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कांग्रेस का वो दलित नेता, जो पांच बार सीएम बनते-बनते रह गया

2.08 K
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मल्लिकार्जुन खड़गे की ये प्रोफाइल कर्नाटक चुनाव के दौरान लिखी गई थी, आज उनके जन्मदिन के मौके दोबारा हम आपको इसे पढ़वा रहे हैं. 


कर्नाटक का चुनाव बुरी तरह से फंसा हुआ है. एकदम सांसें अटका देने वाला मामला है. पर हमारे लिए नहीं. सियासी पार्टियों के लिए. और कर्नाटक में तीन मेन प्लेयर्स हैं. कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस. इन्हीं के बीच 224 सीटों का बंटवारा होगा और बंटवारा करेगी कर्नाटक की जनता. क्या बंटवारा किया, ये कर्नाटक चुनाव नतीजों के साथ बहुत जल्द सामने आने वाला है. मगर इस फैसले से पहले एक और चीज आती है. एग्जिट पोल. उसने इन तीनों पार्टियों की टेंशन बढ़ा दी है.

इन पोल्स का कहना है कि कर्नाटक में इस बार हंग असेंबली आ रही है. कांग्रेस और बीजेपी के बीच फर्स्ट-सेकंड की लड़ाई है. पर किंगमेकर रहेगी तीसरे नंबर पर आ रही जेडीएस. और इस जेडीएस के समर्थन देने या न देने के नाम ने कर्नाटक में येदियुरप्पा और सिद्धारमैया के अलावा एक और नाम सीएम की रेस में ला दिया है. ये नाम है कर्नाटक में 9 बार से लगातार विधायक, दो बार से सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का. पर ये नाम क्यों आया, पहले ये समझते हैंः

मल्लिकार्जुन खड़गे लोकसभा में नेता विपक्ष हैं.
मल्लिकार्जुन खड़गे लोकसभा में नेता विपक्ष हैं.

1. खड़गे दलित समाज से आते हैं और कर्नाटक में 23 फीसदी दलित अाबादी है. इसके बावजूद एक बार भी ऐसा मौका नहीं आया जब उनके बीच का कोई नेता राज्य की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचा हो. माने सीएम की गद्दी तक. राज्य की राजनीति में हमेशा से ब्राह्मणों, वोकालिग्गा और लिंगायतों का वर्चस्व रहा. पर इस बार ओपिनियन पोल्स और एग्जिट पोल्स ने राज्य की राजनीति में नए समीकरण के रास्ते खोल दिए. हंग एसेंबली यानी त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में जेडीएस किंगमेकर की भूमिका में दिखने लगी. सवाल उठता है कि वो ऐसी स्थिति में किसे समर्थन देगी?

ये सवाल बीजेपी-कांग्रेस दोनों के मन में चल रहा था मगर कांग्रेस ने एक कदम आगे बढ़ा दिया है. राज्य के सीएम सिद्धारमैया को पता है कि जेडीएस उनके नाम के लिए तो तैयार नहीं होगी. सो उन्होंने कहा कि पार्टी यदि किसी ‘दलित चेहरे’ को आगे करती है तो वो पीछे हट जाएंगे. बस इसी दलित चेहरे का नाम सामने आने के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम उछलने लगा. खड़गे के नाम पर जेडीएस को मनाना भी आसान होगा.

2. खैर, ऐसा नहीं है कि खड़गे सिर्फ दलित चेहरे के नाते ही सीएम कुर्सी के दावेदार हैं. वो कर्नाटक में कांग्रेस के सबसे सीनियर नेताओं में से एक हैं. 9 बार विधायक रहे हैं और दो बार से सांसद. राज्य से लेकर केंद्र में मंत्री रहे हैं. कर्नाटक के दो बार अध्यक्ष रहे हैं और गांधी परिवार के भरोसे के आदमी हैं. पर सबसे खास बात जो उनकी दावेदारी मजबूत करती है, वो ये कि खड़गे कई बार सीएम के तगड़े दावेदार होने के बावजूद सीएम बनते-बनते रह गए. ये थे वो मौके:

खड़गे कई बार सीएम बनते-बनते रह गए.
खड़गे कई बार सीएम बनते-बनते रह गए.

