ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाने में मुसलमानों की अहम भूमिका
ममता बनर्जी पहली बार साल 2011 में बंगाल की सत्ता पर काबिज़ हुई. उनकी पार्टी ने 184 सीटों में जीत दर्ज़ की और 38.9% वोट पाने में कामयाब हुई. अगर 2006 के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो तृणमूल कांग्रेस महज़ 30 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी और उसने 26.6% वोट हासिल किये थे. इस जीत के पीछे एक अहम वजह मुस्लिम वोटों का शिफ्ट होना माना जाता है. नंदीग्राम के 10 हज़ार एकड़ ज़मीन के भूमि-अधिग्रहण में ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोगों की ज़मीने थीं. और इस आन्दोलन में कई दिग्गज मुस्लिम नेता जिनमें ममता सरकार में मंत्री रहे सिद्दीकुल्ला चौधरी, फुरफुरा शरीफ मजार के इब्राहीम सिद्दीकी और तोहा सिद्दीकी भी शामिल थें. इन नेताओं ने साल 2009 के लोकसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी को समर्थन देने का ऐलान किया था. जिसकी बदौलत ममता बनर्जी 2009 में 19 सीटें जीतने में कामयाब हुईं थीं. ये ममता दीदी के लिए बहुत बड़ी जीत थी. रिसर्च जर्नल इन सोशल साइंसेज में 2014 में छापी एक रिपोर्ट दावा करती है कि 2006 से ही ममता बनर्जी को मुसलमानों का समर्थन मिलना शुरू हो गया था. हालांकि इस रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि उस समय यह समर्थन पूरे राज्य में नहीं बल्कि कुछ नेताओं के प्रभाव वाले इलाकों तक सीमित था. नीचे दी गई टेबल पर अगर नज़र डालें तो आपको तृणमूल की 2016 तक सिलसिलेवार प्रगति का ग्राफ़ दिख जाएगा. तृणमूल ने 2006 विधानसभा चुनावों में 26.6% वोटों से 2016 के विधानसभा चुनाव 45.6% वोट तक का सफ़र तय किया है.
ममता बनर्जी की BJP के खिलाफ लड़ाई में कैसे निर्णायक भूमिका में होंगे मुस्लिम वोटर?
टीएमसी को 26% से 45% तक पहुंचने के केंद्र में रहे हैं मुसलमान वोटर
Advertisement

प्रतीकात्मक तस्वीर: मुस्लिम महिला वोटर, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रधान मंत्री मोदी
पश्चिम बंगाल के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खुली चुनौती देते हुए अपनी नई राजनीतिक पार्टी इंडियन सेक्युलर फ़्रंट का ऐलान कर दिया है. पीरजादा ने ममता के खिलाफ मुसलमानों को वोटों के लिए इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया है. दरअसल बंगाल में मुस्लिम वोट 27 प्रतिशत से भी ज्यादा हैं. ये आंकड़े 2011 की जनगणना पर आधारित हैं. जो कि लक्षदीप, जम्मू-कश्मीर और असम के बाद सबसे ज्यादा है. भले ही बंगाल की मुस्लिम आबादी प्रतिशत में चौथे नंबर पर है, लेकिन अगर तादाद की बात करें तो ये 2 करोड़ 46 लाख है. जो पहले 3 राज्यों की कुल मुस्लिम आबादी से भी 50 लाख ज्यादा है. तो आइए समझते हैं बंगाल में मुस्लिम वोटों की क्या अहमियत है.
ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाने में मुसलमानों की अहम भूमिका
ममता बनर्जी पहली बार साल 2011 में बंगाल की सत्ता पर काबिज़ हुई. उनकी पार्टी ने 184 सीटों में जीत दर्ज़ की और 38.9% वोट पाने में कामयाब हुई. अगर 2006 के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो तृणमूल कांग्रेस महज़ 30 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी और उसने 26.6% वोट हासिल किये थे. इस जीत के पीछे एक अहम वजह मुस्लिम वोटों का शिफ्ट होना माना जाता है. नंदीग्राम के 10 हज़ार एकड़ ज़मीन के भूमि-अधिग्रहण में ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोगों की ज़मीने थीं. और इस आन्दोलन में कई दिग्गज मुस्लिम नेता जिनमें ममता सरकार में मंत्री रहे सिद्दीकुल्ला चौधरी, फुरफुरा शरीफ मजार के इब्राहीम सिद्दीकी और तोहा सिद्दीकी भी शामिल थें. इन नेताओं ने साल 2009 के लोकसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी को समर्थन देने का ऐलान किया था. जिसकी बदौलत ममता बनर्जी 2009 में 19 सीटें जीतने में कामयाब हुईं थीं. ये ममता दीदी के लिए बहुत बड़ी जीत थी. रिसर्च जर्नल इन सोशल साइंसेज में 2014 में छापी एक रिपोर्ट दावा करती है कि 2006 से ही ममता बनर्जी को मुसलमानों का समर्थन मिलना शुरू हो गया था. हालांकि इस रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि उस समय यह समर्थन पूरे राज्य में नहीं बल्कि कुछ नेताओं के प्रभाव वाले इलाकों तक सीमित था. नीचे दी गई टेबल पर अगर नज़र डालें तो आपको तृणमूल की 2016 तक सिलसिलेवार प्रगति का ग्राफ़ दिख जाएगा. तृणमूल ने 2006 विधानसभा चुनावों में 26.6% वोटों से 2016 के विधानसभा चुनाव 45.6% वोट तक का सफ़र तय किया है.
हालांकि 2019 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल को नुक़सान हुआ, उनका वोट 45.6 से घटकर 43.7 पर पहुंच गया. लेकिन तृणमूल के वोटरों में मुसलिम वोटरों की तादाद काफ़ी बढ़ गई. बंगाल में चुनावों में जाति और धर्म के आधार पर वोटिंग बिहेवियर पर CSDS- लोकनीति ने एक रिसर्च की है. ये रिसर्च दावा करती है की तृणमूल कांग्रेस को 2019 लोकसभा चुनावों में 70 प्रतिशत मुसलमानों ने वोट दिया था. ये 2014 के मुकाबले 30 परसेंट कि बढ़ोतरी है. यह वोटों की शिफ्ट कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों को जाने वाले वोटों से हुई है. इस कारण तृणमूल अपनी ज़मीन बचाने में कुछ हद कामयाब हो पाई.
आपको बता दें कि बंगाल की राजनीति में ध्रुवीकरण तेज़ होने से फ़ायदा दो ही पार्टियों को हुआ है. जानकर मानते हैं की वाममोर्चे के खेमे से शिफ़्ट हुए हिंदू वोट ने बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाया है और मुसलमान ने ममता को फ़ायदा पहुंचाया है. बंगाल सीपीएम के एक बड़े नेता ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि शहरी इलाक़ों में उनकी पार्टी के कुछ समर्थकों ने बीजेपी को हारने के लिए तृणमूल को भी वोट किया था और उन्हें ऐसा लगता है की ऐसा होना आगे भी संभव है.
बंगाल के मुस्लिम बहुल ज़िले
2011 जनगणना के आधार पर बंगाल में मुस्लिम बाहुल्य तीन जिलें हैं, इनमे मालदा, मुर्शीदाबाद और उत्तर दिनाजपुर शामिल है. दो और जिलें हैं जिसमे मुस्लिम आबादी के वोट निर्णायक हैं, यानि इन जिलों में 35% से ज्यादा वोट हैं, ये जिले हैं दक्षिण 24 परगना और बीरभूम. इन पांच जिलों में कुल 86 विधानसभा सीटें हैं. अगर इन ज़िलों के अलावा पूरे बंगाल की 294 विधानसभा सीटों की बात करें तो कुल 120 सीटों पर मुस्लिम वोटों का प्रभाव है, ऐसा इस्लामिक विषयों के जानकर और पश्चिम बंगाल की मुस्लिम आबादी पर आधारित विशेष शोध पत्रिका “उदार आकाश” के सम्पादक फारूक अहमद बताते हैं. उनके मुताबिक़ क़रीब 40 ऐसी सीटें हैं जहां मुस्लिम वोट 50% से ज़्यादा है और 80 से ज़्यादा ऐसी सीटें हैं जहां मुस्लिम वोट 30% से 35% के बीच है. फारूक का ये भी दावा है कि बंगाल की मुस्लिम आबादी पिछले 10 सालों में काफ़ी बढ़ी है और यह वर्तमान में करीब 35% के आस पास है.
