The Lallantop

नेता जो सीधे प्रधानमंत्री बना- चंद्रशेखर

समाजवादी-कांग्रेसी और फिर जनता दल के नेता रहे चंद्रशेखर के सियासी किस्से.

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop

यादों को एक बहाना चाहिए. सियासत को शायद वो भी नहीं चाहिए. पर हम नेता नहीं हैं. साफ कहना चाहिए. 1 जुलाई के दिन चंद्रशेखर पैदा हुए थे. 8 जुलाई को उनका निधन हुआ. पूर्व प्रधानमंत्री. बलिया के बाबू साहब. जो कभी न तो राज्य में मंत्री रहे और न ही केंद्र में. बने तो सीधे प्रधानमंत्री. उनके कुछ किस्से सुनाता हूं.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
1951 में सोशलिस्ट पार्टी के फुल टाइम वर्कर बन गए युवा चंद्रशेखर. तीखे तेवर थे. बात खुलकर कहते थे. जाहिर है कि ज्यादातर लोगों से पटती नहीं थी. इन लोगों में सोशलिस्ट पार्टी के लंबरदार राम मनोहर लोहिया भी थे. एक बार चंद्रशेखर आचार्य नरेंद्र देव को आमंत्रित करने इलाहाबाद गए. आचार्य बीमार थे. वहीं लोहिया मौजूद थे. उन्होंने कहा: आप डॉक्टर लोहिया को ले जाइए. लोहिया बोले, मुझे तो कलकत्ता जाना है. चंद्रशेखर ने कहा. बलिया से चले जाइएगा. बक्सर से ट्रेन है. वहां तक आपको जीप से भिजवा दूंगा. लोहिया बलिया पहुंचे. स्टेशन पर ही पूछने लगे. जीप कहां हैं. चंद्रशेखर ने कहा, इंतजाम हो चुका है. गेस्ट हाउस पहुंचे तो लोहिया ने फिर सवाल दोहराया. चंद्रशेखर ने कहा, शाम तक आ जाएगी. आपको तो वैसे भी कल सुबह निकलना है. लोहिया भड़क गए. अनाप-शनाप बकने लगे. चंद्रशेखर भड़क गए. बोले. ऐसा है डाक्टर साहब. आपकी इज्जत है, तो हमारी भी है. आपको नहीं बोलना तो मत बोलिए. हमें झूठा मत ठहराइए. वो रही जीप और वो रहा रास्ता. आप चले जाएं. लोहिया अवाक रह गए. फिर तीन सभाओं में बोले. सोशलिस्ट पार्टी में टूट हुई तो चंद्रशेखर कांग्रेस में चले गए. युवा तुर्क कोटरी का हिस्सा बने. शुरू में इन्हीं के बूते इंदिरा गांधी ने ओल्ड गार्ड को किनारे लगाया. मगर चंद्रशेखर के बगावती तेवर यहां भी बने रहे. 1975 में इमरजेंसी लागू हुई तो चंद्रशेखर उन कांग्रेसी नेताओं में से एक थे, जिन्हें विपक्षी दल के नेताओं के साथ जेल में ठूंस दिया गया. इमरजेंसी हटी, चंद्रशेखर वापस आए और विपक्षी दलों की एक हो बनाई गई जनता पार्टी के अध्यक्ष बने. अपनी पार्टी की जब सरकार बनी तो चंद्रशेखर ने मंत्री बनने से इनकार कर दिया. सत्ता के संघर्ष में कभी इस तो कभी उस प्रत्याशी का समर्थन करते रहे. चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने की बारी आई 1990 में. जब उनकी ही पार्टी के विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बीजेपी के सपोर्ट वापस लेने के चलते अल्पमत में आ गई. चंद्रशेखर के नेतृत्व में जनता दल में टूट हुई. एक 64 सांसदों का धड़ा अलग हुआ और उसने दावा ठोंक दिया सरकार बनाने का. समर्थन दिया राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने. पीएम बनने के बाद चंद्रशेखर ने कांग्रेस के हिसाब से चलने से इंकार कर दिया. सात महीने में ही राजीव गांधी ने सपोर्ट वापस ले लिया. बहाना बनाया हरियाणा पुलिस के दो सिपाहियों को. जो राजीव के घर के बाहर पाए गए थे. कहा गया कि सरकार राजीव की जासूसी करवा रही है. चंद्रशेखर सत्ता जाने के बाद कई बार लोकसभा के सांसद रहे. मगर राजनीति में उनकी पूछ हर बीतते बरस के साथ सांकेतिक ही रह गई. मगर आज भी चंद्रशेखर को उनके तीखे तेवरों और साफ बात के लिए याद किया जाता है. कहा जाता है कि राम जन्मभूमि मुद्दे पर वह दोनों पक्षों को समाधान के लिए लगभग मना चुके थे. मगर उनके पास समय नहीं था. सत्ता चली गई. चुनाव हुए. कांग्रेस आई. और फिर मस्जिद टूट गई. चंद्रशेखर के समय में भी मुद्रा कोष का प्रेशर और भुगतान का संकट भी सामने आया था. जब देश को 55 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था. ये याद रखना मौजू होगा कि चंद्रशेखर के आर्थिक सलाहकार डॉ. मनमोहन सिंह थे. चंद्रशेखर के बाद उनकी बलिया सीट से बेटा नीरज शेखर सांसद बना. 2014 की मोदी लहर में हारे तो मुलायम सिंह यादव ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया.
  तमाम किस्सों के लिए यहां क्लिक करें. https://www.youtube.com/watch?v=dVetlvruCEA

Advertisement
Advertisement
Advertisement