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ट्रंप के चीन दौरे की वो 5 बातें, जो दिल्ली के सियासी गलियारों में बेचैनी बढ़ा सकती हैं

Trump-Xi Beijing Summit 2026: ट्रंप और जिनपिंग के बीच बंद कमरे में होने वाली बातचीत तय करेगी कि आपके शहर में पेट्रोल-डीजल के दाम कम होंगे या नहीं. यह तय होगा कि भारत में आने वाली विदेशी कंपनियां कहीं अपना रुख दोबारा चीन की तरफ तो नहीं कर लेंगी.

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अमेरिका और चीन के बीच खिंची तलवारें क्या म्यान में जाएंगी? (फोटो- व्हाइट हाउस)

अमेरिका और चीन के बीच की तल्खी क्या अब ठंडी पड़ने वाली है. बीजिंग की सड़कों पर बिछा लाल कालीन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वो मुस्कुराहट बहुत कुछ कह रही है. डॉनल्ड ट्रंप करीब 9 साल बाद राष्ट्रपति के तौर पर चीन की धरती पर उतरे हैं. आखिरी बार जब वो 2017 में आए थे तो माहौल में एक अनकही सी कड़वाहट थी, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग दिख रहा है. बीजिंग के 'टेंपल ऑफ हेवन' में ट्रंप का स्वागत जिस गर्मजोशी से हुआ है, उसने दुनिया भर के कूटनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है.

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लेकिन रुकिए, अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ दो बड़े देशों की मुलाकात है, तो आप गलत हैं. सात समंदर पार हो रही इस 'महा-मीटिंग' के तार सीधे आपकी जेब, आपके किचन के बजट और आपकी सुरक्षा से जुड़े हैं. ट्रंप और जिनपिंग के बीच बंद कमरे में होने वाली बातचीत तय करेगी कि आपके शहर में पेट्रोल-डीजल के दाम कम होंगे या नहीं. यह तय होगा कि भारत में आने वाली विदेशी कंपनियां कहीं अपना रुख दोबारा चीन की तरफ तो नहीं कर लेंगी.

दिल्ली के सत्ता के गलियारों में भी इस मुलाकात को लेकर एक अजीब सी बेचैनी है. साउथ ब्लॉक में बैठे रणनीतिकार बारीकी से एक-एक तस्वीर और बयान को तौल रहे हैं. आखिर ट्रंप की इस यात्रा की वो कौन सी 5 बातें हैं जो भारत को सोचने पर मजबूर कर रही हैं. चलिए, इस पूरे मामले की परत दर परत जांच करते हैं और समझते हैं कि ट्रंप और जिनपिंग की इस 'पॉवर हग' का भारत के लिए असली मतलब क्या है.

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1- ईरान की जंग और आपके घर का बजट

ट्रंप की इस यात्रा का सबसे बड़ा और तात्कालिक एजेंडा है 'ईरान युद्ध'. साल 2026 की शुरुआत से ही मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर है और अमेरिका-ईरान के बीच सीधी जंग जैसे हालात हैं. चीन, जो ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, इस पूरे विवाद में एक 'पॉवर ब्रोकर' बनकर उभरा है. ट्रंप जानते हैं कि अगर जंग रोकनी है या ईरान को टेबल पर लाना है, तो जिनपिंग की मदद जरूरी है.

अब इसका भारत से कनेक्शन समझिए. भारत अपनी जरूरत का 80 परसेंट से ज्यादा कच्चा तेल बाहर से मंगवाता है. जब भी मिडिल ईस्ट में पटाखे फूटते हैं, कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. ‘जे पी मॉर्गन’ की ‘मिड-ईयर आउटलुक 2026’ रिपोर्ट (J.P. Morgan Mid-Year Outlook 2026) बताती है कि इस साल की शुरुआत में तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया था. 

अगर ट्रंप और जिनपिंग के बीच ईरान को लेकर कोई 'डील' हो जाती है, तो तेल की कीमतें गिर सकती हैं. इसका सीधा मतलब है कि भारत में पेट्रोल-डीजल सस्ता हो सकता है और आपकी रसोई का बजट संभल सकता है.

