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मनोज कुमार के इस एक सीन पर अवॉर्ड्स की बारिश होनी चाहिए थी!

उनके जन्मदिन पर पढ़ें तीन खास फैक्ट्स.

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फोटो - thelallantop
मनोज कुमार यानी भारत कुमार. भारत कुमार नाम इनकी देशभक्ति वाली फिल्मों का इतिहास देखते हुए पड़ा. जनता के साथ नेताओं के भी फेवरेट अभिनेता थे. लाल बहादुर शास्त्री के ब्लैक एंड व्हाइट जमाने से अटल बिहारी के कलरफुल जमाने तक सबके फेवरेट रहे. अब 80 साल के हो चले हैं. जैसे ही इनका हैप्पी बड्डे आता है, सारे लोग आपको इनकी देशभक्ति से लबरेज फिल्मों के बारे में ज्ञान देने लगते हैं. वो वाला गाना सारे दिन बजता है- हो ओ हो ओ..हो ओ हो ओ..है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं..भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हूं. देशभक्ति का ओवरडोज झेलने वाले हम लोग उनकी इस ट्रिविया को एंजॉय भी करते हैं. लेकिन गुरू बात ये है कि किसी को ऐसे इमेज में नहीं बांधना चाहिए. उन्होंने कित्ता और काम किया, कित्ते रोमांटिक रोल किए, सब देशभक्ति के नीचे दब गया. देशभक्ति अपनी जगह सही है लेकिन बाकी चीजें भी बतानी चाहिए. है कि नहीं? तो मनोज कुमार ने देशभक्ति के अलावा जो काम किया वो ये है.

गोल्ड प्लेटेड हनुमान चालीसा यंत्र का ऐड

hanuman तीन चार साल पहले मार्केट में एक कमाल की चीज आई थी. ये इंसानी जिंदगी में आने वाली सारी मुश्किलें एक झटके में खत्म कर देता था. तकरीबन 5 हजार की कीमत वाली इस चीज का नाम था "गोल्ड प्लेटेड हनुमान चालीसा यंत्र." लोगों के अंधविश्वास और बजरंगबली के नाम का इस्तेमाल करके इसको धकापेल बेचा गया. इससे किसी की मुश्किल खत्म हुई हो या नहीं, उस दौर में कुछ एक्टर्स की मुश्किलें जरूर कम की थीं. आलोकनाथ से लेकर रोनित राय, शिवाजी साटम, मुकेश खन्ना और ढेर सारे लोग इसका ऐड करते थे. इसके पोस्टर में मनोज कुमार की तस्वीर थी और वो ऐड भी करते दिखे थे. उनका सबसे फेमस गाना "जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने तब दुनिया को गिनती आई" से शुरू होता है. यानी उसमें मैथ और साइंस की बात की गई थी. वो आगे जाकर अंधविश्वास वाले आइटम का प्रचार करेंगे ऐसा मालूम नहीं था. mano

शाहरुख खान को धर लपेटा

man मनोज कुमार बहुत गुस्सहिल आदमी हैं. साल 2008 में शाहरुख खान की फिल्म ओम शांति ओम आई थी. दीपिका पादुकोण की ये पहली फिल्म थी. इस फिल्म में शाहरुख खान ने चेहरे पर मनोज कुमार की स्टाइल में हाथ रखा हुआ था. मनोज को ये मजाक पसंद नहीं आया. शाहरुख खान के खिलाफ मानहानि का केस कर दिया. पूरे 100 करोड़ की डिमांड कर डाली. केस चलता रहा. 2013 में केस वापस ले लिया.

क्लर्क कम डॉक्टर वाला रोल

ये भारतीय फिल्मों के इतिहास का सबसे आइकनिक सीन है. इसको टक्कर देने के लिए बाद में साउथ इंडियन फिल्मकारों ने बड़ी कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. 1989 में क्लर्क फिल्म आई थी. मनोज कुमार उसमें एक ईमानदार क्लर्क बने हुए थे. जो कि गरीबी के कारण थोड़े समय के लिए करप्ट और फिर ईमानदार बन जाते हैं. अशोक कुमार उनके बापू बने थे. बीमार थे तो डॉक्टर नहीं आया. उसको पैसा चाहिए था. तब देखिए कैसे मनोज कुमार ने उनको ठीक किया. इतना सारा काम करने के बाद भी मनोज कुमार को सिर्फ देशभक्ति के लिए याद किया जाता है तो ये गलत बात है. उनको हैप्पी बड्डे. जियें हजारों साल.
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