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आटा मिलना बंद, शुभेंदु सरकार के फैसले के बाद राशन कार्ड वालों का क्या होगा?

West Bengal News: पश्चिम बंगाल के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री अशोक कीर्तनिया का कहना है कि आटे की पिसाई, उसकी पैकिंग और फिर गोदामों से राशन की दुकानों तक पहुंचने के खेल में बिचौलिए और भ्रष्ट अधिकारी करोड़ों डकार रहे थे. आटे की क्वालिटी को लेकर भी हमेशा सवाल उठते रहे हैं..

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बंगाल में राशन वाली 'आटे की थैली' पर ताला

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों 'चावल-आटा' सिर्फ पेट भरने का सामान नहीं, बल्कि एक बड़ा सियासी अखाड़ा बन गया है. मामला ये है कि बंगाल के नए-नवेले खाद्य और आपूर्ति मंत्री अशोक कीर्तनिया ने कुर्सी संभालते ही एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने पूरे राज्य में खलबली मचा दी है. उन्होंने आदेश दिया है कि अब सरकारी राशन (PDS) की लिस्ट से 'गेहूं का आटा' (Whole Wheat Flour) गायब हो जाएगा. अब आप सोच रहे होंगे कि भला सरकार आटा क्यों बंद कर रही है? क्या लोगों को अब रोटी नहीं मिलेगी? या फिर इसके पीछे कोई बहुत बड़ा 'खेला' हो गया है?

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दरअसल, इसके पीछे की कहानी रोटी से ज्यादा 'करप्शन' की बोरी से जुड़ी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मंत्री जी का दावा है कि बंगाल के राशन सिस्टम में अगर सबसे ज्यादा कहीं सेंधमारी हो रही थी, तो वो आटे की सप्लाई में थी. शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नई व्यवस्था में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात कही जा रही है. अशोक कीर्तनिया का ये फैसला उसी दिशा में एक बड़ी 'सर्जिकल स्ट्राइक' माना जा रहा है. लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ आटा बंद कर देने से भ्रष्टाचार रुक जाएगा या फिर ये गरीबों की थाली पर सीधा हमला है?

घोटाले की 'जड़' पर प्रहार या प्रशासनिक मजबूरी?

बंगाल में राशन घोटाला कोई नई बात नहीं है. पिछले कुछ सालों में ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) ने इस विभाग में इतने चक्कर काटे हैं कि आम जनता भी समझ गई थी कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है. पूर्व खाद्य मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक का जेल में होना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि सिस्टम के अंदर कितनी गहरी दीमक लगी थी. अशोक कीर्तनिया का कहना है कि आटे की पिसाई, उसकी पैकिंग और फिर गोदामों से राशन की दुकानों तक पहुंचने के खेल में बिचौलिए और भ्रष्ट अधिकारी करोड़ों डकार रहे थे. आटे की क्वालिटी को लेकर भी हमेशा सवाल उठते रहे हैं. कई बार शिकायतें आईं कि राशन में मिलने वाला आटा खाने लायक ही नहीं होता.

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मंत्री जी ने दो टूक कह दिया है कि पार्टी ने हमें बहुत बड़ी जिम्मेदारी दी है और बंगाल में सबसे बड़े घोटाले खाद्य और शिक्षा विभाग में हुए हैं. अब बहुत हो चुका, आगे कोई घोटाला नहीं होने दिया जाएगा. यानी सरकार का लॉजिक सीधा है कि न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. जब सरकारी सिस्टम से आटा पिसवाने और पैकेट बनवाने का झंझट ही खत्म हो जाएगा, तो न उसमें हेराफेरी का मौका मिलेगा और न ही घटिया क्वालिटी की शिकायत आएगी. लेकिन इस फैसले का दूसरा पक्ष ये है कि बंगाल की एक बड़ी आबादी, जो मजदूरी करती है, उसके लिए पिसा-पिसाया आटा एक बड़ी राहत थी. अब उन्हें फिर से चक्की के चक्कर काटने पड़ेंगे.

