धर्मेंद्र प्रधान के जाने की कहानी सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे के कहानी नहीं है. ये पहली बार है जब ‘अजेय’ लग रही मोदी सरकार को युवाओं के अचानक छिड़े आंदोलन की वजह से राजनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा है. इससे पहले किसान आंदोलन के बाद सरकार ने तीन कृषि कानून वापस लिए थे लेकिन इसमें पूरा एक साल लगा था. इस बार फैसला जल्दी हुआ और उसका सीधा असर एक केंद्रीय मंत्री पर पड़ा. सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री जिन्हें सत्ता का पूरा सपोर्ट था, उन्हें जनता के गुस्से से नहीं बचाया जा सका. राजनीतिक रूप से कोई कुछ भी सोचता हो लेकिन पिछले दो हफ्तों की घटनाओं को याद रखा जाना चाहिए. भारत में जनरेशन जेड यानी ‘जेन-जी’ के विरोध ने हर किसी को सीखने के लिए 6 सबक दिए हैं.
पेपर लीक प्रोटेस्ट के 6 सबक, जो भारत की हर पॉलिटिकल पार्टी को रट लेना चाहिए
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री के पद छोड़ने की कहानी नहीं, बल्कि युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलन से भारतीय राजनीति को मिले बड़े संदेशों की कहानी भी है. यह आंदोलन बताता है कि डिजिटल दौर में युवाओं की ताकत, शिक्षा का मुद्दा और बिना बड़े नेता के भी जनआंदोलन सत्ता को जवाबदेह बना सकते हैं.

पहला, भारत के युवाओं की ताकत को कम मत आंकिए.
सालों से ऐसा कहा जाता रहा है कि भारत के युवा राजनीति में दिलचस्पी नहीं लेते. वे स्मार्टफोन से चिपके रहने वाले, इंस्टाग्राम और रील्स में खोए रहते हैं. समाज में युवाओं को ऐसे ही देखा-दिखाया जाता रहा है लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शनों ने इस सोच को पूरी तरह से बदल दिया. अजीब बात है कि जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अक्सर ध्यान भटकाने वाला माना जाता था, वही लोगों को एकजुट करने का जरिया बन गए. इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स, वॉट्सऐप ग्रुप और यूट्यूब लाइव के जरिए खबरें तेजी से फैलीं.
इस आंदोलन को किसी विचारधारा के किसी बड़े नेता ने लीड नहीं किया. इसके लीडर अनजान युवा चेहरे थे, जिनका भविष्य परीक्षा में धांधली और सरकारी लापरवाही से बार-बार प्रभावित हुआ. इस आंदोलन के लीडर वोट या सत्ता पाने की लालसा रखने वाले मंझे राजनेता नहीं थे. बल्कि आम भारतीय नागरिक थे, जो सत्ता के सामने सच बोल रहे थे. उनकी पहचान का छिपा रहना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई.

उन्हें न तो अपने पॉलिटिकल करियर की चिंता थी. न ही पार्टी के ‘बॉस’ को खुश करना था. वो किसी विचारधारा के बचाव के फेर में भी नहीं पड़े. उन्होंने एक नागरिक के कॉन्फिडेंस के साथ ऐसे बात की, जैसे उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है. हर जगह सरकार को यह एक सबक याद रखना चाहिए. युवाओं को नज़रअंदाज़ करना आपके लिए खतरनाक हो सकता है. खासकर तब जब दबी हुई निराशा सामूहिक कार्रवाई का रूप ले ले.
दूसरा भारत एजुकेशन सिस्टम आखिरकार एक राजनीतिक मुद्दा बन गया.
सालों से पेपर लीक, नतीजों में देरी, कोचिंग संस्थानों की मनमानी, पढ़ाई का बढ़ता खर्च अलग-अलग समस्याएं थीं. छात्र इसका कुछ दिन विरोध करते. फिर अपने काम में लग जाते क्योंकि अगली परीक्षा हमेशा उनका इंतजार कर रही होती थी. लेकिन इस बार मामला अलग था. हजारों छात्रों की शिकायतें मिलकर एक बड़े सवाल में बदल गईं कि क्या भारत का एजुकेशन सिस्टम लाखों युवाओं और उनके परिवारों को निराश कर रहा है.
भारत में पहली बार सिर्फ शिक्षा तक पहुंच नहीं, बल्कि उसकी क्वालिटी और एक भरोसेमंद शिक्षा व्यवस्था भी चुनावी और राजनीतिक मुद्दा बन गई है. हर सरकार चाहती है कि उसे 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' यानी देश की युवा आबादी का फायदा मिले. लेकिन उन्हें इसके साथ जुड़ी 'डेमोग्राफिक एंग्जायटी' यानी युवाओं से जुड़ी चिंताओं का भी सामना करना पड़ेगा. उन्हें यह समझना होगा कि अच्छी नौकरियां कम हैं और उम्मीदें बहुत ज्यादा. युवाओं की सबसे बड़ी चिंता यही है.

