कर्नाटक का नक्शा देखने पर आप अटपटा महसूस करते हैं. राजधानी बैंगलुरु, इसके दक्षिणी कोने पर बसी हुई है और तमिलनाडु के साथ सीमा साझा करती है. ज्योग्राफिया का यही नुक़्ता कर्नाटक की सियासत की तासीर तय करता है. बैंगलोर दक्षिण कर्नाटक में है. दक्षिण कर्नाटक, जिसे किसी दौर में मैसूर स्टेट नाम से जाना जाता था. यहां वोक्कालिगा सबसे बड़ी बिरादरी है. वहीं राज्य के उत्तरी हिस्से में लिंगायत समुदाय का बोलबाला है. उत्तरी कर्नाटक लगातार इल्ज़ाम लगाता रहा है कि सूबे का सारा विकास दक्षिण कर्नाटक चूस लेता है.

धरम सिंह पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ.
अस्सी की दहाई में बैंगलोर खुद को इलेक्ट्रॉनिक्स सिटी के तौर पर गढ़ रहा था. जल्द ही इस पर सिलिकॉन वैली का मुलम्मा चढ़ने वाला था. यहां जैसे-जैसे कारखाने लगने लगे, वैसे-वैसे मजदूर आना शुरू हुए. देखते ही देखते कैम्पे गौड़ा का यह शहर मजूरों की बस्ती में तब्दील हो रहा था. लोगों के आने के साथ ही बैंगलोर ने पसरना शुरू किया. एक-एक करके आस-पास के गांव, शहर की ज़द में आते चले गए. प्रॉपर्टी के दाम आसमान छूने लगे.
वोक्कालिगा हार्टलैंड में बसा बैंगलोर, राजधानी होने की वजह से सियासत का सबसे बड़ा अड्डा था. ऐसे में जब शहर पर वर्चस्व की लड़ाई शुरू हुई तो उसमें सियासत भी नत्थी हो गई. जंग का मैदान बना कनकापुरा संसदीय क्षेत्र. 2007 के चुनावी परिसीमन के बाद ये बैंगलोर रूरल कहलाया.
पहुंचते हैं 1985 में. कर्नाटक में इस साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे थे. वोक्कालिगा लोगों के सबसे बड़े चेहरे एचडी देवेगौड़ा ने दो जगह से पर्चा दाखिल किया था. पहला अपनी गृह विधानसभा, होलानरसीपुर सीट से और दूसरा बैंगलोर की सातनूर विधानसभा सीट से. सातनूर से कांग्रेस की टिकट पर एक 25 साल का युवक देवेगौड़ा को चुनौती दे रहा था. नाम था - डीके शिवकुमार. वोक्कालिगा समाज से आने वाले शिवकुमार यह चुनाव 15,803 के बड़े मार्जिन से हार गए लेकिन उनके और देवेगौड़ा के बीच दशकों तक चलने वाली सियासी रंजिश की नींव इस चुनाव ने रख दी थी. रंजिश, जिसके केंद्र में थे - बैंगलोर और वोक्कालिगा.
इसी साल 1985 में, देवेगौड़ा होलानरसीपुर और सातनूर दोनों जगह से चुनाव जीत गए. उन्होंने सातनूर की सीट छोड़ दी. यहां हुए उप-चुनाव में डीके शिवकुमार फिर मैदान में उतरे. और जीत गए. उनके सियासी करियर की यह शुरुआत थी. शिवकुमार और देवेगौड़ा परिवार के बीच दो चुनावों में सीधी टक्कर हुई थी. पहला 1985 में, जब वो देवेगौड़ा के खिलाफ चुनाव लड़े थे और दूसरी मर्तबा 1999 में, जब उन्होंने एचडी कुमारस्वामी को सातनूर से हराया था.

धरम सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह.
कहते हैं 1999 में कुमारस्वामी के चुनाव हारने के बाद दोनों गुटों की रंजिश अपने चरम पर थी. शिवकुमार, वक़्त के इस टुकड़े में देवेगौड़ा पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे थे. वजह थी उनकी बढ़ती सियासी हैसियत. वो 1999 में बनी एस. एम. कृष्णा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर बन गए थे. कृष्णा के पास शिवकुमार को शह देने की पर्याप्त वजह थीं. कृष्णा खुद वोक्कालिगा बिरादरी से आते थे और अपने समुदाय का सबसे बड़ा नेता बनने का ख्वाब देख रहे थे. शिवकुमार इस अभियान में उनके सेनापति थे. तो इस तरह देवेगौड़ा और शिवकुमार के बीच चल रहे झगड़े में कृष्णा अपनी महत्वाकांक्षा के चलते गुत्थमगुत्था हो गए.
