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इंडिया का सबसे महंगा म्यूज़िक कंपोज़र, जिसने लता के साथ कभी काम नहीं किया

एक से बढ़कर एक सफल गाने बनाने वाले इस संगीतकार ने, लता के साथ कभी काम क्यों नहीं किया?

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Omkar Prasad Nayyar
संगीत के तीन हिस्से होते हैं सुर लय और ताल. हिंदी सिनेमा के संगीत में इन तीन हिस्सों को तमाम संगीतकारों ने अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल किया है. मगर एक संगीतकार ऐसा भी है जिसके संगीत को बेहतरीन सुर और लय के साथ-साथ ताल के अद्भुत इस्तेमाल के कारण याद किया जाता है. बात हिंदी सिनेमा के अलग मिजाज़ संगीतकार ओ.पी. नैय्यर की. Banner_301216-074137-600x150
बहुत महंगे कंपोज़र थे नैय्यर 1994 की फिल्म 'अंदाज़ अपना अपना' तो याद होगी? सिनेमा की कल्ट कॉमेडीज़ में शुमार होने वाली इस फिल्म के सारे गाने 60’s का टच लिए हुए थे. फिल्म में जब 'ऐलो जी सनम' गाना आता है तो  ईस्टमैन युग का  भ्रम पैदा कर देता है, कहना चाहिए कि ओ.पी. नैय्यर की कंपोजीशन का भ्रम पैदा करता है. 50 और 60 के दशक के ऐसे तमाम हिट गानों की अगर लिस्ट बनाई जाए जिनमें लता मंगेश्कर नहीं हैं, तो इसमें ओ.पी. नैय्यर की धुनों की गिनती सबसे ज़्यादा होगी. हिंदी सिनेमा के ईस्टमैन युग में ओ.पी. नैय्यर का संगीत कितना हिट था इसकी बानगी ये है कि ओ.पी. नैय्यर पहले संगीतकार हैं जो 50 और 60 के दशक में संगीत देने के एक लाख रुपए लेते थे जो बहुत ही बड़ी रकम थी.
'कजरा मोहब्बत वाला', 'दीवाना हुआ बादल', 'इक परदेसी मेरा दिल ले गया', 'आओ हुज़ूर तुमको', 'आइये मेहरबान', 'पुकारता चला हूं मैं', 'लाखों है यहां दिलवाले', 'उड़े जब-जब ज़ुल्फे तेरी', 'तौबा ये मतवाली चाल' जैसे सब गाने उन्होंने कंपोज किए और आज भी बड़े लोकप्रिय हैं.

लता से झगड़ा और रेडियो से बैन

ओ.पी. नैय्यर का फिल्मी करियर बड़ा चुनौतीपूर्ण था. उन्होंने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी. संगीत की शास्त्रीय भाषा में बात करना उन्हें नहीं आता था. एक बार किसी फिल्म के लिए वो लता मंगेश्कर को अपने ढंग से ब्रीफ कर रहे थे. कहते हैं लता जी ने उन पर ताना मारते हुए नैय्यर को बातें सुना दीं. नैय्यर ने कसम खा ली कि आगे कभी लता के साथ काम नहीं करेंगे. पूरा करियर गुज़र गया मगर नैय्यर ने लता जी के साथ काम नहीं किया. और तो और, मध्य प्रदेश सरकार ने जब नैय्यर को लता मंगेशकर अवॉर्ड देने की घोषणा की तो नैय्यर ने उसे भी लेने से मना कर दिया. ये वो दौर था जब किसी फिल्म के म्यूजिक के हिट होने की गारंटी लता मंगेशकर को माना जाता था. वैसे लता के साथ काम न करके ओ.पी. नैय्यर ने आशा भोसले और गीता दत्त को हिंदी सिनेमा में ऊंचे पायदान पर स्थापित करने की नींव रखी. ओ.पी. की चुनौतियां यहीं कम नहीं हुईं. 1952 में ऑल इंडिया रेडियो ने हिंदी सिनेमा के गानों को अश्लील और पश्चिमी मानते हुए कई सालों के लिए बैन कर दिया. नैय्यर बैन होने वाले संगीतकारों में प्रमुख थे. इसी समय श्रीलंका स्थित बेहद मशहूर रेडियो सेलोन ने उनके गानों को बजाना शुरू किया. उस दौर में ये रेडियो स्टेशन इकलौता सोर्स था जहां से ओ.पी. के गाने सुने जा सकते थे. इस पूरे घटनाक्रम का क्या असर हुआ इसके लिए रेडियो सेलोन से जुड़े दो शब्द याद करिए - बिनाका गीतमाला और अमीन सायानी. हिंदी सिनेमा के पुराने कद्रदानों के लिए संगीत का ये कार्यक्रम रेडियो से जुड़ी सबसे सुनहरी यादों में से एक है.

ओ.पी. की खासियत

संगीत के तीन हिस्से होते हैं, सुर-लय-ताल. सुर अगर अच्छे से लगे तो आंख भर आती है वहीं ताल अच्छी हो तो कदम अपने आप थिरकने लगते हैं. ओ.पी. के संगीत का सबसे खास पहलू उनकी रिदम पर पकड़ है. पंजाब के ढोल पर बजने वाले लोक गीतों को उन्होंने बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया. 'उड़े जब-जब ज़ुल्फें तेरी', 'रेशमी सलवार कुर्ता जाली दा', 'कजरा मोहब्बतवाला'. अंग्रेज़ी की मार्च (हॉर्स बीट) को उन्होंने 50 और 60 के दशक के संगीत की पहचान बना दिया. चलते हुए तांगे की फील देने वाली ये रिदम आपने 'दीवाना हुआ बादल' और 'जिसने तुम्हें बनाया' में सुनी होगी.

पश्चिम का असर

हिंदी सिनेमा में शायद ही कोई संगीतकार हो जिसने पश्चिम के गानों का इस्तेमाल नहीं किया हो. ओ.पी. भी अपवाद नहीं थे. हालांकि उनके पश्चिम से लिए गए ज़्यादातर गाने चोरी नहीं प्रेरणा कहे जाएंगे मगर 'ये है मुंबई मेरी जान' जैसे नंबर भी हैं जो 'ओ माय डार्लिंग' जैसे वेस्टर्न हिट्स से सीधा कॉपी हैं. https://www.youtube.com/watch?v=Rrk70q-Li1E

निजी ज़िंदगी में कड़वाहट

ओ.पी. नैय्यर का पारिवारिक जीवन अच्छा नहीं रहा. कुछ गायिकाओं के साथ संबध के चर्चों के चलते उनकी पत्नी से कलह होती रहती थी. 1989 में उन्होंने घर छोड़ दिया और गिने चुने लोगों से ही मिलते थे जिनमें से एक सारेगामा और अंताक्षरी के प्रोड्यूसर गजेंद्र सिंह थे. ओपी मुंबई के एक मिडिल क्लास परिवार में रहने लगे. लोग बताते हैं कि वो इस परिवार के साथ काफी खुश रहते थे. दोपहर के खाने के साथ बियर और शाम के खाने के साथ दो पेग स्कॉच का उनका नियम था. नैयर ने इस नियम को कभी नहीं तोड़ा, न ज़्यादा न कम.
ओ.पी. नैय्यर के बारे में दुनिया जो भी कहे, खुद उन्होंने अपने संगीत के बारे में बड़ी मज़ेदार बात कही,

'मैं इंडस्ट्री का सेकंड बेस्ट संगीतकार हूं. बाकी के लोग नंबर एक के लिए लड़ सकते हैं'.


 

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