राधिकाकानों में ईयरफोन खोंसे वह लड़की चली जा रही है. यह राजधानी की एक व्यस्त सड़क है. बगल से निकलती हैं गाड़ियां, बाइकसवार और पैदल यात्रियों के जत्थे. इस पराए शहर का एक हिस्सा इस वक्त उसके दाईं और बाईं ओर से गुजर रहा है. लेकिन वह निरपेक्ष भाव से बढ़ी जा रही है.
वह छात्रा होगी या नौकरीपेशा होगी. 18 की होगी या 28 की, क्या फर्क पड़ता है. लेकिन क्या वह अपने आस-पास गुजरते शहर को जी-भर देखने से कतराती है? क्या वह उन शक्लों, बल्कि उन आंखों का सामना करने से घबराती है? क्या वो यहां इस वक्त शहर की रंगीनियों से बेअसर दिखाई पड़ती है?
उस लड़की ने हमें कुछ लिख भेजा है. राधिका शर्मा का यह तजुर्बा पढ़ें, क्योंकि औरत का होना सिर्फ अंगों का होना नहीं है.
Claimer: नीचे जो कुछ लिखा है, ना ही काल्पनिक है और ना ही ओरिजिनल है, फॉर क्राइंग आउट लाउड. आखिर तक कोशिश रहेगी कि एट लीस्ट आपको बता पाऊं कि ये ओरिजिनल पीस ऑफ वर्क क्यों नहीं है.
तो दिक्कत क्या है? इस लेख की दिक्कत ये है की इसे कोई नहीं पढ़ेगा. और ऐसा इसलिए क्योंकि जब भी महिला सशाक्तिकरण के बारे में कोई लेख पढ़ो तो बैक हो जाता है या टैब बंद हो जाती है. ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि इतने सारे लोग इतनी सारी बातें बोल चुके हैं कि पढ़ने वाले को भी (चिंतन-मनन करने वाले को नहीं) लगता है कि अब क्या ही नई बात लिखी होगी. वही फेमिनिस्ट टाइप की, हमारी मांगें पूरी करो, हमें जीने दो, हमें हमारे हाल पे छोड़ दो टाइप्स.
लेकिन अगर कंफेशंस टाइप कुछ हों जिसमें किसी लड़की ने अपने sexcapades डिस्कस किए हों तो क्या ही कहने. ठीक है, ये बात भी इतनी हैरत की नहीं है. छेड़छाड़, एसिड अटैक्स, वॉर्डरोब मलफंक्शनिंग या रेप की ख़बर भी लगता है लोग शायद इसलिए पढ़ते हैं कि उनके अंदर लर्क करने वाले परवर्ट की क्षुधा शांत हो सके. डिटेल्स, यू सी.
डिग्रेस्स करने की इजाज़त चाहती हूं.
अब सड़क को ले लीजिये. कहने वाले इसे रास्ता भी कहते हैं पर हर रास्ते की मंज़िल हो और हर सड़क पक्की हो, ये एक्सपेक्टेशन कुछ ज़्यादा नहीं हुई?
मेरी मां अपने ज़माने का वाक़या बांटते हुए बोलीं, "एक लड़का रोज़ मुझे घर से कॉलेज और लौटाबाद छोड़ने आता था." और इससे पहले मेरे सवालों की लड़ी आग पकड़ती उन्होंने मुझे "समझाया" कि चुप रहना पड़ता है.
