ये कहानी सिर्फ दो फाइटर जेट्स की नहीं है. ये कहानी है सिस्टम, फैसलों, राजनीति, इंडस्ट्री और टाइमिंग की. भारत का LCA तेजस और पाकिस्तान का JF-17 अक्सर एक ही तराजू में तौले जाते हैं, क्योंकि दोनों लगभग एक ही दौर में शुरू हुए, दोनों का मकसद एक जैसा था और दोनों को अपने अपने देशों की वायुसेना की रीढ़ बनना था. लेकिन नतीजा बिल्कुल अलग निकला.
पाकिस्तान ने Tejas के बाद बनाना शुरू किया था JF-17, फिर एक्सपोर्ट भारत से पहले कैसे?
Tejas vs JF-17 fighter jet comparison: भारत का LCA तेजस और पाकिस्तान-चीन का JF-17 दोनों हल्के फाइटर जेट हैं, लेकिन तेजस महंगा और देर से ऑपरेशनल हुआ, जबकि JF-17 सस्ता, जल्दी तैयार और एक्सपोर्टेबल बना. तेजस तकनीकी रूप से ताकतवर है, पर देरी, इंजन और इंडस्ट्रियल सपोर्ट की कमी ने इसे पीछे खींचा, वहीं JF-17 की प्रैक्टिकल डिजाइन और सीमित ग्राहक ने इसे सफलता दिलाई.
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एक तरफ पाकिस्तान कह रहा है कि JF-17 के एक्सपोर्ट से उसे आर्थिक फायदा हो रहा है. दूसरी तरफ भारत में तेजस आज भी पूरी तरह वायुसेना की जरूरतें नहीं पूरी कर पाया है. अब सवाल यही है कि ऐसा हुआ क्यों. आखिर LCA तेजस प्रोजेक्ट की नींव पड़ी कैसे?
क्यों जरूरत पड़ी1980 के दशक में भारत की वायुसेना की रीढ़ थी MiG-21. वही विमान जिसे पायलट प्यार से उड़ता ताबूत भी कहते थे. ये विमान बूढ़ा हो चुका था और लगातार हादसे हो रहे थे.
1983 में भारत सरकार ने फैसला लिया कि अब विदेशी जहाजों पर निर्भर नहीं रहेंगे. देश अपना हल्का लड़ाकू विमान बनाएगा. नाम दिया गया LCA यानी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट.
कब शुरू हुआलाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एलसीए प्रोजेक्ट को 1983 में मंजूरी मिली. 1984 में ADA यानी एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी बनाई गई. HAL को बनाने की जिम्मेदारी दी गई. कागज पर प्लान ये था कि 1995 तक विमान उड़ने लगेगा और 2000 तक वायुसेना में शामिल हो जाएगा
JF-17 की एंट्री कैसे हुईसवाल ये है कि आखिर पाकिस्तान को चीन से साथ मिलकर जेएफ-17 के विकास और निर्माण में क्यों उतरना पड़ा?

पाकिस्तान भी MiG-21 जैसे पुराने विमानों पर टिका था. ऊपर से अमेरिका ने F-16 पर कई बार प्रतिबंध लगाए. मतलब जरूरत थी सस्ते, भरोसेमंद और जल्दी मिलने वाले फाइटर जेट की.
1990 के दशक में पाकिस्तान ने चीन से हाथ मिलाया.
कब शुरू हुआ JF-17JF-17 की टाइमलाइन अपने आप में बहुत कुछ बता देती है. 1995 में चीन और पाकिस्तान के बीच इस फाइटर जेट को लेकर समझौता हुआ. 1999 तक इसका डिजाइन फाइनल कर लिया गया और 2003 में पहला प्रोटोटाइप उड़ान में आ गया. इसके बाद ज्यादा वक्त नहीं लगा और 2007 में JF-17 पाकिस्तान वायुसेना में शामिल हो गया. मतलब साफ है, तेजस के मुकाबले इसकी शुरुआत करीब 10 साल बाद हुई, लेकिन फैसले तेज थे, लक्ष्य साफ थे और यही वजह रही कि यह प्रोजेक्ट पहले खत्म होकर मैदान में उतर गया.