तीसरी बात, हमेशा ‘डिनायल मोड’ में शासन नहीं हो सकता.
सरकार को चुनौती पेश करने वाले विरोध प्रदर्शनों पर मोदी सरकार का रवैया काफी जाना-पहचाना हो गया था. प्रदर्शन करने वालों की बातों को नकारना, उन पर सवाल उठाना और इंतजार करना कि समय के साथ मामला ठंडा पड़ जाएगा. यहां सरकार की ये स्ट्रेटेजी नाकाम हो गई. प्रदर्शन करने वालों को पॉलिटिकल टूल या देशविरोधी दिखाने की कोशिशें फेल हो गईं क्योंकि मुद्दा काफी ‘सच्चा’ था. तकरीबन हर भारतीय परिवार में कोई न कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है. हर माता-पिता को पता है कि बार-बार मिलने वाली असफलता की भावनात्मक और आर्थिक कीमत क्या होती है और वह भी जो काबिलियत की कमी से नहीं बल्कि सिस्टम की खराबी से आती है. सरकारें गलती मानकर लोगों का भरोसा हासिल करती हैं न कि ये दिखाकर कि उनसे कोई गलती ही नहीं हुई. मोदी सरकार को जब तक ये बात समझ आई और उसने बातचीत के रास्ते खोले, तब तक जनता का उन पर भरोसा काफी कम होने लगा था.

चौथी बात, आंदोलन के लिए किसी एक बड़े नेता की जरूरत नहीं.
इस आंदोलन की सबसे खास बात यह थी कि इसमें कोई एक बड़ा नेता नहीं था. इसके बजाय दर्जनों युवा अपने आप सामने आकर आंदोलन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. स्टूडेंट्स, रिसर्चर्स और वॉलंटियर्स ने विरोध-प्रदर्शन का कामकाज देखा. किसी ने सबूत इकट्ठा किए. किसी ने मीडिया से बातचीत की. कोई मंत्रियों के साथ संवाद करने के लिए गया. ये सब उन पुराने आंदोलनों से काफी अलग है, जिसमें एक करिश्माई शख्सियत होती थी और उसे ईर्द-गिर्द ही सारी चीजें होती थीं. डिजिटल जनरेशन को बंटी हुई लीडरशिप से कोई दिक्कत नहीं है. अधिकार कद या पद से नहीं बल्कि भरोसे और काबिलियत से मिलता है. पुरानी राजनीतिक पार्टियों को जो किसी एक नेता के पीछे चलती हैं, इस बदलाव को समझना होगा.
पांचवी बात, नागरिक हार न मानें तो लोकतंत्र आज भी काम करता है.
हाल के वर्षों में तमाम लोगों को ये लगने लगा था कि प्रोटेस्ट से कुछ नहीं मिलता. सरकारी संस्थाएं किसी की नहीं सुनतीं. सरकार भी बस जनता के गुस्से के शांत होने का इंतजार करती है. लेकिन इस आंदोलन ने एक अलग संदेश दिया. इसमें शांतिपूर्ण, लगातार और अनुशासित लामबंदी से सत्ता में बैठे लोग सुनने को मजबूर हो गए. लेकिन ये रातोंरात नहीं हुआ. इसके लिए साहस और गजब के सब्र की जरूरत थी, जो उकसावे के बावजूद संयम बनाए रखे. इस आंदोन का असर तब दिखा जब प्रधानमंत्री को खुद आधी रात को वीडियो के जरिए देश को संबोधित करना पड़ा. उनका इरादा जो भी हो लेकिन यह इस बात का सबूत था कि जनका की आवाज को दबाया नहीं जा सकता.
ये सही बात है कि सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे से एजुकेशन सिस्टम ठीक नहीं हो जाएगा. सिर्फ एक व्यक्ति के पद छोड़ने से पेपर लीक की समस्या भी खत्म नहीं होगी. असली परीक्षा तो बुनियादी सुधार की है लेकिन लोकतंत्र में सांकेतिक जीत भी काफी मायने रखते हैं. ये जनता को याद दिलाते हैं कि सरकार से जवाब मांगा जा सकता है.