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अशोक कीर्तनिया, खाद्य और आपूर्ति मंत्री, पश्चिम बंगाल (फोटो-PTI)

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स: एक विश्लेषण

इस बड़े बदलाव पर राजनीतिक और आर्थिक जानकारों की राय भी बंटी हुई है. कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुदीप्तो सेनगुप्ता ने 12 मई 2026 को एक लोकल टीवी डिबेट में कहा कि,

सरकार का ये कदम प्रशासनिक रूप से साहसिक लग सकता है, लेकिन ये 'शॉर्टकट' है. भ्रष्टाचार रोकने के लिए सप्लाई चेन को डिजिटल और पारदर्शी बनाना चाहिए था, न कि सीधा प्रोडक्ट ही बंद कर देना चाहिए. इससे उन लाखों लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा जो अब गेहूं पिसवाने के लिए अलग से पैसे खर्च करेंगे.

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वहीं, फूड सिक्योरिटी एक्सपर्ट रितिका खेड़ा ने लल्लनटॉप से बात करते हुए कहा,

PDS में लीकेज रोकने का सबसे सीधा तरीका 'कमोडिटी को सरल बनाना' है. अगर सरकार साबुत अनाज देती है, तो उसमें मिलावट की गुंजाइश कम होती है. आटे में चोकर की मात्रा या अन्य चीजों की मिलावट पकड़ना आम आदमी के लिए मुश्किल होता है. इसलिए सरकार का ये तर्क कि वो भ्रष्टाचार रोक रही है, तकनीकी रूप से सही बैठता है, भले ही ये आम आदमी की सुविधा के खिलाफ दिखे.

जहां तक राशन में कमी का सवाल है तो रितिका कहती हैं,

नियमों के मुताबिक पांच किलो राशन सरकार को देना होता है. वो चाहे तो दो किलो चावल और तीन किलो आटा दे या फिर पूरा पांच किलो चावल दे. कोई अनुपात तय नहीं है. ऐसे में सरकार अगर आटे को हटा रही है तो यकीनन उसके बदले चावल की मात्रा बढाई गई होगी.

रितिका खेड़ा ये भी कहती है कि आटे में मिलावट की वाली बात कई सर्वे में सामने आई है. इसीलिए जब दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने सरकारी राशन दुकानों पर आटा देने की बात कही तो उसका विरोध हुआ.

एक हफ्ते का 'अल्टीमेटम' और नई प्लानिंग

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर आटा हट गया, तो क्या कार्ड धारकों को सिर्फ चावल पर गुजारा करना होगा? या फिर सरकार सीधे 'गेहूं' देने वाली है? बंगाल जैसे राज्य में जहां मछली-चावल मुख्य आहार है, वहां भी अब रोटी की खपत तेजी से बढ़ी है. खास तौर पर शहरी और मध्यम वर्गीय गरीब परिवारों में. ‘आनंद बाजार’ के मुताबिक इस पर मंत्री कीर्तनिया ने सस्पेंस बरकरार रखा है. उन्होंने जनता से एक हफ्ते का समय मांगा है. उन्होंने कहा कि नई सरकार को थोड़ा वक्त दें, सात दिन बाद पूरा 'ब्लूप्रिंट' यानी कार्ययोजना सबके सामने होगी.

जानकारों का मानना है कि सरकार शायद अब 'पैकेट बंद आटे' के बजाय सीधे 'साबुत गेहूं' देने की तैयारी में है. इससे दो फायदे होंगे. 

  • पहला ये कि पिसाई और पैकिंग के नाम पर जो टेंडर माफिया सक्रिय था, उसका खेल खत्म हो जाएगा. 
  • दूसरा, केंद्र सरकार की 'वन नेशन वन राशन कार्ड' योजना के तहत अनाज का डिस्ट्रीब्यूशन ज्यादा आसान हो जाएगा. 

भारत में NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि पोषण के मामले में बंगाल के कुछ जिलों की स्थिति चिंताजनक है, ऐसे में राशन की थाली से कुछ भी गायब करना सरकार के लिए रिस्की हो सकता है. इसीलिए एक हफ्ते का ये बफर पीरियड लिया गया है ताकि विपक्ष के हमलों की धार कुंद की जा सके.

सियासी मायने: क्या ये पुरानी सरकार के 'सिंडिकेट' पर हमला है?

इस फैसले को सिर्फ प्रशासनिक सुधार की तरह देखना एक बड़ी भूल होगी. इसके पीछे बंगाल की वो कड़वी राजनीति है जिसे 'सिंडिकेट राज' कहा जाता है. भाजपा शुरू से ही आरोप लगाती रही है कि ममता बनर्जी की सरकार के दौरान राशन माफिया और टीएमसी के लोकल नेताओं का एक नेक्सस था. ये नेक्सस आटे की मिलों से लेकर कोटेदारों तक फैला हुआ था. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अशोक कीर्तनिया का ये फैसला उस पूरे इकोसिस्टम की कमर तोड़ने वाला है. नई सरकार ये जताना चाहती है कि वो पुरानी सरकार के समय के 'करप्ट सिस्टम' को जड़ से उखाड़ रही है.

