गुजरात के मोरबी में हुए पुल हादसे को लेकर जैसे-जैसे जानकारी सामने आ रही है, उससे मालूम चलता है कि लापरवाही किस दर्जे की थी और कार्रवाई के नाम पर क्या खेल चल रहा है. 30 अक्टूबर की रात से चल रहा केंद्र, राज्य और तीनों सेनाओं का संयुक्त बचाव अभियान 31 अक्टूबर की शाम 5 बजे रोक दिया गया था. आज सुबह 9 बजे के करीब अभियान फिर शुरु किया गया. जिनके अपने अभी तक लापता हैं, उन्हें उम्मीद बंधी हुई है. लेकिन हर बीतती घड़ी के साथ उनके मन में अनहोनी की आशंका बढ़ती जा रही है.
हादसे के बाद पीएम मोदी के मोरबी दौरे के पहले और क्या बाद क्या बोले लोग?
हादसे में घायल हुए व्यक्तियों से पीएम मोदी ने अस्पताल में मुलाकात की.


राष्ट्रीय आपदा मोचन बल NDRF के कमांडेंट वी.वी.एन. प्रसन्ना कुमार मोरबी में ही हैं. उन्होंने आज कहा कि कुछ शवों के नदी के तल में फंसे होने की आशंका है. इसीलिए डीप डाइवर्स को तैनात किया गया है. ये खास ट्रेनिंग वाले गोताखोर होते हैं, जो आम गोताखोरों से ज़्यादा गहराई पर जा सकते हैं. नौसेना और तटरक्षक की टुकड़ियां बीते दो दिनों की तरह आज भी मच्छू नदी के पानी को छानती रहीं.
जो ज़िंदा बचा लिए गए, उनका इलाज मोरबी के शासकीय अस्पताल में चल रहा है. यहां आज दोपहर एक और शख्स ने दम तोड़ दिया. इसी के साथ मृतकों का आधिकारिक आंकड़ा 135 हो गया है. जबकि मीडिया रिपोर्ट्स में आंकड़ा 140 के पार है. इनमें से कम से कम 47 बच्चे थे. स्क्रीन पर आपको इनके नाम नज़र आ रहे हैं. 2 साल. 6 साल. 9 साल. 12 साल. ये कोई उम्र थी जाने की? हादसे के बाद से ज़िम्मेदारी तय करने के नाम पर जो लीपापोती हो रही है, उसमें बड़ी प्रमुखता से इस बात को भी रेखांकित किया जा रहा है लोगों ने पुल हिलाया और वो टूटकर गिर गया. मानो ये सब नियति थी, जिसे कोई टाल ही नहीं सकता था. इस हिसाब से तो ये बच्चे भी हादसे के ज़िम्मेदार हो जाते हैं. इसपर आपकी अपनी राय हो सकती है. लेकिन हमारी राय तो वही है, जो इस देश के संविधान की भावना है. कि नाबालिग बच्चों के लिए समाज और सरकार बराबर ज़िम्मेदार होते हैं. ये बच्चे अब इस दुनिया में नहीं हैं. इसीलिए हम आज इन बच्चों के हिस्से के सवाल पूछना चाहते हैं.
सवालों का सिलसिला शुरू हो, इससे पहले आपको 31 अक्टूबर से लेकर आज तक के अपडेट्स दे देते हैं. हमने आपको बताया था कि प्रधानमंत्री मोदी तीन दिनों के गुजरात दौरे पर हैं. पहले दिन वो केवड़िया और बनासकांठा होते हुए अहमदाबाद पहुंचे. जहां विकास कार्यों का उद्घाटन करने के बाद उन्होंने गांधीनगर स्थित राजभवन में एक उच्च स्तरीय बैठक की, जिसमें मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के साथ गुजरात प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी शामिल हुए. बैठक के दौरान राज्य सरकार ने बचाव अभियान और कार्रवाई को लेकर प्रधानमंत्री को ब्रीफिंग दी.
बैठक के बाद, रात साढ़े नौ बजे मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने गुजराती में एक ट्वीट किया. इसका हिंदी अनुवाद हम आपको बता देते हैं. पटेल लिखते हैं --
"प्रधानमंत्री की अध्यक्षा में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई. इसमें फैसला लिया गया कि मोरबी हादसे में जान गंवाने वालों की याद में 2 नवंबर राज्यव्यापी शोक रखा जाएगा. 2 नवंबर को प्रस्तावित राज्य सरकार के सारे आयोजन स्थगित रहेंगे. राष्ट्रध्वज भी झुका रहेगा. हम राज्य के सभी लोगों से अपील करते हैं कि मृतकों की शांति के लिए इस रोज़ प्रार्थना करें. "
जैसा कि सीएम ने कहा था, शोक का दिन है 2 नवंबर. इसीलिए 1 नवंबर माने आज के दिन आयोजन-कार्यक्रम चलते रहे. सीएम भूपेंद्र पटेल सुबह साढ़े 10 बजे के करीब राजस्थान के बांसवाड़ा में नज़र आए. यहां उन्होंने प्रधामंत्री मोदी और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ मंच साझा किया.