लागत और समय का फर्कअब सबसे जरूरी बात, पइसा किसने ज्यादा खर्चा किया. यानी बात बजट की.
तेजस का हिसाबतेजस प्रोजेक्ट की शुरुआत जब हुई थी, तब सरकार का अनुमान था कि इस पूरे कार्यक्रम पर करीब 560 करोड़ रुपये खर्च होंगे. ये आंकड़ा उस दौर के हिसाब से भी बड़ा था, लेकिन भरोसा था कि पहली बार देश अपना फाइटर जेट बना रहा है, तो लागत वाजिब है. मगर जैसे जैसे वक्त बीतता गया, डिजाइन बदले, इंजन फंसा, टेस्ट बढ़ते गए और फाइलें घूमती रहीं, वैसे वैसे खर्च भी बढ़ता चला गया. आज हालत ये है कि तेजस के विकास पर 20000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है, यानी शुरुआती अनुमान से कई गुना ज्यादा.
कागज पर प्लान ये था कि तेजस 1995 तक उड़ान भर लेगा. लेकिन हकीकत में इसकी पहली उड़ान साल 2001 में हो पाई. यानी तय समय से करीब 6 साल की देरी. ये देरी सिर्फ कैलेंडर पर नहीं थी, बल्कि हर साल के साथ लागत, तकनीकी जटिलताएं और वायुसेना की मुश्किलें भी बढ़ती चली गईं.

पहली उड़ान के बाद भी कहानी जल्दी खत्म नहीं हुई. तेजस को IOC यानी शुरुआती ऑपरेशनल मंजूरी 2013 में मिली. मतलब पहली उड़ान के पूरे 12 साल बाद जाकर वायुसेना इसे सीमित रूप में इस्तेमाल करने लायक मान पाई. इसके बाद भी कई खामियां बाकी थीं, जिन्हें दूर करने में और वक्त लगा.
FOC यानी पूरी ऑपरेशनल मंजूरी तेजस को 2019 में मिली. यानी जिस विमान को साल 2000 के आसपास वायुसेना की रीढ़ बनना था, वो पूरी तरह तैयार होने में करीब 20 साल देर कर चुका था. इस देरी का सीधा असर ये हुआ कि वायुसेना को पुराने MiG-21 लंबे समय तक उड़ाने पड़े और स्क्वाड्रन की संख्या लगातार कम होती चली गई.
JF-17 का हिसाबJF-17 प्रोजेक्ट की कुल विकास लागत करीब 5000 करोड़ रुपये के आसपास रही, जो अपने समय और पैमाने के हिसाब से काफी किफायती रही. इस जेट की पहली उड़ान 2003 में हुई और चार साल बाद 2007 तक इसे पूरी तरह ऑपरेशनल घोषित कर दिया गया, यानी देरी सिर्फ 2-3 साल की रही. मतलब पाकिस्तान और चीन ने मिलकर जो विमान बनाना शुरू किया, उसे जल्दी तैयार करके वायुसेना के इस्तेमाल में ला दिया. अगर इसे आसान भाषा में देखें, तो तेजस उस बच्चे जैसा था जिसे IIT में दाखिला लेने का सपना था, लेकिन रास्ते में स्कूल बदलते-बदलते उसकी उम्र निकल गई और सपना लंबा खिंच गया. वहीं JF-17 उस बच्चे जैसा था जिसे जल्दी नौकरी चाहिए थी, इसलिए उसने साधारण पढ़ाई करके भी जल्दी मैदान में कदम रख लिया और काम शुरू कर दिया.