दूसरा बड़ा एंगल है 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (DBT). केंद्र सरकार लगातार जोर देती रही है कि राशन की जगह सीधे पैसे दिए जाएं या फिर अनाज को इतना पारदर्शी बनाया जाए कि कोई बीच में न खा सके. भाजपा की कोशिश है कि बंगाल में राशन व्यवस्था को वैसा ही बनाया जाए जैसा कि उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश में दिखता है. हालांकि, इसमें एक खतरा भी है. अगर सात दिन बाद सरकार ने गेहूं देने का ठोस वादा नहीं किया, तो टीएमसी इसे 'गरीब विरोधी' मुद्दा बनाने में एक मिनट की भी देरी नहीं करेगी.

आम आदमी पर क्या होगा असर?

अगर आप एक आम मजदूर की नजर से देखें जो दिन भर काम करने के बाद शाम को राशन की दुकान से 5 किलो आटे का पैकेट लेकर घर जाता था, तो उसके लिए ये खबर परेशानी वाली है. अब उसे गेहूं मिलेगा, फिर उसे साफ करना होगा, चक्की पर ले जाना होगा और फिर पिसाई का पैसा देना होगा. मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए शायद ये बड़ी बात न हो, लेकिन जो लोग 'हैंड टू माउथ' हैं, उनके लिए 5-7 रुपये किलो की पिसाई भी महीने के बजट को बिगाड़ देती है.

समाजशास्त्रीय नजरिए से देखें तो बंगाल में राशन का आटा सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुरक्षा का अहसास था. सरकार को ये सुनिश्चित करना होगा कि वो गेहूं के साथ-साथ पिसाई की लागत की भरपाई के लिए भी कुछ सोचे. अगर सरकार ऐसा नहीं करती है, तो 'राशन भ्रष्टाचार' खत्म करने का क्रेडिट 'महंगाई बढ़ाने' के ब्लेम में बदल सकता है. नीति आयोग की रिपोर्ट्स अक्सर कहती हैं कि सरकारी योजनाओं का प्रभाव तभी होता है जब वो 'लास्ट माइल' तक बिना किसी एक्स्ट्रा कॉस्ट के पहुंचें.

भविष्य का रास्ता: क्या बदल सकता है बंगाल में?

आने वाले सात दिन बंगाल की राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. अगर अशोक कीर्तनिया 'फोर्टिफाइड गेहूं' (Fortified Wheat) लाने का ऐलान करते हैं, तो ये एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है. इससे पोषण की समस्या भी दूर होगी और पिसाई के घोटाले भी रुकेंगे. इसके अलावा, सरकार को 'ई-पॉस' (e-PoS) मशीनों का 100% इस्तेमाल अनिवार्य करना होगा ताकि अनाज की कालाबाजारी पूरी तरह बंद हो सके.

अंत में, बात वही है कि सुधार की राह हमेशा कठिन होती है. राशन घोटाले ने बंगाल की साख को काफी चोट पहुंचाई है. अगर शुभेंदु सरकार इस घोटाले की जड़ यानी 'आटा सप्लाई चेन' को काटकर एक नया और साफ-सुथरा मॉडल खड़ा कर पाती है, तो ये देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर बनेगा. लेकिन अगर ये सिर्फ एक राजनीतिक बदला लेने का जरिया बनकर रह गया, तो गरीब की थाली खाली ही रहेगी.

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करप्शन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' का दावा

अशोक कीर्तनिया ने अपनी पारी की शुरुआत एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' से कर दी है. उन्होंने साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार की गुंजाइश रखने वाले हर दरवाजे पर ताला जड़ा जाएगा. लेकिन ताला लगाने के बाद चाबी किसके पास होगी और वो चाबी क्या गरीबों की भूख का समाधान खोल पाएगी, ये सात दिन बाद ही पता चलेगा. बंगाल की जनता उम्मीद कर रही है कि उसे घोटाले मुक्त राशन के साथ-साथ अपनी रोटी का हक भी मिलेगा.

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