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2- 'चाइना प्लस वन' स्ट्रैटेजी पर मंडराता खतरा

पिछले कुछ सालों में भारत के लिए सबसे अच्छी बात यह रही कि दुनिया की बड़ी कंपनियां चीन से अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर भारत जैसे विकल्पों की तलाश कर रही थीं. इसे 'चाइना प्लस वन' कहा गया. एप्पल से लेकर टेस्ला तक भारत में अपनी जड़ें जमाने लगे थे. ट्रंप की पिछली पारी में चीन पर लगाए गए भारी टैरिफ ने भारत के लिए एक बड़ा मौका बनाया था.

लेकिन इस बार ट्रंप के साथ चीन गए डेलिगेशन में एलन मस्क, टिम कुक और एनवीडिया के जेनसन हुआंग जैसे दिग्गजों का होना बहुत कुछ इशारा कर रहा है. ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर लिखा है कि वह जिनपिंग से अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन के दरवाजे और ज्यादा 'खुलवाने' की बात करेंगे. 

‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट ‘विल 2026 सी इंडियाज चाइना ड्रीम कम ट्रू?’ (Economic Times - Will 2026 see India's China dream come true?) के मुताबिक अगर अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक रिश्ते सुधर जाते हैं और टैरिफ कम होते हैं, तो वो कंपनियां जो भारत आने का मन बना रही थीं, शायद फिर से चीन की चमक-धमक की ओर आकर्षित हो जाएं. भारत के 'मेक इन इंडिया' मिशन के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन सकता है.

3- चिप और सेमीकंडक्टर की नई रेस

21वीं सदी का नया सोना 'सेमीकंडक्टर चिप' है. आपके फोन से लेकर वाशिंग मशीन और मिसाइल तक, सब इसी पर टिके हैं. अमेरिका ने पिछले कुछ सालों में चीन को एडवांस्ड चिप्स देने पर कड़ी पाबंदी लगा रखी है. भारत इसका फायदा उठाकर खुद को एक ग्लोबल सेमीकंडक्टर हब बनाने की कोशिश में जुटा है. हाल ही में टाटा और अन्य कंपनियों ने इस दिशा में बड़े निवेश किए हैं.

चीन में इस समय एआई (AI) और कंप्यूटिंग के लिए चिप्स की भारी मांग है. ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात में अगर चिप्स और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर कोई बीच का रास्ता निकलता है, तो भारत के उभरते हुए सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए कॉम्पिटिशन बढ़ जाएगा. 

रणनीतिक थिंक टैंक ‘चाथम हाउस’ की रिपोर्ट (Chatham House - Trump-Xi Summit Analysis) के मुताबिक, यह समिट किसी बड़े विवाद को सुलझाने के बजाय 'रिश्तों को मैनेज' करने के लिए है. अगर टेक-वार में थोड़ी भी नरमी आती है, तो ग्लोबल सप्लाई चेन का समीकरण बदल जाएगा, जिसका सीधा असर भारत की औद्योगिक नीति पर पड़ेगा.

4- बॉर्डर का टेंशन और ट्रंप की चुप्पी

भारत के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय है एलएसी (LAC) यानी चीन के साथ हमारा सीमा विवाद. अब तक अमेरिका खुलकर भारत का साथ देता रहा है. लेकिन इस बार की बीजिंग यात्रा में ट्रंप का पूरा फोकस 'कॉमर्स' और 'बिजनेस' पर है. ‘मनोहर पारिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड रिसर्च’ का मानना है कि ट्रंप का 'अमेरिका फर्स्ट' एजेंडा कभी-कभी कूटनीतिक समझौतों के लिए सामरिक हितों की बलि चढ़ा देता है.

इस बारे में पूर्व भारतीय राजनयिक गौतम बंबावले कहते हैं कि, 

अमेरिका और चीन के बीच 'जरूरत से ज्यादा नजदीकी' भारत के लिए रेड सिग्नल हो सकती है. अगर ट्रंप ने व्यापारिक रियायतें पाने के चक्कर में ताइवान या दक्षिण चीन सागर जैसे मुद्दों पर ढील दी, तो चीन का मनोबल बढ़ सकता है. दिल्ली के लिए डर यह है कि क्या अमेरिका सीमा पर भारत को मिलने वाले कूटनीतिक और इंटेलिजेंस सपोर्ट को सौदेबाजी का हिस्सा तो नहीं बना लेगा. 