– 1989 में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो वीरेंद्र पाटिल को सीएम की गद्दी मिली. उस वक्त भी खड़गे पांच बार के विधायक थे. मंत्री रह चुके थे. प्रदेश के सीनियर नेता थे. 1985 में सदन में विपक्ष के उपनेता रहे थे. मगर वीरेंद्र पाटिल के प्रदेश अध्यक्ष रहते कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव लड़ा था सो उनका दावा हेगड़े पर भारी पड़ा.

– 1989 में आडवाणी रथ यात्रा लेकर निकले तो कर्नाटक में दंगे हो गए. 1990 में पाटिल को हटाना पड़ा और इस बार नंबर लगा एस बंगरप्पा का. दावा इस बार भी खड़गे का था, मगर वो खुद पीछे हट गए. वजह बंगरप्पा उनके पॉलिटिकल मेंटर की तरह थे.

कांग्रेस के सबसे सीनियर नेताओं में से एक हैं खड़गे.
कांग्रेस के सबसे सीनियर नेताओं में से एक हैं खड़गे.

– 1992 में कांग्रेस को एक बार फिर सीएम बदलना पड़ा. इस बार कावेरी विवाद के चलते प्रदेश में हुए दंगे इसकी वजह थे. और बंगरप्पा को हटाने की फील्डिंग तैयार की थी वीरप्पा मोइली ने. बंगरप्पा हटे और मोइली ने दावेदारी ठोक दी. पर बंगरप्पा अड़ गए कि मोइली को नहीं बनने देंगे और खड़गे का नाम आगे बढ़ा दिया. मोइली की दावेदारी मजबूत होते देख बंगरप्पा एक दूसरे नाम के पक्ष में आ गए. ये नाम था एसएम कृष्णा. वो इसलिए क्योंकि कृष्णा के पास 100 से ज्यादा विधायकों का समर्थन था. मगर अंत में मुहर मोइली के नाम पर ही लगी. वजह था एक वीटो जोकि लगाया था केरल के सीएम करुणाकरन ने. पीएम नरसिम्हा राव को कह दिया था- मोइली को सीएम बनाओ वरना मैं बागी हो जाऊंगा.

– 1999 में एक बार फिर कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार आई. इस बार टक्कर दो लोगों के बीच थी. एसएस कृष्णा और मल्लिकार्जुन खड़गे. खड़गे की सबसे मजबूत दावेदारी इसी बार मानी जा रही थी. इस बार सीएम तय करने में कांग्रेस नेतृत्व के पसीने छूट गए. दिल्ली से भेजे गए चार ऑब्जर्वर एके एंटनी, गुलाम नबी आजाद, वक्कोम पुरुषोत्तम और वी नारायणस्वामी ने 9 अक्टूबर 1999 को एक मीटिंग की. मगर किसी नाम पर सहमति नहीं बन पाई. इसकी वजह सोनिया गांधी का बयान था. वो बोली थीं – “कर्नाटक में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला है. वहां चुने गए विधायक लोकतांत्रिक तरीके से अपने नेता का चुनाव करेंगे.” बस यहीं खेल हो गया. कुछ ही घंटे बाद मुख्यमंत्री पद के लिए आधा दर्जन उम्मीदवार खड़े हो गए. अंत में यही फैसला हुआ कि जो सोनिया गांधी कहेंगी, वही होगा. सोनिया गांधी को गुलाम नबी आजाद ने फोन मिलाया और एसएम कृष्णा के नाम पर मुहर लग गई.

खड़गे विपक्ष में मौजूद कांग्रेस का पक्ष रखते आ रहे हैं.
खड़गे विपक्ष में मौजूद कांग्रेस का पक्ष रखते आ रहे हैं.

– 2004 में एक बार फिर मैदान में थे मल्लिकार्जुन खड़गे. पर इस बार सरकार कांग्रेस अकेले नहीं बना रही थी. उसे जेडीएस की बैसाखी का सहारा था. सो यहां उनका एचडी देवगौड़ा से पुराना पंगा भारी पड़ गया. बात 1984 की है, जब एक पीएसी का नेतृत्व करते हुए खड़गे ने देवगौड़ा के मंत्री कार्यकाल में हुए सिंचाई घोटाले का खुलासा कर दिया था और देवगौड़ा की ईमानदार छवि धरी की धरी रह गई थी. वहीं एसएम कृष्णा पर एचडी कुमारस्वामी से दुश्मनी भारी पड़ी. उनके कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री रहे डीके शिवकुमार ने 1999 में कुमारस्वामी को सातनूर विधानसभा से चुनाव हराया था. इस खींचतान का फायदा मिला धरम सिंह को जिन्हें कर्नाटक का अजातशत्रु कहा जाता था. माने उनका कोई दुश्मन नहीं था.

