( ये लेख मुंबई से लल्लनटॉप के दोस्त पुनीत शर्मा ने ख़ास हमारे इसरार पर भेजा है. पुनीत फिल्मी दुनिया में गीत और कहानी लिखने का काम करते हैं.) अक्सर मैं अपने कुछ ख़ास दोस्तों से एक सवाल करता हूं. जब भी मैं किसी फ़िल्म की पटकथा पर काम कर रहा होता हूं, मुझे उसमें कहीं गानों की गुंजाइश नहीं दिखाई देती. क्या ये उस आदमी के लिए आश्चर्य की बात नहीं है, जिसकी पहली पहचान गीतकार के रूप में है? उससे भी बढ़कर बात ये कि उस गीतकार को गीतों से एक ख़ास किस्म का अथाह प्रेम है. इसके बदले में मुझे बहुत से जवाब मिलते हैं, लेकिन कोई एक ऐसा जवाब नहीं मिलता जो मुझे संतुष्ट कर सके. जब सौरभ ने मुझे इस साल के फ़िल्मी गीतों पर कुछ लिखने को कहा, तो मैंने सोचा क्यों ना इसी बहाने अपने सवाल की ख़ोज पर भी निकला जाए.
किसी और के दिए काम में अपना स्वार्थ ढूंढ लेने से बड़ी कोई और उपलब्धि नहीं है. बशर्ते आपका स्वार्थ आपको उस मुख्य उद्देश्य से दूर न ले जाता हो. वैसे मैं एक स्वघोषित निडर मनुष्य हूं लेकिन अपने समय के गीतों पर लिखते हुए एक डर रहता है. पहला डर यह कि कहीं आप गीतों को सिर्फ़ गीतकार के रूप में तो नहीं सुन रहे और दूसरा ये कि आप पर अपने ही साथियों की समीक्षा की ज़िम्मेदारी है.समीक्षा को सरल करने के लिए मैं इसे दो भागों में बांट रहा हूं. कुछ गीत वो होंगे जो अपनी धुन के साथ मुझे दूसरों से बेहतर लगे और दूसरे वो जिनके शब्द धुन के बग़ैर मेरे ज़्यादा करीब आए. ये कोई मेरिट लिस्ट नहीं है. ऐसे कई गीत हो सकते हैं जो मेरे कानों तक पहुंचे ही ना हों. ऐसे भी गीत आपको शायद यहां न मिलें जो बहुत ख़ूबसूरत हों लेकिन आज ये लिखते हुए मुझे उनसे कोई खास जुड़ाव महसूस न हुआ हो. जनवरी शुरुआत करते हैं जनवरी से जिसकी एक फ़िल्म के गानों ने ऐसी उम्मीद बांधी थी कि, इस साल अगर कुछ और अच्छा नहीं भी सुनने को मिला तो इनके सहारे ज़िंदा रहा जा सकता है. वो फ़िल्म थी "जुगनी" और गीतकार थे "शैली" और उन शब्दों को "क्लिंटन" के बेहद खूबसूरत और नए साउंड ने अपने कंधों पर यूं उठा रखा था, जैसे कोई अत्तार दो ख़ुशबुओं को मिला के एक अलहदा इत्र बनाता है. विशाल भारद्वाज की महीन आवाज़ में डूबा "डुग डुगी डुग" इस फ़िल्म का हासिल था और इसे साल के सबसे बड़े गानों में बिना विवाद शामिल किया जा सकता है. आव-भगत में मुस्कानें, फ़ुर्सत की मीठी तानें, दाएं का हाथ पकड़ के, बाएं से पूछ के, ओए ओए होए डुग डुगी डुग शोर भरे शब्दों के दौर में इतना सहज सुनना बड़ा "रेयर" है. दूसरी फ़िल्म जो उम्मीद जगाती आई वो थी "साला खड़ूस" लेकिन स्वानंद की कुछ अच्छी लाइनें, बहुत सारे गानों और ठीक-ठाक संगीत की भीड़ में खो सी गईं. जैसे "तेरी नज़र जाए जिधर, मेरी नज़र रखे उस पे पहरा". हमारे ज़्यादातर श्रोताओं के पास अब इतना वक्त है नहीं कि, वो एक ढेर में से अच्छा माल ढूँढ सकें. वो तो यूट्यूब पर ट्रेंड होते सारे गाने सुन ले वही काफ़ी है. फ़रवरी फिर आया फ़रवरी और मुझे पहला सुकून दिया "फ़ितूर" ने. यहां स्वानंद के बोल यूं ही खर्च नहीं हुए. अमित के साथ उनकी जुगलबंदी काफ़ी अच्छी रही. जिसका शिखर रहा "पश्मीना". अमित के संगीत का अपना एक बोलने का ढंग है. सौ गानों की भीड़ में आप उनके संगीत का डायलेक्ट पकड़ सकते हैं. ठीक यही बात स्वानंद की भाषा पर भी सटीक बैठती है. कच्ची हवा, कच्चा धुआं घुल रहा
ऐसे बोलों के साथ फ़ितूर के संगीत का बैलेंस काफ़ी बेहतरीन रहा. अमित और स्वानंद आख़िरी बार "काय पो चे" में साथ सुनाई दिए थे, लेकिन उस लज़्ज़त का ज़िक्र इस मज़े को शायद थोड़ा कम कर दे.
