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अक्षय के कनाडा बसने वाले स्टेटमेंट की वो बातें जो शायद आप मिस कर गए

न जाने क्यूं बिना पूरा सच जाने ही हम अक्षय कुमार को ट्रोल करने में लगे हैं!

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फोटो - thelallantop
भारतीय मूल के कैनेडियन नागरिक – अक्षय कुमार. उनकी एक वीडियो काफी वायरल हो रही है. इसमें वो कह रहे हैं –
मैं आपको एक और बताना चाहता हूं- ये मेरा घर है. टोरंटो मेरा घर है. जब मैं इस (फिल्म) इंडस्ट्री से रिटायर हो जाऊंगा, तो मैं यहां वापस आऊंगा और यहीं रहूंगा.
होने को वीडियो में कहीं पर भी ये बात नहीं कही गई है कि मैं अपनी ‘सारी संपत्ति के साथ’ टोरंटो (कनाडा) में रहूंगा. लेकिन वीडियो को शेयर करते हुए ‘हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ नाम के ट्विटर हैंडल (@RealHistoryPic) ने कैप्शन में ये बात (सारी संपत्ति के साथ) भी लिखी है. हम एक वक्त को केवल इतना मान कर चलते हैं कि अक्षय कुमार ने सिर्फ उतना ही कहा जितना हमने सुना - मैं यहां वापस आऊंगा और यहीं रहूंगा. बेशक ये वीडियो 24 दिसंबर, 2018 को शेयर किया गया है लेकिन है ये जुलाई-अगस्त, 2008 का. यानी दस साल से भी ज़्यादा पुराना. ये वीडियो है तब का, जब अक्षय की ‘सिंह इज़ किंग’ रिलीज़ होने वाली थी. उसी के प्रमोशन के चलते अक्षय कुमार कनाडा गए थे और वहीं जाकर ये सब बोल गए. तो ये तो थी पूरी स्टोरी, आइए अब थोड़ी गप-शप हो जाए. जब मैं बहुत छोटा था तो एक धारावाहिक आता था, उसका नाम तो याद नहीं, क्यूंकि बहुत पुरानी बात है. वो नाइंटीज़ और दूरदर्शन का दौर था. Akshay - 1

हां, लेकिन उसका कंटेंट बड़ा मज़ेदार था. एक डाकिए के हाथ 20-25 साल पुरानी चिट्ठियों का एक बैग पड़ जाता है. जब वो इन लेटर्स को इतने सालों बाद घरों में बांटने जाता है, तो हर घर की परिस्थियां इतनी बदल चुकी होती हैं कि चिट्ठियों को आज के परिप्रेक्ष्य में पढ़ना और देखना बड़ा रोचक हो जाता है. ऐसा ही हाल इस वीडियो का भी है. वीडियो में कही गई बातों को दस साल बाद के परिप्रेक्ष्य में देखना रोचक है.

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बात करने से बात बनती है, रोज़ बातें किया करो हमसे. (इब्राहम अश्क)

चलिए, आपको एक और रियल लाइफ इंसिडेंट बताता हूं. वैसे भी कौन सा हमें किसी निष्कर्ष पर पहुंचना है. बातें चल रही हैं. बातें चलती रहनी चाहिए गो कि - हां, तो दोस्तों आपको याद है आज से 20-25 साल पहले कैसे दंतमंजन और टूथपेस्ट प्रचारित किया करते थे कि कोयले से दांत नहीं साफ़ करने चाहिए. कि दांतों में नमक लगने के फलाने नुकसान हैं. आज वही पीछे से धप्पा कर-कर के पूछ रहे हैं कि क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है? वही आपको बार-बार चारकोल वाले पेस्ट के फायदे गिनाते नहीं थक रहे. तो दोस्तों, कहने का तात्पर्य ये कि समय, टाइम, बड़ी इंट्रेस्टिंग चीज़ है. ये आपके सारे मुखौटों को उतार कर रख देती है. आज अपनी फिल्मों की रिलीज़ के लिए 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर जैसी तारीख़ों का इंतज़ार करने वाले कल क्या कहते थे, ये जानना वाकई बड़ा रोचक है. लेकिन ज़रा रुकिए, यहां से कन्फ्यूज़न शुरू होता है. और अब आगे की बातें पढ़कर आपके सवाल उठने शुरू होंगे – कहना क्या चाहते हो भाई? दरअसल मुझे अक्षय के पक्ष में कुछ बातें कहनी हैं, लेकिन शुरुआत टूथपेस्ट से करते हैं. अगर कल कोई टूथपेस्ट कोयले को बुरा और आज अच्छा बता रहा है, तो ज़रूरी नहीं कि ये उसका दोगलापन ही हो. हो सकता है कि ताज़ा रिसर्च में नई बातें और कोयले, नमक वगैरह के फायदे पता चले हों. Akshay - 2

बात करें अगर इंसानों की, तो अंगुलिमाल से लेकर तुलसीदास तक और गोडसे से लेकर बदलापुर के नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के किरदार तक, न जाने कितने ही ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जो हृदय, बुद्धि या समझ परिवर्तन के दौर से गुज़रे हैं.