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देरी की वजहें क्या थींअब सबसे बड़ा सवाल कि आखिर ऐसा क्या और कैसे हो गया कि पहले शुरू हुआ तेजस, बाद में शुरू होने वाले जेएफ-17 से पीछे रह गया.
तेजस क्यों फंसातेजस प्रोजेक्ट के फंसने के कई कारण रहे. सबसे बड़ी समस्या थी इंजन की. भारत ने अपना कावेरी इंजन बनाने की कोशिश की, लेकिन यह सफल नहीं हो पाया और आखिर में अमेरिकी GE इंजन लगाना पड़ा, जिससे समय और खर्च दोनों बढ़ गए. इसके अलावा वायुसेना की बार-बार बदलती जरूरतें भी देरी का कारण बनीं. हर नए फीचर के कारण विमान का वजन बढ़ा, डिजाइन बदलना पड़ा और टेस्टिंग फिर से शुरू करनी पड़ी, जिससे काम लगातार पीछे खिंचता गया. अनुभव की कमी भी एक बड़ी वजह थी, क्योंकि भारत ने इससे पहले कभी खुद का फाइटर जेट नहीं बनाया था; हर कदम पर नई चीजें सीखनी पड़ीं, जिससे टाइमलाइन लंबी हो गई. ऊपर से सिस्टम की सुस्ती और अफसरशाही ने स्थिति और बिगाड़ दी. फाइलों में लंबी प्रक्रियाएं, मंजूरी में देर और बजट के सवालों ने रफ्तार को लगातार रोका और प्रोजेक्ट को तय समय से काफी पीछे खींच दिया.
JF-17 क्यों तेज निकलाJF-17 की सफलता का बड़ा कारण चीन का अनुभव था. चीन पहले से J-7 और J-8 जैसे जेट बना चुका था, इसलिए उसे जेट डिजाइन और निर्माण की अच्छी समझ थी. इसके अलावा JF-17 के मामले में रेडीमेड सोच अपनाई गई थी, यानी इसे परफेक्ट बनाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि काम चलाने वाला और जल्दी तैयार होने वाला विमान बनाया गया. तीसरी वजह थी कि इस प्रोजेक्ट का एक ही मुख्य ग्राहक था, यानी पाक वायुसेना. ग्राहक सीमित होने के कारण मांगें भी नियंत्रित रहीं, डिजाइन बार-बार नहीं बदला गया और विमान जल्दी ऑपरेशनल हो गया. इस तीनों फैक्टर के चलते JF-17 तेजस के मुकाबले काफी जल्दी तैयार और इस्तेमाल के लिए उपलब्ध हो गया.
प्रोडक्शन सेंटर और निर्माताअब कुछ तकनीकी बातें… मसलन कहां बनता है और कौन बनाता है.
तेजस
तेजस का डिजाइन एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी यानी ADA ने तैयार किया, जो पूरे प्रोजेक्ट की तकनीकी रीढ़ थी. निर्माण का काम HAL बेंगलुरु ने संभाला, जहां विमान के असेंबली और टेस्टिंग का सारा काम किया गया. पूरे प्रोजेक्ट का सिस्टम पूरी तरह सरकारी हाथ में था, यानी डिजाइन, निर्माण, टेस्टिंग और ऑपरेशन सभी सरकारी एजेंसियों के नियंत्रण में थे, जिससे निर्णय लेने में समय ज्यादा लगता रहा और फ्लेक्सिबिलिटी कम रही.
JF-17
JF-17 का डिजाइन चीन की CAC और पाकिस्तान की PAC ने मिलकर किया, जबकि निर्माण दोनों देशों में ही हुआ. असेंबली का मुख्य काम पाकिस्तान के PAC कामरा में हुआ, जहां पूरी लाइन एक मिशन की तरह चलती थी. इस सिस्टम में हर किसी को पता था कि क्या करना है और कब करना है, इसलिए काम तेजी से हुआ. फर्क ये है कि पाकिस्तान ने इसे इंडस्ट्री के सहयोग से एक मिशन की तरह संभाला, जबकि भारत में तेजस पूरी तरह एक सरकारी प्रोजेक्ट बना रहा, जिसमें फैसले और मंजूरी लेने में ज्यादा समय लग गया.