अब पहुंचते हैं 2004 में. इस साल कर्नाटक विधानसभा के चुनाव लोकसभा के साथ-साथ हो रहे थे. देवेगौड़ा फिर से, दो सीट पर चुनाव लड़ रहे थे - हसन और कनकापुरा. कृष्णा ने शिवकुमार के साथ मिलकर कनकापुरा सीट पर देवेगौड़ा का गेम सेट कर दिया. कृष्णा के कहने पर यहां से तेजस्विनी गौड़ा को टिकट दिया गया. राजनीति में आने से पहले वो कन्नड़ न्यूज़ चैनल उदया टीवी में एंकर हुआ करती थीं. तेजस्विनी ने कनकापुरा सीट से बड़ा उलटफेर कर दिया. वो 5,83,920 वोट के साथ इस चुनाव में अव्वल रहीं. वहीं 4,67,257 वोट के साथ बीजेपी के रामचंद्र गौड़ा दूसरे नंबर पर रहे. देवेगौड़ा को 4,62,320 वोट के साथ तीसरे नंबर पर खिसकना पड़ा. वे एक पूर्व-प्रधानमंत्री थे, और ये एक शर्मनाक हार थी.
लेकिन खेल यहीं खत्म नहीं होता. देवेगौड़ा को इस हार का बदला लेने का मौका दिया 2004 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों ने. इनमें 224 में से 79 सीट के साथ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. 65 सीटों के साथ कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी. और 58 सीटों के साथ जेडीएस सत्ता की चाबी हासिल करने में कामयाब रही.

धरम सिंह और नरेंद्र मोदी.
चुनाव के बाद गठबंधन पर रस्साकशी शुरू हुई. करीब दो सप्ताह चली बातचीत में देवेगौड़ा आखिरकार सत्ता साझा करने के महाराष्ट्र फॉर्मूले पर राजी हो गए. सूबे में उनकी पार्टी के अध्यक्ष सिद्धारामैय्या को उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी दी गई. उनके बड़े बेटे रवन्ना को सिंचाई और PWD मंत्रालय दिया गया. देवेगौड़ा इन सब बातों पर पहली मीटिंग में मान गए. दो सप्ताह चले मोल-भाव के बीच में थी मुख्यमंत्री की कुर्सी. समझौते के हिसाब से यह कांग्रेस के खाते में जानी थी लेकिन देवेगौड़ा मुख्यमंत्री के नाम पर टांग अड़ाकर बैठ गए. उन्हें कनकापुरा से चुनाव हारे एक महीना भी नहीं बीता था. वो एमएम कृष्णा को किसी हालत में बख्शने को तैयार नहीं थे. इस तरह कृष्णा की प्रबल दावेदारी लड़खड़ा कर गिर गई.
दूसरा नाम आया मलिक्कार्जुन खड्गे का. खड्गे गांधी परिवार के करीबी थे. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके थे. उनकी छवि साफ़-सुथरी थी. एसएम कृष्णा के हटने के बाद वो सबसे प्रबल उम्मीदवार थे. उनका नाम फाइनल होने ही वाला था कि देवेगौड़ा ने फिर टांग अड़ा दी. उन्हें खड्गे से अपना दशक पुराना हिसाब-किताब जो चुकता करना था.
बात ये थी कि 1985 से 1988 के बीच देवेगौड़ा रामकृष्ण हेगड़े सरकार में सिंचाई और PWD मंत्री थे. ठीक इसी दौर में खड्गे चौथी बार विधायक बने थे और उनको पब्लिक अकाउंट्स कमिटी का अध्यक्ष बनाया गया. यह पद विपक्ष के लिए आरक्षित होता है. खड्गे ने PAC में रहते हुए कर्नाटक में हुए सिंचाई घोटाले की पोल खोल दी. देवेगौड़ा इस घोटाले के लपेटे में आ गए. इससे उनकी 'ईमानदार किसान' वाली छवि को फटका लगा. इसलिए मुख्यमंत्री का नाम तय करने के नाज़ुक मौके पर देवेगौड़ा को खड्गे के ये पुराने 'अहसान' याद आ गए, और वो उनकी दावेदारी के खिलाफ ज़ोर से खड़े हो गए.
कांग्रेस की तरफ से गठबंधन संकट सुलझाने का काम सौंपा गया था विलासराव देशमुख को. देशमुख जिन्होंने महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ गठबंधन का 'महाराष्ट्र फॉर्मूला' तैयार किया था. देवेगौड़ा के अड़ियल रवैये से आजिज आकर देशमुख ने उनसे पूछा कि - बताइए, मुख्यमंत्री के तौर पर किसे देखना चाहते हैं? तो देवेगौड़ा ने मद्धम आवाज में कहा, "अजातशत्रु'".
