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AI हनी ट्रैप का खौफनाक खेल, सेना के जवानों को फंसाने में जुटे सुंदर चेहरों वाले 'डिजिटल जासूस'

AI Honey-Trap: भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने हाल ही में एक ऐसे ही नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है जो हमारे सेना के जवानों को निशाना बना रहा था. ये हनी ट्रैप का वो डिजिटल अवतार है जिसके बारे में आपने फिल्मों में भी नहीं सोचा होगा.

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एआई हनी ट्रैप: सुंदर चेहरों के पीछे अब बॉट्स (फोटो- AI)

कल्पना कीजिए कि एक बहुत ही खूबसूरत महिला की फोटो लगी प्रोफाइल से आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट आता है. आप उसकी डीपी देखते हैं, उसकी बातों में खो जाते हैं और धीरे धीरे अपनी बातें शेयर करने लगते हैं. लेकिन क्या हो अगर हम आपसे कहें कि वो चेहरा दुनिया में कहीं है ही नहीं? वो बस पिक्सल्स का एक ढेर है जिसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई ने तैयार किया है.

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भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने हाल ही में एक ऐसे ही नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है जो हमारे सेना के जवानों को निशाना बना रहा था. ये हनी ट्रैप का वो डिजिटल अवतार है जिसके बारे में आपने फिल्मों में भी नहीं सोचा होगा.

हनी ट्रैप का मतलब होता है किसी को प्यार या आकर्षण के जाल में फंसाकर उससे राज उगलवाना. सालों से जासूसी की दुनिया में इसका इस्तेमाल होता रहा है. पहले इसके लिए बाकायदा इंसानी जासूसों की ट्रेनिंग होती थी, जो महीनों तक टारगेट का पीछा करते थे. लेकिन अब एआई ने इस खेल को पूरी तरह बदल दिया है. अब किसी जासूस को सरहद पार भेजने की जरूरत नहीं है. बस एक कंप्यूटर, कुछ एआई टूल्स और एक इंटरनेट कनेक्शन काफी है.

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सुरक्षा एजेंसियों की हालिया रिपोर्ट बताती है कि कैसे डीपफेक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके ऐसी महिलाएं बनाई जा रही हैं जो वीडियो कॉल पर बात भी करती हैं और उनकी आवाज बिल्कुल असली लगती है.

इस पूरे खेल को समझने के लिए हमें गहराई में उतरना होगा. ये सिर्फ एक क्राइम न्यूज़ नहीं है, बल्कि हमारी नेशनल सिक्योरिटी पर एक बड़ा हमला है. इस मेगा एक्सप्लेनर में हम आपको बताएंगे कि ये डिजिटल जासूसी कैसे काम करती है, भारतीय सेना इससे निपटने के लिए क्या कर रही है और आप खुद को इस मायाजाल से कैसे बचा सकते हैं. ये कहानी है उस अदृश्य दुश्मन की जो आपके स्मार्टफोन के अंदर बैठकर देश की सुरक्षा में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है.

क्या है एआई हनी ट्रैप और ये पुराने जासूसी के तरीकों से अलग कैसे है?

पुराने दौर में जब हनी ट्रैप की बात होती थी, तो उसमें रिस्क बहुत ज्यादा होता था. किसी महिला एजेंट को दूसरे देश भेजा जाता था, उसे वहां की भाषा और तौर तरीके सिखाए जाते थे. अगर वो पकड़ी गई तो दो देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय विवाद खड़ा हो जाता था. लेकिन डिजिटल हनी ट्रैप में ये सारा सिरदर्द खत्म हो गया है. अब पाकिस्तान या किसी भी दुश्मन देश में बैठा एक ऑपरेटर एआई की मदद से एक साथ सैकड़ों प्रोफाइल चला सकता है. उसे न तो पासपोर्ट चाहिए और न ही वीजा. वो बस एक बटन दबाकर भारत के किसी भी शहर में बैठे सैन्य अधिकारी या आम नागरिक के करीब पहुंच सकता है.

