एक गेम. पचास स्टेज. हर स्टेज में खुद को कुछ नुकसान पहुंचाना है. आखिरी स्टेप में एक सेल्फी लेकर खुदकुशी कर लेनी है. उस के बाद दुनिया आपकी सूसाइड सेल्फी लेकर आपकी मौत के कारण पर सिर मथेगी.
मैंने ब्लू व्हेल खेलना चाहा और क्या पाया?
ब्लू वेल गेम का कुछ खौफ तो बार-बार 'आगाह' करते रहने से जना है.
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ब्लू वेल चैलेंज के सच में होने की संभावना कम ही नज़र आती है
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जितना ब्लू वेल गेम को समझने की कोशिश की जाती है, वो उतना भ्रम जनता है. जितना उस से आगाह किया जाता है, उसका खौफ बढ़ता है. नए-नए टास्क सामने आते हैं, नए-नए नियम. तो मैंने सोचा कि खुद ब्लू वेल खेलकर देखा जाए. बच गया, तो ये स्टोरी करूंगा. मेरे पास आपको बताने के लिए एक 'ब्लू वेल भुक्तभोगी' की एक्सपीरियंशियल स्टोरी नहीं है. लेकिन ब्लू वेल को जितना वक्त मैंने दिया, उस से जो कुछ मेरा हासिल रहा, वो मैं यहां आपसे बांट रहा हूं. अंतिम जवाब नहीं हैं, तो अपने सवाल आपसे बांट रहा हूं. ये लेख ब्लू वेल के रहस्य से पर्दा उठाने का दावा नहीं करता, उसके रहस्य को टटोलता है.
मैंने क्या किया?
मैंने ब्लू वेल से जुड़े वो लिंक्स खोलकर देखे, जो हिंदुस्तान में 'ब्लू वेल के चलते हुई पहली मौत' के बाद कई लोगों ने शेयर किए थे. ज़्यादातर लिंक्स या तो काम नहीं करते थे या मैलवेयर या वायरस होते थे. अब इनमें से ज़्यादातर लिंक्स सोशल मीडिया साइट्स से हटा दिए गए हैं. फिर मैंने गूगल की शरण ली. मैंने ढूंढा ब्लू वेल, टॉप सर्च के लिंक्स से आगे बढ़ा तो पिंक वेल मिल गई.

इतने लोग 'पिंक वेल' की मदद चाहते हैं कि उसका लिंक अब और एंट्री नहीं ले पा रहा
पिंक वेल के ज़रिए ऐसे लोगों की मदद करने की कोशिश की जा रही है, जो लोग किसी तरह के डिप्रेशन के चलते ब्लू वेल की तरफ आकर्षित होते हैं. फिर मालूम चला कि ब्लू वेल का कोई लिंक या ऐप नहीं है. गेम खुद आप तक चल कर आता है. तो मैंने रूसी सोशल मीडिया साइट VKontakte पर एक आईडी बना ली (शुरुआत में कहा गया था कि ज़्यादातर मामले VK चलाने वाले रूसी बच्चों के ही थे). उस आईडी पर एक 'डिप्रेस्ड' फोटो लगा ली. ऐसे स्टेटस लिखने लगा -

ब्लू वेल खेलने के लिए बनाई मेरी VK आईडी 'abuse' के चलते ब्लॉक कर दी गई थी
गेम खेलने की कोशिश करने पर भी गेम से दूर कर दिए जाने पर मेरे दिमाग में एक सवाल पैदा हुआ - क्यों एक वायरल गेम, जो तेज़ी से दुनियाभर में लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है, वो एक विलिंग प्लेयर की पहुंच से दूर है? ब्लू वेल खेल नहीं सकता था, तो मैंने पढ़ाई शुरू की. और मेरी पढ़ाई ने मेरा दिमाग उस संभावना की ओर कर दिया, जिसके बारे में कुछ लोग पहले से बात कर रहे हैं - क्या ब्लू वेल जैसा कोई गेम है ही नहीं? मैं ऐसा क्यों सोचने लगा हूं, आगे बता रहा हूं.
ये मामला शुरुआत से ही डाउटफुल है भाया
आम राय है कि ब्लू वेल सबसे पहले रूस में खेला गया. वहां इस गेम के चलते 150 के करीब खुदकुशी के मामले होने की बात की जाती है, जिनमें से कुछ के लिए एक वेब डेवलपर फिलिप बुदकिन को सज़ा होने की बात कही जाती है. लेकिन फैक्ट चेकिंग वेबसाइट स्नोप्स के मुताबिक मामला इतना सीधा-सपाट है ही नहीं.