अजातशत्रु माने जिसका कोई दुश्मन न हो. कर्नाटक की सियासत में ऐसा नाम था एन. धरम सिंह का. उनके पास तीन दशक का अनुभव था लेकिन इस काल में उन्होंने कभी भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को सतह पर न आने दिया. देवेगौड़ा की नजर में धरम सिंह गठबंधन निभा पाने के लिहाज से सबसे मुफीद नेता थे. धरम सिंह सियासत के ऐसे बैकबेंचर थे जो संयोगवश क्लास मॉनिटर बना दिए गए थे. लेकिन ये उनकी सियासी पारी में आया पहला संयोग नहीं था.
ये धरम सिंह 25 दिसम्बर 1936 को गुलबर्गा जिले में पैदा हुए थे. गुलबर्गा, आजादी से पहले हैदराबाद स्टेट का हिस्सा हुआ करता था. धरम सिंह जिस दौर में जवान हो रहे थे उस दौर में तेलंगाना के इलाके में वामपंथी आंदोलन तेजी पर था. उस्मानिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्हें भी वामपंथी आंदोलन की हवा लगी. उस्मानिया से कम्युनिस्ट बनकर लौटे धरम सिंह ने गुलबर्गा की एक स्कूल में हिंदी के टीचर के तौर पर नौकरी कर ली. कुछ वक्त बाद उन्होंने फिर से पढ़ाई का रुख़ किया. वकालत की. पढ़ाई पूरी होने के बाद गुलबर्गा के जेवार्गी कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी. भीतर का वामपंथी अभी जिंदा था तो किसानों और खेत मजदूरों के लिए आंदोलन करते थे, केस लड़ते थे.
राजनीति में दिलचस्पी छात्र जीवन से थी ही. 1960 आते-आते चुनाव में भी दिलचस्पी जागने लगी. पहला चुनाव लड़ा गुलबर्गा म्युनिसिपल काउन्सिल का. सगे भाई के खिलाफ. जीत गए. पार्षद बन गए. ये उनके सियासी करियर की शुरुआत थी. करियर में पहला बड़ा मोड़ आया 1971 में. जब उन पर देवराज उर्स की नज़र पड़ी. उनके कहने पर धरम सिंह ने कांग्रेस जॉइन की.
पहुंचते हैं 1977 में. आपातकाल का वक़्त था. कांग्रेस में भगदड़ मची हुई थी. धरम सिंह पिछली बैंच पर बैठे सारा तमाशा देख रहे थे. उनके मेंटर देवराज उर्स कांग्रेस छोड़कर चल दिए थे. धरम को साथ लेने आए लेकिन वे नहीं आए. कांग्रेस में रुक गए. 1978 में उन्हें टिकट मिला. गुलबर्गा की जेवार्गी सीट से. सामने थे जनता पार्टी के मलप्पा अलुर. कांग्रेस विरोधी लहर में भी धरम सिंह 11,595 वोट से चुनाव जीतने में कामयाब रहे.

धरम सिंह और ओमान चांडी.
अब 1980 का लोकसभा चुनाव उनके करियर का दूसरा बड़ा मोड़ था. उन्हें गुलबर्गा संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस का टिकट मिल गया. जनता पार्टी के विजयनाथ पाटिल को उन्होंने यहां 1,17,976 वोट से पटखनी दी. लेकिन इस बार संसद जाना बदा नहीं था. 1980 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा के भरोसेमंद सिपहसालार सीएम स्टीफन नई दिल्ली सीट से बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी से चुनाव हार गए. इंदिरा चाहती थीं कि स्टीफन उनके कैबिनेट में वित्त मंत्रालय संभाले. उनके लिए सुरक्षित सीट की तलाश की जाने लगी, जहां से उन्हें उपचुनाव के जरिए लोकसभा में लाया जा सके.
धरम सिंह एक लाख से ज्यादा के अंतर से चुनाव जीते थे, तो इंदिरा को गुलबर्गा सीट जंच गई. उन्होंने कहा कि अपनी सीट खाली कर दो. अब तक धरम सिंह ने सांसद के तौर पर शपथ भी नहीं ली थी. और, उन्होंने बिना सवाल किए ये सीट खाली कर दी. उनके इस कदम ने उनका नाम "भरोसेमंद" वाली डायरी में दर्ज करवा दिया. इसके बाद कर्नाटक में कांग्रेस की जो भी सरकार बनी धरम सिंह उसके मंत्रिमंडल में रहे.
उनकी छवि एक मृदुभाषी नेता की थी. वो किसी से भी उलझते नहीं थे. इसी वजह से वो देवेगौड़ा की पहली पसंद थे. 28 मई 2004 को उन्होंने कर्नाटक के 17वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. कर्नाटक की सियासत के इस अजातशत्रु को अभी एक और शहादत देनी थी. एक ऐसे आदमी के हाथों जो अपने कहे शब्दों के लिए बिल्कुल वफादार नहीं था. पढ़िए कांग्रेस के सबसे वफादार नेता के सियासी कत्ल का किस्सा हमारी अगली कड़ी में.
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