इस आंदोलन की सबसे यादगार तस्वीर शायद धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होगी. बल्कि हजारों आम युवाओं की वो तस्वीर होगी जिसने ये महसूस किया कि एकजुट आवाज का असर हो सकता है. ये सभी विचारधारा वाले नेताओं के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी. चेतावनी साफ है कि युवाओं को बेसब्र और राजनीतिक मामले में नासमझ मानकर खारिज करना बंद करें और उनकी बात सुनें. ये अवसर भी उतना ही बड़ा है. भारत के युवा कोई चमत्कार नहीं मांग रहे हैं. वो केवल निष्पक्षता, योग्यता और सम्मान मांग रहे हैं. वो ऐसी परीक्षाएं चाहते हैं जिन पर भरोसा कर सकें. ऐसी संस्थाएं चाहते हैं जिन पर विश्वास हो. ऐसी सरकारें चाहते हैं जो उन्हें महज आंकड़ों के बजाय नागरिक समझे.
इस 'जेन-जी' (Gen Z) के विद्रोह ने दिखा दिया कि भले ही भारत का एक हिस्सा चमक रहा हो, लेकिन एक 'दूसरा भारत' भी है जो बैचेन है. चिंतित है और अब शांत रहने के मूड में बिल्कुल नहीं है. हर सरकार को अपने 'न्यू इंडिया' के दावों में उलझे रहने के बजाय इस 'दूसरे भारत' की आवाज पर ध्यान देना चाहिए.
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छठा और अंतिम सबक: नैरेटिव का एकाधिकार खत्म हो गया है.
अखबारों से टीवी और अब डिजिटल मीडिया तक. मीडिया की ताकत का केंद्र पूरी तरह से बदल गया है. ये बदलाव साफ महसूस किया जा सकता है. कई हफ्तों तक मेनस्ट्रीम मीडिया के एक बड़े हिस्से ने 'CJP' शब्द तक का जिक्र नहीं किया. जैसे इस आंदोलन को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया हो. इसके बावजूद यह आंदोलन लगातार मजबूत होता गया, जबकि अहंकार से भरे ‘प्राइम टाइम वॉरियर्स’ (टीवी एंकर्स) ने इसे नजरअंदाज करने या बदनाम करने की पूरी कोशिश की.
इसके बजाय एक अलग तरीका अपनाते हुए डिजिटल दुनिया में एक नया मंच तैयार कर लिया गया. .यहां इंस्टाग्राम बातचीत करने और अपनी बात फैलाने का सबसे पसंदीदा जरिया बन गया. आगे से कभी किसी इंस्टाग्राम रील को मामूली रील समझकर खारिज करने की गलती न करें. डिजिटल दौर में राजनीति अब सिर्फ राजनीतिक दलों के दफ्तरों या टीवी स्टूडियो से शुरू नहीं होती. कभी-कभी इसकी शुरुआत हर हालत में जिंदा बच जाने वाले ‘कॉकरोच’ की तस्वीर वाले 30 सेकंड के एक वीडियो से होती है और पूरे देश की राजनीति की दिशा बदलकर खत्म होती है.
(लेखक राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं)
वीडियो: लल्लनटॉप के रिपोर्टर्स ने प्रदर्शन के बारे में क्या बताया?












