शुभम हिंदी कविता की नौजवान खेप का हिस्सा हैं और जेएनयू से 'लिटरेचर: इंडियन लैंग्वेजेस' में पीएचडी कर रही हैं. स्त्री विषयों पर उनकी कविताएं खासी चर्चित हुई हैं. पर आज उनकी नज़र से जेएनयू को देखिए, इन कविताओं में .
हम जहां पढ़ते हैं
(1)
चंद एकड़ के अहाते, चंद इमारतें
कुछ क्लासरूम, कुछ लाइब्रेरियां
आप समझते हैं हम ‘यहीं’ पढ़ते हैं
कितने प्यारे हैं आप
किताबों से डरते हैं और प्रोफेसरों से
यहां तक कि विद्यार्थियों से भी
पढ़ाई चीज ही ऐसी है
वैसे डरने की कोई बात नहीं
प्रोफेसर छड़ी क्या डस्टर तक नहीं छूते
उल्टे आप ही चाहें तो..
और किताबों का क्या है
जस शीर्षक तस कंटेंट
डिग्रियां लेंगे तो लेते जाइए, लेमिनेशन वाली
कुछ सर्टिफिकेट और ट्रॉफियां भी
और ये बढ़िया लिंक के ताले दरवाजों के लिए
आप नहीं समझेंगे हम कहां पढ़ते हैं
(2)
हमारे हाथों में किताबें रहें न रहें
आंखों में चेहरे रहते हैं
जिन्हें हम बार बार पढ़ते हैं
कुछ आंखें हमारी विचारधारा तय करती हैं
कुछ जख़्म सवाल
फुटनोट्स जितनी लंबी मौतें
जिंदगियां भूमिकाओं जितनी कम
और एक कभी न खत्म होने वाला फील्ड वर्क
हर तरफ जहां हम देखते हैं या नहीं देखते
ऐसी कितनी थीसिस हम हर रोज लिखते हैं
जिन पर नमी भरे दस्तखत होते हैं
मन के भीतर जमा करते हैं और पढ़ते हैं हम ही
हम ही सवाल करते हैं और जवाब भी खोजते हैं हम ही
पढ़ने का हमारा कायदा है कि
हम हर कहीं पढ़ते हैं
जेल की सलाखों में हम आपकी विचारधारा पढ़ते हैं
आंदोलनों में प्रतिरोध
यहां तक कि
आपकी सौम्यता के पीछे की बर्बरता
और बर्बरता की निरंकुशता
हम आपसे पहले पढ़ते हैं
आप चाहें तो यूनीवर्सिटी बंद कर दें
चाहें तो किताबें
हम किताबों से बेहतर ताले पढ़ते हैं
जेएनयू
किसी के पर्स की तली से चिपकी रही
किसी की पीठ से
कहीं सीवी में टंगी रही
कहीं पते में
कुछ सहमति में रही, कुछ असहमति में
कुछ विचार में कुछ वैचारिकता में
और मुनीरका के एक सीलन भरे अंधेरे कमरे में
आधी रात की प्यास का पानी बन कर
हलक से उतरती रही यूनीवर्सिटी