राजस्थान के बांसवाड़ा के बाद सीएम पटेल और गुजरात भाजपा के तमाम बड़े नेता गुजरात के पंचमहल ज़िले के जंबुघोड़ा में देखे गए, जहां प्रधानमंत्री मोदी की एक सभा थी. विकास कार्यों का शिलान्यास और उद्घाटन होना था. पटेल तो प्रधानमंत्री के साथ मंच पर भी थे. केंद्र और राज्य की सरकारों के पास बहुत अहम ज़िम्मेदारियां होती हैं. कोई भी हादसा हो जाए, सरकार अपना काम करती रहे, यही आवश्यक है. लेकिन जब सरकार की तरफ से शोक की बात कही जाएगी, तो उसकी कथनी और करनी का मूल्यांकन ज़रूर होगा.
खैर, बांसवाड़ा और पंचमहल के बाद प्रधानमंत्री का काफिला शाम साढ़े चार बजे मोरबी में नज़र आया. प्रधानमंत्री दुर्घटनाग्रस्त पुल के पाये तक स्वयं गए. जहां उन्हें गुजरात के गृहराज्य मंत्री हर्ष संघवी ने हादसे के बारे में जानकारी दी. फिर प्रधानमंत्री ने राहत कार्य में लगे जवानों और अधिकारियों से भी चर्चा की. वैसे इस बात की खूब चर्चा हुई, कि प्रधानमंत्री घटनास्थल पर पहुंचते, उससे पहले पुल पर लगे उस बोर्ड को ढक दिया गया था, जिसपर मेंटेनेंस करने वाली कंपनी - ओरेवा का नाम लिखा था. ऐसा क्यों किया गया, स्पष्ट नहीं हुआ.
इस सबके बाद प्रधानमंत्री घायलों का हाल लेने अस्पताल पहुंचे. वहां क्या हुआ, ये जानने से पहले आप ये जानिये कि प्रधानमंत्री के आने से पहले अस्पताल में क्या चल रहा था. कायदे से होना ये चाहिये था कि जिस अस्पताल में सैंकड़ों घायल भर्ती हों, वहां इस बात की भागमभाग हो कि मरीज़ों को जल्द से जल्द सही इलाज कैसे पहुंचाया जाए. जिन्हें सर्जरी की ज़रूरत हो, उनका ऑपरेशन हो. जो गंभीर हों, उन्हें बड़े अस्पतालों में रेफर किया जाए. लेकिन 31 अक्टूबर की रात मोरबी के शासकीय अस्पताल में इलाज के साथ साथ लीपापोती भी शुरू हो गई थी. मुहावरे वाली नहीं, असली. और जो असल में हुआ, वो मुहावरे को ही चरितार्थ करता था. कंफ्यूज़ मत होइए. ध्यान से सुनिए.
रात को शोशल मीडिया पर ये बात तैरने लगती है कि चूंकि प्रधानमंत्री मोदी मोरबी आ रहे हैं, अस्पताल का रंगरोगन शुरू हो गया है. पहली नज़र में लगा कि कोई तंज़ कस रहा होगा. लेकिन जब बात बढ़ने लगी तो हमारे साथी अभिनव और विजय रात 12 बजे मोरबी के शासकीय अस्पताल पहुंचे. वहां हमारी टीम ने देखा की अस्पताल में रंग रोगन और मरम्मत का काम बड़ी तेजी के साथ हो रहा है.
प्रधानमंत्री आने को हुए, तो अस्पताल के अधिकारियों मन में मरीज़ों की चिंता इस कदर बढ़ी, कि घायल को उठाकर उसके नीचे से गद्दा बदल दिया गया. वैसे जिनके नीचे से गद्दा बदला गया, उनके बारे में सोशल मीडिया पर ये झूठ चल निकला कि उन्हें नकली प्लास्टर चढ़ाया गया. पीएम के आने से पहले पट्टियां बढ़ा दी गईं. ये बात गलत है. चोट भी पहले ही लगी थी, और इन्हें पट्टियां भी पहले से चढ़ाई गई थीं. इस बात की तस्दीक दी लल्लनटॉप ने ग्राउंड से की है.
लौटते हैं अस्पताल के इलाज पर. रातों-रात न सिर्फ अस्पताल के अंदर टूटी टाइलों को सुधारा गया, वॉटर कूलर बदले गए, बाहर से इतना मलबा हटाया गया कि जेसीबी और ट्रैक्टर ट्रॉली को लगाना पड़ा. अस्पताल में मौजूद सफाई स्टाफ ने दी लल्लनटॉप के कैमरे पर दावा किया कि अस्पताल में साफ सफाई तो हमेशा से की जाती रही है. और अतिरिक्त पलंग वगैरह भी कोरोना के समय से अस्पताल में मौजूद हैं. लेकिन ये तथ्य है कि अस्पताल की साफ सफाई के लिए अतिरिक्त स्टाफ लगाया गया था, जिसे हमारे चैनल पर मौजूद वीडियो में देखा जा सकता है.
