
बीबी हूं जी, हॉर्नी हसीना नहीं
हर रात तेल और मसालों की बू से लबालब इस हरारत भरे बदन को बिस्तर तक पहुंचाते हुए अपने दिलो-दिमाग पर जमी औरताना किचकिच को साफ करती चलती हूं. माफी चाहती हूं कि आज भी तुम अपने बिस्तर पर हॉर्नी हसीना की जगह बहस के लिए पिल पड़ती बेस्वाद बीवी ही पाने वाले हो.
बीवी जो जिस्म नहीं रह गई, जुनून नहीं रह गई. बस एक थुलथुले, लिजलिजे गोश्त में तब्दील हो चुकी है. बीवी जिसके बदन में नजाकत और शरारत भरी कामुक शिरकतों को महसूस करने की कवायद में मनहूसियत ही हाथ लगा करती है.
(पतनशील पत्नियों के नोट्स किताब का एक अंश)

बस्टी ब्यूटियों का तिलिस्म
जिस मुल्क में देवियों तक को भरपूर उभारों और गोलाइयों वाले उरोजों के साथ रचा गया हो, वहां बेहाल और ऊलजुलूल अनुपात वाली छातियों की मालकिन होने का जुर्म छोटा नहीं हो सकता है. सच कहूं तो मैं किसी ऐसी औरत से मिलने को बेताब हूं जो अपनी छातियों की दरार में बेशर्म हकीकत बनकर उभरती झुर्रियों की झलक से परेशान न होती हो. जो अपने सीने पर पसरते हुए सफेद धारियों के जंगली जाल से खौफ न खाती हो.
(पतनशील पत्नियों के नोट्स किताब का एक और अंश)
अगर किसी की पत्नी ऐसा बोले तो हिंदुस्तान के समाज में ये कुफ्र ही माना जाएगा. क्योंकि आम तौर पर हमारे समाज में औरतों की चुप्पी ही उनका एक्जिस्टेंस मानी जाती है. अगर बोलें तो सोशल ऑर्डर के टूटने का खतरा मंडराने लगता है. ये तो मानी हुई बात है कि हर किसी को बीवी एक रबर बैंड की तरह चाहिए. जैसे चाहिए, खींच लीजिए. दिन भर काम कराइए, फिर कहीं कोने में डाल दीजिए. पर रात में बीवी हॉर्नी हसीना ही होनी चाहिए. कितने ऐसे केस आते हैं जिसमें थुलथुल पति अपनी पत्नी से एक्रोबैट वाले करतब करने को कहता है. ना करने पर मार-पीट सब हो जाती है. फिर पति अपना अधिकार भी छीन के लेता है. क्योंकि मैरिटल रेप का कॉन्सेप्ट तो है नहीं इंडिया में. कॉन्सेप्ट तो पीरियड का भी नहीं है. औरत के अलावा कोई नहीं जानता कि उसे पीरियड आ रहे हैं.
ये बातें एक लड़की कह रही है
औरतों की इन सारी बातों को नीलिमा चौहान लिखकर लाई हैं अपनी किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स में. वाणी प्रकाशन से आई है ये किताब. 200 पेज की किताब में 49 चैप्टर हैं. हॉर्नी हसीना से शुरूआत होती है. ब्रा, लस्ट, तीस घटा पांच यानी पीरियड, सब पे बात होती है. शुक्रिया भी अदा किया गया है अंत में.
नीलिमा चौहान
किताब में दो खूबसूरत चीजें हैं- भाषा और मुद्दे. हिंदी और उर्दू मिक्स कर बड़े ही खूबसूरत अंदाज में बातें कही गई हैं. स्पष्टता से. फिर कोई मुद्दा छोड़ा नहीं गया है. हर चीज पर बात की गई है. एक चीज का खास ख्याल रखा गया है. बिना किसी के दिमाग पर दबाव डाले सारी बातें कह देना. शायद इसी के लिए उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया गया है.

क्योंकि सिर्फ हिंदी भाषा इस्तेमाल करने से कंटेंट के सीरियस होने का खतरा था. तब ये किताब 'स्त्री-विमर्श' के दायरे में आने लगती. पर पतनशील पत्नियां कहां विमर्श करना चाहती हैं. वो तो बस अपनी बात करना चाहती हैं. विमर्श आप करिए. उर्दू के शब्द ह्यूमर को एक एंगल दे देते हैं. एक अदब. एक तंज. मेरे ख्याल से बहुत मजबूती से प्रतिरोध जताने के लिए भाषा का ये इस्तेमाल बड़ा ही खूबसूरत होगा. शायद इसी वजह से शायर बड़ी आसानी से बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं.
