मशहूर फिल्म निदेशक विशाल भारद्वाज कॉलेज के सेकेंड ईयर में थे. ये वो वक्त था जब दक्षिण एशिया में ग़ज़ल पुनः संदर्भित हो रही थी. गुलाम अली, मेहंदी हसन और जगजीत सिंह की लोकप्रियता चरम पर थी. नए-नए लड़के स्कूल-कॉलेजों में शायरियां पढ़ रहे थे. फिल्मी गीतों में भी कविताएं कही जा रही थीं. रेलवे स्टेशनों पर शेरों-शायरी की किताबें बिक रही थीं. विशाल भी इस दौर से अलग नहीं थे. कॉलेज में एक प्रोग्राम हुआ. कॉन्सर्ट टाइप. उस प्रोग्राम में विशाल भारद्वाज ने एक शेर पढ़ा, जो उन्होंने कहीं से सुना था. मुलाहज़ा हो,
बशीर बद्र: ये एक पेड़ है आ इससे मिल के रो लें हम
उर्दू शायरी के जिस दौर में हल्की से हल्की बात भी मुश्किल ज़ुबान में कही जा रही थी, उस वक्त बशीर बद्र ग़ज़ल में ऐसे शब्दों को लेकर आए जो आम ज़ुबान के थे. उनके रूपक आम आदमी के जीवन से जुड़े हुए थे.


ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम
यहां से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं
ये शेर लिखा था उस वक्त मेरठ में रह रहे एक शायर ने जो कभी अपने अब्बा की तरह पुलिस विभाग में मुलाज़िम हुआ करता था. देह पर भले पुलिस की सख्त खाकी वर्दी थी लेकिन नाज़ुक से दिल में उस लड़की का ख्याल था, जिसे हर सावन आती है उस सावन की याद जिसमें वो उस लड़के साथ आखिरी बार भीगी थी.
एक शायर जिसे प्रेम में हर मौसम फरिश्तों सा लगता था. जो बेवफ़ाओं की भी मजबूरियां समझता था. उम्मीद से भरा वो शायर जिसने कभी फिर मुलाक़ात की उम्मीद नहीं छोड़ी. जिसका घर जब दंगाइयों ने फूंक दिया तब भी उसने शेर ही लिखा. मुशायरों का वो रॉकस्टार जिसके ज़ेहन पर वक़्त और उम्र ने ऐसी धूल जमा दी कि वो ख़ुद अपने ही लिखे शेर भूल गया. आज सय्यद मुहम्मद बशीर उर्फ़ बशीर बद्र की 'ज़िंदगी की शाम' हो गई. मुहब्बत के शायर ने दुनिया से अलविदा ले लिया. हमारे और उनके रास्ते अब बदल चुके हैं.
अजब चराग़ हूं दिन रात जलता रहता हूं
मैं थक गया हूं हवा से कहो बुझाए मुझे
1997 का साल. अमेरिका का एल्गिन शहर. सर सय्यद डे मुशायरा चल रहा है. हॉल खचाखच भरा हुआ है. लेकिन माहौल थोड़ा ठंडा है. संचालन कर रहे व्यक्ति ने कहा, 'डॉक्टर बशीर बद्र को मैं आवाज़ देने जा रहा हूं.' उनका इतना कहना था कि हॉल तालियों से गूंज गया. संचालक ने कहा, 'बहुत खूब... बहुत खूब...' बशीर बद्र माइक पर आते हैं. इतने बड़े शायर और एक बेहद सरल सा शेर पढ़ते हैं,
परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता
उर्दू शायरी के जिस दौर में हल्की से हल्की बात भी मुश्किल ज़ुबान में कही जा रही थी, उस वक्त बशीर बद्र ग़ज़ल में ऐसे शब्दों को लेकर आए जो आम ज़ुबान के थे. उनके रूपक आम आदमी के जीवन से जुड़े हुए थे. महबूब की ज़ुल्फ़ सुलझाने की बेकरारी हो या गरीब के पेट में भूख से उठने वाला दर्द, उनके पास हर एहसास के लिए सरल भाषा का उम्दा शेर मौजूद था. जैसे कितना बड़ा शेर कितनी सरल ज़ुबान में उन्होंने लिख दिया,
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
बशीर बद्र की शायरी बोझिल दर्शन से मुक्त थी. अवसाद का इलाज उनके पास नहीं था और ना ही ज़ख्मों को कुरदने वाला डंठल. वो रोज़मर्रा के उन अनुभवों पर शेर कहते थे जिन्हें ठहरकर कभी हमने महसूस ही नहीं किया. यही वजह थी कि वो सिर्फ मुशायरों तक महदूद नहीं रहे. कवि सम्मेलनों, जहां वीर रस के कवि भी मंच पर लामबंद होते थे, में भी लोग उन्हें सुनने आते थे. इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि बशीर बद्र की भाषा दूसरे शायरों से बिल्कुल अलग थी. उन्होंने यह देखकर कि फलां शायर की भाषा कैसी है, कभी अपनी शायरी का फारसीकरण नहीं किया. लेकिन शायरी से पहले उन्होंने पुलिस में नौकरी क्यों की?
