बाएं दूरदर्शन के रामायण सीरियल में लक्ष्मण की भूमिका निभाते सुनील लहरी और दाएं आजकल टेलिकास्ट हो रहा वही पुराना रामायण देखते सुनील लहरी
'रामायण' के बाद अब 'उत्तर रामायण' सीरियल एक बार फिर लोगों को अपनी ओर खींच रहा है. लॉकडाउन में लोग अपनी साहित्यिक धरोहर को छोटे पर्दे पर फिर उतरता देखकर वैसे ही सम्मोहन में बंधे जा रहे हैं, जैसे तीन दशक पहले. फर्क बस इतना है कि तब 'रामायण' के वक्त कर्फ्यू लग जाता था, अबकी कर्फ्यू या लॉकडाउन के समय इसका प्रसारण हो रहा है. ऐसे में 'रामायण' से जुड़े कुछ रोचक सवाल लेकर
'दी लल्लनटॉप' पहुंचा 'लक्ष्मण जी' यानी
सुनील लहरी के पास. सुनील लहरी से वीडियो कॉल के जरिए 'दी लल्लनटॉप' की बातचीत का सार-संक्षेप हम आगे सवाल-जवाब के रूप में पेश कर रहे हैं.
लॉकडाउन में एक बार फिर से तीन-तीन पीढ़ियां साथ बैठकर 'रामायण' देख रही हैं. क्या आप ये सीरियल देखने का वक्त निकाल पा रहे हैं?
लॉकडाउन के दौरान इत्तफाक से मैं अपने घर पर अकेला ही हूं. इस वजह से 'रामायण' और 'उत्तर रामायण' देखने का समय निकाल पा रहा हूं. सीरियल की शूटिंग के दौरान तो इतनी व्यस्तता होती थी कि हम अपना ही काम ढंग से देख नहीं पाते थे. सारे कलाकार एक के बाद अगले एपिसोड की शूटिंग के जुट जाते थे. अभी ढंग से सारे एपिसोड देख रहा हूं.
क्या ऐसा लगता है कि कोई बाण होता, जो आप चलाते और कोरोना साफ हो जाता? कोरोना को लेकर 'लक्ष्मण जी' का क्या संदेश है देश के लोगों के लिए?
जैसा कि हमारे प्रधानमंत्री ने भी कहा है, कोरोना से बचना है, तो 'लक्ष्मण रेखा' के पार जाने की कोशिश कभी न करें. कोरोना रूपी 'रावण' आपको तभी पकड़ सकता है, जब आप इस रेखा को पार करेंगे. इसलिए सभी से मेरी अपील है कि लॉकडाउन में अपने-अपने घरों में रहें. क्वारंटीन में रहें. अपने हाथों को बार-बार ठीक से धोते रहें. साफ-सफाई रखें.
सोशल मीडिया पर 'लक्ष्मण-परशुराम संवाद' के कुछ वीडियो और मीम वायरल हो रहे हैं. लोग 'ठग लाइफ', 'लक्ष्मण एटीट्यूड कोट्स' और इस तरह की चीजें डाल रहे हैं. क्या आप तक भी ये मीम पहुंचे?
हां. ऐसी चीजें हम तक भी पहुंचती हैं. इनमें क्रिएटिविटी खूब होती है. मेरा मानना है कि इस तरह की प्रतिभा का इस्तेमाल सकारात्मक बातों के लिए होना चाहिए, न कि किसी को बेवजह नुकसान पहुंचाने के लिए.
कहा जा रहा है कि 'दूरदर्शन' ने इस बार 'रामायण' के प्रसारण में कुछ सीन काट दिए. जैसे, 14 साल बाद लक्ष्मण-उर्मिला के मिलने का प्रसंग. जब नाराज लोग आप तक शिकायत लेकर आते हैं, तो आप कैसे हैंडल करते हैं?
