसाई महिला रहा करती थी. आसिया बीबी. उसकी जीवनचर्या दिहाड़ी मज़दूरी पर टिकी थी. जून 2009 में एक दिन साथी मज़दूरों के साथ पानी पीने को लेकर झगड़ा हो गया. उन मज़दूरों ने उस पर ईशनिंदा का आरोप लगा दिया. 2010 में निचली अदालत ने आसिया बीबी को मौत की सज़ा सुना दी. जेल में रहने के दौरान एक फ़्रेंच पत्रकार ने आसिया बीबी से बात कर एक किताब लिखी. ब्लासफ़ेमी: अ मेमॉयर. ये किताब 2013 में आई थी. इसमें उसने अपनी आपबीती इस तरह बताई थी,
‘मेरा नाम आसिया बीबी है. मुझे पानी की तलब के चलते मौत की सज़ा सुनाई गई है. मैं इसलिए जेल में बंद हूं, क्योंकि मैंने ईसाई होकर मुस्लिमों के कप से पानी पी लिया था.’किताब आने से कई बरस पहले जेल में एक ख़ास विजिटर आया था. सलमान तासीर. तासीर उस समय पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर हुआ करते थे. वो ईशनिंदा कानून के धुर-विरोधी थे. मिलने के बाद तासीर ने आसिया की रिहाई की मांग की. इसको लेकर कठमुल्ले उनके ख़िलाफ़ हो गए.
आसिया बीबीचार जनवरी 2011 को इस्लामाबाद में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई. सलमान तासीर का हत्यारा और कोई नहीं, बल्कि उनका अपना बॉडीगार्ड था. मुमताज़ क़ादरी. उसको तुरंत गिरफ़्तार कर लिया गया. क़ादरी को हत्या का कोई अफ़सोस नहीं था. उसने कहा कि ईशनिंदा का विरोध करने वाला भी ईशनिंदा का दोषी है. मैंने तो बस मुसलमान होने का फ़र्ज़ अदा किया है.
मुमताज क़ादरी का मसला कठमुल्लों को लुभाने लगा. इस मौके पर चौका मारा, एक इस्लामिक नेता ख़ादिम हुसैन रिज़वी ने. उन्होंने पाकिस्तान की सड़कों पर उतरकर प्रोटेस्ट किए. मुमताज़ क़ादरी के समर्थन में. कट्टर मुस्लिमों का एक बड़ा धड़ा उनसे जुड़ा. इसके बाद का इतिहास ये है कि जैसे-जैसे मुमताज़ क़ादरी और आसिया बीबी का केस आगे बढ़ा, ख़ादिम रिज़वी का ग्राफ़ भी ऊपर जाता रहा.
अगस्त 2015 में ख़ादिम रिज़वी ने तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान की स्थापना की. इसका मकसद पाकिस्तान को एक ऐसा देश बनाना है, जो शरियत-ए-मोहम्मदी के हिसाब से चले.
अगस्त 2015 में ख़ादिम रिज़वी ने तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान की स्थापना की.सलमान तासीर के मामले में मुमताज़ क़ादरी को मौत की सज़ा सुनाई गई. TLP ने पाकिस्तान सरकार पर बहुत दबाव डाला कि क़ादरी को माफ़ी दी जाए. नवाज़ शरीफ़ उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे. उन्होंने TLP के आगे झुकने से मना कर दिया.
मार्च 2016 में क़ादरी को फांसी पर चढ़ा दिया गया. रावलपिंडी में उसके जनाजे में लाखों लोग इकट्ठा हुए. जनाजे पर फूलों की बारिश की गई. क़ादरी को शहीद का दर्ज़ा दिया गया. जनाजे में जमा हुए लोग सरकार, अदालत और मीडिया से बेतरह नाराज़ थे. इस रैली को TLP के बैनर तले आयोजित किया गया था. इसने पार्टी को पाकिस्तान की मेनस्ट्रीम में ला दिया था. TLP के लिए दूसरा मौका TLP के लिए दूसरा मौका आया, अक्टूबर 2018 में. जब पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने आसिया बीबी की सज़ा को रद्द कर दिया. इस फ़ैसले के विरोध में TLP लाव-लश्कर लेकर इस्लामाबाद की सीमा पर बैठ गई. सरकार ने समझा-बुझाकर प्रोटेस्ट ख़त्म करा दिया. जब-जब कट्टरता का मसला उठता, तब-तब TLP बोरिया-बिस्तर लेकर निकल आती. जब मामला सामान्य होता, तब वो अपने दड़बे में घुस जाती थी.