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एआई हनी ट्रैप में सबसे बड़ा हथियार है डीपफेक. डीपफेक एक ऐसी तकनीक है जिसमें एआई का इस्तेमाल करके किसी के भी चेहरे को किसी दूसरे के शरीर पर लगाया जा सकता है या फिर एक पूरी तरह से नया और नकली चेहरा बनाया जा सकता है. ये चेहरा इतना असली होता है कि आप उसकी आंखों की पुतलियों की हरकत या होंठों की बनावट देखकर भी धोखा खा जाएंगे.

एजेंसियों के मुताबिक, जासूस अब सिर्फ फोटो ही नहीं भेज रहे, बल्कि वे वीडियो कॉल पर भी बात कर रहे हैं. एआई की मदद से आवाज को किसी भी लहजे में बदला जा सकता है. अगर टारगेट पंजाब का है, तो एआई महिला पंजाबी लहजे में बात करेगी ताकि भरोसा जीत सके.

डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये जासूसी का सबसे सस्ता और सबसे खतरनाक तरीका है. इसमें पकड़े जाने का डर नहीं है क्योंकि जिस आईपी एड्रेस का इस्तेमाल होता है, उसे वीपीएन के जरिए आसानी से छुपा लिया जाता है. एक जासूस जो काम सालों में नहीं कर पाता था, वो अब एआई बॉट्स कुछ ही हफ्तों में कर रहे हैं. वे पहले सोशल मीडिया पर दोस्ती करते हैं, फिर पर्सनल नंबर लेते हैं और फिर शुरू होता है ब्लैकमेलिंग और डेटा चोरी का खेल.

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का खुलासा: क्या था वो नेटवर्क?

हाल ही में भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो और सेना की काउंटर इंटेलिजेंस विंग ने एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया है. इस नेटवर्क का मुख्य काम सेना के उन जवानों को ढूंढना था जो संवेदनशील इलाकों जैसे जम्मू कश्मीर या लद्दाख में तैनात हैं. जासूसों ने एआई की मदद से कई ऐसी प्रोफाइल बनाई थीं जो खुद को मेडिकल स्टूडेंट या फैशन डिजाइनर बताती थीं. इन प्रोफाइल्स से सेना के अधिकारियों को मैसेज भेजे जाते थे. बातचीत की शुरुआत बहुत ही सामान्य तरीके से होती थी, जैसे 'क्या हम दोस्त बन सकते हैं?' या 'आपकी वर्दी बहुत अच्छी लग रही है.'

एक बार जब जवान बातचीत शुरू कर देता, तो ये एआई बॉट्स धीरे धीरे उसकी लोकेशन, यूनिट का नाम और वहां चल रही गतिविधियों के बारे में पूछने लगते थे. चौंकाने वाली बात ये है कि ये बॉट्स अब इतने स्मार्ट हो गए हैं कि वे भावनाओं को भी समझ सकते हैं. अगर जवान उदास है, तो बॉट उसे सहानुभूति भरे मैसेज भेजेगा. एजेंसियों ने पाया कि इस नेटवर्क का कंट्रोल हैंडलर पाकिस्तान के कराची और रावलपिंडी में बैठे थे. वे एक साथ करीब 500 से ज्यादा फर्जी प्रोफाइल मैनेज कर रहे थे.

इस नेटवर्क के खुलासे के बाद हड़कंप मच गया है क्योंकि इसमें इस्तेमाल हुई टेक्नोलॉजी बहुत ही एडवांस थी. ये सिर्फ चैटिंग तक सीमित नहीं था. कई मामलों में जवानों को लालच दिया गया कि वे अपने फोन में एक खास ऐप इंस्टॉल करें ताकि वे प्राइवेट वीडियो चैट कर सकें. जैसे ही जवान वो ऐप इंस्टॉल करता, उसके फोन का पूरा कंट्रोल जासूसों के हाथ में चला जाता था. गैलरी की फोटो से लेकर बैंक डिटेल्स तक सब कुछ चोरी हो रहा था.

