
2019 में सरकार बनाने के सबसे बड़े दावेदार हैं नरेंद्र मोदी
1. अगर आजकल चुनाव पैसे, 'मशीन' और मीडिया का खेल है, तो मोदी को बहुत बड़ा एडवांटेज है भारतीय चुनावों के इतिहास में मीडिया कभी इतना एकतरफा नहीं रहा, जितना आज है. न कभी सत्ता पक्ष के पास इतना खजाना रहा और न ही किसी सरकार की पार्टी मशीनरी कभी इतनी तगड़ी रही है, जितनी आज भाजपा की है. जहां एक तरफ भाजपा एक नई चमाचम फरारी की तरह है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस एक पुरातन, सेकंड-हैंड एंबेसेडर की तरह खड़ी है (राजनीतिक अड्डों में मौज ली जाती है कि कांग्रेस रईस नेताओं की गरीब पार्टी है). भाजपा ने पहले ही अपने प्रतिद्वंदियों को निचोड़ लिया है. अब इस लंबे चलने वाले चुनाव प्रचार में भाजपा का खजाना पहले ही बाकियों से बहुत भारी है.
2. मोदी भारत के नेता नंबर वन हैं चुनाव प्रचार में मोदी ने बिना थके एनर्जी दिखाई है. अच्छे प्रवक्ता हैं और पार्टी की छवि से बड़े उभरकर आते हैं. भाजपा की टैगलाइन 'मोदी है तो मुमकिन है' ने सरकार और मोदी के बीच का फर्क खत्म कर दिया है. ये 70 के दशक की बच्चन की उन फिल्मों जैसा है, जो खराब स्क्रिप्ट के बावजूद बंपर कमाई करती थीं. व्यक्तिवादी राजनीति के दौर में मोदी की 'लार्जर दैन लाइफ' इमेज ने भाजपा को ज़रूरी ताकत दी है. मोदी अकेले ही उतनी चुनावी रैलियां कर चुके हैं, जितनी उनके सभी विपक्षियों ने मिलकर भी नहीं की हैं. हां कभी-कभी लगातार चलती रैलियों और भाषणों से जनता का मोहभंग होता है, पर यह मोदी के प्रति गुस्से में नहीं बदल पाता. यहां तक कि हाहाकार मचाने वाली नोटबंदी से भी मोदी की मज़बूती पर कोई असर नहीं पड़ा. मोदी की ध्यान से गढ़ी गई कर्म-योगी की छवि अब भी वैसी ही है. बालाकोट को इस छवि के सबसे नए उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है.

अमिताभ बच्चन और नरेंद्र मोदी
3. अमित शाह की इलेक्शन-इंजीनियरिंग 2014 में, अमित शाह उत्तर प्रदेश के इंचार्ज थे. वो राज्य जहां उन्होंने शानदार रिजल्ट दिया था. अब 2019 में, शाह पार्टी प्रेसीडेंट हैं. पूरे भारत में भाजपा के इंचार्ज हैं. भारतीय राजनीति में कोई 'वन साइज, फिट्स ऑल' मॉडल नहीं है. शाह के ही नेतृत्व में भाजपा को 2015 में बिहार और दिल्ली में बड़ी हार झेलनी पड़ी थी. लेकिन अमित शाह जीत के लिए साम, दाम, दंड, भेद, सभी कुछ के लिए तैयार रहते हैं. उनके लिए तरीके से ज्यादा मायने रखता है रिजल्ट. उत्तर प्रदेश में ही देख लीजिए. जिस तरह शिवपाल यादव के गुट जैसे छोटे गुटों को विपक्ष के खिलाफ तैयार किया जा रहा है या जैसे पब्लिक वॉर्निंग के बाद भी शिवसेना को वापस मिला लिया गया. इसके साथ ही भाजपा के पास संघ परिवार की वजह से बूथ लेवल तक कार्यकर्ताओं का संगठन है और आखिरी मील तक कनेक्टिविटी है.