2019 का पूरा साल और 2020 के शुरुआती कुछ महीने शांतिपूर्वक बीते. फिर आया अक्टूबर 2020. फ़्रांस में एक चेचेन मुस्लिम ने एक स्कूल टीचर सैमुअल पैटी की हत्या कर दी. उस टीचर ने कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद का एक कार्टून क्लास में दिखाया था.
इस हत्या के विरोध में पूरा फ़्रांस एकजुट हो गया. फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ये कह दिया कि कार्टून दिखाए जाते रहेंगे. ये उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. उन्होंने ये भी कहा कि इस्लाम में पुनर्जागरण की ज़रूरत है.
मुस्लिम देशों ने इस बयान को हाथोंहाथ लिया. फ़्रांस का बहिष्कार करने की धमकी दी जाने लगी. पाकिस्तान में इस विरोध का मोर्चा TLP ने संभाला. उसने फ़्रेंच प्रोडक्ट्स को बायकॉट करने और फ़्रेंच दूतावास को बंद करने की मांग रखी. नवंबर 2020 में सरकार ने समझौता कर लिया. सरकार ने 17 फ़रवरी 2021 तक का समय मांगा. फ़्रेच राजदूत को बाहर निकालने के लिए.
पाकिस्तान में फ्रांस का विरोध.समझौता होने के चार दिन बाद ही ख़ादिम रिज़वी की मौत हो गई. सरकार को लगा कि TLP की लीडरशिप कमज़ोर पड़ गई है. उन्होंने समझौते की शर्तों पर से ध्यान हटा दिया. लेकिन ये उनकी भूल साबित हुई. ख़ादिम रिज़वी की मौत के बाद TLP की कमान उनके बेटे साद रिज़वी के पास आई. साद रिज़वी को उसके बाप से अधिक कट्टर माना जाता है. फ़रवरी 2021 की शुरुआत में उसने धमकी जारी कर दी. तब जाकर सरकार की नींद टूटी. सरकार ने फिर समय मांगा. 20 अप्रैल 2021 तक का. लेकिन पाकिस्तानी एलीट फ़ोर्स की एक टीम ने डेडलाइन से आठ दिन पहले साद रिज़वी को अरेस्ट कर लिया. TLP का प्रोटेस्ट चलता रहा. कई शहरों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक मुठभेड़ भी हुई.
ख़ादिम रिज़वी की मौत के बाद TLP की कमान उनके बेटे साद रिज़वी के पास आई जिसे पिता से भी ज्यादा कट्टर माना जाता है.15 अप्रैल को सरकार ने TLP पर बैन लगा दिया. पार्टी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को अरेस्ट किया गया. उस समय तो प्रोटेस्ट शांत पड़ गया. लेकिन हमेशा के लिए नहीं. पिछले कुछ दिनों से TLP साद रिज़वी को रिहा करने, प्रतिबंध हटाने और फ़्रेंच राजदूत को निकालने की मांग को लेकर एक बार फिर सड़कों पर है. इसी को लेकर हुकूमत में भगदड़ मची है. गृहमंत्री TLP की मांगों को मानने की बात करते हैं. जबकि दो दिन बाद ही सरकार अपनी बात से मुकर गई. सरकार के सुर में बदलाव की वजह क्या थी? दरअसल, कैबिनट मीटिंग में मंत्रियों के अलावा सैन्य अधिकारी भी शामिल हुए थे. जानकारों का अनुमान है कि इसके पीछे सेना का दबाव है. सेना पाकिस्तानी तालिबान (TTP) से पहले से ही परेशान चल रही है. सेना का संबंध न तो TTP के साथ अच्छा है और ना ही TLP के साथ. सेना कतई नहीं चाहती कि TLP वाली मुसीबत और बढ़े.
मंत्री फवाद चौधरी.सरकार क्या कर रही है? क्या सरकार TLP के ख़िलाफ निर्णायक अभियान चलाने का मूड बना चुकी है? इसको लेकर भी संशय है. इमरान ख़ान की समस्या ये है कि उन्हें सबको साथ लेकर चलना है. वो TLP पर सख़्त कार्रवाई करके कट्टर धार्मिक वोटर बेस की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहेंगे. प्रधानमंत्री बनने से पहले इमरान ख़ान ने यहां तक कहा था कि उनकी पार्टी के लोग TLP की रैली में शामिल होने के इच्छुक हैं. ऐसा करके वो अपने कैंपेन के लिए समर्थन जुटाना चाहते थे. पाकिस्तान में इस लालच के बुरी बला साबित होने का लंबा इतिहास रहा है. हालांकि, उन्हें उस इतिहास से सबक लेना नहीं सीखा.