डीपफेक का मायाजाल: पहचानना क्यों नामुमकिन होता जा रहा है?

डीपफेक टेक्नोलॉजी असल में जेनरेटिव एडवरसैरियल नेटवर्क्स (GANs) पर काम करती है. इसमें दो एआई सिस्टम होते हैं. एक सिस्टम नकली फोटो या वीडियो बनाता है और दूसरा उसे चेक करता है कि वो कितना असली लग रहा है. ये प्रक्रिया लाखों बार चलती है जब तक कि दूसरा सिस्टम भी उसे असली न मान ले. यही वजह है कि इंसानी आंखें इसे नहीं पहचान पातीं. आज के समय में ऐसे कई ऐप्स और वेबसाइट्स मौजूद हैं जो सिर्फ एक फोटो से आपका बोलता हुआ वीडियो बना सकते हैं.

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआई अब माइक्रो एक्सप्रेशंस को भी कॉपी कर लेता है. जब हम बात करते हैं, तो हमारे चेहरे की मांसपेशियां जिस तरह से हिलती हैं, एआई उसे बिल्कुल सटीक तरीके से दोहराता है. इसके अलावा एआई वॉयस क्लोनिंग तो और भी खतरनाक है. अगर जासूस के पास आपकी आवाज का सिर्फ 30 सेकंड का सैंपल है, तो वो आपकी जैसी आवाज में किसी से भी बात कर सकता है. कल्पना कीजिए, कल को आपके बॉस की आवाज में आपको फोन आए और वो कोई संवेदनशील फाइल मांगे, तो आप शायद ही शक करेंगे.

भारत में साइबर सुरक्षा पर काम करने वाली संस्थाओं के डेटा के अनुसार, पिछले दो सालों में डीपफेक से जुड़े मामलों में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. इसमें से ज्यादातर मामले ब्लैकमेलिंग और जासूसी के हैं. सबसे बड़ी चुनौती ये है कि इन एआई मॉडल्स को इंटरनेट पर मौजूद अरबों फोटो और वीडियो पर ट्रेन किया गया है, जिससे इनकी सटीकता हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती जा रही है.

जासूसी के लिए इंसान की जगह मशीन: क्या बदल गया है?

जासूसी की दुनिया में एक शब्द बहुत मशहूर है 'ह्यूमिंट' (HUMINT) यानी ह्यूमन इंटेलिजेंस. इसका मतलब है इंसानों के जरिए जानकारी जुटाना. लेकिन अब हम 'एआई-इंट' (AI-INT) के दौर में प्रवेश कर चुके हैं. मशीनों के जरिए जासूसी करने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि मशीनें थकती नहीं हैं. वो 24 घंटे काम कर सकती हैं. एक ही ऑपरेटर हजारों लोगों को एक साथ टारगेट कर सकता है. इसके लिए उसे किसी बड़े ऑफिस या सेटअप की जरूरत नहीं है.

मशीनें डेटा का विश्लेषण भी इंसानों से बेहतर करती हैं. मान लीजिए एक एआई बॉट 1000 सैनिकों से बात कर रहा है. वो उन सबकी बातों से ये निष्कर्ष निकाल सकता है कि कौन सा सैनिक ज्यादा जानकारी दे रहा है या कौन मानसिक रूप से कमजोर है. एआई उन कीवर्ड्स को तुरंत पकड़ लेता है जो संवेदनशील हो सकते हैं, जैसे 'मिसाइल', 'बॉर्डर मूवमेंट' या 'नया बेस'. ये इंफॉर्मेशन तुरंत हैंडलर के पास पहुंच जाती है.