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ अमित शाह
4. कांग्रेस की स्थिति तीन हिंदी-भाषी राज्यों में जीत के बाद भी पिछले तीन महीनों में कांग्रेस कोई लहर नहीं बना पाई है. एक तरफ मोदी सरकार ने तेजी से कदम बढ़ाकर अपनी कमियों में सुधार किया है. किसानों, सवर्णों और उद्योगों के लिए स्कीमें लेकर आई है. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेसी कार्यशैली में कोई खास बदलाव नहीं आया है. पारिवारिक कलहों की खबरों और खराब डिसीजन-मेकिंग के चलते कांग्रेस सत्ता में आने का मौका खोती नज़र आ रही है. शायद विधानसभा में जीत के बाद कांग्रेस ढीली पड़ गई. या फिर इस रिजल्ट को गलती से मोदी-विरोधी लहर मान लिया गया. महाराष्ट्र जैसे राज्य, जो कांग्रेस को वापस जिंदा करने में अहम हैं, वहां कांग्रेस में कोई सुधार नजर नहीं आ रहा है. सच तो ये है कि कांग्रेस का मरीज ICU से तो निकल गया है, पर अब भी खास देखरेख की ज़रूरत है.
5. राहुल गांधी का नेतृत्व राहुल गांधी अब भी एक मिस्ट्री ही बने हुए हैं. 2017 में गुजरात चुनाव में कड़े मुकाबले और दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद एक कैंपेनर के रूप में उनके कद में इज़ाफा ज़रूर हुआ है. लेकिन एक संगठन के नेता के तौर पर वे अब भी उभर कर नहीं आए हैं. उन्होंने कभी ममता या मायावती के साथ व्यक्तिगत तौर पर सामंजस्य बिठाने की कोशिश क्यों नहीं की, या टीम राहुल ब्रांड के युवा नेताओं को आगे क्यों नहीं बढ़ाया, ये आश्चर्यजनक है. उनका कैंपेन रफाल के इर्द-गिर्द ही रहा. ये एक दो-धारी तलवार जैसा है. एक तरफ ये कांग्रेस के अंदर ही मोदी की चौकीदार वाली इमेज का डर मिटा रहा है. तो दूसरी ओर किसानों और बेरोजगारी के मुद्दों से भटक भी रहा है, जहां मोदी सरकार को घेरा जा सकता है.

राहुल गांधी
6. महागठबंधन की पहेली विपक्ष अभी तक मोदी-विरोध के आगे कोई मुद्दा नहीं ढूंढ़ पाया है. न ही 'मोदी नहीं तो कौन?' वाले सवाल का जवाब दे पाया है. पहले का प्लान सारी 543 सीटों में एक कॉमन फ्रंट बनाकर लोकल लेवल पर चुनाव लड़ने का था. पर अब विपक्ष, उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्यों में भी वोटों के बंटने का रिस्क ले रहा है. यहां तक कि दिल्ली की सात सीटों में भी आप और कांग्रेस साथ नहीं आ सके. इससे ही विपक्ष के आपसी मतभेद साफ नज़र आते हैं. कांग्रेस को अब ये तय करना बहुत ज़रूरी है कि वो यह चुनाव खुद को जिंदा रखने के लिए लड़ रही है या भाजपा की सीटों को कम से कम में समेटने के लिए. मायावती जैसे क्षेत्रीय नेताओं को भी चुनाव के बाद के गठबंधन की संभावनाओं को छोड़कर, यह तय करना होगा कि वो किस तरफ खड़ी हैं.
7. भाजपा के आंकड़ों का खेल 2014 के चुनावों में भाजपा ने उत्तर और पश्चिमी भारत में अपना मैक्सिमम परफॉर्मेंस दिया था. करीब 90 प्रतिशत सीटों को जीतकर. इस तरह की जीत दोबारा हासिल करना आसान नहीं. फिर भी भाजपा 75 से 100 सीटों पर जीत हासिल कर सकती है. 2014 में भाजपा ने 3 लाख से ज्यादा के मार्जिन से 42 सीटें, 2 लाख के मार्जिन से 75 सीटें और डेढ़ लाख के मार्जिन से 38 सीटें जीती थीं. कुल-मिलाकर भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनने से तभी रोका जा सकता है, जब इन सीटों में बहुत बड़ा बदलाव आ जाए. अगर भाजपा 200 सीटों के आंकड़े को छू लेती है तो NDA 3 की सरकार का इंतजाम भी कर ही लेगी.
8. उत्तर प्रदेश अब भी भाजपा का ही चुनाव है विपक्ष ने सपा-बसपा गठबंधन का भी स्वागत किया था और प्रियंका गांधी के पदार्पण पर भी जोश दिखाया था. लेकिन बुआ-भतीजा गठबंधन की ज़मीनी हकीकत में उनके बीच की केमिस्ट्री ठीक नहीं है. इसपर कई सवाल हैं. क्या यादव वोटर बसपा को वोट देंगे? प्रियंका की एंट्री भी पॉलिटिकल बॉक्स ऑफिस पर फेल ही रही है.

