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बड़े नोट बंद हो जाने के बाद क्या-क्या अच्छा हो रहा है

लोग परेशान हैं, लेकिन बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो इस मौके के अलावा कभी और न हो पाता.

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Source- Reuters

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एक मेडिकल स्टोर है. उसके सामने एक मजदूर खडा है. उसे दवाई लेनी है. उसकी बेटी की तबियत खराब है. दवाई ढाई सौ के लगभग की आई, उसके पास सत्तर रुपये थे, बाकी पांच सौ का नोट था, झिकझिक चली. दुकान वाले को खुल्ले पैसे ही चाहिए थे, अंत में दुकान वाले ने 500 भी नहीं लिए. दवाई दे दी. कहा, अब खुल्ले नहीं हैं तो क्या बच्ची बीमार रहने दें. होगा तो दे ही देगा.

एक ई-रिक्शे वाला था, उसे 10 रुपये देने थे. 50 का नोट दिया. खुल्ला नहीं था, चिल्लर दिया, छह रुपये में मान गया. क्या करता? मुस्कुरा के चला गया.

मकान मालकिन से किराने की दुकान वाले ने दो हजार का नोट लिया, हजार के खुल्ले लौटाए, 135 और देने थे. कागज पर लिख दिया. वो कागज लेकर लौट आईं.
जबसे बड़ा पैसा सिर्फ कागज रह गया, तब से कागज का भी मोल हो गया. जबसे बड़े नोट बंद हुए, हमें पता लगा पैसा बड़ा नहीं होता. पैसा सबसे बड़ा नहीं होता. आदमी बड़ा होता है. 2000 आया. मिलेनियम सुनने को आया, एक सुबह हम उठे और लगा सब नया हो गया. मैं हमेशा से चाहता था ऐसा कुछ फिर हो. एक रोज़ लगे कि कुछ बदल गया है. एक वक़्त मेरा क्रांतियों में भरोसा था, लगता था किसी सुबह सब बदलेगा. बदल गया, मेरा सपना पूरा हुआ.
अभी मुश्किलें बहुत हैं, लेकिन इस बुरे वक़्त में भी बहुत कुछ अच्छा हो रहा है. सौ की नोट दो दिन चल रही है. पता चल रहा है, ऑफिस के पास घर लेना कितना अच्छा है. सौ के नोट से कितने काम हो सकते हैं. पैसे की वैल्यू पता चल रही है. मकान मालिक से कहा पैसे ले लो, चेक दे देता हूं. महीने की दस तारीख को महीना पूरा होता है, उनने मना कर दिया. मैंने कहा ट्रांजेक्शन कर देता हूं, मना कर दिया. जो मकान मालिक दस तारीख के किराए के लिए एक तारीख से पूछने लगे सैलरी आ गई है? वो ऐसा व्यवहार करे तो समझिए क्या कुछ नहीं बदला है.
इस वक़्त देश एक है. सारा देश एक साथ खडा है. एटीएम की लाइन में, बैंक की लाइन में. ये वो मौक़ा है जब पता लगता है, हम एक राष्ट्र का हिस्सा हैं, जहां हम सबको एक तरह से एक फैसले से फर्क पड़ता है. इस वक़्त न कोई हिंदू है, न मुसलमान, न मद्रासी, न पूर्वोत्तर का. सारे हिन्दुस्तानी हैं. सबके पास पैसे कम हैं. सब चाहते हैं बैंकों से लाइन खत्म हो, उनकी जेब में पड़े पैसे खत्म होने से पहले. एक राष्ट्र के तौर पर आप चीजें महसूस कर रहे हैं, इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि अगला क्या सोचता है, किस तबके से है, कितना कमाकर धरे है. उसकी पॉलिटिक्स क्या है. आज सब बराबर हैं. जब तेरे पास हों तब दे देना. राष्ट्रीय सूत्र बन गया है. 
लोग पैसे बचाने लगे हैं. पैदल चलने लगे हैं. अब डेढ़ किलोमीटर के लिए पचास रुपये देना अखरने लगा है. कार वाले ऑटो वाले में आ गए. पेट्रोल-डीजल वालों ने भी हजार-पांच सौ लेना बंद कर दिया है. ऑटो वाले रिक्शे में आ गए, रिक्शे वाले पैदल आ रहे हैं. और पैदल वाले खुद को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं.
आदमी ने बाहर का खाना छोड़ दिया, तला-छना बेकार होता है, ट्रांस फैट से बचना चाहिए. घर का खाना बेस्ट हो गया है. घर के खाने में भी फिल्टर लगे हैं. प्याज से मुंह गंधाता है, टमाटर में कैरोटेनॉयड्स होते हैं जो इम्यून सिस्टम को कमजोर करते हैं. उसका बीज ज्यादा खा लें तो पथरी हो जाती है. चाय-सुट्टा छूट गया है. ऑफिस में जो बार-बार चाय पीने के लिए बाहर निकलते थे, अब नहीं जाते, जाने कौन-कौन साथ हो ले और कितने की चपत लग जाए. कोई साथ नहीं जाता तो दरबार नहीं लगती काम ज्यादा होता है. लोग ऑफिस में काम करते हैं. ओवर टाइम करते हैं, ताकि रात घर लौटने को कैब मिले. किराए के पैसे ही बचें. बुरी आदतें छोड़ रहा है, शराब के ठेकों पर हर कहीं कार्ड नहीं चलते. आदमी सतर्क रहता है, सजग रहता है, पैसे बचाने के लिए, क्राइम से बचने के लिए. और अब यूं भी सतर्क रहना चाहता है कि कोई क्राइम न करबैठे, नो पार्किंग में गाड़ी न लगा जाए, स्पीड लिमिट न क्रॉस करे, ताकि जुर्माना न देना पड़े. कुछ बुरा करे तो हर्जाना न देना पड़े. सड़क पर हॉर्न भी ज्यादा नहीं बजाता है. जमानत के पैसे बचा लेना चाहता है. आदमी, आदमी पर भरोसा करने लगा है. ये नोट न चलने के टाइम पर इंसानों में भरोसे का वक़्त है.

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