रशियन वेबसाइट Novaya Gazeta ने मई 2016 में सबसे पहले ब्लू वेल के चलते मौतों की खबर चलाई थी
बात यूं है कि ब्लू वेल गेम नाम की चिड़िया का नाम रूस में किसी ने तब तक नहीं सुना था, जब तक Novaya Gazeta नाम की एक रशियन वेबसाइट ने ये खबर ब्रेक नहीं की. मई 2016 में Novaya Gazeta ने दावा किया कि नवंबर 2015 से लेकर अप्रैल 2016 के बीच रूस में तकरीबन 130 बच्चों ने खुदकुशी की. ये सब बच्चे इंटरनेट पर एक ही ग्रुप के मेंबर थे. Novaya Gazeta ने ये भी दावा किया कि इन 130 में से कम से कम 80 का ताल्लुक सीधे-सीधे ब्लू वेल गेम से है.
इस आर्टिकल पर काफी सवाल उठाए गए. इनमें सबसे लॉजिकल सवाल Meduza नाम की वेबसाइट का था -
कुछ ग्रुप तो फॉलोवर बढ़ाने के चक्कर में बनाए गए थे
रूस में रिना पलेन्कोवा नाम की एक टीनेज लड़की की मौत के बाद ब्लू वेल और उसके जैसे सूसाइड ग्रुप्स की खूब बातें होने लगी थीं. रिना ने अपनी मौत से पहले अपनी सेल्फी VKontakte पर अपलोड की थी. सोशल मीडिया पर कई स्वयंभू सूसाइड ग्रुप्स ने रिना को अपने कल्ट फिगर की तरह पेश करना शुरू किया. ऐसा ही एक ग्रुप था 'Sea of Whales'. इसे बनाने वाले मोर कितोव ने एक वेबसाइट को दिए अपने बयान में कहा कि वो महज़ अपने पेज के फॉलोवर बढ़ाने के लिए ऐसा कर रहे थे. इससे उन्हें मिलने वाला ऐड रेवेन्यू बढ़ता.

तस्वीर में दिख रही रिना पलेन्कोवा को ब्लू वेल और उसकी तरह के चैलेंज में कल्ट का दर्जा प्राप्त है. रिना ने एक सेल्फी लेने के बाद अपनी जान दे दी थी.
फिलिप का पकड़ा जाना कितनी बड़ी उपलब्धि है?
धारणा है कि ब्लू वेल एक क्यूरेटर या ग्रुप एडमिन के ज़रिए आप तक पहुंचता है. इसलिए इस गेम के डेवलपर और एडमिन फिलिप बुदकिन के पकड़े जाने और उसे हुई सज़ा को इस गेम के होने के अकाट्य प्रमाण की तरह देखा जाता है.
ये सच है कि 14 नवंबर, 2016 को फिलिप की गिरफ्तारी ब्लू वेल के डेवलपर होने के शक में हुई थी, लेकिन लगभग उसी वक्त रूस के दूसरे हिस्सों से तकरीबन 10 और लोगों को इस शक में गिरफ्तार किया गया. इन सभी को पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया. फिलिप पर 15 लोगों को खुदकुशी के लिए उकसाने का इल्ज़ाम लगा. लेकिन रेडियो फ्री यूरोप/रेडियो लिबर्टी के मुताबिक फिलिप के वकील रोस्तिस्लाव गुबेनको का कहना है कि मई 2017 में फिलिप के खिलाफ एक ही मामले में जांच चल रही थी.

