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'कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है'

चुनावों का माहौल है, अपनी कुर्सी की पेटियां बांध के रखें. क्योंकि ये मौसम ज़रा दुश्वार है.

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फोटो - thelallantop
दिग्गज कह गए हैं, कि अंतत: खेल सारा कुर्सी का है. तो डूबते सोमवार में माहौल गरम करता दफ़्तर में ये फड़फड़ाता शेर आया, और चहुंओर से जैसे कुर्सियों की बरसात होने लगी. कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है कुछ कर नहीं सकते तो उतर नहीं जाते ये 'किस्सा कुर्सी का' पुराना है. सत्तर के दशक में इसी नाम से भगवन्त देशपांडे और अमृत नाहटा ने एक फ़िल्म बनाई थी. इसे भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे ज्वलनशील फ़िल्म कहा जा सकता है. इमरजेंसी के दौर में रिलीज़ होने को तैयार इस फ़िल्म में सुरेखा सीकरी राजनेता बनी हैं. अपना 'गरीबी हटाओ' का नारा सच बनाने के लिए वह गरीबों को ही समूल हटाने का अभियान शुरू कर देती हैं. इंदिरा गांधी के प्यारे आपातकाल में इस दुस्साहस के घातक अर्थ निकलने ही थे. फिल्म को बैन कर दिया गया और कहीं गलती से कोई इस फिल्म को देख ना ले, इसलिए फ़िल्म की रील को बाकायदा 'देख-रेख' में जलवा दिया गया. आज भी ये फिल्म चाहने वालों के कुछ चुनिंदा निजी सग्रहों में ही मिलती है. लेकिन किताबों, पेंटिग्स, फ़िल्मों को 'देख-रेख' में जलवाने से कई बार जनता के भीतर की आग पर पानी पड़ने के बजाए वो और भभक उठती है. सतहत्तर के चुनाव इसका उदाहरण हैं. कुल जमा ये कि कुर्सी ने अच्छे-अच्छों को ता-था-थैय्या नाच नचाया है. कैसे, इसे इस नौ मिनट की पंडित रविशंकर के मधुर लेकिन बदमाशी से भरे सितार की तान और पंडित चतुरलाल के सधे हुए तबले की थाप से सजी इस फ़िल्म में देखिए. सिनेमा ध्वनि और संकेतों का कैसे समृद्ध उपयोग कर सकता है, यह जानने के लिए यह प्राइमरी टेक्स्ट है. बिना संवादों के भी क्या खूब कहती है, और कितना गहरा. अन्त में, चुनावों का माहौल है, अपनी कुर्सी की पेटियां बांध के रखें. क्योंकि इस मौसम में बहुत से लोग दूसरों की कुर्सियां खींचने के इरादे से ही खुल्ले में निकलते हैं. https://www.youtube.com/watch?v=5XIiWOuDuxc

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