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कहने का मतलब ये कि अक्षय ने जो 10 साल पहले कहा था ज़रूरी नहीं कि वो आज भी वही स्टैंड रखते हों. और ऐसा होना या करना कोई गलत नहीं है. आप हर पल इवॉल्व हो रहे होते हैं. हो सकता है कि वो आज भारत में ही बसना पसंद करें. हो ये भी सकता कि उन्होंने ‘जैसा देश, वैसा भेष’ की तर्ज़ पर टोरंटों में, टोरंटो के श्रोताओं के लिए ये बात कही हो. याद है न मैट्रिक्स फिल्म की भविष्य-दृष्टा ऑरेकल, जो हर किसी को अलग-अलग बातें बताती थी और साथ में ये भी बताती थीं कि ये सत्य केवल तुम्हारे लिए है. मंत्रियों के भाषण तो सुने होंगे आपने. कैसे वो जिस शहर, जिस राज्य में भाषण देते हैं, उसे अपना प्रिय शहर, प्रिय राज्य बना लेते हैं. कोई न कोई रिश्ता वहां से निकाल लेते हैं. यानी हो सकता है कि अक्षय ने ये बात सीरियसली नहीं, केवल लोगों को खुश करने के लिए कह दी हों. और लोगों की ख़ुशी, लोगों की तालियां, उनकी चीयर्स आपको वीडियो में साफ़ सुनाई दे सकती हैं. लेकिन... एक बड़ा वाला लेकिन... जब वो सही हो सकता है, तो ये भी तो सही हो सकता है. हमें ‘शायद’ की दोनों संभावनाओं पर बराबरी से विचार करना चाहिए. तो ये भी हो सकता है कि अक्षय का आज भी कोई ह्रदय परिवर्तन न हुआ हो. वो आज भी सोचते हों कि रिटायरमेंट के बाद कनाडा में ही जाकर बसना है. और ये कि 2008 में उन्होंने जो बातें कनाडा में कही थीं, वो सारी सीरियसली कही थीं. अब इसमें भी कई बातें, कई संभावनाओं पर हमें गौर करना चाहिए. इस पूरी स्पीच का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है ‘रिटायरमेंट’. अक्षय की कोई सरकारी जॉब तो है नहीं, जो उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा 58-60 वर्ष की उम्र में रिटायर होना ही होना है. देवानंद से लेकर राजेश खन्ना तक, लगभग सभी ऐक्टर्स अपने अंतिम समय तक पूरी तरह सक्रिय थे. कई लोगों का तो करियर ही बुढ़ापे में जाकर शुरू हुआ है. यूं ‘रिटायरमेंट’ के बाद शिफ्ट होने का एक मतलब कभी भी शिफ्ट न होना भी लगाया जा सकता है.

लेकिन जैसा कि हमने कहा कि हमें सारे पक्षों पर गौर करना चाहिए. तो अगर वो वाकई में एक उम्र के बाद रिटायरमेंट ले लेते हैं और कनाडा बस जाते हैं तो इसमें इतने हाय-तौबा की क्या बात? क्या उन्हें भारत में देशभक्ति का केवल ब्रैंड एंबेसेडर भर नहीं माना जा सकता? जैसे अमिताभ बच्चन को गुजरात का, जबकि उनका संबंध तो मुंबई और यूपी से रहा है.