एक और बड़ा बदलाव ये आया है कि अब पहचान चोरी करना बहुत आसान है. जासूस किसी असली लड़की की प्रोफाइल कॉपी करते हैं और फिर एआई से उसकी शक्ल में थोड़ा बदलाव कर देते हैं ताकि कॉपीराइट का लफड़ा न हो. इससे ये लगता है कि प्रोफाइल बिल्कुल असली है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम भी इन प्रोफाइल्स को बढ़ावा देते हैं क्योंकि ये दिखने में आकर्षक होती हैं और लोग इनसे ज्यादा इंगेज करते हैं.

भारतीय सेना की तैयारी: काउंटर इंटेलिजेंस अब कितना बदला?

भारतीय सेना इस खतरे को बहुत गंभीरता से ले रही है. सेना ने अपने जवानों के लिए सख्त सोशल मीडिया गाइडलाइंस जारी की हैं. जवानों को निर्देश दिया गया है कि वे वर्दी में अपनी फोटो न डालें और किसी भी अंजान व्यक्ति की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न करें. इसके अलावा सेना अब खुद एआई का इस्तेमाल कर रही है ताकि इन फर्जी प्रोफाइल्स को पहचाना जा सके. सेना ने अपनी एक अलग साइबर विंग बनाई है जो चौबीसों घंटे सोशल मीडिया पर नजर रखती है कि कहीं कोई संवेदनशील जानकारी लीक तो नहीं हो रही.

सेना के अधिकारियों को अब डिजिटल हाइजीन की ट्रेनिंग दी जा रही है. उन्हें बताया जा रहा है कि कैसे किसी फोटो के मेटाडेटा को चेक किया जाता है या कैसे संदिग्ध लिंक की पहचान की जाती है. इसके अलावा सेना ने कई ऐसे सॉफ्टवेयर भी विकसित किए हैं जो ये पकड़ सकते हैं कि कोई वीडियो डीपफेक है या नहीं. इसे 'कैट' (Combat Against Targeting) कहा जा रहा है.

चुनौती बड़ी है क्योंकि टेक्नोलॉजी हर दिन बदल रही है. सेना के सूत्रों का कहना है कि अब केवल ट्रेनिंग काफी नहीं है, हमें एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना होगा जहां सुरक्षा से जुड़ा हर व्यक्ति डिजिटल रूप से जागरूक हो. सेना अब अपने परिवार के सदस्यों को भी इस बारे में जागरूक कर रही है क्योंकि कई बार जासूस सीधे जवान को निशाना न बनाकर उसके परिवार के जरिए उस तक पहुंचने की कोशिश करते हैं.

क्यों फंस जाते हैं लोग इस जाल में?

ये सवाल अक्सर उठता है कि पढ़े लिखे और ट्रेनिंग पाए हुए लोग भी कैसे इन जालों में फंस जाते हैं? इसका जवाब मनोविज्ञान में छिपा है. एआई हनी ट्रैप में जासूस 'इमोशनल मैनिपुलेशन' का इस्तेमाल करते हैं. वे टारगेट की पसंद-नापसंद का अध्ययन करते हैं. अगर किसी जवान को कविताएं पसंद हैं, तो एआई बॉट उसे बेहतरीन कविताएं भेजेगा. इससे एक मानसिक जुड़ाव बन जाता है.

अकेलापन भी इसका एक बड़ा कारण है. दूरदराज के इलाकों में तैनात जवानों को अक्सर अपनों की कमी खलती है. ऐसे में जब कोई सुंदर चेहरा उनसे प्यार भरी बातें करता है, तो वे अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते. जासूस इसी 'वल्नरेबिलिटी' का फायदा उठाते हैं. वे खुद को एक ऐसे इंसान के तौर पर पेश करते हैं जो उन्हें समझता है और उनका साथ देना चाहता है.

साइकोलॉजिस्ट का कहना है कि डिजिटल दुनिया में हमारा दिमाग अक्सर असली और नकली के बीच का अंतर भूल जाता है. जब हम किसी से चैट करते हैं, तो हमारा दिमाग एक ऐसी छवि बना लेता है जो हमारी इच्छाओं के अनुरूप होती है. एआई इसी इमेज को और पुख्ता कर देता है. यही वजह है कि पीड़ित को अंत तक ये एहसास नहीं होता कि वो किसी जासूस से नहीं बल्कि एक प्रोग्राम से बात कर रहा है.