3. मल्लिकार्जुन खड़गे का सीएम बनना कांग्रेस की भावी सियासत को भी सूट करेगा. माने कर्नाटक के बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में चुनाव हैं. सोचिए वहां की एक रैली में राहुल गांधी बोल रहे हैं –

राहुल गांधी और कर्नाटक सीएम सिद्धारमैया के साथ खड़गे.
राहुल गांधी और कर्नाटक सीएम सिद्धारमैया के साथ खड़गे.

हमारी चार प्रदेशों में सरकार है. इसमें से एक का मुख्यमंत्री हमने दलित समाज का बनाया है. जबकि बीजेपी की 20 राज्यों में सरकार है. बताइये कितने राज्यों में उसने दलित सीएम बनाया है. जवाब है- एक भी नहीं. 

इसका जवाब बीजेपी के पास भी नहीं होगा और ये बात सीधा फायदा कांग्रेस को पहुंचाएगी.

4. कांग्रेस की वापसी के द्वार हमेशा से साउथ से ही खुले हैं. सो इस बार भी वो ऐसा ही चाहेगी. कांग्रेस हर हाल में वहां सरकार बनाए और फिर से ये उसके लिए लकी चार्म साबित हो. 2019 के लिहाज से. केंद्र में वापसी के लिए.

ऐसा पहला मौका तब था जब इमरजेंसी के बाद 1977 के चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हारी थी. मगर कर्नाटक और केरल दोनों में ही कांग्रेस की सरकार बनी रही थी.

सोनिया गांधी के साथ खड़गे.
सोनिया गांधी के साथ खड़गे.

# दूसरा मौका आया 1992 के चुनाव में जब राजीव गांधी श्रीपेरामुदूर में एक रैली में जाते वक्त जान गंवा बैठे. इसके बाद साउथ के राज्यों में लोकसभा के चुनाव पड़े तो कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल के लोगों ने कांग्रेस को पूरा समर्थन दिया. यहां से मिली सीटों के बल पर ही नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बन पाए थे.

तीसरा मौका रहा 2004 में जब कांग्रेस के लिए किंगमेकर के तौर पर आए आंध्र प्रदेश के सीएम वाईएसआर रेड्डी. उस समय कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में 29 सीटें जीती थीं.

सो कांग्रेस इस बार भी चाहेगी कि कर्नाटक में हर हाल में उसका सीएम बने. फिर जेडीएस से ही क्यों न हाथ मिलाना पड़े और सिद्धारमैया को किनारे लगाना पड़े. वैसी स्थिति में खड़गे ही बाजी मारते दिखते हैं.

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के साथ खड़गे.
पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के साथ खड़गे.

छात्र राजनीति से की शुरुआत, कॉलेज में बने महामंत्री

बिदार जिले के भल्की तालुका में एक गांव पड़ता है वारावती. 21 जुलाई 1942 को यहां के एक गरीब और दलित परिवार में खड़गे का जन्म हुआ. पर जैसे हर गरीब पिता की ख्वाहिश होती है कि जो वो खुद न कर सके वो लड़के को करवाएंगे. तो उन्होंने मल्लिकार्जुन को पढ़वाया. गुलबर्गा के नूतन विद्यालय में ही वो इंटर तक पढ़े. अब बारी थी कॉलेज की. वो जगह जहां जाने के लिए सबकी बाहें फड़फड़ाने लगती हैं पांचवी क्लास से ही. जब बड़े होंगे तो ये करेंगे. वो तीर मारेंगे. तो खड़गे को भी तीर मारने थे. सो वो भी पहुंचे कॉलेज. गुलबर्गा के गवर्नमेंट कॉलेज. यहीं उनको लगा राजनीति का चस्का. छात्र राजनीति में एंट्री की. लड़ गए महामंत्री का चुनाव और जीत भी गए. 1965 में ग्रेजुएशन पूरा हुआ.

