
नेट पर प्रैक्टिस के दौरान संजय बांगड़ और वीरेंद्र सेहवाग
रेलवे की रणजी टीम को क्रिकेट सितारों के बिना भी घरेलू क्रिकेट की शक्तिशाली टीम बनाने वाले संजय बांगड़ ने बैटिंग कोच का ये पद यूं ही और एक दिन में नहीं पाया है. क्रिकेटर के तौर पर एक-दो यादगार जौहर दिखाने वाले संजय बांगड़ ने कोच के तौर बड़ी पारी की शुरूआत की आईपीएल से. आईपीएल में पहली बार डेक्कन चार्जर्स के साथ, दूसरी बार कोलकाता नाइट राइडर्स के साथ. आईपीएल-2 साउथ अफ्रीका में हुआ थी. कोलकाता ने खर्चे से बचने के लिए इन्हें वापस भेज दिया. कहा तो ये भी गया कि इससे टीम के कुछ खिलाड़ी नाराज़ हो गए. लेकिन, कोच के तौर पर असली उदय हुआ किंग्स इलेवन पंजाब के साथ. 2014 में संजय बांगड़ पंजाब को लीग के पेंदे से फाइनल तक ले गए.
भारत के टेस्ट विकेटकीपर रिद्धिमान साहा को तराशने में सबसे बड़ा योगदान संजय बांगड़ ने ही दिया. साहा चेन्नई की टीम से खेलते थे. धोनी के होते हुए उन्हें कौन मौका देता. संजय बांगड़ ने देखा और किंग्स इलेवन पंजाब ले आए. उस वक्त पंजाब से खेल रहे वीरेंद्र सेहवाग से भी जब ये पूछा गया कि पंजाब टीम के चौंकाने वाले प्रदर्शन का श्रेय किसको देंगे. जबाव था- संजय बांगड़.
सही खिलाड़ियों का सेलेक्शन, खिलाड़ियों को आज़ादी से खेलने का मौका देने के लिए कोच को तेंदुलकर कम और मैनेजर ज्यादा होना चाहिए. ऐसा भी नहीं है कि संजय बांगड़ एक नाकाम क्रिकेटर रहे हैं. दिक्कत ये है कि हम सिर्फ इंटरनेशनल क्रिकेट देखते हैं और टीवी पर जो खेले, उसी को खिलाड़ी मानते हैं. 165 फर्स्ट क्लास मैचों में 8349 रन और 300 विकेट कम नहीं होते. और अपने छोटे से इंटरनेशनल करियर में भी संजय बांगड़ ने एक-दो यादगार जौहर दिखाए थे.
2002 इंग्लैंड दौरा. तीसरा टेस्ट. इंग्लिंश कंडिशंस और सीमिंग पिच. भारत के पास तब ओपनर नहीं होते थे. संजय बांगड़ को ओपनिंग के लिए कहा गया और बांगड़ ने 296 मिनट डटकर बल्लेबाजी की. 68 रन बनाए और नई गेंद की चमक उधेड़ डाली. इसके बाद आई सचिन-द्रविड़-गांगुली की त्रिमूर्ति ने शतक जड़ा और भारत ने इंग्लैंड में ऐतिहासिक जीत दर्जकी.

दूसरा मौका था उसी साल मोतेरा में. वेस्ट इंडीज के खिलाफ चौथा वनडे मैच. भारत 324 रन के पहाड़ से लक्ष्य का पीछा करते हुए 38 ओवरों में 231-5 पर था. तब आए बांगड़. उस ज़माने में वेस्ट इंडीज़ के गेंदबाज़ों और भारत के दर्शकों को अचंभे में डालते हुए 41 गेंदों में 57 रन ठोक डाले और भारत आसानी से मैच जीत गया. महाराष्ट्र में बीड़ के पास एक छोटे से गांव में जन्मे संजय मूलत: एक गेंदबाज़ थे जो उन्हीं के शब्दों में 'मार-तोड़ के बल्लेबाज़' बना दिए गए. बल्लेबाज़ भी ऐसे कि नंबर 1 से 7 तक कहीं भी खिला लो.
खेलों की दुनिया हर बार रहमदिल नहीं होती. हमेशा और हर खिलाड़ी के साथ पूरा-पूरा न्याय हो, ऐसा संभव नहीं है. सिर्फ 11 खिलाड़ी खिलाने की हद में. कई बार वो खिलाड़ी भी बाहर हो जाते हैं जो किसी से भी पौने एक नहीं होते और फिर भुला दिए जाते हैं. धोनी पहले 4 मैचों में कुछ नहीं कर पाए, फिर चमके. मुरली कार्तिक अपने आखिरी मैचों में अच्छा खेल कर भी वापसी न कर पाए.
संजय बांगड़ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. भारत के लिए दूसरे कपिल देव यानी फास्ट बॉलिंग ऑलराउंडर की उम्मीद की तरह आए बांगड़ एक बार बाहर हुए तो फिर वापसी नहीं कर पाए. वापसी हुई तो कोच के तौर पर. सोचने वाले सोच सकते हैं विराट को कोई अब क्या बैटिंग सिखाएगा, लेकिन एक अच्छा स्कूल मास्टर बच्चों को वो चीज़ें ज़्यादा बेहतर सीखा पाता है जो बड़े-बड़े साइंटिस्ट नहीं सिखा सकते. लॉजिक तो ये भी है.
अपनी पत्नी के साथ संजयसंजय बांगड़ को जन्मदिन की हार्दिक बधाई. कोचिंग में झंडे गाडें. और वैसे संजय बांगड़ किसान तो हैं हीं. इनके पास दो-दो खेत हैं. क्रिकेट की इतनी यादें होंगी, लेकिन सबसे मधुर यादें खेतों की ही बताते हैं.