ये सच है कि लक्ष्मण-उर्मिला के मिलने का प्रसंग बहुत ही प्रभावी था. उन दोनों के बीच के संवाद मर्मस्पर्शी थे. लोग सोशल मीडिया से जरिए हम तक अपनी बात रखते हैं. मैं ये नहीं कह सकता कि किसी तकनीकी वजह से या फिर किसी और कारण से दूरदर्शन पर वो प्रसंग दिखाया नहीं जा सका.
ऐसा सुना है कि रामानंद सागर जी 'रामायण' के बाद 'उत्तर रामायण' बनाने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन बाद में कुछ प्रोटेस्ट के बाद इसके लिए तैयार हुए थे?
देखिए, अपना देश बहुत बड़ा है. यहां हर तरह के मत के लोग हैं. सबकी अच्छी भावनाओं का आदर होना जरूरी था. सबसे बड़ी बात ये कि देश-दुनिया के लोगों को 'रामायण' इतना ज्यादा पसंद आया कि वे इससे आगे 'उत्तर रामायण' की कहानी भी देखना चाहते थे. इन्हीं भावनाओं के कारण 'उत्तर रामायण' सीरियल बना.
रावण के पक्ष के किस एक शख्सियत ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया?
मेरी नजर में मंदोदरी. मंदोदरी ने न केवल रावण, बल्कि उसके राज्य के हित की बात बताई. इससे भी बढ़कर, उन्होंने नारी की गरिमा और इसकी रक्षा करने की बात की.
लक्ष्मण भी एक भाई हैं, विभीषण भी भाई हैं. 'लक्ष्मण जी' की नजर में विभीषण कैसे भाई हैं?
विभीषण वो भाई हैं, जिन्होंने सत्य और धर्म का पक्ष लिया. रावण ने उन्हें लंका से निकाल दिया था. ऐसे में उनके पास श्रीराम की शरण में जाने का ही विकल्प बचता था.
सीता जी वन जाती हैं, उर्मिला जी को अयोध्या के राजमहल में ही रुकना पड़ता है. आपकी नजर में किनका त्याग ज्यादा बड़ा है?
मेरी नजर में उर्मिला जी का त्याग बड़ा है. सीता जी को वन में श्रीराम का साथ मिला, लेकिन उर्मिला जी को 14 बरस तक अपने पति से वियोग का सामना करना पड़ा.
ऐसा पढ़ा है कि आपके पिताजी की इच्छा के अनुसार ही उनका पार्थिव शरीर अस्पताल को दान कर दिया गया था?
ये एकदम सही बात है. मेरे पिताजी डॉक्टर थे. मेडिकल कॉलेज में पढ़ाते थे. उन्होंने ये महसूस किया कि मेडिकल कॉलेज में छात्रों को डेडबॉडी की कमी की समस्या का सामना करना पड़ता था. एक-एक बॉडी पर 45-50 स्टूडेंट. पिताजी को यह कमी खलती थी. इसे ही देखते हुए उन्होंने अपना पार्थिव शरीर और अंगदान करने की इच्छा जताई थी. हमारे पूरे परिवार ने, सबसे आगे बढ़कर मेरी माताजी ने उनकी ये इच्छा पूरी की.
क्या लक्ष्मण जी की तरह आप भी क्रोध करते हैं या फिर असल जीवन में इससे अलग हैं?
वैसे मैं ज्यादा गुस्सैल नहीं हूं. मुझे कभी-कभी, किसी बात पर बस उतना ही गुस्सा आता है, जितना किसी सामान्य इंसान को आता है. मैं समझता हूं, कभी-कभी आप लोगों को भी गुस्सा आता होगा...
इस बातचीत के दौरान लक्ष्मण जी ने हर किसी को अपनी ओर से कामयाबी का मूलमंत्र बताया. उन्होंने कहा कि चाहे आप किसी भी फील्ड में हों, अगर सफल होना चाहते हैं, तो उस काम को पूरे समर्पण के साथ करें. उस काम को बेहतर बनाने के लिए अपना 100 फीसदी लगा दें. अगर ऐसा कर पाते हैं, तो ही आप कोई मील का पत्थर खड़ा कर पाएंगे.
इस पूरी बातचीत को यहां देखिए -