शायद अब हमने सारे ‘इफ ऐंड बट’ कवर कर लिए हैं. लेकिन एक चीज़ और जोड़ना चाहेंगे कि जब आप सिलेब्रिटी हो जाते हैं, तो आपको अपनी पर्सनल लाइफ में भी बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. तब आप ये कहकर नहीं निकल सकते कि मेरी पर्सनल और प्रफेशनल लाइफ को मिक्स मत कीजिए. क्यूंकि वो तो होकर रहेगी. तभी तो कोई और अगर सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीता है तो लोगों को उतना फर्क नहीं करता, लेकिन शाहरुख़ खान ऐसा करें तो बात बिलकुल अलहदा है. आप अगर फैन-फॉलोइंग चाहते हैं तो आप भीड़ से बच नहीं सकते – दोनों एक ही हैं. कहने का मतलब ये कि अगर आप अपनी प्रफेशनल लाइफ में एक-दो बार नहीं, कंसिसटेंटली एक चीज़ का सपोर्ट करते हों, तो अपनी पर्सनल लाइफ में ठीक इतर व्यवहार करना लोगों को आपके ऊपर अंगुली उठाने का मौका देगा ही देगा. एक और भी बात है. बेहद ज़रूरी. जिस वक़्त का ये वीडियो है, उसके बाद ही जाकर अक्षय कुमार ने खोज़ की. कि सुपरहिट होने का, और ज़्यादा पसंद किए जाने का एक फॉर्मूला नेशनलिस्ट फिल्में बनाना भी है. उन्होंने ये किया भी बहुत. उससे दिक्कत नहीं. लोकतंत्र है. सबको अपनी चॉइस की आज़ादी है. मगर अक्षय ने फिल्मों से इतर भी अपनी अल्ट्रा-नैशनलिस्ट छवि बनाई. बहुत सारे मौकों पर. हाव-भाव से. बातों से. उन्हें इसका फ़ायदा भी मिला बहुत. अक्षय की एक फैन फॉलोइंग ऐसी भी है, जो उनकी इसी राष्ट्रवादी वाली छवि से प्रभावित होकर उन्हें पसंद करती है. एक अच्छे ऐक्टर होने की वजह से नहीं, बल्कि 'देशभक्त ऐक्टर' होने की वजह से उन्हें तवज़्जो देती है. ये जो इस वीडियो पर उनके खिलाफ़ ज़हर उगला जा रहा है, वो उस अल्ट्रा कट्टर राष्ट्रवादिता का ही एक चेहरा है. उसी किस्म की राष्ट्रवादिता, जो नसीरुद्दीन शाह के किसी गंभीर बयान को लपक लेती है और उन्हें देशद्रोही कहकर भारत के भगाने की बात करती है. वही उग्र राष्ट्रवादिता, जो आमिर ख़ान के एक बयान से इतनी नाराज़ हो जाती है कि एक ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट जिसका कि आमिर विज्ञापन करते थे, उसको बायकॉट करना शुरू कर देती है. Nasir

इस उग्र राष्ट्रवादिता ने देशभक्ति के नाम पर लंबे समय तक अक्षय को सहलाया है. अक्षय बखूबी जानते भी थे ये बात. पिछले कुछ सालों में किए गए उनके फिल्म सिलेक्शन में साफ़ दिखती है ये चीज. तो जिस चीज को आपने इतना निचोड़ा हो, जिसका आपने इतना फ़ायदा उठाया हो, उसके नुकसान का फर्स्ट हैंड अनुभव भी कीजिए. क्योंकि दोहरापन तो है बॉस. देशभक्ति का व्यावसायिक इस्तेमाल किया आपने. अब अपने हिसाब से विक्टिमहुड नहीं खेल सकते. बाकी हमारा उनके पक्ष में खड़ा होना सही है. क्योंकि हमने हमेशा ये स्टैंड लिया है. चॉइस की आज़ादी, अभिव्यक्ति की आज़ादी, विविधता. हमारा अक्षय के पक्ष में खड़े होना एक इंसान के पक्ष में खड़ा होना नहीं है. बल्कि संवैधानिक और मानवीय मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना है.

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लेट्स मेक इंडिया ग्रेट अगेन.

और सबसे महत्वपूर्ण बात सबसे अंत में – कोई भारतीय यदि भारत के बजाय किसी दूसरे देश को प्रेफर करता है क्यूंकि उसे वो दूसरा देश बहुत ज़्यादा पसंद है, तो हमें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. लेकिन कोई कोई भारतीय यदि भारत के बजाय कोई दूसरा देश इसलिए प्रेफर करता है कि उसे भारत देश पसंद नहीं, तब दिक्कत की बात है. यानी दिक्कत की बात अक्षय के कनाडा जाकर बसने में नहीं है. बल्कि किसी के बस इसलिए भारत छोड़कर कहीं और बसने में है कि उसे ये मुल्क पसंद नहीं. दोनों ही स्थितियों में हमें दिक्कत देश छोड़ने की तमन्ना रखने वाले व्यक्ति से नहीं, देश के कर्ताधर्ताओं से होनी चाहिए. कि भारत का कोई और विकल्प क्यों तलाश रहे हैं भारतीय? आज से ही नहीं दशकों से? नैसर्गिक और भौगोलिक रूप से तो कोई कमी नहीं भारत में. इतनी चीज़ें कॉपी की हैं अमेरिका की. तो एक नारा भी सही –

ये स्टोरी दर्पण और स्वाती ने मिलकर की है.


वीडियो देखें:

एक सांसद को 25 करोड़ खर्च करने होते हैं वो भी नहीं कर पा रहे हैं -

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