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अगर शादियों में 'तुम तो ठहरे परदेसी' न बजे तो शादी नहीं हो सकती थी

इस संसार के नश्वर होने का दर्शन, इतने आसान शब्दों में अल्ताफ राजा से पहले किसी ने नहीं समझाया था.

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फोटो - thelallantop
दिल चाहता है फिल्म देखे हो? उसमें एक कैरेक्टर रहता है. स्टॉप वॉच जैसा. हर घटना का दिन, तारीख, घंटा, मिनट, सेकेंड याद रहता है उसे. फिल्म में उसका मजाक उड़ाया गया है. लेकिन असल जिंदगी में जो वैसा होना एडवांटेज है. कहा जाता है कि मेमोरी शार्प है तुम्हारी. अगर कुछ भी नहीं याद रख पाते तो घोंघा बसंत हो. खैर, चीजें याद कैसे रखते हो? बीते हुए साल कैसे याद रखते हो? सन 90 में पैदा हुए. 2004 में हाईस्कूल किया. 05 में पहली बार प्यार हुआ. 06 में पहला मोबाइल हाथ लगा. इसी तरह चीजें याद रखी जाती हैं. जैसे सन 96 में मैंने पहली बार हॉल में पिच्चर देखी थी. दिलजले. उसी तरह सन 1997 लोगों के मानस पटल पर अंकित है. दो क्रांतियां हुई थीं इस साल. राजा हिंदुस्तानी रिलीज हुई थी. जिसमें करिश्मा-आमिर का बारिश वाला किस सीन देखकर पूरी पीढ़ी में करंट दौड़ गया था. दूसरी अल्ताफ राजा. उनका पहला एलबम 'तुम तो ठहरे परदेसी.' इस एलबम को लेकर किंवदंतियां मशहूर हैं. जैसे महापुरुषों के बारे में हो जाती हैं. कि वो पानी छू लें तो रिफाइंड बन जाता है. आदमी छू लें तो म्यूटंट बन जाता है. उसी तरह कहा जाता था कि अगर शादियों में तुम तो ठहरे परदेसी गाना न बजे तो शादी नहीं हो सकती थी. न तिलक न बारात. द्वार पर से बारात लौट जाती थी. ऐसा जलवा था इस गाने का. इस एलबम का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है. सबसे ज्यादा ऑडियो कैसेट बेचने का. वही जिसमें दो छेद होते थे और उसको रिवाइज करने के लिए पेंसिल खोंस के सुदर्शन चक्र की तरह नचाया जाता था. हां जी, वही ऑडियो कैसेट. उसके आने के बाद एक सिलसिला बन गया था. गांव-कस्बे में जो अल्ताफ राजा के नए एलबम का कैसेट सबसे पहले लाता था, उसका भौकाल मिनी साइज के नवाब आसफुद्दौला सरीखा होता था. लेगेसी जुड़ी है भाई साहब अल्ताफ राजा के साथ. इन्होंने सन 97 में वो काम किया जो गांधी ने सन 47 में किया था. कैसे? अकबकाओ मत, बताता हूं. गांधी के बारे में कहा जाता है कि देश आजाद कराने में इनका सबसे बड़ा हाथ था. क्या था, वो इतिहास जाने. इन बहसों में न उलझो. तुम सुनो सन 97 की आजादी के बारे में. अल्ताफ भाई ने उस जमाने की स्कूली पीढ़ी को एक पीरियड की मार से आजादी दिलाई. याद करो उस खूंखार टीचर की शक्ल. जो तुम्हें खड़ा करके साल के सभी महीनों के नाम बताने को कहता था. तुम जुलाई से शुरू करके सितंबर पर अटक जाते थे. फिर वो टीचर तुमको कभी बेंच पर खड़ा करते थे, कभी मुर्गा बनाते थे. कभी डंडे से संटिया देते थे. ब्रिटिश राज का अत्याचार भी तो ऐसा ही था. फिर अल्ताफ राजा ने अपनी महीन, एकदम बारीक आवाज में गाकर रटवा दिए हर महीने के नाम.

जब तुमसे इत्तफाकन मेरी नजर मिली थी कुछ याद आ रहा है शायद वो जनवरी थी ............ बेकैफ था दिसंबर जज्बात मर चुके थे मौसम था सर्द उसमें अरमां बिखर चुके थे

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अल्ताफ राजा ने उस पीढ़ी को पाल पोस कर बड़ा किया है जिसके पास आईपॉड, स्मार्टफोन, टैब, MP3 प्लेयर जैसी चीजें नहीं होती थीं. इंटरनेट नहीं था, तो युवा 3G पर कैटेगरी वाइज पॉर्न सर्च कराने की बजाय नुक्कड़ की कैसेट वाली दुकान पर अल्ताफ के गाने सर्च करते थे. और उस दुकान को तुम म्यूजिक सेंटर कहकर बेइज्जत कर दो. मैं तो उसे पद्मनाभ मंदिर कहूंगा. भारत का सबसे अमीर मंदिर.

और फिर वो लास्ट लाइन वेद पुराणों की एक सूक्ति का स्थान पा गई थी. कि "लेकिन ये क्या बताएं अब हाल दूसरा है, वो साल दूसरा था ये साल दूसरा है." विपुल साहित्य तो इस एक अंतरे पर ही लिखा जा सकता है. इस संसार के नश्वर होने का दर्शन इससे पहले इतने आसान शब्दों में अल्ताफ राजा से पहले किसने समझाया था. कि साल के पहले महीने से शुरू हुआ प्यार लास्ट आते आते नष्ट हो गया. मानो प्यार न था रोमिंग में चल रहा प्रीपेड मोबाइल था. कब बैलेंस चुक गया, कुछ पता ही न चला. https://www.youtube.com/watch?v=3uTzfhqdcn8 आने के साथ ही अल्ताफ राजा आकाश में छा गए थे. इस एलबम के पीछे शपथ पिक्चर का वो गाना आया. "थोड़ा इंतजार का मजा लीजिए." इस गाने के बारे में फिर बात करेंगे. लेकिन इनके पहले एलबम और इस गाने में ही इनके फ्यूचर का क्लू था. ये अभी समझ लो. ये ऐसे परदेसी ठहरे कि अब कभी कभी किसी एक गाने में आ जाते हैं, मौसमी रिश्तेदार की तरह. अब बस इंतजार का मजा लेना बाकी रह गया है. इस क्रांतिकारी शेर के साथ अल्ताफ राजा को नमन.

इस शहरे नामुराद की इज्जत करेगा कौन हम भी चले गए तो मोहब्बत करेगा कौन इस घर की देखभाल को वीरानियां तो हों जाले हटा दिए तो हिफाजत करेगा कौन

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