संवाद की स्थिति आलोचना और आकांक्षा से निर्मित होती है. एक ऐसे दौर में जब आलोचना संकट से और आकांक्षा दु:स्वप्न से गुजर रही है, समाज का आकलन कर उसे संवाद के दायित्व तक ले चलना, एक जरूरी मानवीय कार्यभार है. रचनात्मक और बौद्धिक हस्तक्षेप का सहकारी उपक्रम 'संगमन' इस कार्यभार में ही संलग्न है.
संगमन दूसरा दिन: हमले और हत्या अदब में विवेक बनाए रखने की कीमत हैं
संगमन के 22वें एडीशन का दूसरा और आखिरी दिन, अविनाश की निगाह से.

मडगांव (गोवा) में कल संपन्न हुए 'संगमन' के 22वें संस्करण के दूसरे दिन की शुरुआत प्रसिद्ध कोंकणी लेखक दामोदर मावजो के वक्तव्य से हुई. गोवा के इतिहास और इसकी संस्कृति की विशेषताओं में उतरते हुए उन्होंने कहा कि गोवा के बारे कुछ गलत तथ्य प्रचलित हैं. गोवा को एक ईसाई-बहुल प्रदेश माना जाता है, जबकि सच्चाई ये है कि गोवा में सिर्फ 25% ईसाई हैं और 65% हिंदू हैं. पारस्परिक सद्भाव को मावजो ने बहुत गंभीरता से रेखांकित करते हुए कहा कि गोवा और कोंकणी साहित्य दोनों में ही 'अदरिंग फैक्टर' नहीं नज़र आएगा.

संगमन का 22वां संस्करण (फोटो क्रेडिट: पलाश अग्नि)
भारत में व्यापार करने के इरादे से आकर, लोगों को अपना गुलाम बना लेने वाली ताकतों के क्रमवार विश्लेषण से गुजरते हुए हिंदी लेखक-विचारक जितेंद्र भाटिया ने इस प्रश्न को सामने रखा कि आखिर 'इस दुनिया का मालिक कौन है'. किसानों, श्रमिकों और वंचितों के शोषण और दमन के लिए रची गई नई शब्दावली और सकल आय के असल तथ्यों के बीच उन्होंने कहा कि बाजार आज असहयोग आंदोलन तक का इस्तेमाल अपना तेल बेचने के लिए कर रहा है.
विदर्भ के किसानों के बीच काम कर रहे मराठी पत्रकार जयदीप हार्डीकर ने कृषि-संकट को अर्थव्यवस्था का संकट बताते हुए कहा कि साढ़े सात करोड़ किसानों ने गए बीस सालों में किसानी छोड़ दी है. वे सर्विस-इकानॉमी में आ गए हैं और मानसून-विमर्श मध्यवर्गीय जीवन से बाहर हो गया है. प्राकृतिक संसाधनों पर शहरी लोगों का अधिकार बढ़ता जा रहा है. 2015-16 के अकाल को अपने बयान में बहुत सारे आकड़ों के साथ लाते हुए जयदीप ने कहा कि 130 प्रमुख नदियां इस दरमियान समुद्र में मिली ही नहीं.

संगमन में वक्ताओं को सुनते लोग (फोटो क्रेडिट: विनायक समंत)
हिंदू परंपरा आर्थिक समानता की बात नहीं करती है. बुद्ध ने भी सामाजिक विषमता की बात की, लेकिन आर्थिक विषमता की नहीं. इन बिंदुओं के साथ समानता पर विचार करते हुए कोंकणी विचारक दत्ता नायक ने कहा कि आर्थिक समानता की बात सिर्फ कार्ल मार्क्स के यहां मिलती है. इसके बाद पर्यावरणविद् राजेंद्र केरकर ने जंगलों की और माग्दालीन डिसूजा ने अल्पसंख्यकों की स्थिति पर अपने वक्तव्य दिए.
'लोकमत' के संपादक राजू नायक ने कहा कि आज सामान्य लोग बगैर किसी नेतृत्व के सरकार के विरुद्ध उठ रहे हैं. ऐसे में नागरिक-चिंताओं को केंद्र में रखकर विचारकों और एक्टिविस्ट्स को एक साथ आने की जरूरत है.
कोंकणी कवि-लेखक दादू मांद्रेकर ने हाल ही में हुईं लेखकों-कलाकारों की हत्या पर बहुत मुखर प्रतिरोध दर्ज किया. वैदिक संस्कृति और पाखंड पर उन्होंने बहुत ओजपूर्ण भाषा में प्रहार करते हुए कहा कि आज विरोध में उठने वाली सारी आवाजें कुचली जा रही हैं.