फिलिप बुदकिन को ब्लू वेल का डेवलपर कह कर प्रचारित किया गया है.
रेडियो फ्री यूरोप/रेडियो लिबर्टी ने ब्लू वेल खेलने का इच्छुक बन कर खुद को ब्लू वेल के एक सूसाइड ग्रुप का एडमिन बताने वाले दो लोगों से बात भी की. एक मामले में एडमिन कुछ दिन बाद गायब हो गया, तो दूसरे मामले में एडमिन की प्रोफाइल ही ब्लॉक हो गई. कुछ इसी तरह ब्लू वेल खेलने का ख्वाहिशमंद दिखती मेरी प्रोफाइल ब्लॉक हो गई थी. इसी तरह कुछ एडमिन ऐसे पाए गए, जिनका ध्यान पैसे ऐंठने पर था.
इससे सवाल उठता है कि रिपोर्ट होकर ब्लॉक होने से ये एडमिन बचते कैसे हैं?
सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर किसी को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने जैसे काम निश्चित तौर पर कंपनी की पॉलिसी का उल्लंघन होते हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स हर हाल में ऐसे किसी भी काम से दूरी बनाना चाहती हैं ताकि उन्हें किसी कानूनी पचड़े में न पड़ना पड़े.
तो बच्चों की खुदकुशी का ज़िम्मेदार है कौन?
ब्लू वेल के चलते न सिर्फ रूस, बल्कि किर्गिस्तान, अजर्बैजान और कज़ाकिस्तान में भी बच्चों की खुदकुशी की खबरें सामने आईं. इनमें से एक में भी पुलिस पक्के सबूतों के साथ ब्लू वेल (या वैसे किसी गेम) का पता नहीं लगा पाई. ऐसे में इन देशों के बच्चों में सूसाइडल टेंडेंसी की तरफ ध्यान जाता है. रशिया में 2016 में सामने आए 720 खुदकुशी के मामलों में बच्चों ने अपनी जान ड्रग्स, प्यार में धोखा खाने, पारिवारिक समस्याओं और दूसरी मानसिक परेशानियों की वजह से दी. इनमें से सिर्फ 0.6% बच्चों के पास इंटरनेट या सोशल मीडिया तक पहुंच थी. तो ब्लू वेल के अपने देश रूस में ही इस बात की संभावना कम है कि किसी ऑनलाइन गेम के चलते खुदकुशी के मामले अचानक बढ़ गए हों.

मुंबई के मनप्रीत साहस की मौत को भारत में ब्लू वेल के चलते हुए पहला मामला बताया जाता है
देसी मामलों का क्या?
भारत में ब्लू वेल का ज़िक्र मुंबई में रहने वाले मनप्रीत साहस की मौत के बाद से होने लगा. मनप्रीत की अपनी मौत पर भारी बहस है कि वो खुदकुशी है भी या नहीं. इसलिए उसके केस में ब्लू वेल से मौत का सवाल फिलहाल खड़ा ही नहीं होता. बावजूद मनप्रीत का मामला मीडिया में सामने आने के बाद से दर्जनों खुदकुशी (या खुदकुशी की कोशिश) के मामलों में ब्लू वेल का नाम घसीट लिया गया है. इन मामलों को लेकर जितनी जानकारी हमने जुटाई, उस में यही सामने आया कि खुदकुशी की वजह चाहे जो रही हो, वो ब्लू वेल तो नहीं ही थी. कम से कम पुलिस की जांच में तो यही सामने आ रहा है. इस पर एक मुकम्मल आर्टिकल अंग्रेज़ी वेबसाइट quartz.com पर प्रकाशित है. आप यहां क्लिक कर के
उसे पढ़ सकते हैं.
और जिनके हाथ पर वेल बनी है, उन सरवाईवर्स का क्या?
यही असल में ब्लू वेल से जुड़ा यक्ष प्रश्न है. अस्पताल में भर्ती लोग, जिनके हाथ पर वेल बनी है, उन पर कैसे सवाल खड़े किए जाएं. उन मामलों के बारे में मेरी राय ये है कि कट तो चोटी भी सच में ही रही है और एक समय मुंह भी सही में नोचा जा रहा था. दिल्ली में काला बंदर भी सच-मुच में लोगों की जान का दुश्मन बना हुआ था. लोग ज़ख्मी तक हुए थे. इसलिए ऐसा हो सकता है कि ब्लू वेल भी सच-मुच हो. माने कि न हो.
ब्लू वेल सरवाइवर बताई जा रही इस लड़की का बयान सुनने में रटा-रटाया लगता है. उसका दिया ब्योरा ब्लू वेल गेम के बारे में प्रचलित डीटेल्स से भी कुछ अलग है. संभव है कि ब्लू वेल एक तरह का मास हिस्टीरिया हो. मास माने पब्लिक या संख्या और हिस्टीरिया माने पागलपन. जी, बहुत सारे लोग अचानक एक साथ एक अजीब व्यवहार कर सकते हैं. ये मेरा अंदाज़ा नहीं, साइंस की खोज है. इसके बारे में तफसील से जानने के लिए यहां क्लिक करें.
सनद रहे, हाथों पर कट मिले हैं, लेकिन फोन से अबतक पचास स्टेज को लेकर हुई बातचीत वगैरह का डाटा नहीं मिला है.