जब भी जन्मभूमि से वापसी होती है, अम्मा हिदायतन मुझे बोल करती हैं, "किसी के पचड़े में मत पड़ना" और भगवान की मूर्ति से कहती हैं "बस इस लड़की का रास्ते में किसी से झगड़ा न हो". मैं अब तक अच्छे से प्रैक्टिस कर चुकी झूठ-मूठ की एक दबी मुस्कान देकर और शगुन का आशीर्वाद लेकर चल देती हूं.बाज़ार में हो तो ज़ोर-जोर से हंसी-मज़ाक मत करना. मुंह को स्कार्फ़ से ढंककर ही निकलना. रोज़ एक ही रास्ते से मत जाना. वगैरह-वगैरह. ये और न जाने ऐसी कितनी हिदायतें. घर पर रहो तो क़ायदा. बाहर रहने लगो तो वही 'इमोशनल ब्लैकमेल' मां के दूध-सा सा टपकता हुआ "आग्रह" की शक्ल ले लेता है. पर मैं भी ठहरी अपनी अम्मा की दुक्लौती और सबसे छोटी पोती. अव्वल दर्जे की ढीठ.
Generalise करती थी, ग़लत करती थी. शायद इसलिए लगता था कि पापा is fearless. But apparently not when comes to his daughter. और अगर कन्फ्रंट करो तो जवाब आता है, 'चिंता तुम दोनों की ही करते हैं'.बड़ी हूं तो खुद को स्पेशल मानती हूं, इसलिए उनकी इस बात को मानने के लिए ख़ुद को मना नहीं पाती. शायद हर पिता अपनी बेटी से परेशान रहता होगा. अगर मेरे जैसी हो तो अपने सवालों से कान से खून तक निकाल दे. और कहीं बहस छिड़ जाए तो बस.
जैसे उस दिन रास्ते में ही ठोकर लगी तो पापा बोले, "नीचे देखकर क्यों नहीं चलती हो?" तो मेरे फायरब्रांड अवतार ने कहा, "भला ऐसा कोई काम किया है जो सर झुकाकर चलूं?" और एक सवाल के बदले दूसरा सवाल पिता-पुत्री ने लो फिर खेल लिया. वह विचारधारा वाली प्रश्नोत्तरी अब भी धीमी आंच पर चूल्हानुमा मन के किसी कोने में धधक रही है.
पर सावधानी तो आपको ही बरतनी है. भंसाली वाली 'देवदास' के चुन्नी बाबू के स्टाइल में कहूं तो: 'द' से 'दर्द', 'द' से 'दवा' औेर 'द' से 'दिक्कत' तुम ही हो.नारी हो. अबला या नहीं, वो मूड पर डिपेंड करता है. ऑफिस से मस्त होकर निकलो, तो उसी रास्ते में मिल जाते हैं लोग. ये वही हैं जिनके बारे में किशोर दा 'अमर प्रेम' में गा गए हैं. दूर से बाइक आती है जिस पर सवार लोग आपको "देखते" हैं. आप रुक जाओ तो वे रुक जाएं. Thought अच्छा है, पर नीयत साफ़ नहीं लगती. और आपने (आपके हिसाब से) कुछ किया भी नहीं था. बस देखा था, वाकई सिर्फ़ देखा था. क्या? कि बाइक जाए तो आप रोड क्रॉस कर लो.
अब मुद्दे की बात.
आपने पहना क्या था? ढीली-ढाली "लड़कों" वाली टीशर्ट with जीन्स. शक्ल भी निरी-सी थी. ज़ुल्फ़ें भी क़ैद थीं. शायद मेकअप से सनी होती तो..."तो फिर ग़लती क्या थी" सोचते-सोचते current बसेरे की ओर बढ़ते समय लूप में Eminem का 'Not Afraid' सुनने या हनुमान चालीसा जपने से इस किस्म के लोग तो गायब नहीं हुए ना?
'शायद': जितना पूरा, उतना ही अधूरा. Romantic भी, pathetic भी.
पब्लिक शेमिंग भी की है (अंदर फट रही होती है, तब भी की है), तमीज़ से बदतमीज़ी से, कोशिश की है.
और यही रिस्क है जो शायद मुझे जैसी कई रोज़ उठाती हैं.
यही रिस्क है हमारे होने का, कि हमारा होना ही एक रिस्क है. दिक्कत है.
PS: कहा था न कुछ ओरिजिनल नहीं है.














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