इन बातों की खूबसूरती है कि लड़कियां खुद पर हंस रही हैं
अगर किताब के कुछ चैप्टरों के नाम ही देख लिए जाएं तो पता चल जाता है कि पतनशील पत्नियां कुछ छुपाना नहीं चाहतीं. अगर मजाक के नाम पर मर्द अपनी हर बात कह सकते हैं तो औरतों को भी ये लक्जरी पब्लिकली मिले. बहुत लंबे वक्त से ये बना चला आ रहा है कि किसी भी पार्टी में कोई मर्द बड़े ही आराम से जोक्स क्रैक करने वाले की भूमिका निभाता है और औरतें यू आर सो फनी कह के ताली पीटती हैं. पर पतनशील पत्नियां के पास भी जोक्स हैं. दे आर ऑल्सो फनी. वो किसी पेडेस्टल पर नहीं रहना चाहतीं. ना ही किसी पेडेस्टल के नीचे. तो उनकी बातें भी हैं, कुछ यूं-1. तश्तरी में मादा लेखन. 2. शरीफजादियां नहीं होतीं शराबखोर. 3. घर वापसी. 4. शादी का मेहनताना. 5. मैं भी काफिर. 6. अय्यार जनानापन. 7. बराबर की छप्पनछुरी. 8. बीवियों के माशूक नहीं होते. 9. चूंकि बोरियत भी एक मर्दाना शै है. 10. बवाल ए जान ब्रा. 11. तीस घटा पांच. 12. जनाना लस्ट के लफड़े.
पर ये पूरी कहानी औरतों के एक खास वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है. ना तो ये कमर पर फेंटी बांध ईंट ढोने वाला वर्ग है, ना ही मर्सिडीज से निकल कर सीधा स्विमिंग पूल में छलांग लगाने वाला वर्ग है. ये छोटे शहरों का भी नहीं है. टियर 2 या टियर 1 के शहर के एक-डेढ़ लाख रुपये महीने की कमाई वाला वर्ग लगता है. जो आराम से जिंदगी बिता रहा है. इनके पास लाइफ तो है, कभी-कभी डल हो जाती है.
जो भी है, ये किताब बड़े ही प्यार से लिखी गई है. क्रूर मुद्दों को उठाकर. जिनको फेमिनिज्म का नाम सुन के कन्फ्यूजन हो जाता है, उनके लिए ये किताब प्राइमर का काम करेगी. जिन्हें मुद्दे पता हैं, उनके ज्ञान में इजाफा होगा. पर सबसे बड़ी बात है कि ये किताब औरतों का एक बहुत ही मजबूत पक्ष देती है. ट्रू फेमिनिज्म. कि औरतें मजाक कर सकती हैं. सेल्फ-डिप्रीकेटिंग ह्यूमर भी शामिल हैं उसमें. मतलब खुद पे हंस सकती हैं. उन्हें हर वक्त कॉन्शस रहने की जरूरत नहीं है. उन्हें कल्चर्ड होने का दिखावा नहीं करना है हर वक्त. जैसी हैं, उसमें कम्फर्टेबल हैं. मेरी नजर में ये चीज किसी भी औरत को सबसे ज्यादा मजबूत बना सकती है. विमर्श तो सिर्फ सरकार की पॉलिसी बनाने के काम आता है. पर औरतों का हंसना शुरू करना सबको विस्मय में डाल सकता है. आने वाले वक्त में ऐसी और किताबों की दरकार है.
कोई भी किताब या रचना किसी पॉइंट का द एंड नहीं होती. ये किताब भी उस दायरे से बाहर नहीं है. कहीं-कहीं ऐसा लगता है कि कुछ चीजें जल्दबाजी में लिख दी गई हैं. और अच्छा लिखा जा सकता था. पर लिखने वाले की नजर में शायद इतना पर्याप्त होगा.
कन्हैया कुमार की किताब बिहार से तिहाड़ का रिव्यू यहां देखिए. चेतन भगत की किताब का रिव्यू नीचे देखिए.
https://youtu.be/XMe5ZfP29mY
https://youtu.be/vOyDRKRsn40
बुकर प्राइज विनर किताब द सेलआउट, ट्विंकल खन्ना की किताब और कई दूसरी किताबों के रिव्यू यहां पढ़िए-