इस महीने के बाकि गाने ठीक-ठाक तो थे लेकिन एक घिसी-पिटी लकीर पर चल रहे थे. पिछले साल ऐसे ही गानों की मांग के कारण तंग आकर मैंने गाने लिखना लगभग छोड़ ही दिया था. तो क्या ये कारण था कि मेरी लिखी फ़िल्मों में मुझे गानों की गुंजाइश नहीं दिखती क्यों कि मुझे लगता है कि गानों को सुनने वाले ख़त्म हो गए हैं. ऊपर लिखे गए गानों को पढ़कर तो ऐसा नहीं लगता. तो फिर क्या कारण है?इस बात पे सर खुजाते हुए मैं फ़रवरी की जिस अगली फ़िल्म पे बात करना ज़रूरी समझूंगा वो है "नीरजा". नीरजा के गाने ऐसे हैं जिन्हें नज़रंदाज़ भी नहीं किया जा सकता और ना ही उन्हें सुनकर प्रसून और विशाल-शेखर जैसे बड़े नामों का एहसास होता है. कुछ ऐसा लगता है कि खाना तो अच्छा था लेकिन इनसे हमारी "उम्मीद" कहीं ज़्यादा बड़ी थी.
जब आप बड़े खिलाड़ी बन जाते हैं तो आपको खेलने के लिए एक बड़ा और खुला मैदान मिलता है. लोग चाहते हैं कि वो आप उन्हें अपने खेल से चमत्कृत करें. फिर आप चाहे जैसे-तैसे जीत जाएं लेकिन ये "जैसे-तैसे" उस जीत को जीत नहीं रहने देते. मैं किसी जीत-हार से नहीं, खेलने के हुनर पर फ़िदा होता हूं.हारने में कैसे हुनर ? चलिए मैं आपको एक हारे हुए हुनर की मिसाल देता हूँ । उसका नाम था "ज़ुबान" की एलबम और गाना था "अज्ज सानु ओ मिलिया"। हार इसी बात की थी कि इतने अच्छे गाने को उसका ड्यू नहीं मिला और जीत थी ऐसे कमाल के बोल, जीवें धर्त नु बीज, बीजा नु फूल फुला नु त्रैल, त्रैल नु किरण किरना नु रंग, रंगा नु नैन नैना नु ख्वाब जी अज्ज सानु ओ मिलेया आप पूरा गीत तसल्ली के साथ सुनेंगे तो आपको समझ आएगा कि सुरजीत पातर के बोलों के साथ वरुण ग्रोवर ने बड़े ही भले से ताल मिला कर, इसे यूं पूरा किया है कि पता नहीं चलता, एक कहां शुरू हुआ है और दूसरा कहां ख़त्म. मार्च इसके बाद तो मुझे मार्च में सिर्फ़ एक ही ऐसा गाना मिला, जिसे मैं यहां शामिल कर सका. वो था कपूर एंड संस का "बोलना" जिसका संगीत तनिष्क बाग़ची का था और बोल थे डॉक्टर देवेंद्र काफ़िर के. फ़िल्म अच्छी थी लेकिन उसमें गानों की जगह नहीं दिखती थी. गानें उसमें ज़बरदस्ती घुसाए गए थे. शायद ये भी एक बड़ा डर है जो मेरी कई पटकथाओं से गानों को दूर रखता है.