संगमन के 22वें संस्करण के पहले दिन की ग्रुप फोटो (फोटो क्रेडिट: स्नेहा सबनीस)
भोजनावकाश के बाद शुरू हुए 'संगमन' के दूसरे दिन के दूसरे सत्र का संचालन चर्चित हिंदी कथाकार वंदना राग ने किया. इस सत्र के पहले वक्ता थे कवि-विचारक लाल्टू. उन्होंने कई महत्वपूर्ण कवियों की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहा कि अदब से जुड़े हुए व्यक्ति की सोच मानव-केंद्रित होती है. राष्ट्रवाद वृहद मानवीयता के विचार को कुचलता है.
लाल्टू ने कहा कि बुद्धिजीवियों पर हमले कोई नई बात नहीं है. इस तरह के हमले पहले भी हुए हैं और कई कवियों-लेखकों ने आत्महत्याएं भी की हैं. हमले और हत्या अदब में विवेक बनाए रखने की कीमत हैं.
सरस्वती सम्मान प्राप्त कोंकणी साहित्यकार महाबलेश्वर सैल ने साहित्यिक-जीवन से जुड़े अपने अनुभव बहुत सहज और मार्मिक ढंग से सुनाए. उन्होंने कहा कि मेरे अनुभव मेरे साहित्य में घुल-मिल गए हैं. सैल के वक्तव्य के बाद युवा कार्यकर्ता प्रवीण सबनीस ने युवाओं पर, अमिता गुरव ने रंगमंच पर, प्रशांत नायक ने छात्र-आंदोलन पर और रत्नमाला ने बाल-साहित्य पर अपने विचार रखे.

संगमन के समापन सत्र में बोलते गिरिराज किशोर (फोटो क्रेडिट: स्नेहा सबनीस)
आखिर में समापन सत्र में बोलते हुए प्रतिष्ठित साहित्यकार और 'संगमन' के संरक्षक गिरिराज किशोर ने इस आयोजन को सफल बताते हुए कहा कि जो अपनी भाषा से प्यार करते हैं, वही दूसरी भाषाओं से भी प्यार करते हैं. उन्होंने आगे कहा कि जो काम अंग्रेज कई सालों में नहीं कर पाए, उसे मौजूदा सरकार सिर्फ तीन सालों में ही करने कामयाब रही है. आज घर-घर बंट गया है. हाल ही में BHU में अपने अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहीं छात्राओं पर हुए लाठीचार्ज को उन्होंने आजाद भारत की सबसे शर्मनाक घटनाओं में से एक बताते हुए कहा कि इस सरकार के सारे फैसले देश का आर्थिक और वैचारिक शोषण कर रहे हैं.
'संगमन' के बारे में और जानने के लिए: www.sangamankar.com
पर जा सकते हैं.
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अविनाश
ये अविनाश मिश्र ने लिखा है. घातक कानपुर के सरल अविनाश. शेखर के नाम से फेसबुक पर धमाल मचाए रखते हैं. हिंदी साहित्य के भविष्य हैं. पर हमारी नजर में अगर हिंदी पुरातत्व की खुदाई हो, तो उसमें भी शेखर जैसे ही नजर आएंगे. बहुत मीठा बोलते हैं पर कर्कश तर्कों के साथ. किसी भी किताब का जिक्र आए, तो हम इनकी तरफ देखते हैं कि इनको तो पता ही होगा. साहित्य से जुड़े हर सवाल का जवाब शेखर को माना जाता है. शेखर की खूबी ही शेखर की दुश्वारी है.
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