भारत अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' पर कायम है, लेकिन इस मुलाकात की केमिस्ट्री पर नजर रखना बेहद जरूरी है.

5- ताइवान और हथियारों की डील का पेंच

पीबीएस न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, जिनपिंग से मुलाकात के ठीक पहले ट्रंप ने ताइवान को दिए जाने वाले 11 अरब डॉलर के हथियारों के पैकेज पर चर्चा करने की बात कही थी. यह चीन के लिए सबसे दुखती रग है. पीपल्स डेली ने इसे 'रेड लाइन' बताया है. अगर ट्रंप ने इस पैकेज को रोकने या कम करने का इशारा किया, तो इसके बदले में वो चीन से क्या मांगेंगे?

भारत के नजरिए से देखें तो अगर चीन अपनी पूर्वी सीमा (ताइवान) पर निश्चिंत हो जाता है, तो उसकी पूरी ताकत और ध्यान हिमालयी सीमा (भारत) की ओर मुड़ सकता है. कूटनीति में एक तरफ का संतुलन बिगड़ना अक्सर दूसरी तरफ नई मुसीबत लाता है. भारत को इस बात की तैयारी रखनी होगी कि अगर ग्लोबल पॉवर बैलेंस चीन की तरफ झुकता है, तो हमें अपने डिफेंस और डिप्लोमेसी को और ज्यादा धार देनी होगी.

मुलाकात नहीं, नतीजा अहम है

डॉनल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुस्कुराते हुए चाहें जितनी भी तस्वीरें आ जाएं. मगर जब तक दोनों देशों के बीच तनाव कम करने वाले कदम नहीं उठाये जाते, तब तक उसका कोई मतलब नहीं है. 

रणनीतिक मामलों के पोर्टल ‘इंडिया मैटर्स’ के एडीटर रोहित शर्मा कहते हैं,

ट्रंप-जिनपिंग की मुलाकात से ज्यादा भारत के लिए जरूरी ये है कि उसका आउटकम क्या आता है. दोनों देशों के बीच तनातनी का जो ताना-बाना है, उसे देखते हुए लगता नहीं है कि बात बनेगी. साउथ चाइना सी का मुद्दा हो या ताइवान का या फिर ईरान जंग का, अमेरिका और चीन के बीच तनातनी की दीवार इतनी ऊंची है कि उसका गिरना नामुमकिन सा लगता है.

रोहित की बात में दम भी है क्योंकि अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के मुताबिक ट्रंप के साथ मुलाकात में शी जिनपिंग ने साफ कर दिया कि अगर ताइवान के मुद्दे को ठीक ढंग से हल नहीं किया गया. तो इसके चलते अमेरिका और चीन के बीच संघर्ष की नौबत भी आ सकती है.

बावजूद इसके रोहित ये भी मानते हैं कि अगर कहीं अमेरिका और चीन के रिश्ते सुधरे तो उसके बाद जो जियो-पॉलिटिकल हालत पैदा होंगे, उन्हें भारत के लिए अच्छा तो हरगिज नहीं कहा जाएगा.

क्या बदल जाएगा आगे का परिदृश्य

ट्रंप और जिनपिंग की यह मुलाकात खत्म होने के बाद जो साझा बयान आएगा, उसमें असली खेल छिपा होगा. भारत को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सचेत रहने की जरूरत जरूर है. हमें अपनी डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को इतना मजबूत करना होगा कि दुनिया की कंपनियां सिर्फ मजबूरी में नहीं, बल्कि भरोसे के चलते भारत आएं.

चाहे तेल के दाम हों या बॉर्डर की सुरक्षा, भारत को अपनी चाल खुद तय करनी होगी. ट्रंप की 'डील मेकिंग' स्टाइल दुनिया को एक नया आकार दे रही है और भारत इस बदलती दुनिया का एक अहम हिस्सा है. अंत में, सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि बीजिंग की मुस्कुराहटों के पीछे छिपे असली इरादे क्या हैं.

वीडियो: ट्रंप के दावे पर अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट में क्या पता चला? ईरान की कितनी ताकत बची है?

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