लोगों को 'आगाह' करने के चक्कर में 'पत्रकारों' ने कोरा तक से जानकारी कबाड़ी है.
दिस टाइम, शूट द मैसेंजर
अंग्रेज़ी की कहावत है. संदेसा लाने वाला कैसा भी संदेसा लाए, उसे बख्श देना ही समझदारी होती है. लेकिन ब्लू वेल के मामले में कुछ गलती मीडिया से भी हो गई लगती है. कई मीडिया संस्थान ब्लू वेल जैसी अपुष्ट सनसनी से लोगों को आगाह करने के चक्कर में खौफ बांटते रहते हैं. यकीन नहीं आता तो ब्लू वेल पर हुई रिपोर्टिंग पर नज़र मारिए. 'कहा जाता है' और 'बताया जाता है' की शैली में इतना कुछ लिख दिया गया है कि अवचेतन में कहीं न कहीं ब्लू वेल बैठ ही जाता है. रिपोर्टिंग पर हुई मेहनत का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि ब्लू वेल 'जनने' वाले फिलिप बुदकिन का ताज़ा हाल आपको उन वेबसाइट्स और अखबारों में ढूंढने से नहीं मिलेगा, जिन्होंने उसका इंटरव्यू छाप दिया था. फैक्ट चेकिंग साइट स्नोप्स के मुताबिक फिलिप ने अपने इंटरव्यू में ये कहा कि उसका ग्रुप 2013 में बैन हो गया था. अपने यहां आज उसके नाम पर गदर कट रहा है.
तो क्या कुछ भी नहीं है?
मैं दावे के साथ नहीं कह सकता. लेकिन इतना तय है कि जितना बताया जा रहा है, उतना तो नहीं ही है. इसलिए सचेत रहिए, भयभीत नहीं. ब्लू वेल पुराण में इस बार के लिए बस इतना ही.
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मैंने क्या किया?
मैंने ब्लू वेल से जुड़े वो लिंक्स खोलकर देखे, जो हिंदुस्तान में 'ब्लू वेल के चलते हुई पहली मौत' के बाद कई लोगों ने शेयर किए थे. ज़्यादातर लिंक्स या तो काम नहीं करते थे या मैलवेयर या वायरस होते थे. अब इनमें से ज़्यादातर लिंक्स सोशल मीडिया साइट्स से हटा दिए गए हैं. फिर मैंने गूगल की शरण ली. मैंने ढूंढा ब्लू वेल, टॉप सर्च के लिंक्स से आगे बढ़ा तो पिंक वेल मिल गई.

इतने लोग 'पिंक वेल' की मदद चाहते हैं कि उसका लिंक अब और एंट्री नहीं ले पा रहा
पिंक वेल के ज़रिए ऐसे लोगों की मदद करने की कोशिश की जा रही है, जो लोग किसी तरह के डिप्रेशन के चलते ब्लू वेल की तरफ आकर्षित होते हैं. फिर मालूम चला कि ब्लू वेल का कोई लिंक या ऐप नहीं है. गेम खुद आप तक चल कर आता है. तो मैंने रूसी सोशल मीडिया साइट VKontakte पर एक आईडी बना ली (शुरुआत में कहा गया था कि ज़्यादातर मामले VK चलाने वाले रूसी बच्चों के ही थे). उस आईडी पर एक 'डिप्रेस्ड' फोटो लगा ली. ऐसे स्टेटस लिखने लगा -
'End is all there is. Come take me #bluewhale'इस से पहले कि मैं इस स्टोरी के लिए कुछ स्क्रीनशॉट ले पाता, मेरी VK आईडी 'abuse' का कारण बताकर ब्लॉक कर दी गई. बाकी सोशल मीडिया पर हैशटैग ब्लू वेल कर पोस्ट डालना वक्त की बरबादी समझा गया, क्योंकि प्रशासन से लेकर हाईकोर्ट निर्देश दे चुके हैं कि ब्लू वेल से जुड़ी सारी चीज़ें भारत में इंटरनेट पर से हटा ली जाएं.

