
सेल्फी चर्चा में है. लोग डूब रहे हैं. ट्रेन से गिर रहे हैं. इस मुई सेल्फी के फेर में. इंसानियत के लिए जीका वायरस इतना खतरनाक नहीं है जितना ये सेल्फी. कुमार केशव दी लल्लनटॉप के रीडर हैं. इंसानियत को संकट में देख न पाए. ये सटायर लिख भेजा हमें. आप भी कुछ लिखना चाहें, जो नया हो, सलीके का हो, तो लिखिए. और लिखकर भेज दीजिए lallantopmail@gmail.com पर.
आजकल सेल्फी के संक्रमण से लोग-बाग खासे संक्रमित हैं. ये कोई सनसनीखेज खुलासा नहीं है कि सेल्फी का साम्राज्य सर्वत्र फैला हुआ है. नजरें घुमाकर देखो तो आस-पास ही असामान्य भाव-भंगिमा वाले सैकड़ों सेल्फी-स्नेही सज्जन स्वतः दृष्टिगोचर हो जाते हैं. मुंबई से लेकर मछरहट्टा, चेन्नई से लेकर चिंचपोकली, दिल्ली से लेकर दिलदारनगर, कश्मीर से लेकर कन्नौज, कानपुर से लेकर कनखल, गंगानगर से लेकर गंगटोक, वॉशरूम से लेकर वॉशिंगटन, ड्रॉइंग रूम से लेकर डुमरांव ,वोटिंग बूथ से लेकर बोटिंग यूथ, शादी से लेकर श्राद्ध, जिम से लेकर जिम्बाब्वे और रवि से लेकर कवि तक जहां नहीं पहुंच पाता हो वहां भी, सेल्फी की संपूर्ण स्वीकार्यता है. अपने पेट (पालतू पशु) से लेकर पेट के अंदर पल रहे बच्चे के साथ की सेल्फी सार्वजानिक की जा रही है.

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आपको ये जानकर हैरत होगी कि अखिल विश्व में सेल्फी ही सर्वोपरि है. इसके ऊपर कोई संविधान भी नहीं है. पिऊन से लेके पीएम तक इसके प्रभाव क्षेत्र में आते हैं. किसी सड़क छाप आशिक से लेकर संयुक्त राज्य के शासक तक को सेल्फी के फ्रेम में समाने के लिए अपने स्मार्ट फोन के अग्रकैम से चिरौरी करना पड़ रहा है. सोते-जागते, खाते-पीते, नहाते-धोते , हंसते-नाचते, घूमते-वऊआते कभी भी सेल्फी लेने की प्रबल इच्छा के आगे इंसानों ने घुटने टेक दिए हैं. इससे पता चलता है कि सेल्फी और मृत्यु का कोई वक्त-मुहूर्त नहीं होता है. आए दिन इन दोनों के एक साथ आने की भी खबर आती रहती है.

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आजकल अवार्ड-वापसी पर पसरे बहस को ध्यान में रखते हुए ये साफ़ करना महाजरूरी है कि असहिष्णुता के इस दौर में भी सेल्फी सबसे सहिष्णु है. वो इसलिए कि सेल्फी लेने के क्रम में सेल्फी-संतप्त सज्जन चाहे अपने थूथने और नाक की नक्काशी नेस्तनाबूद कर अपने मुखमंडल का बरमूडा ट्रैंगल बना ले या दोनों नेत्रगोलकों (आई-बॉल) को परस्पर अधिककोण पे रख अपनी भौंहों को ऊर्ध्वाधर उंचकाते हुए चेहरे का मानचित्र कितना भी बिगाड़ ले, सेल्फी स्वेच्छा से सबकुछ स्वीकार कर लेता है.

ये एक रोचक जानकारी है कि सेल्फ़ी में कैद मानव शरीर भले ही नश्वर हो परंतु सेल्फी शाश्वत है. इसे शाश्वत बनाने में स्मार्ट फोन निर्माताओं ने महती भूमिका निभाई है। इन्होंने सेलफोन में उत्तम किस्म के अग्रकैम उपलब्ध कराने के साथ उसमें उपलब्ध स्टोरेज स्पेस में भी उत्तरोत्तर वृद्धि की ताकि उसमें सुगमता से सेल्फी-संग्रहालय स्थापित किया जा सके। उप्पर से फोटो-एडिटिंग एप्प के सृजन ने सेल्फी-सुधार-संसार में ऐसी श्वेत क्रांति ला दी कि दसों दिशाओं में सेल्फी की नदियां बहने लगीं.