अप्रैल
ख़ैर ! मार्च गुजरने के बाद अप्रेल की पहली फ़िल्म थी "की एंड का". "जी हुज़ूरी" इसका एक ऐसा गाना था जो मैं सईद कादरी के लिए सुन सका, लेकिन ऐसे गानें में जब आप मन डुबाने की कोशिश करते हैं तो आपका माथा कांच से टकरा जाता है.
यही हाल गानों की एक लंबी फ़ेहरिस्त का है. इन गानों से शिकायत ये होती है कि पहली बार सुनने के लिए इस तरह के गाने सतह पर अच्छे होते हैं लेकिन उनसे दूसरी-तीसरी बार मिला जाए, तो वो वही बातें उसी तरह से दोहराते हैं. मेरी ग़लती शायद यही है कि मेरी दिलचस्पी, दिलचस्प लोगो में है.इन्हीं दिलचस्प गानों को ढूंढते हुए मेरे हाथ लगी एक छोटी सी फ़िल्म, "निल बटे सन्नाटा". इस फ़िल्म में मनोज यादव ने "मौला" और "मुरब्बा" नाम के दो गीत बड़े ही करीने से लिखे थे. उनमे से भी ख़ास था मुरब्बा. इतना सच बता दे ज़िंदगी तू रिश्ते में मेरी क्या लगती है मुझको मैं अच्छी लगती हूं तुझको तू कैसी लगती है इन गानों के बोलों में ताज़गी भी थी और संगीत उनके साथ कदम मिला के भी चल रहा था. लंबी यात्राओं का सहारा ये छोटे सुख ही होते हैं. इस सुख को भोग के थोड़ा आगे बढ़ा तो मुझे मिला, मैथियास डुप्लेसी के कांसे जैसे झनझनाते हुए संगीत में डूबा "लाल रंग" का एक गीत "बावली बूच". गीतकार दुष्यंत ने इस गाने में बहुत ही सुंदर और सौंधे शब्दों का प्रयोग मुहावरों की तरह किया है. कह गए स्याणे, सोच-साच के सहज पके के तो आवे स्वाद इश्क पकाया मंदी आंच पे बहुत पके तो हो बरबाद गाना हिट तो था लेकिन शायद उतने लोगों तक नहीं पहुंचा, जिसका वो हकदार था. जब एक मन से लिखा हुआ गाना उसकी ऑडियंस तक नहीं पहुंचता तो एक अनकहा मलाल रह जाता है.
ख़ासकर ऐसे गाने का जो अच्छा होकर भी उसी आयतन का हो, जिसे प्रसिद्धि के तरल में डुबाने से आर्किमिडीज़ के सिंद्धात के मुताबिक़ प्रसिद्धि को आयतन के बराबर छलकना चाहिए लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ऐसी घटनाओं के बाद आपको सुनने वालों के बारे में कुछ समझ नहीं आता, लेकिन फिर बाज़ार के बारे में सबकुछ समझ आ जाता है.मई अप्रेल की उहापोह के बाद मई ख़ाली मिला. जो कुल जमा हासिल था वो "बुद्धा इन ट्रैफिक जैम" फिल्म में रोहित शर्मा के संगीत में बंधी फैज़ की नज़्में थी. फैज़ साहब के बारे में तो क्या कहूं लेकिन रोहित ने "चंद रोज़" और "बेकार कुत्ते" अच्छे से कंपोज़ किया. जून इसके बाद सीधे जून में "धनक" आई और मनोज यादव ने एक बढ़िया गीत लिखा "जीने से भी ज़्यादा" और "te3n" के गानों में अमिताभ भट्टाचार्य ने कुछ अच्छी लाइनें लिखी. क्लिंटन ने टुकड़ों में अच्छा संगीत भी दिया लेकिन कोई एक गाना पूरी तरह रिझा नहीं पाया. फिर दो महीनों के इंतज़ार के बाद स्याह आसमान में चमका "उड़ता पंजाब" नाम का एक धूमकेतू. मैं उड़ता पंजाब के किस गाने का ज़िक्र करूँ और किसे छोडूं समझ नहीं आता. फिर भी दो गाने, शैली का "डा डा डस्से" और वरुण का "उड़ दा पंजाब" इतने खूबसूरत थे कि दोनों ने मुझे काफ़ी कुछ दिया. "डर डा डा डस्से रे और मंज़िल हस्से रे" और "अंदर का कुत्ता अज्ज कड़िये"
शैली ने "चिट्टा वे" और बाकि गानों में भी कोई कमी नहीं छोड़ी. अमित ने फिर से अपना लहज़ा संभालते हुए संगीत को कहीं कहीं एक नई ख़ुशबू भी दी.