डेटा और आंकड़े: कितना बड़ा है ये खतरा?

विभिन्न वैश्विक साइबर सुरक्षा फर्मों और इंटरपोल की रिपोर्टों के अनुसार, पूरी दुनिया में हनी ट्रैप के मामलों में एआई का इस्तेमाल बढ़ा है. साल 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर अपराधों के जरिए होने वाली जासूसी में 40 प्रतिशत हिस्सा अब एआई-जनरेटेड अवतारों का है. भारत में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के डेटा से पता चलता है कि साइबर फ्रॉड और हनी ट्रैपिंग के मामले पिछले पांच सालों में दोगुने हो गए हैं.

डिफेंस के क्षेत्र में बात करें तो भारतीय रक्षा मंत्रालय ने पिछले साल संसद में बताया था कि कई अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है क्योंकि वे सोशल मीडिया पर हनी ट्रैप का शिकार हुए थे. हालांकि सटीक संख्या सुरक्षा कारणों से साझा नहीं की गई, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये संख्या चिंताजनक हो सकती है. दुनिया भर में करीब 50 अरब डॉलर का नुकसान हर साल साइबर जासूसी की वजह से होता है.

एक और डराने वाला आंकड़ा ये है कि डार्क वेब पर 'एआई जासूसी किट्स' अब महज कुछ हजार रुपयों में उपलब्ध हैं. यानी कोई भी छोटा अपराधी या दुश्मन देश का एजेंट इन टूल्स को खरीदकर ऑपरेशन शुरू कर सकता है. ये खतरे की वो घंटी है जिसे नजरअंदाज करना भारत के लिए घातक हो सकता है.

ये सिर्फ फौजियों की समस्या नहीं है!

अगर आपको लगता है कि ये सिर्फ सेना की समस्या है, तो आप गलत हैं. एआई हनी ट्रैप अब आम लोगों, खासकर कॉरपोरेट अधिकारियों और सरकारी बाबुओं को भी निशाना बना रहा है. बड़ी कंपनियों के सीईओ से उनकी कंपनी के सीक्रेट्स निकलवाने के लिए इन एआई मॉडल्स का इस्तेमाल हो रहा है. इसे 'इंडस्ट्रियल एस्पियनेज' कहा जाता है.

मिडिल क्लास लोग भी इसके निशाने पर हैं. यहां मकसद जासूसी नहीं बल्कि पैसे ऐंठना होता है. आपको किसी लड़की का वीडियो कॉल आता है, वो कपड़े उतारती है और आपको भी ऐसा करने के लिए उकसाती है. जैसे ही आप ऐसा करते हैं, वो कॉल रिकॉर्ड कर ली जाती है और फिर शुरू होता है ब्लैकमेलिंग का अंतहीन सिलसिला. इसमें एआई का रोल ये है कि वो कॉल पूरी तरह से स्क्रिप्टेड और नकली चेहरे वाली होती है, जिसे आप कभी पकड़ नहीं पाएंगे.

समाज पर इसका मनोवैज्ञानिक असर भी पड़ रहा है. लोगों का एक दूसरे पर भरोसा कम हो रहा है. वैवाहिक जीवन में दरारें आ रही हैं क्योंकि कई लोग इन फेक प्रोफाइल्स के चक्कर में पड़कर अपना घर बर्बाद कर रहे हैं. ये डिजिटल वायरस अब हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुका है और इससे बचने के लिए केवल सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि सूझबूझ की जरूरत है.

सरकार और पॉलिसी का नजरिया: कानून क्या कहता है?

