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14 RT-PCR और 17 एंटीजन टेस्ट, 5 महीने से कोविड निगेटिव नहीं हुआ, क्या कहते है डॉक्टर?

महिला का एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेदिक इलाज किया जा रहा है, लेकिन कोरोना रिपोर्ट निगेटिव नहीं आ रही है.

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शारदा देवी भरतपुर के 'अपना घर आश्रम' में रहती हैं. पिछले पांच महीने से उनकी कोरोना की रिपोर्ट पॉजिटिव आ रही है. (फोटो-आज तक)
राजस्थान के भरतपुर से एक हैरान करने वाली खबर आई है. एक महिला पिछले 5 महीने से कोरोना संक्रमित हैं. आम तौर पर 14 दिन में कोरोना की रिपोर्ट निगेटिव आ जाती है. महिला का एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेदिक तरीके से इलाज किया जा रहा है, लेकिन उनकी कोरोना रिपोर्ट निगेटिव नहीं आ रही है. क्या है मामला? इंडिया टुडे से जुड़े सुरेश फौजदार की रिपोर्ट के मुताबिक, शारदा देवी बझेरा गांव की रहने वाली हैं. ये गांव भरतपुर जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर है, शारदा देवी यहां 'अपना घर आश्रम' में रहती हैं. यह आश्रम गरीब और बेहसहारा लोगों को आश्रय देता है. 4 सितंबर 2020 को पहली बार शारदा देवी की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी. तब से लेकर अब तक उनकी 31 बार जांच हो चुकी है. लेकिन हर बार कोरोना की रिपोर्ट पॉजिटिव आती है. मामला संज्ञान में आने के बाद महिला को इलाज के लिए जयपुर भेजने की बात हो रही है.
Rajasthan Woman आश्रम के एक कमरे में पिछले पांच महीने से क्वारंटीन शारदा देवी.

अपना घर आश्रम के निदेशक डॉक्टर बीएम भारद्वाज ने बताया,
शारदा देवी का 14 बार RT-PCR (रिवर्स ट्रांसक्रिप्ट पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन) टेस्ट हो चुका है. 17 बार एंटीजन टेस्ट हो चुका है. हर बार ये पॉजिटिव आ रही हैं. उन्हें देखने आए डॉक्टर का कहना है कि महिला के अंदर वायरस है, लेकिन एक्टिव नहीं है. इनएक्टिव फेज के वायरस से संक्रमण की संभावना कम होती है. लेकिन फिर भी आप उन्हें अलग रखें. इसलिए इन्हें अलग रखा जा रहा है, क्योंकि यहां पर इस समय 3100 से ज्यादा लोग हैं.
इस पूरे मामले को समझने के साथ ही ये जानने के लिए कि कोई व्यक्ति कितने दिनों तक कोरोना पॉजिटिव रह सकता है, क्या उससे संक्रमण फैल सकता है  या नहीं, हमने बात की नई दिल्ली Institute of Liver and Biliary Sciences की प्रोफेसर एकता गुप्ता से. वह वायरोलॉजी लैब की प्रोफेसर हैं.
कोई व्यक्ति कितने दिन पॉजिटिव रह सकता है?.
प्रोफेसर एकता गुप्ता ने बताया,
अगर हम कोरोना के RT-PCR टेस्ट की पॉजिटिविटी की बात करें तो वह काफी दिन तक रहती है. RT-PCR टेस्ट जिंदा वायरस और डेड वायरस का न्यूक्लिक एसिड भी एमप्लीफाई कर देता है. अगर RT-PCR के आधार पर पॉजिटिविटी देखना चाहते हैं, तो यह दो महीने तक दिख सकती है. लेकिन ये इंफेक्टिव होता है कि नहीं, इसके लिए लोगों ने वायरस का कल्चर करके देखा. कल्चर से जिंदा वायरस का पता चलता है. क्लचर स्टडी ने दिखाया है कि नाक और मुंह से लिए गए स्वाब में वायरस आठ दिन से ज्यादा जिंदा नहीं रहता है.
प्रोफेसर गुप्ता के मुताबिक कुछ लोगों में 60 दिनों तक कोरोना के लक्षण दिख सकते हैं. लेकिन ज्यादातर मामलों में लक्षण 10 दिन से ज्यादा नहीं रहता है.
महिला पांच महीने से कोरोना पॉजिटिव क्यों आ रही है?
प्रोफेसर एकता गुप्ता ने बताया,
इसके लिए बहुत सारी चीजें देखनी होंगी. महिला की बात करें, तो ये देखना होगा कि क्या वो इस बीच कभी निगेटिव हुईं कि नहीं? लगातार टेस्ट हो रहा है कि नहीं? जहां तक लक्षण की बात है, तो यह लोगों में सात से आठ दिन में तो कुछ लोगों में 15 दिन तक रहता है. देखने को मिला है कि कोरोना का वायरस 8-10 से ज्यादा जिंदा नहीं रहता है. इसके बाद जो भी वायरस मिला वह कल्चर में ग्रो नहीं कर पाया. मतलब उसके अंदर इनफेक्टिविटी नहीं रही. RT-PCR टेस्ट की पॉजिटिविटी की जहां तक बात है तो दो यह महीने तक देखने को मिली है. लोगों ने रिसर्च पेपर छापे हैं. हालांकि पांच महीने थोड़ा सा ज्यादा लग रहा है, लेकिन ऐसा हो भी सकता है. मुंबई के अस्पतालों की स्टडी आई है जहां लोगों ने रिइंफेक्शन देखा है. बीच में कभी निगेटिव हो गया फिर पॉजिटिव हो गया. हालांकि पांच महीने तक की पॉसिबिलिटी कम लग रही है. लेकिन हो भी सकता है.
क्या महिला संक्रमण फैला सकती है?
प्रोफेसर एकता गुप्ता ने बताया बताया,
नहीं ये बिल्कुल नहीं है. 8 से 10 दिन के बाद वायरस की इन्फेक्टिविटी नहीं रहती है. यानी संक्रमण नहीं फैल सकता है. पांच महीने वाला वायरस संक्रमित नहीं है. एक बहुत बड़ी स्टडी हुई थी जिसमें 13 हजार लोगों को शामिल किया गया. 500 लोगों को 60 दिनों तक फॉलो किया गया, ये देखने के लिए वो इन्फेक्टिव हैं कि नहीं. लेकिन आठ या 10 दिन के बाद उनसे संक्रमण का खतरा नहीं रहा.
वायरल लोड क्या होता है?
प्रोफेसर एकता गुप्ता से हमने ये भी जानने की कोशिश की कि वायरल लोड क्या होता है? उन्होंने बताया कि वायरल लोड का मतलब है वायरस का अमाउंट. शरीर में वायरस की एंट्री के बाद ये कोशिकाओं पर हमला करता है और एक तरह से फोटो कॉपी बना लेता है. ये प्रतियां धीरे-धीरे विकसित होती हैं और इस तरह मरीज़ के शरीर में कई वायरस पैदा हो जाते हैं. वायरस की संख्या को वायरल लोड कहते हैं. वायरल लोड जितना ज़्यादा होगा, किसी भी बीमारी की गंभीरता उतनी बढ़ जाएगी और मरीज़ के संक्रामक होने की आशंका भी उतनी ही बढ़ जाएगी.

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