
ये फोटो नरेंद्र मोदी के ट्विटर हैंडल से 30 दिसंबर 2018 को ट्वीट की गई.
सेल्यूलर जेल से सावरकर ने अपने बड़े भाई बाबाराव को कई पत्र लिखे. बाद में जब इन पत्रों का संकलन छपा तो नाम दिया गया- 'एन ईको फ्रॉम दी अंडमान्स'. ईको मतलब गूंज. गूंज जो हिंदी के लेखक यशपाल को सुनाई दी तो उन्होंने इस पत्र संकलन का हिंदी अनुवाद कर डाला. और नाम रखा - 'अंडमान की गूंज'.
इन लोगों से जुड़ा एक किस्सा है जो कम गूंजता है. ये किस्सा यशपाल का है. बाबाराव का है. और मोहम्मद अली जिन्ना का है. ये किस्सा हमको पता चला है हाल ही में आई वैभव पुरंदरे की किताब से. किताब का नाम है - 'सावरकर - दी ट्रू स्टोरी ऑफ दी फादर ऑफ हिन्दुत्व'. किताब को छापा है जगरनॉट प्रकाशन ने.

सावरकर पर वैभव पुरंदरे की किताब का कवर.
किस्सा
साल 1929 था. विनायक सावरकर को मर्सी पिटीशन्स के बाद जेल से तो रिहा कर दिया गया, लेकिन रत्नागिरी ज़िले से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी. इनके बड़े भाई बाबाराव ने भी काला पानी की सज़ा काटी थी, लेकिन अंग्रेज़ विनायक के मुकाबले बाबराव को कम डेंजरस मानते थे. डेंजर कम समझ में आया तो इन पर कोई प्रतिबंध भी नहीं था.
बाबाराव अपने इलाज के लिए बनारस जाते थे. और स्वतंत्रता आंदोलन में आग झोंक रहे क्रांतिकारियों के टच में रहते थे. उस दौर में एक क्रांतिकारी हिंदी के लेखक यशपाल भी थे. यशपाल HSRA के सदस्य थे. HSRA माने हिन्दुस्तान सोशियलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन. HSRA माने चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिसमिल, अश्फाक उल्लाह खान, भगत सिंह और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों का अड्डा.

क्रांतिकारियों की तस्वीरें.
उन दिनों यशपाल नौजवान भारत सभा का काम देख जब रहे थे. नौजवान भारत सभा को 1926 भगत सिंह ने शुरू किया था. लेकिन ये साल 1929 की बात हो रही है. ये वही साल है जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेंब्ली पर बम फेका था. और इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाते हुए गिरफ्तार हो गए थे. नौजवान भारत सभा के लिए मुश्किल की घड़ी थी. और इस घड़ी में उनका सदस्य यशपाल संगठन के लिए चंदा जुटाने के काम में लग गया.
इसी साल बाबाराव दिल्ली पहुंचे. और बाबाराव से मिलने पहुंचे यशपाल और उनके साथी भगवती चरण वोहरा. दोनो ने बाबाराव के पैर छुए, अपने काम के बारे में बताया और मदद मांगी. बाबाराव ने सुझाव दिया कि इस चर्चा के लिए दिल्ली का माहौल ठीक नहीं है. और यशपाल से बोले 'तू मुंबई आएगा'. शायद वैसे ही जैसे अन्नु मलिक बोला करते हैं.

यशपाल ने अपनी आत्मकथा 'सिंहावलोकन' में इन बातो का ज़िक्र किया है.
माह-ए-दिसम्बर. कड़ाके की ठंड. यशपाल पहुंच गए मिलने. लेकिन मुंबई नहीं, अकोला. बाबाराव उस समय अस्थायी रूप से विदर्भ के अकोला में रह रहे थे. एक छोटे से कमरे में. जहां सामान के नाम पर एक बिस्तर भर था. ठंड बहुत थी और ओढ़ने को एक ही कंबल था. वो कंबल बाबाराव ने अपने मेहमान यशपाल को दे दिया. यशपाल ने मना किया, लेकिन बाबाराव ने जबरन थमा दिया. कहा कि तुम लंबी यात्रा कर के आए हो.
यशपाल को पता था कि सावरकर बंधुओं ने हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने की ठान ली है. लेकिन साथ ही उन्हें पता था कि ये भी अंग्रेज़ों को देश से खदेड़ना चाहते हैं. यशपाल काम की बात पर आए. बाबाराव से मदद मांगी. उन्हें भरोसा था कि बाबाराव उनकी मदद ज़रूर करेंगे. बाबाराव ने कहा -
'हां अंग्रेज़ों को तो भगाना ही है, लेकिन इनके अलावा देश के और भी दुश्मन हैं. जो देश की एकता के लिए खतरा हैं. जो अंग्रेज़ों को निकाल फेंकने के हमारे प्रयासों में बाधा हैं. वो है मुसलमानों के बीच अलगाव की भावना. हम तब तक आज़ाद नहीं होंगे जब तक राष्ट्र को एक संस्कृति में नहीं पिरो देते. ऐसे विरोधियों से आज़ाद हुए बिना स्वराज के बारे में सोचना व्यर्थ है. सबसे खतरनाक चीज़ है जिन्ना के नेतृत्व में मुसलमानों की वो पॉलिसी, जो एक राष्ट्र के अंदर दूसरे का निर्माण करने की बात रखती है. जिन्ना इस पॉलिसी का चेहरा है. अगर तुम जिन्ना को मारने की ज़िम्मेदारी लेते हो तो स्वतंत्रता के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा साफ हो जाएगा. और इस काम के लिए हम तुम्हारी 50,000 रुपयों की आर्थिक मदद कर सकते हैं.'

जिन्ना और गांधी. दो देशों के राष्ट्रपिता.
ये एक बहुत ही चरमपंथी कदम था. क्योंकि अब तक जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग भी नहीं की थी. मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग जिन्ना 1940 के पाकिस्तान रिज़ॉल्यूशन में उठाते हैं. 10 साल बाद. हालांकि 1929 में जिन्ना ने नेहरू रिपोर्ट के विरोध में अपने फोर्टीन पॉइंट्स रखे थे. चौदह बिंदु, जिनमें मुसलमानों के लिए अलग चुनाव-क्षेत्र रखने की बात थी. जिनमें सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए आरक्षण की बात थी. चौदह बिंदु, जो आगे चल कर जिन्ना के सांप्रदायिक एजेंडा का आधार बनते हैं.
यशपाल ने दर्ज किया है कि 'बाबाराव की लगन और त्याग पर कोई संदेह नहीं था, लेकिन हमारा नज़रिया सावरकर बंधुओं से अलग था.'
यशपाल ने बाबाराव का ऑफर ठुकरा दिया. बाबाराव ने भी 'ठुकरा के मेरा प्यार, मेरा इंतक़ाम देखेगी' वाला एटीट्यूड नहीं पाला. यशपाल को लौटती के लिए खर्चा-पानी देकर रवाना कर दिया.
घर लौटते हुए यशपाल डरकर सोच रहे थे कि जिन्ना की सुपारी का ऑफर ले लिया होता देश में खून-खराबा मच जाता. कुछ दिन बाद यशपाल के खुद के नाम की सुपारी निकल जाती है. और ये सुपारी निकाली थी चंद्रशेखर आज़ाद ने. ये किस्सा कभी और. अभी के लिए टाटा. बाय-बाय.
वीडियो - शिवसेना के खिलाफ खड़े थे शिवाजी महाराज के वंशज, हारे या जीते?



