मुस्लिम वोट कंसोलिडेशन का ममता को बाक़ी इलाक़ों में फ़ायदा
लेकिन मुस्लिम वोटों का ममता की ओर कंसोलिडेट होना और भी कई सीटों पर ममता को जीत दिलाने में निर्णायक साबित हो सकता है. जैसा की 2019 के लोकसभा चुनावों में देखने को मिला था. अगर दक्षिण बंगाल के लोकसभा सीटों को विधानसभा में बात दें, जिसमे बर्धमान, पूर्वी मेदिनीपुर, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, हावड़ा, हुगली, नदिया और कोलकाता शामिल हैं. इन जिलों में कुल 167 विधानसभा सीटें हैं. इन 167 सीटों में BJP सिर्फ 48 सीटें जीतने में कामयाब हुई जबकि तृणमूल ने 119 सीटें जीतीं. अगर बात बंगाल के केंद्रीय हिस्से की करें जिसमें बीरभूम और मुर्शिदाबाद शामिल हैं, तो यहां कुल 33 सीटें हैं, जिनमे बीजेपी सिर्फ़ 6 सीटों में जीत दर्ज़ करने में कामयाब हुई थी. बची सीटों में 3 सीटें कांग्रेस और बाक़ी सारी तृणमूल कांग्रेस के खाते में गईं. इस उभरते समीकरण की वज़ह से ममता बनर्जी के लिए मुस्लिम वोटों की अहमियत बहुत ज़्यादा है और उनको अगर आने वाले विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज़ करनी है तो ये वोट उसमें अहम भूमिका निभाएंगे. इन वोटों के अलावा अगर ममता बाक़ी तबकों से मिले वोटों से 10-15% वोट भी बचाने में कामयाब होती हैं, तो यह उनके लिए सत्ता की चाबी साबित हो सकता है. वहीं दूसरी तरफ पीरजादा अब्बास और ओवैसी के इस लड़ाई में कूदने से ममता का डर भी लाज़मी है.
ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाने में मुसलमानों की अहम भूमिका
ममता बनर्जी पहली बार साल 2011 में बंगाल की सत्ता पर काबिज़ हुई. उनकी पार्टी ने 184 सीटों में जीत दर्ज़ की और 38.9% वोट पाने में कामयाब हुई. अगर 2006 के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो तृणमूल कांग्रेस महज़ 30 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी और उसने 26.6% वोट हासिल किये थे. इस जीत के पीछे एक अहम वजह मुस्लिम वोटों का शिफ्ट होना माना जाता है. नंदीग्राम के 10 हज़ार एकड़ ज़मीन के भूमि-अधिग्रहण में ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोगों की ज़मीने थीं. और इस आन्दोलन में कई दिग्गज मुस्लिम नेता जिनमें ममता सरकार में मंत्री रहे सिद्दीकुल्ला चौधरी, फुरफुरा शरीफ मजार के इब्राहीम सिद्दीकी और तोहा सिद्दीकी भी शामिल थें. इन नेताओं ने साल 2009 के लोकसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी को समर्थन देने का ऐलान किया था. जिसकी बदौलत ममता बनर्जी 2009 में 19 सीटें जीतने में कामयाब हुईं थीं. ये ममता दीदी के लिए बहुत बड़ी जीत थी. रिसर्च जर्नल इन सोशल साइंसेज में 2014 में छापी एक रिपोर्ट दावा करती है कि 2006 से ही ममता बनर्जी को मुसलमानों का समर्थन मिलना शुरू हो गया था. हालांकि इस रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि उस समय यह समर्थन पूरे राज्य में नहीं बल्कि कुछ नेताओं के प्रभाव वाले इलाकों तक सीमित था. नीचे दी गई टेबल पर अगर नज़र डालें तो आपको तृणमूल की 2016 तक सिलसिलेवार प्रगति का ग्राफ़ दिख जाएगा. तृणमूल ने 2006 विधानसभा चुनावों में 26.6% वोटों से 2016 के विधानसभा चुनाव 45.6% वोट तक का सफ़र तय किया है.
Add Lallantop as a Trusted Source

Advertisement
Advertisement
Advertisement




