फिलहाल, TLP ने दूसरे हफ़्ते भी अपना प्रदर्शन जारी रखा है. उनका मकसद राजधानी इस्लामाबाद को घेरने का है. अभी तक हुई हिंसक झड़प में पांच पुलिसवालों की मौत हो चुकी है. आने वाले दिनों में ये संघर्ष और तेज़ होने की आशंका है. दूसरी तरफ़ से पुलिस और पैरा मिलिटरी ने भी मोर्चा संभाला हुआ है.
पाकिस्तान की इस्लामिक रैली का नजारा.इस समय इमरान ख़ान के सामने दो विकल्प हैं. एक विकल्प कुएं का है, दूसरा खाई का. अगर वो TLP पर सख़्त होते हैं तो उनका कट्टर वोटर बेस जाएगा. अगर नहीं होते हैं तो आतंकवाद को बढ़ावा मिलेगा. ये पाकिस्तान की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता के लिए नुकसानदेह होगा. पाकिस्तान में ऊंट किस करवट बढ़ता है, उस पर हमारी नज़र बनी रहेगी. इमरान की दूसरी मुसीबत क्या है? ये तो हुई पहली मुसीबत. इमरान ख़ान की दूसरी मुसीबत खुफिया एजेंसी ISI के डायरेक्टर-जनरल की नियुक्ति से जुड़ी है. ISI चीफ़ की नियुक्ति को लेकर एक परंपरा रही है. आर्मी चीफ़ तीन नामों की छंटनी करके प्रधानमंत्री के पास भेजते हैं. फिर प्रधानमंत्री उसमें से अपनी पसंद के व्यक्ति की नियुक्ति करते हैं. लेकिन इस दफा इस परंपरा को किनारे कर दिया गया. 6 अक्टूबर को सीधे ऐलान हुआ. सेना ने फ़ैज हमीद की जगह नदीम अंजुम की सीधी नियुक्ति कर दी. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान इससे नाराज़ हो गए. उन्हें एक भरम हुआ. भरम ये कि वो जनता के समर्थन से सरकार चला रहे हैं. उनकी कुर्सी कायम रखने में सेना की कोई भूमिका नहीं है.
सेना ने ISI चीफ के लिए नदीम अंजुम की सीधी नियुक्ति कर दीपड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान के हालात को देखते हुए इमरान ख़ान फ़ैज़ हमीद को अगले साल तक के लिए पद पर रखना चाहते थे. काबुल की गद्दी पर तालिबान की वापसी में फ़ैज़ हमीद की अहम भूमिका रही है. क़ब्ज़े के कुछ दिनों बाद वो तालिबान लीडरशिप से मिलने काबुल गए थे. इसलिए, पीएमओ ने ISI चीफ़ की नियुक्ति को फंसाए रखा. सरकार की तरफ़ से नोटिफ़िकेशन जारी नहीं किया गया. इससे सेना और सिविलियन सरकार के बीच तनाव बढ़ने लगा. सरकार कहती रही कि सब ठीक चल रहा है. लेकिन पर्दे के पीछे हाई-प्रोफ़ाइल मीटिंग्स का दौर जारी था.
#11 अक्टूबर को आर्मी चीफ़ क़मर जावेद बाजवा और इमरान ख़ान की मीटिंग हुई. इसके बाद बयान आया कि सेना और प्रधानमंत्री के रिश्ते मधुर हैं. कोई भी एक-दूसरे की गरिमा को नीचे नहीं गिराएगा.
#13 अक्टूबर को सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने ट्वीट किया कि चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ और प्रधानमंत्री के बीच बातचीत का दौर पूरा हो गया है. जल्दी ही नई नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी.
