
ऋषभ
ये ऋषभ श्रीवास्तव हैं. दी लल्लनटॉप के नए साथी. खूब पढ़ते हैं. खूब लिखते हैं. नॉलेज वाला हिस्सा ऋषभ का अच्छा-खासा भरा हुआ है. और ये लगातार उसे भर ही रहे हैं. साथ ही लिख भी रहे हैं. ईरान और इंडिया के बीच सोमवार को चाबहार पोर्ट डील हुई है. ऋषभ ने आज इसी पर लिख दिया है.
सदियों पहले एक शिल्पी ‘उस्ताद इसा शीराज़ी’ पर्शिया से हिंदुस्तान आया था. कहा जाता है कि ताजमहल उसके अमर प्रेम की निशानी है. जो कि उसने बादशाह की लाडली बेटी से किया था. शीराजी को ताजमहल का शिल्पी माना जाता है. ताजमहल में अपार खूबसूरती के बावजूद एक वेदना भी है जो कि देखनेवाले को उद्विग्न कर देती है. ये शीराज़ी की वेदना है. बादशाह ने कहलवा दिया था कि बेटी मर गई. इसीलिए शीराज़ी ने ताज को डिजाइन बनाया. फिर बादशाह ने तो हथिया लिया ताजमहल को और कहानी को भी. बादशाह है. क्या करोगे.
सदियों बाद बहुत सारे इंजीनियर और नेता भिड़े हैं हिंदुस्तान से पर्शिया में. चाबहार पोर्ट बनाने के लिए. हिंदुस्तान अब इंडिया और पर्शिया ईरान के नाम से जाना जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान में अड्डा जमाये हुए हैं. कार्टून बन रहे हैं. पर किसे है परवाह.
उड़ते उड़ते ही जुड़ जाएं तो क्या शिकवा जमीनी जिंदगी से करें तकरारें होंगी आमने सामने पर गैरों की निगाहों में अभी आबरू बची रहेसच में करीब 33 हजार करोड़ रुपये (500 मिलियन डॉलर) की ये डील हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. जब हिंदुस्तान में स्वतंत्रता संघर्ष हो रहा था. उसी वक्त ईरान में रजा शाह पहलवी ने क्रांतिकारी कदम उठाये थे. वहां पर औरतें हाफ पैंट पहनती थीं. कार चलाती थीं. जो मर्ज़ी आये करती थीं. पढ़ती भी थीं. स्वतंत्रता के बाद भारत ने गुट निरपेक्ष आंदोलन चलाया और अमेरिका से विमुख हो गया. वहीं ईरान ने अमेरिका का दामन थाम लिया था उस समय. समय समय की बात है. कुछ सालों बाद जब इंदिरा गांधी भारत में अपना जौहर दिखा चुकी थीं इमरजेंसी में और जनता ने उनको 'बेड रेस्ट' बता दिया था. उसी वक्त ईरान में खोमैनी के नेतृत्व में सत्तापलट हुआ और ईरान 'आसमानी किताब' से चलनेवाला देश बन गया.
फिर इंडिया और पाकिस्तान के मुद्दों पर ईरान का साथ चुपके चुपके पाकिस्तान के साथ रहा. पर अफगानिस्तान में तालिबान के मुद्दे पर भारत और ईरान की सहमति रही. दोनों ने विरोध किया और कुछ हासिल नहीं किया. बात मान जाए फिर तालिबान कैसा. समय और बदला. हिंदुस्तान अमेरिका के करीब आ गया. और ईरान परमाणु मुद्दे पर अमेरिका की आंख की किरकिरी बन गया. भारत और अमेरिका के संबंध ऐसे सुधर गए कि भारत ने इस मुद्दे पर ईरान के खिलाफ वोट भी कर दिया यूएन में. हालांकि भारत लगातार ईरान से तेल और गैस खरीदता रहा है. लोग कहते हैं कि भारत ने अपना परमाणु बम बना लिया, तेल भी खरीदता है और विरोध भी करता है.