दी लल्लनटॉप उन मेहनतकश लोगों का पूरा सम्मान करता है, जो मोरबी और पूरे देश के अस्पतालों में सबसे ज़रूरी काम करते हैं - साफ-सफाई. हमारा सवाल उस अस्पताल प्रशासन से है, जिसे पीएम के दौरे के एक दिन पहले रंगरोगन, टूटी टाइल्स और नए कूलर की याद आई. ये काम वाकई ज़रूरी थे और इनसे मरीज़ों को फायदा होगा. लेकिन हमारा सवाल प्राथमिकता को लेकर है. प्राथमिकता, जिसमें इलाज, रंगरोगन से पहले आता है. अस्पताल को बताना चाहिए कि अगर पुताई ज़रूरी थी, और एक रात में हो सकती थी, तो पहले क्यों नहीं हो गई.
क्या अस्पताल की टीम और राज्य सरकार को ये लगता है कि एक रात पहले हड़बड़ी में काम निपटाकर भारत के प्रधानमंत्री और उनकी टीम को भ्रमित किया जा सकता है? जो हमने आपको अभी दिखाया, क्या उसकी जानकारी प्रधानमंत्री तक पहले ही नहीं पहुंच गई होगी? ये हमारे नहीं, उन बच्चों के सवाल हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. सीधा जवाब कहीं से मिल नहीं रहा. लेकिन दर्शक तो स्वयं तय कर ही सकते हैं कि अस्पताल में रंगरोगन हुआ या लीपा-पोती. खैर, जैसे-तैसे अस्पताल चाक चौबंद हुआ. आज दुर्घटनास्थल के दौरे के बाद प्रधानमंत्री अस्पताल पहुंचे तो उन्होंने घायलों और उनके परिजनों से बात करके उनका हाल लिया. प्रधानमंत्री के जाने के बाद हमारी टीम ने मोरबी के लोगों से बात की.
अब एक दूसरे बिंदु पर गौर करते हैं - हादसे के बाद कार्रवाई. 31 अक्टूबर की रात राजकोट रेंज के आईजी अशोक यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मामले में गिरफ्तारियों की जानकारी दी थी. इसमें ओरेवा कंपनी के मैनेजर, सिक्योरिटी गार्ड और क्लर्क थे. ऐसे में सवाल पूछा जा रहा है कि क्या इस स्तर के कर्मचारियों ने ही पुल को खोलने और उसपर लोगों को भेजने का फैसला ले लिया होगा? क्योंकि मोरबी नगर निगम इस बात पर कायम है कि उसने फिटनेस सर्टिफिकेट जारी नहीं किया था. और पुलिस ने ओरेवा के बड़े अधिकारियों को पकड़ा नहीं! तो क्या ये चौकीदारों, टिकट क्लर्क्स और मैनेजरों का किया कांड था? फिर जिस भाषा में पुलिस ने मामला दर्ज किया है, उसमें भी ''एजेंसी'' शब्द का इस्तेमाल हुआ है. पूछा जा रहा है कि ओरेवा का नाम पुलिस ने क्यों नहीं लिखा? FIR में नाम आने से ओरेवा दोषी साबित नहीं हो जाती. और फैसला तो कोर्ट को करना है. तब नाम लिखने में आनाकानी क्यों?
सवाल और भी हैं. 26 अक्टूबर से पुल शुरू हुआ. 30 अक्टूबर को गिरा. अगर इस दावे पर एक बार को भरोसा कर ही लिया जाए कि लड़कों के हिलाने से पुल टूट गया, तो मामला और गंभीर हो जाता है. मोरबी नगर पालिका, मोरबी ज़िला प्रशासन, मोरबी पुलिस और गुजरात सरकार. इनमें से किसी को भी चार दिन तक ये क्यों नज़र नहीं आया, कि क्षमता से ज़्यादा लोग पुल पर चढ़ रहे हैं. उसे हिला भी रहे हैं? अगर आज अहमदाबाद नगर निगम ये फैसला ले सकती है कि नवनिर्मित अटल ब्रिज पर एक बार में 3 हज़ार से ज़्यादा लोगों को नहीं जाने दिया जाएगा, तो ऐसा काम हफ्ते भर पहले मोरबी में क्यों नहीं हो सकता था? हमने आपको कल भी बताया था कि पुल पर जाने के लिए जो टिकट लगता था, उसपर ये लिखा था कि जो पुल को नुकसान पहुंचाएगा, उसपर कार्रवाई होगी. अगर लोग पुल को झुला रहे थे, तो ओरेवा ने कितने लोगों पर कार्रवाई की थी? उस कार्रवाई का रिकॉर्ड कहां हैं?
क्या सरकारी अधिकारियों और पुलिस पर इस बात के लिए कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, कि उन्होंने समय रहते ओरेवा के काम का मूल्यांकन नहीं किया. उसके खिलाफ ज़रूरी कदम नहीं उठाए? हम यहां लकीर नहीं पीटना चाहते. जो हो चुका, वो हो चुका. 47 बच्चों समेत 135 लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं. बचे हैं ये सवाल, जिनके जवाब नहीं मिले, तो मोरबी का हादसा, खुद को दोहराता रहेगा.














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