खड़गे की विपक्ष में भी अच्छी पकड़ है.
खड़गे की विपक्ष के तमाम नेताओं में भी अच्छी पकड़ है.

उस वक्त खड़गे के दिलोदिमाग पर बीआर अंबेडकर छाए हुए थे. 1964 में वो अंबेडकर की बनाई रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़ गए. नागपुर में इसके युवा मोर्चे के अध्यक्ष भी रहे. उसी दौर में खड़गे ने एक और मजबूत काम किया. दरअसल, गुलबर्गा में पड़ती थी एमएसके मिल. वहां के मजदूरों की तमाम मुद्दों को लेकर अपने मालिकों से ठनी हुई थी. सो खड़गे इसके नेता बन गए. प्रदर्शन के बाद आंदोलन छेड़ दिया. जेल भी जाना पड़ा मगर इसने उनको मजदूरों का नेता बना दिया. फिर क्या था, उनका जलवा पूरे कर्नाटक में फैल गया. खड़गे ने फिर मजदूर संगठनों का जाल फैलाने का काम शुरू किया. जिन मिलों में यूनियन नहीं थी, वहां यूनियन बनवाईं.

इस नेतागिरी के साथ-साथ उनकी पढ़ाई भी जारी रही. 1967 में लॉ की डिग्री मिल गई. माने अब वो नेता के साथ ही वकील भी बन गए थे. प्रैक्टिस शुरू भी कर दी और यहां भी वो दलितों और दबे-कुचले तबके के लोगों के मुकदमे लड़ने लगे. मजदूरों के मुकदमे भी लड़ने लगे. कई मजदूर संगठनों के लीगल एडवाइजर बन गए.

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प्रियंका गांधी के साथ खड़गे.

अब बारी थी कांग्रेस में एंट्री की

बात 1969 की है. केंद्र में थी कांग्रेस सरकार पर उसके काले दिन चल रहे थे. कांग्रेस टूटकर तो खेमों में बंट गई थी. एक कांग्रेस-आई माने इंदिरा गांधी का गुट और दूसरी कांग्रेस-ओ माने इंदिरा के विरोधी. अब पार्टी बंटेगी तो नेता भी बंटेंगे. वफादारी दिखाने का भी दौर शुरू हो गया. पूरे देश के नेता इन दोमों खेमों में जाने लगे. मगर बहुमत इंदिरा के साथ था. कर्नाटक का भी एक नेता उस वक्त इंदिरा की कांग्रेस में आया. नाम था धर्मा राव अफजलपुरकर. गुलबर्गा में कांग्रेस के बड़े नेता और खड़गे के पहले गुरु. धर्मा राव ने खड़गे को भी कांग्रेस जॉइन करने के लिए कहा और वो मान गए. उन्हें बिना देरी इसका ईनाम भी मिला. गुलबर्गा का जिलाध्यक्ष बना दिया गया. ये खड़गे की असल राजनीति में एंट्री थी.

1971 के लोकसभा चुनाव में धर्मा राव को सांसदी का टिकट मिला. खड़गे ने उनको चुनाव जिताने के लिए खून-पसीना एक कर दिया. खड़गे की ये मेहनत रंग लाई और धर्मा राव रिकॉर्ड मतों से जीते. उनको 68 फीसदी वोट मिले. करीब 96 हजार वोटों के अंतर से जीते. ये चेले को गुरु का गिफ्ट था. इस मेहनत का नतीजा ये भी हुआ कि खड़गे कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवराज उर्स की नजरों में चढ़ गए. नतीजा ये हुआ कि 1972 के विधानसभा चुनाव में खड़गे को गुरमितकल की रिजर्व सीट से टिकट मिल गया. अब जिसके साथ मुख्यमंत्री हो, सांसद हो…उसे कौन चुनाव हरा सकता है. खड़गे को उम्मीद से ज्यादा 62.68 फीसदी वोट मिले माने 16796 वोट. दूसरे नंबर पर निर्दलीय लड़ रहे मुर्थेप्पा को 7356 वोट मिले.

कांग्रेस नेताओं के साथ खड़गे.
कांग्रेस नेताओं के साथ खड़गे.