शायर कैसे बने?
15 फरवरी 1935 को बशीर बद्र का जन्म हुआ. आज़ादी से पहले का भारत. शहर था कानपुर. पिता सय्यद मुहम्मद नज़ीर पुलिस में थे. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई कानपुर में ही हुई. बाद में पिता का ट्रांसफर हो गया और परिवार आ गया इटावा. लिहाज़ा 10वीं इटावा से निकाली. बशीर आगे भी पढ़ना चाहते थे कि लेकिन पिता नहीं रहे. रहा बस एक घर और उसकी जिम्मेदारियां. पढ़ाई रुक गई और पिता की नौकरी बेटे को मिल गई. 85 रुपये की सैलरी में परिवार का गुज़र बसर होने लगा. परिवार बड़ा था इसलिए जिम्मेदारियां भी ज्यादा थीं. शादी हो चुकी थी और तीन बच्चे भी थे. बशीर सुबह ड्यूटी पर जाते और शाम को थक-हारकर वापस आ जाते. जब काम में दिल नहीं लगता तो आदमी जल्दी थक जाता है.
बशीर की हालत भी कुछ ऐसी ही थी. अक्सर रात को वो अपनी शायरी के बारे में सोचते. 7वीं क्लास में ही उनकी ग़ज़ल 'निगार' मैग्ज़ीन में छप चुकी थी. लोग उन्हें और उनके लेखन को जानते थे. 20 साल की उम्र में तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान की बड़ी-बड़ी मैग्ज़ीन्स उन्हें प्रमुखता से छाप रही थीं. फिर एक दिन आया जब बशीर ने फैसला किया कि 'ऐसे तो चलेगा नहीं गुरु'. फैसला किया कि ग़ज़लों की दुनिया में लौटेंगे और स्थगित पढ़ाई को दोबारा शुरू करेंगे.
बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बी.ए. और एम.ए. और फिर पीएचडी भी की. पढ़ाई के दौरान ही पुलिस की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह मुशायरों के हो गए. पीएचडी के बाद कुछ समय के लिए एएमयू में पढ़ाया और फिर मेरठ यूनिवर्सिटी आ गए. मिसरे के बाद सलीके से बुने किसी शेर की तरह जीवन भी आगे बढ़ रहा था. बशीर बद्र की लोकप्रियता का आलम ये था कि शायरों की लंबी कतार को लोग सिर्फ इसलिए बैठकर सुनते थे क्योंकि अभी बशीर का पढ़ना बाकी था. एक स्थायी मुस्कुराहट जो अब मानो चेहरे की बनावट का ही हिस्सा हो गई हो, बढ़िया सा एक सूट, शर्ट से मैचिंग टाई, कुछ कम बाल और एक बड़ा सा चश्मा. बशीर बद्र माइक पर आते और बेहद सौम्य और गहरी आवाज़ में शेर पढ़ते तो लोग मानो सच में पागल हो जाते,
तुम मुझे छोड़ के जाओगे तो मर जाऊंगा
यूं करो जाने से पहले मुझे पागल कर दो
एक बड़े मशहूर ग़ज़ल गायक हैं. तलत अज़ीज़. एक क़िस्सा सुनाते हैं. 84-85 का वक्त था. तलत अज़ीज़ के पास दूरदर्शन से एक फोन आया. न्यू ईयर प्रोग्राम के लिए. कहा गया कि नए साल पर आपका कार्यक्रम कर रहे हैं तो कुछ नया तैयार करिए. वक़्त कम था और काम बड़ा. तलत अज़ीज़ ने फोन किया डॉक्टर बशीर ब्रद को. कहा कि डाक साब... ऐसी-ऐसी बात है. बशीर बद्र ने कहा कि 'अरे, उसमें क्या है. मैं ग़ज़ल लिखकर देता हूं आपको.' बशीर बद्र ने शेर लिखा,
आपको मुबारक हो यूं नई सहर आई
जैसे एक दुल्हन की पहली-पहली अंगड़ाई
ये हुनर से कुछ आगे की चीज़ है. इसे जादू ही कहा जा सकता है. लेकिन फिर एक रोज़ एक 'शाम' आई. फ़ैज़ के ग़म की शाम. साल था 1984. बशीर बद्र एक मुशायरे के सिलसिले में पाकिस्तान गए हुए थे. कुछ रोज़ बाद जब वो वापस लौटे तब उन्हें ख़बर मिली कि बेगम नहीं रहीं. बशीर की गैर-मौजूदगी में मोहल्ले वालों ने उनका अंतिम संस्कार किया. जाते-जाते वो उनका चेहरा भी ठीक से नहीं देख पाए. लेकिन जैसा फ़ैज़ कहते हैं- '... शाम ही तो है'.