उस समय कयास लगे थे कि इमरान ख़ान सेना से अपनी बात मनवाने में कामयाब हो गए हैं. अब वो अपनी पसंद के व्यक्ति को ISI चीफ़ बना सकते हैं.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान.ये कयास एक अफ़वाह बनकर रह गई. 26 अक्टूबर को पीएमओ ने नोटिफ़िकेशन जारी किया. इसमें नए ISI चीफ़ के तौर पर नदीम अंजुम का ही नाम लिखा था. यानी सेना की नियुक्ति में कोई बदलाव नहीं किया गया था. इस घटना ने एक बार फिर सेना का वरदहस्त साबित कर दिया था. हालांकि, इस चक्कर में इमरान ख़ान ने अपना ही कद घटा लिया. फिलहाल तो तनाव पर विराम लगता दिख रहा है. लेकिन ये कब तक बरकरार रहेगा, ये देखने वाली बात होगी. ये थी चुनौती नंबर दो. तीसरी चुनौती के बारे में भी जान लीजिए पाकिस्तान में महंगाई का ग्राफ़ लगातार ऊपर जा रहा है. ईंधन, खाने की चीज़ों समेत कई और बुनियादी चीज़ों के दाम बढ़ रहे हैं. पाकिस्तानी रुपये का मूल्य नीचे गिर रहा है. इसको लेकर आम जनता में नाराज़गी है. विपक्षी पार्टियां इसको लेकर सरकार को घेर रही है. विपक्षी पार्टियों के गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) ने दो हफ़्ते तक देशव्यापी प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. फ़ाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) मनी-लॉन्ड्रिंग और टेरर फ़ाइनेंशिंग पर नज़र रखने वाली संस्था है. ये दुनियाभर के देशों को पैसे वाले अपराध को रोकने के लिए ज़रूरी उपाय बताती रहती है. FATF मानदंडों पर खरा नहीं उतरने वाले देशों को ग्रे-लिस्ट में डाल देती है. इस लिस्ट में जाने का मतलब ये है कि संबंधित देश में मनी-लॉन्ड्रिंग और टेरर फ़ंडिंग का अपराध चल रहा है.
Pakistan Rupee Imf Dollarपाकिस्तान FATF की ग्रे-लिस्ट में पहली बार 2008 में गया था. अगले साल ही वो बाहर निकल आया. फिर 2012 से 2015 तक वो इस लिस्ट में रहा. फिर 2018 से पाकिस्तान लगातार ग्रे-लिस्ट में बना हुआ है. 2019 में उसे 27 ऐक्शन प्लान दिए गए थे. अक्टूबर 2021 में FATF ने अपडेटेड लिस्ट जारी की. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वो इस बार बाहर निकल आएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.FATF ने कहा कि पाकिस्तान ने 27 में 26 ऐक्शन-प्लान पर अमल किया. एक पर नहीं किया, इसलिए उन्हें बरकरार रखा गया. ग्रे-लिस्ट में रहने से पाकिस्तान को क्या नुकसान हो रहा है? जानकारों का कहना है कि इससे सीधे तौर पर कोई प्रतिबंध नहीं लगते. लेकिन इसके साइड-इफ़ैक्ट्स बहुत अधिक हैं. इससे विदेशी निवेश रुकता है. निवेशकों को ये ख़तरा होता है कि संबंधित देश कभी भी ब्लैक लिस्ट में डाला जा सकता है. पाकिस्तान को पिछले 12 सालों में तीन बार FATF की ग्रे-लिस्ट में डाला गया है. स्वतंत्र थिंक-टैंक तबादलब की रिसर्च के अनुसार, इसके चलते 2008 से 2019 के बीच पाकिस्तान को लगभग तीन लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है. पाकिस्तानी अख़बार ‘द न्यूज़ इंटरनैशनल’ के अनुसार, पाकिस्तान को अगले दो साल की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए लगभग चार लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत है.
पाकिस्तान FATF की ग्रे-लिस्ट में पहली बार 2008 में गया था.इमरान ख़ान अपनी हालिया सऊदी अरब यात्रा से चालीस हज़ार करोड़ रुपये की मदद लेकर आए हैं. उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर लटकी तलवार थोड़े समय के लिए टाल दी है. लेकिन कब तक, ये कहना मुश्किल है. क्या इन मुसीबतों से इमरान ख़ान सरकार को ख़तरा है?
जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान में जो संकट दिख रहा है, उसमें कुछ भी नया नहीं है. ये पहले भी होता रहा है. या यूं कहें कि ये समस्याएं उनके साथ नत्थी हैं. जहां तक सेना की तरफ़ से तख़्तापलट की बात है, इसकी संभावना भी कम है. क्यों?
जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान में पहली बार हाईब्रिड शासन अस्तित्व में आया है. सेना ने ये तय कर लिया है कि वो पर्दे के पीछे से ही सरकार पर नियंत्रण रखेगी. इमरान ख़ान के साथ उनका सफ़र ठीक चला है.
जहां तक दो मुख्य विपक्षी पार्टियों पीएमएल-एन और पीपीपी की बात है, वहां नेतृत्व का संकट चल रहा है. इन दोनों पार्टियों को लेकर सेना बहुत सहज भी नहीं रहती. इसलिए वो इमरान सरकार को अपदस्थ नहीं करना चाहेगी.
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