इत्र का टॉप नोट उन्होंने बदला, हार्ट नोट ज़रा सा नए जादू से ब्लेंड किया लेकिन बेस नोट वही रखा जिसके लिए वो पहचाने जाते हैं. शैली से मिला ये साल का आख़िरी जादू था. लेकिन वरुण का कमाल यहीं नहीं रुका और वो रमन राघव 2.0 में क़त्ले-आम, पानी का रास्ता और बेहूदा के साथ लौटा.शब्दकोष के क्रूर, लहूलुहान शब्दों को मासूम लफ़्ज़ों के पास बिठाकर पैदा किए गए आतंक में बुने हुए इस फ़िल्म के सारे गानें कमाल थे लेकिन,
"तेरा ख़ून है सौ में नब्बे काला"







बेंजो में अमिताभ ने "उड़नछू" गीत के अच्छे बोल लिखे लेकिन वो गाना भी कहीं अधपका रह गया. "एम एस धोनी" में मनोज मुंतशिर और अमाल का "बेसबरियां" सितंबर के आख़िरी छोर पर खड़ा एक अच्छा गीत रहा.
अफ़सोस, इन गानों ने अपने भीतर अलहदा अफ़साने तो पैदा कर कर लिए लेकिन फ़िल्म का कमज़ोर अफ़साना इन गानों को अपने कंधों पर नहीं उठा सका.
फिर "बेफिक्रे" के साथ बड़े लंबे वक्त बाद मैदान में उतरे जयदीप साहनी. गानें उन्होंने सभी अच्छे लिखे और सबसे खूबसूरत था "नशे सी चढ़ गई", लेकिन विशाल-शेखर के संगीत के नीचे कुछ बहुत कमाल बोल दबे-दबे से सुनाई दिए.
मैं जयदीप को गीतों के मायने के साथ शब्दों के साउंड का चुनाव करने के लिए भी बेहतरीन मानता हूं. वो अमिताभ या स्वानंद की तरह गायक नहीं है फिर भी वो अपने गानों में कमाल की आवाज़ें लाते हैं. जिस तरह साउंड का इस्तेमाल गुलज़ार सबसे कमाल की खूबसूरती से करते हैं.
दंगल की क़ामयाबी का शुक्रिया, ये गाना यूं ही खराब नहीं जाएगा. कभी-कभी फ़िल्म बड़ी भी हो लेकिन फ़िल्म की कहानी में गीत सहजता से ना आते हों तो वो अपना महत्व खो देते हैं. इसी अंत के बाद होती है एक शुरुआत. ऐसे गानों की जो हमने सुने ही नहीं. अजी हमारी लफ़्फ़ाज़ी से
कहीं तलवार नहीं अड़ती,
हमारे झूठों से मरकज़ की
सरकार नहीं गिरती राजशेखर ने ये गीत "शहर महबूब" एक "क्यूट कमीना" नाम की बेनाम सी फ़िल्म के लिए लिखा था. डर इसी बात का है कि मैं इस फ़िल्म से जुड़ा था तभी मुझे इसका पता लग सका. न जाने कितने ही ऐसे ख़ूबसूरत गीत लोगों तक पंहुचने से पहले "हिट हुक्लाइन्स" के शोर में गुमनामी रहते हुए दम तोड़ देते हैं. हमारे कुछ गीतकारों को कई दफ़े इन्हीं हुकलाइनों की तलाश में सहजता से समझौता करना पड़ता है.
नया साल
दरअसल एक नया कैलेंडर है,
कैलेंडर से उम्मीद नहीं करनी चाहिए
उसके पीछे लिखी भविष्यवाणियों से भी नहीं,
आदमी का नया कैलेंडर,
रंग, तस्वीरों, कीमत की
दबी मुस्कराहट में,
उसके
पिछले साल के बारे में बताता है,
खैर , कैलेंडर चाहे जैसा हो
तारीखें सब पर वही होती हैं,
उन पर निशान लगाइए,
निशानों से उम्मीद कीजिए,
वो आपका एलान हैं,
खुद से उम्मीद करना
एक अच्छी बात है,
इतना ही मुझे पता है
इतना ही ज्ञात है 






