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सिंधु बनाम सायना : कुछ खट्टा सा मीठा

दोनों में तीन मैच हुए हैं और तीनों बार सायना आसानी से जीती हैं

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फोटो - thelallantop

अगर पीवी सिंधु और सायना नेहवाल हॉन्गकॉन्ग सुपर सीरीज़ के सेमीफाइनल में खेलतीं तो ये 4था मौका होता जब भारतीय बैंडमिंटन की 2 ध्वजवाहिकाएं एक-दूसरे के आमने-सामने होतीं. पिछले तीनों मैचों में सायना नेहवाल ने सिंधु का आसानी से हरा दिया था.  बैडमिंटन में पी वी सिंधु के उदय के साथ वो बहस शुरू हो गई जो नहीं ही होनी चाहिए थी. सिंधु और सायना में कौन बड़ी खिलाड़ी है?

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स्टार खिलाड़ी भी अपने साथियों के साथ कभी गुड़ जैसे मीठे और कभी इमली जैसे खट्टे होते हैं. क्रिकेट में धोनी-सहवाग, गंभीर-कोहली के बारे में कभी-कभी एक म्यान में दो तलवारें फिट नहीं बैठती वाली बात हुई है.

ओलंपिक में ज़ल्दी बाहर होने के बाद बहुत सारे लोगों के लिए सायना नेहवाल ‘बीते कल की खिलाड़ी’ हो गईं. लेकिन कम ही लोगों को पता था कि वो पैर की चोट के साथ दवा-पानी लेकर खेल रही थीं. चोट के कारण लगातार बाहर होने के बावजूद सायना नेहवाल अभी भी रैंकिंग में नंबर 11 पर हैं. सिंधु की रैंकिंग नंबर 9 है.

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एक ही कोच के साथ और एक ही मैदान में ट्रेनिंग लेने के बावजूद सिंधु और सायना में कोई गहरी दोस्ती नहीं हो पाई. सिंधु के वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के ठीक बाद सायना नेहवाल ने गोपीचंद की अकेडमी छोड़ दी और बैंगलुरू में कोच विमल कुमार के साथ ट्रेनिंग शुरू कर दी. गोपीचंद के साथ कोचिंग छोड़ने का शायद एक कारण ये था कि गोपीचंद नए खिलाड़ियों की पूरी फौज तैयार करने में ज्यादा व्यस्त थे और टॉप लेवल पर सायना को ज्यादा ‘इंटेंसिव कोचिंग’ की ज़रूरत महसूस हुई.

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2013 के बाद सिंधु लगातार बेहतर होती गईं और सायना चोट की वजह वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाईं. इसी दौरान दोनों 2014 में सैय्यद मोदी इंटरनेशनल के फाइनल में पहली बार किसी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में आमने-सामने थीं. इस मैच को सायना ने सीधे गेमों में जीत लिया. कुछ समय के लिए इस बहस पर रोक लग गई कि सायना-सिंधु में कौन बेहतर है.

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खेल के लिहाज़ से सायना-सिंधु एकदम अलग हैं. सिंधु को लंबाई का फायदा मिलता है तो सायना हैदराबाद के ही वीवीएस लक्ष्मण की तरह बैडमिंटन में कलाईओं से शानदार फ्लिक लगाती हैं. सिंधु अचानक से पोइंट निकालती हैं तो सायना पोइंट को धीरे-धीरे बनाकर निकालती हैं.

सायना नेहवाल ने सिंधु के साथ अपनी प्रतिद्वंदता पर एक बार कहा था, ‘अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों से दोस्ती होना मुश्किल है, ये सही है कि हम साथ-साथ ट्रेनिंग करती हैं और आए दिन एक-दूसरे से बात होती है लेकिन हमारे पास अच्छे दोस्त बनने का समय नहीं होता. कई बार तो घरवालों से बात करने का भी समय नहीं होता. वह अब एक बड़ी खिलाड़ी बन गई है. मुझे इस बात की खुशी है. मुझे पता है हम दोनों ही भारतीय हैं और लोग हमारे मैचों के बारे में दिलचस्पी लेते हैं.’

सिंधु सायना को अपनी प्रेरणस्रोत मानती हैं. सिंधु का कहना है, ‘तुलनाएं होती रहेंगी. लेकिन कोर्ट से बाहर हम सामान्य दोस्तों की तरह हैं. मैदान पर हम सिर्फ जीतने के लिए खेलती हैं.’ सबसे ज्यादा नंबर लाने वाला बेस्ट माना जाए, तुलना की जाए यहां तक तो बात ठीक है लेकिन किसी एक की हार को दूसरे की जीत मानना और सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप बकना गड़बड़ कर जाता है.

आप सायना और सिंधु में से किसी एक को बेस्ट मान सकते हैं. एक ने बैडमिंटन को लोकप्रिय बनाया और दूसरी ने उस लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी. एक के पास तज़ुर्बा है और दूसरी के पास अभी और बेहतर होने के लिए काफी समय है. क्यों न इन दोनों छोरियों की कामयाबियों का उत्सव मनाएं हैं, ओलंपिक बैडमिंटन में मेडल लाकर दोनों ने वो कारनामा किया है जो भारत के पुरूष बैडमिंटन खिलाड़ी अभी तक नहीं कर पाए हैं.

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