इलेक्शन शुरू होते ही शुरू होता है चुनाव प्रचार जिसका स्वाद बढ़ाने के काम आता है दलबदल. एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कूदने वाले नेता इसे साहित्यिक भाषा में हृदय परिवर्तन कहते हैं.
ये हृदय परिवर्तन कैसे होता है. जैसे एक दिन पहले एनडी तिवारी का हुआ. दो दिन पहले नवजोत सिंह सिद्धू का हुआ. एक महीने पहले रीता बहुगुणा जोशी का हुआ था. तीन साल पहले शाज़िया इल्मी का हुआ था. किरन बेदी का हुआ था. किरन बेदी का हाफ हृदय परिवर्तन कह सकते हैं क्योंकि वो पार्टी छोड़कर नहीं आई थीं. वो पार्टी न जॉइन करने की कसम तोड़कर आई थीं. उसी तरह अगर कांग्रेस और सपा में गठबंधन हो रहा है तो इसे हृदय परिवर्तन न कहा जाए. हृदय परिवर्तन का मतलब है अपनी पार्टी की नीतियां एकदम से कुलघाती लगना और "जीतने के आसार वाली पार्टी" की नीति में विश्वास हो जाना. ऐसा टिकट कटने की परिस्थिति में ज्यादा होता है.
फ्लैशबैक में चलें तो इसकी क्रांतिकारी शुरुआत हरियाणा से हुई. 1967 में. दलबदलुओं के पितामह गयालाल हुए. फिलहाल कांग्रेस के नेता हैं. तब भी ये कांग्रेस के नेता थे. हसनपुर, जिला पलवल से MLA थे. एक रात कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी में चले गए. रात में ही वापस कांग्रेस में आ गए. 9 घंटे में फिर जनता पार्टी में चले गए. लेकिन फिर जब कांग्रेस में आए तो कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह ने कहा कि "गया राम अब आया राम हैं." तब से आया राम गया राम टर्म ही यूज किया जाने लगा दलबदलुओं के लिए.इनके अलावा एक और महापुरुष भारतीय राजनीति में, हरियाणा की धरती पर हुए हैं. भजन लाल. तीन बार चीफ मिनिस्टर रह चुके हैं. 1980 में चीफ मिनिस्टर बनने के लिए तगड़ा दांव चला. अपने 37 विधायकों संग जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस जॉइन कर ली. ये एक नया रिकॉर्ड था गिरी हुई राजनीति का.

भजन लाल
कहां गया दल बदल कानून आठवां लोकसभा चुनाव कांग्रेस जीती और राजीव गांधी बने प्रधानमंत्री. 24 जनवरी 1985 संविधान संसोधन विधेयक पेश किया गया. दल बदलुओं की धार कुंद करने के लिए. 30 जनवरी को लोकसभा और 31 को राज्यसभा में विधेयक पारित हो गया और फिर राष्ट्रपति ने भी साइन कर दिए. लगा कि अब हृदय परिवर्तन का खेला खत्म. लेकिन उस कानून में जो अपवाद थे, उन्हीं के सहारे इस कानून की टांगें काट के रखी गई हैं.
इन वरिष्ठों का दिखाया रास्ता रोज कोई न कोई अपना रहा है. स्वामी प्रसाद मौर्य BSP के नेता थे. BJP में आ गए. मोदी जी की नीति में उनका विश्वास हो गया. BSP से जो निकलता है वो कुर्ते झाड़ता हुआ कहता जाता है "मायावती टिकट के लिए पांच करोड़ मांग रही थीं." मानो BSP फिक्स रेट की दुकान है. न कम न ज्यादा. इधर उनका मोदी जी की नीति से विश्वास फिर डोलता दिख रहा है. अब वो अखिलेश यादव के साथ चिपकने के लिए गोटियां सेट कर रहे हैं. क्योंकि अखिलेश का काम बोलता है.
इन नेताओं के लिए ये चुनाव नहीं सरकारी नौकरी हैं. जिसमें रिटायरमेंट नहीं होता. ये ताउम्र विधायक, सांसद रहेंगे. हर चुनाव से पहले जीतने वाली पार्टी का दामन थाम लेंगे. पुरानी पार्टी को ये कहकर छोड़ देंगे कि जनता के हक की लड़ाई में पार्टी उनका साथ नहीं दे रही. जिसका हिंदी में मतलब होता है कि पार्टी हमें टिकट नहीं दे रही. या पार्टी के जीतने की उम्मीद नहीं है. तो क्या हम पांच साल बेरोजगार बैठेंगे? अरे भैया जो इस विधायकी में खर्चे बढ़ गए हैं. देशी विदेशी दौरों की आदत पड़ गई है सरकारी खर्चे पर. घर के बच्चे तक सरकारी गाड़ी स्कूल छोड़ने जाती है. घर की सब्जी सरकारी नौकर लाने जाते हैं. हर काम के लिए आदमी पाल रखे हैं. सिर्फ कमाई ही हुई, खर्च कहीं हुआ नहीं. पांच साल विधायक नहीं रहे तो बेड़ा गर्क हो जाएगा. ये अनर्थ होने से पहले दूसरी पार्टी की नीति में विश्वास कर लो. हृदय परिवर्तन कर लो. मामला सेट है.
पब्लिक को मूर्ख समझ रखा है. कोई नीति है ही नहीं. सिर्फ बयान हैं. भाषण हैं. वादे हैं. पार्टी बदलते ही ड्रेस बदल जाती है. निशान बदल जाते हैं. मुद्दे बदल जाते हैं. वो कहानी सुनी है न. शिकारी आएगा जाल बिछाएगा वाली. तो इस बार भी दूसरे चुनाव चिन्ह के साथ शिकारी आएगा. पब्लिक भैया मत फंसना.
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