करना पड़ता है. भारत में शिया मुस्लिम ईरान के बाद सबसे ज्यादा हैं. फिर भी ईरान सुन्नी बहुल पाकिस्तान को सपोर्ट करता था. हमें इस से ऐतराज नहीं है. हम तो चाहते हैं सब मिल जुलकर रहें. दूसरों को परेशान न करें. पर इतने से कुछ होता नहीं है. अभी जो स्थिति है वो जटिल है. चीन ने भारत को चारों तरफ से घेर रखा है. पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का निर्माण किया है. श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और ईरान में भी बहुत पैसा लगा रखा है. भारत को मध्य एशिया से व्यापार करने के लिए पाकिस्तान से होकर गुजरना पड़ता है. और चीन अब वहां खड़ा है. ग्वादर पोर्ट की आड़ में.
ग्वादर पोर्ट से मात्र 72 किलोमीटर पश्चिम में चाबहार पोर्ट है. यहां से भारत मध्य एशिया में सीधा घुस सकता है. अब पाकिस्तान की जरूरत मध्य एशिया से व्यापार में नहीं पड़ेगी. सवाल ये है कि भारत बर्रे के छत्ते में हाथ क्यों डालना चाहता है? क्योंकि भारत को अच्छा लगता है. सच में! दो चीजें हैं. एक तो भारत को गैस और तेल की जरूरत है. दूसरा अफगानिस्तान में तालिबान का मजबूत होना और गणतंत्र का कमजोर होना पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है. इंडिया वहां बैटमैन बनना चाहता है. कौन नहीं बनना चाहता?

तो भारत ने सफलता हासिल भी की है. फरज़ाद-बी क्षेत्र में भारत को गैस खोजने का काम मिला है. ये 2000 ई. से चल रहा था और इस साल हुआ. चाबहार 2003 से चल रहा है. और आशा है अब हो जायेगा. अगर ये हो जाता है तो भारत तेल और गैस के क्षेत्र में 27 लाख करोड़ रुपये (40 बिलियन डॉलर) लगाने को तैयार है. साथ ही भारत की कंपनियां अन्य क्षेत्रों में भी जाना चाहती हैं. जरांज-डेलाराम हाईवे भारत की सहायता से बन चुका है और ये बड़ी बात है. क्योंकि बनाने में खतरा बहुत था.
चाबहार पोर्ट बनने के बाद भारत की स्थिति बलूचिस्तान में भी मजबूत होगी. खुराफात करने के लिए नहीं. कुछ अच्छा करने के लिए. पाकिस्तान लाख कहता रहे हम अच्छा ही चाहते हैं. पाकिस्तान को चीरने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं. पोर्ट बनाने में है.

हालिया समय तक हम तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-इंडिया पाइपलाइन के बनने का इंतजार कर रहे थे, अब नहीं कर रहे हैं. क्योंकि पता है बन नहीं पाएगी अब. इसी तरह ईरान-पाकिस्तान-इंडिया पाइपलाइन का हाल हुआ. अब चाबहार के बाद ओमान-ईरान-इंडिया व्यापार शुरू हो सकता है जमीं और सागर के तालमेल से.
ये सब मोदी जी के जाने के साथ ही नहीं शुरू हो गया. पिछले महीने पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान भी वहां गए थे. हां, मोदी की यूएई और सऊदी अरब की यात्रा के बाद ईरान के साथ अब बेतकल्लुफी भारत के बढ़ते प्रभाव का परिचायक बन सकती है. पर ये अपनी पीठ ठोंकने के लिए काफी नहीं है. ईरान से पश्चिमी देशों की कंपनियों के जाने के बाद चीन की 100 कंपनियां बेताब हैं वहां खेलने को. वहीं साउथ कोरिया, रूस और जापान भी वहां जाना चाहते हैं. याद रहे चीन सुरक्षा परिषद् का सदस्य है और किसी भी नीति को ईरान के साथ जोड़ सकता है.
हम शाहरुख़ खान और माजिद मजीदी से ही जोड़कर हर रिश्ते को नहीं देख सकते. मध्य एशिया में पॉवर स्ट्रगल और भारत की ऊर्जा जरूरतें अहम् हैं. साथ ही चीन के बढ़ते प्रभाव के सामने खुद को खड़ा रखना भी चुनौती है. और अगर हम सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बनना चाहते हैं तो चाबहार पोर्ट की तरह के प्रोजेक्ट तुरंत निपटाने होंगे. भले ही चाबहार पोर्ट के डिजाइन में खूबसूरती और वेदना न झलके पर तगड़ा व्यापार जरूर होना चाहिए. और इंतजाम ऐसे हों कि उद्विग्नता न हो.
