ब्लू वेल खेलने के लिए बनाई मेरी VK आईडी 'abuse' के चलते ब्लॉक कर दी गई थी
गेम खेलने की कोशिश करने पर भी गेम से दूर कर दिए जाने पर मेरे दिमाग में एक सवाल पैदा हुआ - क्यों एक वायरल गेम, जो तेज़ी से दुनियाभर में लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है, वो एक विलिंग प्लेयर की पहुंच से दूर है? ब्लू वेल खेल नहीं सकता था, तो मैंने पढ़ाई शुरू की. और मेरी पढ़ाई ने मेरा दिमाग उस संभावना की ओर कर दिया, जिसके बारे में कुछ लोग पहले से बात कर रहे हैं - क्या ब्लू वेल जैसा कोई गेम है ही नहीं? मैं ऐसा क्यों सोचने लगा हूं, आगे बता रहा हूं.
ये मामला शुरुआत से ही डाउटफुल है भाया
आम राय है कि ब्लू वेल सबसे पहले रूस में खेला गया. वहां इस गेम के चलते 150 के करीब खुदकुशी के मामले होने की बात की जाती है, जिनमें से कुछ के लिए एक वेब डेवलपर फिलिप बुदकिन को सज़ा होने की बात कही जाती है. लेकिन फैक्ट चेकिंग वेबसाइट स्नोप्स के मुताबिक मामला इतना सीधा-सपाट है ही नहीं.

रशियन वेबसाइट Novaya Gazeta ने मई 2016 में सबसे पहले ब्लू वेल के चलते मौतों की खबर चलाई थी
बात यूं है कि ब्लू वेल गेम नाम की चिड़िया का नाम रूस में किसी ने तब तक नहीं सुना था, जब तक Novaya Gazeta नाम की एक रशियन वेबसाइट ने ये खबर ब्रेक नहीं की. मई 2016 में Novaya Gazeta ने दावा किया कि नवंबर 2015 से लेकर अप्रैल 2016 के बीच रूस में तकरीबन 130 बच्चों ने खुदकुशी की. ये सब बच्चे इंटरनेट पर एक ही ग्रुप के मेंबर थे. Novaya Gazeta ने ये भी दावा किया कि इन 130 में से कम से कम 80 का ताल्लुक सीधे-सीधे ब्लू वेल गेम से है.
इस आर्टिकल पर काफी सवाल उठाए गए. इनमें सबसे लॉजिकल सवाल Meduza नाम की वेबसाइट का था -
बच्चे एक ग्रुप में हैं, इसलिए खुदकुशी कर रहे हैं या ऐसे बच्चे कॉमन पसंद की वजह से एक खास ग्रुप की ओर खिंचे चले आ रहे हैं, जिनमें पहले से सूसाइडल टेंडेसी मौजूद है?ये एक टिपिकल 'मुर्गी पहले कि अंडा पहले' वाला सवाल है. लेकिन है पते का.
कुछ ग्रुप तो फॉलोवर बढ़ाने के चक्कर में बनाए गए थे
रूस में रिना पलेन्कोवा नाम की एक टीनेज लड़की की मौत के बाद ब्लू वेल और उसके जैसे सूसाइड ग्रुप्स की खूब बातें होने लगी थीं. रिना ने अपनी मौत से पहले अपनी सेल्फी VKontakte पर अपलोड की थी. सोशल मीडिया पर कई स्वयंभू सूसाइड ग्रुप्स ने रिना को अपने कल्ट फिगर की तरह पेश करना शुरू किया. ऐसा ही एक ग्रुप था 'Sea of Whales'. इसे बनाने वाले मोर कितोव ने एक वेबसाइट को दिए अपने बयान में कहा कि वो महज़ अपने पेज के फॉलोवर बढ़ाने के लिए ऐसा कर रहे थे. इससे उन्हें मिलने वाला ऐड रेवेन्यू बढ़ता.

