जीडीपी क्या है, रियल और नॉमिनल में क्या फर्क है?
जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट. यानी एक फाइनेंशियल ईयर में देश में जो कुछ भी बना, बिका, उन सबका टोटल. इसमें चीज़ों से लेकर सर्विसेज तक शामिल होती हैं. यानी क्रिकेट की एक गेंद से लेकर फाइव स्टार होटल में अवेलेबल कमरों तक. सब कुछ जीडीपी का हिस्सा है.
रियल जीडीपी से ये पता चलता है कि किसी साल में चीज़ों और सर्विसेज का प्रोडक्शन कितना बढ़ा या घटा. इसके लिए एक साल को बेस इयर यानी आधार मान लिया जाता है. ऐसे समझिये. इस वक़्त 2011-12 वाला जो फाइनेंशियल ईयर है, उसे बेस माना जाता है. अब उसमें मान लीजिए 1000 रुपए वैल्यू की बिक्री हुई थी. वहीं 2018-19 में वो 1050 पहुंच गई. तो बढ़त का प्रतिशत रहा 5 फीसद. ये हुई रियल जीडीपी.
नॉमिनल जीडीपी ये मापती है कि प्रोडक्शन में और दामों में जो बढ़त हुई, उसके बाद इसका कुल आंकड़ कहां तक पहुंचा. यानी इसमें इन्फ्लेशन (मुद्रास्फीति) भी जुड़ जाती है. यानी नॉमिनल जीडीपी में से आप मुद्रास्फीति घटा दें, तो आपको रियल जीडीपी मिल जाएगी.
क्या ज़रूरत है इन दोनों की?
वैसे तो रियल जीडीपी ही देखकर लोग विकास का स्तर मापते हैं. कि वित्तीय साल इस बार कैसा रहा, आने वाला कैसा होगा. NSO का अनुमान ये है कि 2019-20 वाले वित्तीय साल में रियल जीडीपी 4.98 फीसद रहेगी. वहीं नॉमिनल जीडीपी 7.53 फीसद रहेगी. इन दोनों में 2.6 फीसद का ही फर्क है.
इसका सीधा मतलब ये है कि जो लोग उत्पादन और बिक्री में पैसा लगा रहे हैं, उन्हें उसका कोई ख़ास रिटर्न मिल नहीं रहा है. अगर नॉमिनल जीडीपी ज्यादा होती, तो इसका मतलब ये होता कि ज्यादा उत्पाद या ऊंची कीमतों से उत्पादकों को फायदा हुआ है. लेकिन आंकड़े इससे उलट कहानी बता रहे हैं.
2019 की जुलाई -सितम्बर की तिमाही में जीडीपी 4.5 फीसद तक गिर गई थी. (तस्वीर: इंडिया टुडे)दोनों जीडीपी कम हैं, इसका क्या मतलब है?
बजट के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ये माना था कि नॉमिनल जीडीपी 12 फीसद के आसपास रहेगी, जो कि इस वक़्त के अनुमान से कहीं ज्यादा है. इसका मतलब बजट को लेकर जो एस्टीमेट लगाया गया था, वो गड़बड़ा जाएगा.
इसे ऐसे समझिए. आपकी कपड़ों की एक दुकान है. उसके लिए आप कच्चा माल लाते हैं. सिलवाते हैं, फिर उसे बेचते हैं. कच्चे माल की कीमत आपकी जेब से गई. सिलाई वाले टेलर मास्टर का मेहनताना आपकी जेब से गया. अब आपका अनुमान है कि इस साल आपके 1500 सूट बिक जाएंगे, तो आपकी आमदनी 1.5 लाख हो जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं होता. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. लब्बोलुआब ये कि अनुमान के हिसाब से बिक्री नहीं हुई. आपके जेब से पैसे तो चले गए, लेकिन उस पर आपको कोई ख़ास आमदनी नहीं हुई. अब आपका बजट गड़बड़ हो गया. आपने सोचा था घर की पुताई करवा लेंगे. या बालक को स्कूटर दिला देंगे. लेकिन अब तो पैसे आए ही नहीं, तो काट-छांट कहीं और करनी पड़ेगी. ऐसा ही देश की कुल आमदनी के साथ भी हो रहा है.
12 फीसद की बढ़त होती तो नॉमिनल जीडीपी 211 लाख करोड़ होती. लेकिन मौजूदा दर पर ये 204 लाख करोड़ के आस-पास ही रह जाएगी. ये अच्छी खबर नहीं है. (तस्वीर: PTI)क्या ऐसा पहले भी हुआ है?
हां. 2001 से 2003 तक. लगातार तीन साल. उस समय NDA की सरकार थी केंद्र में. उन तीन बरस में नॉमिनल ग्रोथ क्रमशः 7.62 फीसद, 8.2 फीसद, और 7.66 फीसद रही थी. लेकिन उन तीन सालों में रियल जीडीपी भी बेहद कम थी. मौजूदा 4.9 फीसद से भी कम. इस वक़्त की जीडीपी फिर भी बेहतर स्थिति में है. पर नॉमिनल ग्रोथ 1975-76 के बाद अब तक सबसे निचले स्तर पर है. 75 वाले साल में ये 7.35 फीसद तक पहुंची थी.
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