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सेनाओं में शामिल होने की कहानीकिसी भी फाइटर जेट की उपयोगिता उस दिन से आंकी जाती है, जिस दिन से वो अपने देश की एयरफोर्स में शामिल होता है. तो आइये इस कसौटी पर भी दोनों विमानों को परख लेते हैं.
तेजस
तेजस को वायुसेना में शामिल होने में लंबा समय लगा, और यह आखिरकार 2016 में ऑपरेशनल हुआ. आज इसके करीब 35 से 40 विमान ही वायुसेना के पास हैं, जबकि वास्तविक जरूरत कम से कम 120 से ज्यादा विमान की थी. मतलब, विमान तो आ गया, लेकिन संख्या और क्षमता के लिहाज से अभी भी वायुसेना की जरूरत पूरी नहीं हुई है.
JF-17
JF-17 पाकिस्तान वायुसेना में 2007 में शामिल हुआ और आज इसके करीब 150 से ज्यादा ऑपरेशनल विमान हैं. इसके उत्पादन को तीन अलग-अलग ब्लॉकों में बांटा गया, और हर ब्लॉक में पिछले अनुभवों के आधार पर सुधार किया गया, जिससे विमान की क्षमता और विश्वसनीयता लगातार बढ़ती रही.
एक्सपोर्ट का खेलये सारी कहानी ही शुरू हुई जेफएफ-17 के एक्सपोर्ट को लेकर पाकिस्तानी दावे के बाद, लिहाजा तेजस और जेएफ-17 के एक्सपोर्ट की तुलना तो बनती है.
JF-17 की बिक्रीJF-17 की सबसे बड़ी ताकत इसकी किफायती कीमत और आसान मेंटेनेंस है, जिससे छोटे और मध्यम देशों के लिए इसे खरीदना आसान हो गया. साथ ही चीन की मजबूत कूटनीति ने इसे कई देशों तक पहुंचाने में मदद की. म्यांमार, नाइजीरिया और इराक जैसे देशों ने इसे खरीदा और इसका अनुमानित फायदा कई अरब डॉलर का बताया जा रहा है. इसी आधार पर पाकिस्तान दावा करता है कि JF-17 के डिफेंस एक्सपोर्ट ने उसे आर्थिक राहत देने में मदद की है.
तेजस का एक्सपोर्टतेजस के मामले में लंबे समय तक कोई विदेशी खरीदार नहीं मिला, जिससे इसके एक्सपोर्ट को लेकर भारत को फायदा नहीं हुआ. हाल में अर्जेंटीना, मिस्र और फिलीपींस जैसे देशों से बातचीत हुई है, लेकिन अभी तक कोई पक्का सौदा नहीं हुआ है. इसके पीछे मुख्य कारण विमान का महंगा होना, डिलीवरी का स्लो होना और इंजन व कुछ अहम पार्ट्स में अमेरिकी निर्भरता है, जो कई देशों के लिए एक बड़ा रोकथाम वाला फैक्टर बन गया है.
तकनीकी तुलना आसान भाषा मेंजब इतना सब हो ही रहा है तो क्यों ना दोनों फाइटर जेट्स की एक दूसरे से तुलना करके देख लिया जाए, तो चलिए एक-एक करके ये काम भी कर लेते हैं.
इंजन
तेजस में GE F404 या F414 इंजन लगाया गया है, जो काफी ताकतवर है और विमान को अच्छी स्पीड और वॉरफाइट क्षमता देता है. इसके मुकाबले JF-17 में RD-93 इंजन इस्तेमाल होता है, जो थोड़ा कम ताकतवर है और प्रदर्शन में तेजस के बराबर नहीं है, लेकिन सरल और भरोसेमंद होने की वजह से काम चलाने के लिए पर्याप्त है.