तस्वीर में दिख रही रिना पलेन्कोवा को ब्लू वेल और उसकी तरह के चैलेंज में कल्ट का दर्जा प्राप्त है. रिना ने एक सेल्फी लेने के बाद अपनी जान दे दी थी.
फिलिप का पकड़ा जाना कितनी बड़ी उपलब्धि है?
धारणा है कि ब्लू वेल एक क्यूरेटर या ग्रुप एडमिन के ज़रिए आप तक पहुंचता है. इसलिए इस गेम के डेवलपर और एडमिन फिलिप बुदकिन के पकड़े जाने और उसे हुई सज़ा को इस गेम के होने के अकाट्य प्रमाण की तरह देखा जाता है.
ये सच है कि 14 नवंबर, 2016 को फिलिप की गिरफ्तारी ब्लू वेल के डेवलपर होने के शक में हुई थी, लेकिन लगभग उसी वक्त रूस के दूसरे हिस्सों से तकरीबन 10 और लोगों को इस शक में गिरफ्तार किया गया. इन सभी को पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया. फिलिप पर 15 लोगों को खुदकुशी के लिए उकसाने का इल्ज़ाम लगा. लेकिन रेडियो फ्री यूरोप/रेडियो लिबर्टी के मुताबिक फिलिप के वकील रोस्तिस्लाव गुबेनको का कहना है कि मई 2017 में फिलिप के खिलाफ एक ही मामले में जांच चल रही थी.

फिलिप बुदकिन को ब्लू वेल का डेवलपर कह कर प्रचारित किया गया है.
रेडियो फ्री यूरोप/रेडियो लिबर्टी ने ब्लू वेल खेलने का इच्छुक बन कर खुद को ब्लू वेल के एक सूसाइड ग्रुप का एडमिन बताने वाले दो लोगों से बात भी की. एक मामले में एडमिन कुछ दिन बाद गायब हो गया, तो दूसरे मामले में एडमिन की प्रोफाइल ही ब्लॉक हो गई. कुछ इसी तरह ब्लू वेल खेलने का ख्वाहिशमंद दिखती मेरी प्रोफाइल ब्लॉक हो गई थी. इसी तरह कुछ एडमिन ऐसे पाए गए, जिनका ध्यान पैसे ऐंठने पर था.
इससे सवाल उठता है कि रिपोर्ट होकर ब्लॉक होने से ये एडमिन बचते कैसे हैं?
सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर किसी को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने जैसे काम निश्चित तौर पर कंपनी की पॉलिसी का उल्लंघन होते हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स हर हाल में ऐसे किसी भी काम से दूरी बनाना चाहती हैं ताकि उन्हें किसी कानूनी पचड़े में न पड़ना पड़े.
तो बच्चों की खुदकुशी का ज़िम्मेदार है कौन?
ब्लू वेल के चलते न सिर्फ रूस, बल्कि किर्गिस्तान, अजर्बैजान और कज़ाकिस्तान में भी बच्चों की खुदकुशी की खबरें सामने आईं. इनमें से एक में भी पुलिस पक्के सबूतों के साथ ब्लू वेल (या वैसे किसी गेम) का पता नहीं लगा पाई. ऐसे में इन देशों के बच्चों में सूसाइडल टेंडेंसी की तरफ ध्यान जाता है. रशिया में 2016 में सामने आए 720 खुदकुशी के मामलों में बच्चों ने अपनी जान ड्रग्स, प्यार में धोखा खाने, पारिवारिक समस्याओं और दूसरी मानसिक परेशानियों की वजह से दी. इनमें से सिर्फ 0.6% बच्चों के पास इंटरनेट या सोशल मीडिया तक पहुंच थी. तो ब्लू वेल के अपने देश रूस में ही इस बात की संभावना कम है कि किसी ऑनलाइन गेम के चलते खुदकुशी के मामले अचानक बढ़ गए हों.