प्रियंका गांधी के महासचिव बनने के बाद की तस्वीर
दूसरी तरफ भाजपा ने उत्तरप्रदेश में बहुत फिल्डिंग की है. गरीबों के लिए चलाई गई स्कीमें सभी जातियों को अपने साथ समेट रही हैं. अगर भाजपा 2014 में जीतीं 73 सीटों की आधी भी जीत लेती है, तो किसी और सरकार का आना बहुत मुश्किल हो जाएगा. 2019 का दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही जाएगा. इस करो या मरो की जंग में फिलहाल बस एक ही सेना तैयार ऩजर आ रही है.
9. पुलवामा, पाकिस्तान, बालाकोट एयर स्ट्राइक जय श्री राम से लेकर भारत माता की जय तक, बाबर की औलाद से लेकर पाकिस्तानी जिहादियों तक, भगवाधारी संतों से लेकर सेना की यूनिफॉर्म में खड़े जवानों तक. मोदी सरकार नेशनल सिक्योरिटी को राजनैतिक अभियानों में लेकर आ रही है. इस तरह के कैंपेन से शायद दक्षिण भारत के देहाती इलाकों में असर न पड़े, पर शहरी इलाकों और हिंदी बोलने वाले क्षेत्रों में इसका खासा असर पड़ सकता है.

पाकिस्तान को पाकिस्तान की भाषा में ही जवाब देने की बात करते हैं मोदी
10. नया युवा 'हिंदुत्व' वोटर निर्वाचन आयोग के अनुसार इस बार 8 करोड़ 40 लाख नए वोटर हैं, जो कुल वोटरों के 10 प्रतिशत से कम है. एक पूरी पीढ़ी है, जिसके ज़हन में बाबरी मस्जिद कांड और 2002 के दंगे नहीं हैं. यही युवा पीढ़ी है, जो मोदी के 'न्यू इंडिया' और 'मज़बूत सरकार' की माचो 'हाउज़ द जोश' वाली पिच से आकर्षित है. कश्मीर मुद्दे को एक बार और हमेशा के लिए सॉल्व करने और 'टफ ऑन टेरर' वाली बातों में इस पीढ़ी को अपील ऩजर आती है. याद रहे कि भाजपा का कोर वोटर, एक इस्लामिक मुल्क़ पाकिस्तान के साथ लड़ाई में मिलिटेंट-हिंदुत्व वाले इमोशन को भी खोज लेता है. जब तक विपक्ष 'किसान-नौजवान' अर्थनीति की बहस को नए सिरे से नहीं पेश करता, तब तक के लिए, नेशनलिज़्म की ताकत से चल रहे मोदी-रथ ने 2019 का मुद्दा सेट कर रखा है.
2004 में अटलजी ही प्रधानमंत्री पद के एकमात्र उम्मीदवार नजर आ रहे थे. उनके जीतकर आने की संभावनाएं 2019 में मोदी के जीतकर आने की संभावनाओं से कहीं ज्यादा थीं. फिर भी वो हार गए, क्योंकि दक्षिण के दो राज्य तमिलनाडु और आंध्र अपने सहयोगियों के विरुद्ध चले गए और उत्तरप्रदेश 'शाइनिंग इंडिया' के नारे को सार्थक नहीं कर पाया. स्टूडियो में बैठकर किए गए अनालिसिस गांवों की धूल में पस्त हो जाते हैं. भारत के मतदाता का स्वभाव लंदन के मौसम की तरह है. एवर-चेंजिंग.
ये स्टोरी राजदीप सरदेसाई द्वारा Dailyo पर लिखी स्टोरी
का अनुवाद है
