रडार
तेजस में AESA रडार अभी आने वाला है, यानी इसे पूरी तरह आधुनिक रडार सुविधा मिलने में कुछ समय और लगेगा. वहीं JF-17 में चीन का AESA रडार पहले से ही इस्तेमाल में है, जिससे यह पहले ही आधुनिक ट्रैकिंग और लक्ष्य पहचान की क्षमता रखता है और ऑपरेशनल रूप से तैयार है.
हथियार
तेजस को भारतीय और विदेशी दोनों तरह की मिसाइलों के साथ डिजाइन किया गया है, लेकिन अभी इसकी पूरी हथियार रेंज ऑपरेशनल नहीं हो पाई है. कुछ हथियार टेस्टिंग में हैं और कुछ को पूरी तरह इंटीग्रेट होना बाकी है. वहीं JF-17 में चीन की लंबी रेंज मिसाइलें और स्टैंडऑफ हथियार पहले से ही शामिल हैं, जिससे वह दूर से वार करने की बेहतर क्षमता रखता है और शुरुआती दौर से ही लड़ाकू भूमिका में ज्यादा तैयार नजर आता है.
पेलोड
तेजस की पेलोड क्षमता करीब 5.3 टन है, यानी यह ज्यादा हथियार और ईंधन लेकर उड़ सकता है. इसके मुकाबले JF-17 की पेलोड क्षमता करीब 3.6 टन है, जो उससे कम है. सीधी भाषा में कहें तो तेजस ताकतवर विमान है और कागज पर ज्यादा क्षमता रखता है, लेकिन इसे पूरी तरह तैयार होकर मैदान में उतरने में बहुत देर लग गई, जबकि JF-17 कम ताकतवर होने के बावजूद समय पर आ गया और इस्तेमाल में चला गया.
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तेजस कहां मात खा गयाअब सबसे बड़ा सवाल यही है कि एलसीए तेजस आखिर कहां मात खा गया. पहली और सबसे बड़ी बात, ये समय पर नहीं आया. युद्ध में ये नहीं देखा जाता कि हथियार कितना शानदार है, बल्कि ये देखा जाता है कि जरूरत के वक्त वो मौजूद है या नहीं. दूसरी वजह रही ज्यादा परफेक्शन की सोच. तेजस को हर मामले में बेस्ट बनाने की कोशिश की गई, लेकिन इसी चक्कर में प्रोजेक्ट लगातार खिंचता चला गया. तीसरी समस्या रही इंडस्ट्रियल सपोर्ट की कमी. प्राइवेट सेक्टर को इस प्रोजेक्ट में बहुत देर से जोड़ा गया, जिससे प्रोडक्शन और सप्लाई की रफ्तार नहीं बन पाई. चौथी और अहम वजह राजनीतिक निरंतरता की कमी रही. हर सरकार के साथ प्राथमिकताएं बदलती रहीं, जिससे फैसले टलते गए और प्रोजेक्ट को लगातार झटके लगते रहे.
JF-17 की असली ताकतJF-17 कोई सुपर जेट नहीं है. लेकिन वो सस्ता है, समय पर है और बिकाऊ है. जैसे लोकल ट्रेन. लग्जरी नहीं, लेकिन हर दिन लाखों को मंजिल तक पहुंचाती है.
आज की तस्वीर और आगे का रास्तातेजस Mk1A और Mk2 पर काम चल रहा है. अगर ये समय पर आए, तो कहानी बदल सकती है. भारत के पास टेक्नोलॉजी है. अब जरूरत है रफ्तार, फैसलों और भरोसे की. JF-17 ने पाकिस्तान को ये सिखाया कि परफेक्ट नहीं, प्रैक्टिकल होना जरूरी है. और तेजस ने भारत को ये सिखाया कि सपना बड़ा हो तो सिस्टम भी उतना ही तेज चाहिए.
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