भारत सरकार ने इस खतरे को देखते हुए 'डिजिटल इंडिया एक्ट' और 'डेटा प्रोटेक्शन लॉ' में कई कड़े प्रावधान किए हैं. डीपफेक बनाना और उसका गलत इस्तेमाल करना अब एक गंभीर अपराध है जिसमें जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है. आईटी मंत्रालय ने सोशल मीडिया कंपनियों को सख्त आदेश दिए हैं कि वे ऐसी फेक प्रोफाइल्स को तुरंत हटाएं और एआई से बने कंटेंट पर 'एआई जनरेटेड' का लेबल लगाएं.

हालांकि, नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे पास अभी भी एआई को पूरी तरह से रेगुलेट करने के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है. कानून तो बन गए हैं, लेकिन जासूस अक्सर विदेशी सर्वर का इस्तेमाल करते हैं, जहां भारतीय कानून लागू करना मुश्किल होता है. सरकार अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'साइबर ट्रीटी' की बात कर रही है ताकि देशों के बीच डेटा शेयरिंग और अपराधियों की धरपकड़ आसान हो सके.

सरकार का फोकस अब 'एआई फॉर गुड' पर है, लेकिन 'एआई फॉर ईविल' को रोकने के लिए हमें डिफेंसिव एआई (Defensive AI) में निवेश बढ़ाना होगा. गृह मंत्रालय ने 'इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर' (I4C) को और मजबूत किया है ताकि राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां मिलकर इन डिजिटल जासूसों का मुकाबला कर सकें.

 जासूसी का बाजार

शायद आप न जानते हों, लेकिन जासूसी अब एक बड़ा बिजनेस बन चुका है. डेटा को आज के दौर का 'नया तेल' कहा जाता है. अगर कोई दुश्मन देश हमारी सेना की मूवमेंट जान लेता है, तो वो न केवल युद्ध की स्थिति में भारी पड़ता है, बल्कि शांति के समय में भी भारत की ग्लोबल इमेज को नुकसान पहुंचा सकता है. इससे विदेशी निवेश (FDI) पर असर पड़ता है.

साइबर सुरक्षा का बाजार भी तेजी से बढ़ रहा है. नैसकॉम (NASSCOM) के अनुसार, भारत में साइबर सुरक्षा इंडस्ट्री 2025 तक 13 अरब डॉलर से ज्यादा की हो जाएगी. एआई हनी ट्रैप जैसे खतरों ने सुरक्षा सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनियों के लिए नए दरवाजे खोल दिए हैं. अब कंपनियां ऐसे फायरवॉल बना रही हैं जो इंसानी व्यवहार को ट्रैक करके ये बता सकें कि दूसरी तरफ कोई बॉट है या इंसान.

स्टॉक मार्केट पर भी इसका असर दिखता है. अगर किसी बड़ी कंपनी का डेटा लीक होता है, तो उसके शेयर धड़ाम से गिर जाते हैं. इसलिए अब कंपनियां अपनी रिस्क मैनेजमेंट पॉलिसी में 'एआई थ्रेट्स' को अलग से शामिल कर रही हैं. जासूसी अब सिर्फ सरहदों तक सीमित नहीं है, ये आपकी तिजोरी और देश की अर्थव्यवस्था पर भी सीधा हमला है.

क्या हम सुरक्षित रह पाएंगे?

आने वाले समय में ये खतरा और भी जटिल होने वाला है. अभी तो हम सिर्फ फोटो और वीडियो की बात कर रहे हैं, लेकिन जल्द ही 'एआई अवतार' मेटावर्स जैसी वर्चुअल दुनिया में आपसे मिलेंगे. वे वहां आपसे हाथ मिलाएंगे, आपके साथ घूमेंगे और आपको लगेगा कि आप किसी असली इंसान के साथ हैं. एआई इतना एडवांस हो जाएगा कि वो आपके मूड के हिसाब से अपनी बातें और शक्ल बदल लेगा.