कुछ वक्त बीता और बशीर के जीवन में डॉ. राहत आईं. भोपाल की रहने वाली डॉक्टर राहत सुल्तान. दोनों ने निकाह कर लिया और कुछ साल बाद वो भोपाल में ही बस गए.
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
इस बीच एक और दुखद घटना हुई. 1987 में मेरठ में दंगे हुए. बड़े पैमाने पर आगज़नी हुई. कई लोगों के घर जला दिए गए. इनमें एक घर बशीर बद्र का भी था. तिनका-तिनका जोड़कर बनाया गया घोंसला घृणा की तपिश झेल नहीं पाया और राख हो गया. सारी गृहस्थी खत्म हो गई. बशीर बद्र भीतर तक हिल गए. अवसाद ने उन्हें घेर लिया क्योंकि उनकी ताज़ा ग़ज़लों का एक बहुत बड़ा कलेक्शन भी अब नष्ट हो चुका था. इस झटके से बाहर आने में उन्हें काफी समय लगा. वो मशहूर शेर भी उन्होंने इसी घटना के बाद कहा,
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
बशीर बद्र की शायरी में बार-बार दुश्मन का जिक्र आता है. दुश्मन उनकी शायरी में मोहब्बत के पैग़ाम का रूपक है. वो इस बात को बार-बार दोहराते हैं कि जाति, धर्म से ऊपर उठकर किसी से मोहब्बत करने की पहली शर्त है बड़ा और खुला दिल. अगर आप दुश्मन को माफ़ कर सकते हैं, अगर उसे भी आप मोहब्बत की नज़रों से देख सकते हैं तो आपको कोई नहीं हरा सकता. ये है बशीर बद्र का नाज़ुक और बेहद सरल सा दर्शन. जैसे,
दुश्मनी का सफ़र इक क़दम दो क़दम
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएंगे
या
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों
या
मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूं
या फिर ये शेर जिसमें वो नफ़रत का जिक्र करते हैं,
सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इंसां को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत
लेकिन मोहब्बत का ये शायर ख़ुद्दार भी बहुत था. जैसे उन्होंने ये शेर कहा जो उनकी वर्सटैलिटी को दिखाता है,
आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समंदर नहीं देखा
महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा
आज हम पीछे मुड़कर देख रहे हैं और बशीर बद्र को याद कर रहे हैं. वो अब इस दुनिया में नहीं हैं. एक जैसी खबरों की एक जैसी हेडलाइनें ये बता रही हैं कि '91 साल की उम्र में उन्होंने भोपाल में आखिरी सांस ली'. सार्वजनिक जीवन से वो बहुत पहले ही गायब हो चुके थे. लेकिन उनके शेर हर मौके पर अपनी प्रासंगिकता ख़ुद-ब-ख़ुद खोज लेते हैं.
बतौर शायर बशीर बद्र ने बुलंदी की कामयाबी और शौहरत देखी. लेकिन वो जानते थे कि ये तालियां, ये लोकप्रियता, ये भीड़ ये सब बहुत अस्थायी है. बुलबुले जैसा. सब खत्म हो जाएगा. अगर कुछ बचेगा तो वो है उनका कलाम. इसलिए शेर कहा,
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
शायरों, कवियों और लेखकों के साथ एक बात बड़ी अच्छी है. उनका लिखा उन्हें हमेशा जीवंत रखता है. हर मौक़े पर उनका लेखन ही उनका सबसे बड़ा पैरोकार साबित होता है.
रेख़्ता के मुताबिक़, गोपीचन्द नारंग कहते हैं कि 'बशीर बद्र ने शायरी में नई बस्तियों को आबाद किया.' उन्हें अपने जीवन में कई सम्मान मिले. पद्मश्री से लेकर साहित्यिक अकादमियों के कई पुरस्कार मिले. लेकिन लोगों का प्यार उनके लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत था.
यूट्यूब पर 2018 का एनडीटीवी का एक वीडियो मौजूद है, जिसमें भोपाल के अपने घर में बीमारी से लड़ते हुए 8 साल पहले के बशीर बद्र व्हीलचेयर पर बैठे दिखाई देते हैं. पास बैठीं पत्नी बशीर साहब का ही एक शेर पढ़ती हैं,
कभी सात रंगों का फूल हूं कभी धूप हूं कभी धूल हूं
मैं तमाम कपड़े बदल चुका तेरे मौसमों की बरात में
बीमारियों और बढ़ती उम्र के चलते उनकी याददाश्त लगभग जा चुकी थी. वो सबकुछ लगभग भूल गए थे. लेकिन बशीर बद्र के आंगन में हर जाने वाली चीज़ के लिए ढेर सारा इंतज़ार और खूब सारी उम्मीद रहती है, फिर भले वो याददाश्त क्यों ना हो. उनकी पत्नी राहत बद्र जब मिसरा कहतीं तो मुस्कुराते हुए बशीर अपनी धुंधला चुकी यादों को खंगालकर शेर को पूरा करने की कोशिश करते और लगभग कर देते,
यूं ही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो
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