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आलम ये है कि लोग एक सांस में लगातार कई सेल्फी खींच रहे हैं और कुछ तो सांस से ज्यादा सेल्फी खींच रहे हैं। कठिन परिश्रम के पश्चात् खुदा न खास्ते एकाध सेल्फी संतोषजनक निकल आती है तो पट्ठा उस दुर्लभ सेल्फी को ऐसे संभाल कर रखता है जैसे वह सेल्फी नहीं टीपू सुल्तान की तलवार हो। गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड के साथ वाली सेल्फी को तो लोग ऐसे छुपा कर रखते हैं जैसे सेल्फी न हो स्विस बैंक में जमा काला धन हो। और सेल्फी किसी सेलिब्रिटी के साथ ली गयी हो तो ओ हो हो.... उसे ऐसे सहेज कर रखा और वक्त-वक्त पे झमकाया जाता है जैसे दहेज में मिली सोने की सिकड़ी हो।

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युवाओं का लगभग युगधर्म बन गया है सेल्फ़ी। ये तो आपने भी महसूस किया होगा कि सेल्फी और सोशल मीडिया के बीच अन्योन्याश्रय संबंध है। काहे से कि सोशल मीडिया माइनस सेल्फी विल बी लाइक केजरीवाल माइनस रायता। सेल्फी भी सोशल मीडिया के बिना सेलफोन में पड़े-पड़े सड़ जायेंगे, नहीं ? वैसे सेल्फी पे चर्चा हो और सेल्फी-स्टिक का जिक्र न हो तो बेमानी होगी। सेल्फी क्रिया को सुगम और सरल बनाने में सेल्फी-स्टिक का अविस्मरणीय योगदान है। सटीक सेल्फी लेने के दौरान हुई परेशानियों को पस्त करने के उद्देश्य से किसी सेल्फी-विज्ञानी ने इसका आविष्कार किया। जी हाँ, आसान भाषा में समझना चाहें तो व्हाट बुढ़ापे की लाठी इज़ टू ओल्डीज, सेल्फी-स्टिक इज़ टू सेल्फीज।

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सेल्फी के कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक सरोकार भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना मोदी जी और कैमरे के बीच में आने जैसा जकरबर्गीय अपराध होगा। आप माने ना मानें मगर सेल्फी के बगैर भारतीय डिप्लोमेसी जीरो बटा लुल है। प्रधानमंत्री जी के प्रत्येक मासिक विदेशाटन के दरम्यान विभिन्न देशों के प्रधान सेवकों के साथ ली गयी सेल्फी से इस तथ्य की पुष्टि होती है। तभी विदेशों से निवेश आये न आये दुई-चार ठो सेल्फी तो जरूर आती है। देश में भी सेल्फी के सहारे बेटियों और माताओं (ऑफ कोर्स गौ माताओं) को बचाया-बढ़ाया जा रहा है।

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इतना ही नहीं, एक आंकड़े के मुताबिक भारत को स्वच्छ बनाने वाले अभियान में देशवासियों से ज्यादा उनके सेल्फियों ने योगदान किया है। अगर कोई व्यक्ति भुजाओं में भाला सदृश झाड़ू उठाये, भारत को स्वच्छ बनाने की भीष्म प्रतिज्ञा टाइप मुद्रा बनाये अपनी सेल्फी न ले तो उसका यह भगीरथ प्रयास सफल होता प्रतीत नहीं होता। सेल्फी के अलौकिक और अनगिन फायदों को देखकर स्वर्गलोक के पंतप्रधान इंद्र भी सोच रहे होंगे कि काश ये सेल्फी चीज विश्वामित्र के टाइम में भी रही होती तो उनका ध्यान भंग करने के लिए मेनका, रंभा इत्यादि अप्सराओं के शिष्टमंडल भेजने का खर्चा बच जाता।

बहरहाल ऐसा भी नहीं सेल्फी के साथ सबकुछ ठीक चल रहा है। जैसा सदैव से होता आया है कि जब भी कोई चीज लोकप्रिय हो जाए तो उसके भतेरे आलोचक भी आकाश से अकस्मात् टपक जाते हैं और उसके खिलाफ रिरियाना चालू कर देते हैं। सेल्फ़ी के साथ भी यही हुआ है। एक संस्था ने अपने शोध में ज्यादा सेल्फी लेने वाले लोगों को मनोरोगी बताया है। मुझे ये एंटी-सेल्फी संस्कृति लोगों का डिजिटल इंडिया के नेटीजनों को आत्ममुग्धता के स्तर पर ईबीसी बनाये रखने का षड्यंत्र प्रतीत होता है। अतः हम इनके इस झांसे में ना आएं और जनसंख्या की तरह सेल्फी-संख्या में भी सतत वृद्धि करें। भारत सरकार भी पंचवर्षीय योजनाओं में सेल्फी को शामिल कर प्रधानमंत्री सेल्फी-संतुष्टि जैसे कार्यक्रम शीघ्र शुरू करे।





