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में 'साइबर वॉरफेयर' में एआई हनी ट्रैप एक मुख्य हथियार होगा. किसी देश पर बम गिराने से ज्यादा आसान होगा उसके सिस्टम को अंदर से खोखला करना. अगर जासूस महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों को अपने जाल में फंसा लेते हैं, तो वे बिना एक भी गोली चलाए देश का कंट्रोल हासिल कर सकते हैं.

लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. जैसे-जैसे एआई खतरनाक हो रहा है, उसे रोकने वाली तकनीक भी एडवांस हो रही है. 'ब्लॉकचेन' और 'क्वांटम कंप्यूटिंग' जैसी तकनीकें डेटा को सुरक्षित रखने में मदद करेंगी. भविष्य में आपकी डिजिटल पहचान को 'बायोमेट्रिक्स' से जोड़ा जा सकता है, जिससे किसी का भी फेक अकाउंट बनाना नामुमकिन हो जाएगा.

आप क्या कर सकते हैं? सुरक्षा के 5 गोल्डन रूल्स

एआई के इस दौर में खुद को सुरक्षित रखना अब आपकी अपनी जिम्मेदारी है. यहां कुछ प्रैक्टिकल टिप्स दिए गए हैं जो आपको इस मायाजाल से बचा सकते हैं:

1. अंजान फ्रेंड रिक्वेस्ट से तौबा: चाहे प्रोफाइल कितनी भी सुंदर क्यों न हो, अगर आप उस व्यक्ति को निजी तौर पर नहीं जानते हैं, तो रिक्वेस्ट स्वीकार न करें. याद रखें, असली लोग अक्सर अंजान लोगों को रैंडम मैसेज नहीं भेजते.

2. वीडियो कॉल पर सावधानी: अगर कोई अंजान व्यक्ति आपसे वीडियो कॉल पर बात करना चाहता है, तो सावधान हो जाएं. अगर आपको लगता है कि सामने वाला व्यक्ति डीपफेक हो सकता है, तो उसे अपना सिर घुमाने या कुछ अजीब हरकत करने को कहें. एआई अक्सर साइड प्रोफाइल में लड़खड़ा जाता है.

3. पर्सनल जानकारी शेयर न करें: अपनी लोकेशन, ऑफिस की बातें या परिवार की डिटेल्स कभी भी सोशल मीडिया पर सार्वजनिक न करें. जासूस इन्हीं जानकारियों का इस्तेमाल करके आपके करीब आते हैं.

4. टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA): अपने सभी सोशल मीडिया और ईमेल अकाउंट्स पर 2FA ऑन रखें. इससे अगर किसी के पास आपका पासवर्ड चला भी जाए, तो वो आपका अकाउंट नहीं खोल पाएगा.

5. संदेह होने पर रिपोर्ट करें: अगर आपको कोई प्रोफाइल संदिग्ध लगती है, तो उसे तुरंत ब्लॉक करें और प्लेटफॉर्म को रिपोर्ट करें. आप 'cybercrime.gov.in' पर जाकर अपनी शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं.

तकनीक अच्छी है, नीयत नहीं

एआई अपने आप में न तो अच्छा है और न ही बुरा. ये उस हाथ पर निर्भर करता है जो इसे चला रहा है. अगर एआई कैंसर का इलाज ढूंढ सकता है, तो वो जासूसी का रास्ता भी खोल सकता है. 'एआई हनी ट्रैप' हमें ये याद दिलाता है कि डिजिटल दुनिया में जो दिखता है, वो हमेशा सच नहीं होता. हमारी सुरक्षा एजेंसियां अपना काम कर रही हैं, लेकिन असली सुरक्षा हमारी जागरूकता में है.

सुंदर चेहरों के पीछे छिपे इन डिजिटल जासूसों से डरने की जरूरत नहीं है, बस सचेत रहने की जरूरत है. अगली बार जब कोई अंजान 'हाय' कहे, तो अपनी भावनाओं को काबू में रखें और अपने दिमाग का इस्तेमाल करें. देश की सुरक्षा और आपकी अपनी गरिमा आपके अपने हाथों में है. इस डिजिटल युग में 'सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है'. 

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