मुंबई के मनप्रीत साहस की मौत को भारत में ब्लू वेल के चलते हुए पहला मामला बताया जाता है
देसी मामलों का क्या?
भारत में ब्लू वेल का ज़िक्र मुंबई में रहने वाले मनप्रीत साहस की मौत के बाद से होने लगा. मनप्रीत की अपनी मौत पर भारी बहस है कि वो खुदकुशी है भी या नहीं. इसलिए उसके केस में ब्लू वेल से मौत का सवाल फिलहाल खड़ा ही नहीं होता. बावजूद मनप्रीत का मामला मीडिया में सामने आने के बाद से दर्जनों खुदकुशी (या खुदकुशी की कोशिश) के मामलों में ब्लू वेल का नाम घसीट लिया गया है. इन मामलों को लेकर जितनी जानकारी हमने जुटाई, उस में यही सामने आया कि खुदकुशी की वजह चाहे जो रही हो, वो ब्लू वेल तो नहीं ही थी. कम से कम पुलिस की जांच में तो यही सामने आ रहा है. इस पर एक मुकम्मल आर्टिकल अंग्रेज़ी वेबसाइट quartz.com पर प्रकाशित है. आप यहां क्लिक कर के
उसे पढ़ सकते हैं.
और जिनके हाथ पर वेल बनी है, उन सरवाईवर्स का क्या?
यही असल में ब्लू वेल से जुड़ा यक्ष प्रश्न है. अस्पताल में भर्ती लोग, जिनके हाथ पर वेल बनी है, उन पर कैसे सवाल खड़े किए जाएं. उन मामलों के बारे में मेरी राय ये है कि कट तो चोटी भी सच में ही रही है और एक समय मुंह भी सही में नोचा जा रहा था. दिल्ली में काला बंदर भी सच-मुच में लोगों की जान का दुश्मन बना हुआ था. लोग ज़ख्मी तक हुए थे. इसलिए ऐसा हो सकता है कि ब्लू वेल भी सच-मुच हो. माने कि न हो.
ब्लू वेल सरवाइवर बताई जा रही इस लड़की का बयान सुनने में रटा-रटाया लगता है. उसका दिया ब्योरा ब्लू वेल गेम के बारे में प्रचलित डीटेल्स से भी कुछ अलग है. संभव है कि ब्लू वेल एक तरह का मास हिस्टीरिया हो. मास माने पब्लिक या संख्या और हिस्टीरिया माने पागलपन. जी, बहुत सारे लोग अचानक एक साथ एक अजीब व्यवहार कर सकते हैं. ये मेरा अंदाज़ा नहीं, साइंस की खोज है. इसके बारे में तफसील से जानने के लिए यहां क्लिक करें.
सनद रहे, हाथों पर कट मिले हैं, लेकिन फोन से अबतक पचास स्टेज को लेकर हुई बातचीत वगैरह का डाटा नहीं मिला है.

लोगों को 'आगाह' करने के चक्कर में 'पत्रकारों' ने कोरा तक से जानकारी कबाड़ी है.
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अंग्रेज़ी की कहावत है. संदेसा लाने वाला कैसा भी संदेसा लाए, उसे बख्श देना ही समझदारी होती है. लेकिन ब्लू वेल के मामले में कुछ गलती मीडिया से भी हो गई लगती है. कई मीडिया संस्थान ब्लू वेल जैसी अपुष्ट सनसनी से लोगों को आगाह करने के चक्कर में खौफ बांटते रहते हैं. यकीन नहीं आता तो ब्लू वेल पर हुई रिपोर्टिंग पर नज़र मारिए. 'कहा जाता है' और 'बताया जाता है' की शैली में इतना कुछ लिख दिया गया है कि अवचेतन में कहीं न कहीं ब्लू वेल बैठ ही जाता है. रिपोर्टिंग पर हुई मेहनत का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि ब्लू वेल 'जनने' वाले फिलिप बुदकिन का ताज़ा हाल आपको उन वेबसाइट्स और अखबारों में ढूंढने से नहीं मिलेगा, जिन्होंने उसका इंटरव्यू छाप दिया था. फैक्ट चेकिंग साइट स्नोप्स के मुताबिक फिलिप ने अपने इंटरव्यू में ये कहा कि उसका ग्रुप 2013 में बैन हो गया था. अपने यहां आज उसके नाम पर गदर कट रहा है.
तो क्या कुछ भी नहीं है?
मैं दावे के साथ नहीं कह सकता. लेकिन इतना तय है कि जितना बताया जा रहा है, उतना तो नहीं ही है. इसलिए सचेत रहिए, भयभीत नहीं. ब्लू वेल पुराण में इस बार के लिए बस इतना ही.
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