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'CAG को देश के अंदर की जानकारी लीक करने का कोई हक नहीं है'

ट्रेन के खाने पर भी उसकी रिसर्च कुछ खास नहीं है.

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फोटो - thelallantop

vineet singh विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. आजकल मुंबई में रहते हैं और वहीं से दुनिया देख रहे हैं. अपने देखे सुने का तमाम एक्सपीरिएंस लल्लन के साथ भी बांटते हैं. अपने दोस्त मकालू से परेशान रहते हैं, उसके किस्से भेजते हैं. आप भी पढ़िए.

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आज मेरा दोस्त मकालू मिला. मछली मारने वाले कांटे के साथ. मैं फिर दोहरा दूं कि मैं उसे बिल्कुल ही पसंद नहीं करता. बोला- गुरू ये CAG कोई विदेश की संस्था है क्या? मैंने कहा- बेवकूफ ही रहोगे, ये भारत की एक स्वायत्त संस्था है. बोला- लेकिन तुम्हें नहीं लगता कि अपने देश को बदनाम कर रही है ये संस्था? कैसे? बोला- जब देखो सिर्फ खामियां निकालती रहती है. यहां माहौल इतना गरम है. चीन और पाकिस्तान को हमने टीवी डिबेट करके डरा रखा है और ये महाराज गा रहे हैं कि देश में दस दिन से ज्यादा लड़ाई करने के लिए गोला बारूद नहीं है. ये तो गलत है ना. गलत क्या है? मैंने कहा- इस संस्था का काम ही है सरकारी उपक्रमों का आडिट करना और उनकी सच्चाई देश के सामने लाना. बहुत जिम्मेदारी का काम है. कोई हंसी खेल नहीं है. मकालू बोला- गुरु माफ करना लेकिन ट्रेन का खाना खाने लायक नहीं है. ये पता कर के कौन सा आविष्कार किया है CAG ने? इतनी सी बात तो मेरी चाची से पूछ लेते तो वो भी बता देती. और ट्रेन वाली चाय की तारीफ करते ही पचास गालियों के साथ स्पेशल फीडबैक भी देती, अब ये हंसी मजाक ही तो है. मुझे गुस्सा आ रहा था. मैंने कहा- मकालू तुम जब भी मुंह खोलते हो, कूड़ा ही उगलते हो. थोड़ा बहुत पढ़ लिख लेते तो इतनी बेतुकी बातें नहीं करते. CAG का फुल फॉर्म भी जानते हो? मकालू बोला- गुरु बुरा ना मानो, दरअसल CAG से सिर्फ देश की बुराई सुना तो गलतफहमी हो गई. लगा किसी और देश की खुफिया एजेंसी है. और इंटरनेट पर भी कोई जानकारी नहीं मिली. मैंने बहुत खोजने की कोशिश की. मैंने कहा- अब तुम मुझे बेवकूफ बना रहे हो, गूगल पर क्या नहीं मिलता, सारी जानकारी उपलब्ध है. मकालू बोला- गुरू मेरा "सोर्स आफ इनफार्मेशन" सिर्फ फेसबुक और व्हाट्सऐप है. गूगल नहीं, और जहां तक पढ़ने की बात है तो मैं इकॉनमिक्स, हिस्ट्री, साइंस वगैरह पढने में टाइम वेस्ट नहीं करता. अपने काम भर की जानकारी नेताओं के फैन पेज या फैन ग्रुप्स से मिल जाती है. मैं समझा नहीं. मकालू बोला- समझाता हूं, फेसबुक पर चले जाओ और वहां I support Narendra Modi पर मोदी के बारे में, I support Arvind Kejriwal पर केजरीवाल के बारे में, और I support Indian national Congress पर राहुल गांधी के बारे में सारी जानकारी मिल जाती है, ऐसे ही पत्रकारों के भी फैन पेज हैं फेसबुक पर, वहां से भी बहस करने भर का मसाला जुटा लेता हूं. मैंने कहा- पहली बात भारत में इनके अलावा भी राजनीतिक दल हैं और दूसरी बात तुम्हें नहीं लगता कि फैन पेज पर खबरों के एकतरफा होने की संभावना ज्यादा होती है. वहां तो सिर्फ तारीफ ही मिलेगी. मकालू चिढ़ गया और जाते हुए बोला- ज्यादा ज्ञान मत ठेलो, जरुरी है कि अपने ही संस्थाओं और नेताओं के लिए नकारात्मक बातें कहीं जाएं और घूम घूम शिकायत किया जाए. लेकिन सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें करने से भी तो किसी का भला नहीं होने वाला - मैंने समझाने की आखिरी कोशिश की. मकालू भड़क गया- गुरु हर जगह तुम्हारी पिपीहिरी नहीं बजेगी, मेरा जो जी में आएगा मैं वो करूंगा. गलती हो गई मुझसे, मैंने बात बदलने के लिए पूछा- अच्छा मछली मारने जा रहे हो क्या बोला- नहीं, घर में मच्छर बहुत हो गए हैं. उनकी वजह से बेटे को डेंगू हो गया है, उन्हें पकड़ने जा रहा हूं. लेकिन मछली मारने के कांटे से? मकालू गुस्सा गया- फिर शुरू हो गए नकारात्मक सोच के इंसान. तुम देखना सबको पकड़ कर रहूंगा और तुम्हारे लिए एक मुफ्त की सलाह दे रहा हूं - कभी-कभी लोगों की मंशा भी देख लिया करो. हर बात में कुछ ना कुछ निगेटिव खोज लेते हो. मकालू मुझे झिड़क कर चला गया और अब मैं फेसबुक पर नेताओं के फैन पेज खोज रहा हूं.
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