लगातार 9 बार विधायक बने

खड़गे विधायक बन चुके थे. और यहां से जो उनके जीतने का दौर शुरू हुआ. वो अब तक जारी है. खड़गे इस चुनाव के बाद 1978, 1983, 1985, 1989, 1994, 1999, 2004 में भी इसी गुरमितकल विधानसभा से चुनाव जीते. 2008 में सीट बदली और चिट्टापुर विधानसभा से चुनाव लड़ा. वहां से भी जीते. फिर 2009 में आई राज्य से निकलने की बारी. बहुत हो गई विधायकी अब सांसदी की बारी थी. अपने घर माने गुलबर्गा सीट से चुनाव लड़े और जीते. हालांकि बीजेपी के कैंडिडेट रेवुनाइक बेलाम्गी ने उन्हें कड़ी टक्कर दी. खड़गे को मिले 3,45,241 वोट. वहीं बेलाम्गी ने पाए 3,31,651 वोट. माने ये जीत करीब 14000 वोटों की ही थी. 2014 में देश मोदी लहर पर सवार था तो भी मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव जीता. एक बार फिर उनके सामने बीजेपी के कैंडिडेट रेवुनाइक बेलाम्गी थे. पर अबकी बार वोटों का अंतर घटने के बजाए बढ़ गया था. खड़गे को मिले 5,07,193 वोट तो बेलाम्गी को मिले 4,32,460 वोट.

सीएम बदलते रहे और खड़गे मंत्री बनते रहे

– पहली बार मौका मिला 1976 में. मुख्यमंत्री देवराज उर्स के कार्यकाल में. तब बने प्राइमरी और सेकंडरी एजुकेशन के राज्य मंत्री.

– दूसरा मौका आया 1979 में और इस बार वो कैबिनेट मिनिस्टर बन गए थे. ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री बने. इस बार भी सीएम देवराज उर्स ही थे.

– फिर आया गुंडू राव का कार्यकाल और खड़गे तीसरी बार मंत्री बने. रेवेन्यू मिनिस्टर बने.

– 1990 में फिर अच्छे दिन आए. कांग्रेस की सरकार लौटी और एस बंगरप्पा सीएम बने. एक बार वो फिर रेवेन्यू मिनिस्टर बने. कुछ दिन बाद उन्हें ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग भी दे दिया गया.

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राहुल गांधी के साथ खड़गे.

– 1992 में वीरप्पा मोइली के कार्यकाल में भी खड़गे मंत्री रहे. 1994 में उनको इंडस्ट्री मिनिस्टर बना दिया गया.

– 1998 में एसएम कृष्णा बने तो खड़गे गृह मंत्री बने.

– 2004 में धरम सिंह के कार्यकाल में वो जल संसाधन और केएसआरटीसी के मंत्री बने.

– 2009 में लोकसभा पहुंचे तो लेबर और एंप्लॉयमेंट मिनिस्टर बने. 2013 में उन्हें प्रमोशन मिला और रेल मंत्री का प्रभार दे दिया गया.

लोकसभा में खड़गे.
लोकसभा में खड़गे.

1985 में कर्नाटक में विपक्ष के उपनेता, 2014 में लोकसभा में नेता विपक्ष

कर्नाटक में सबसे सीनियर नेताओं में से एक मल्लिकार्जुन खड़गे कभी प्रदेश अध्यक्ष नहीं बने थे. सो 2005 में उनका अध्यक्षी का नंबर भी लग गया. वो 2008 तक कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे. इससे पहले वो 1985 में कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के उपनेता रहे चुके थे. पर 2014 में उन्हें ये रोल लोकसभा में निभाने का मौका मिला.

रेल मंत्री के रूप में खड़गे.
रेल मंत्री के रूप में खड़गे.

2014 में जब कांग्रेस के हाथ लोकसभा चुनाव में आईं मात्र 44 सीटें. उसके लिए अपना नेता विपक्ष बनवाना और खुद को मुख्य विपक्षी पार्टी घोषित करवाने तक का आंकड़ा नहीं था. माने लोकसभा में इसके लिए 10 फीसदी सीटें चाहिए होती हैं. करीब 55. तो अब ये स्पीकर के विवेक पर था कि वो नेता विपक्ष चुने या नहीं. ऐसे में कांग्रेस ने अपने दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे बढ़ाया. अब बीजेपी सरकार किसी दलित नेता को नेता विपक्ष बनने से रोकने का रिस्क क्यों लेती. सो खड़गे बन गए नेता विपक्ष.


 

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