बचपन में नागरिक शास्त्र पढ़ते हुए सोचता था कि यदि 'प्रेसिडेंट' कोई महिला हुई तो क्या उसे 'राष्ट्र-पत्नी' कहा जाएगा? लेकिन जब थोड़ा बड़ा हुआ तो लगा कि भाषा में, जहां पूरे देश का पति होना अभिमान का विषय है वहीं 'पत्नी' होना गोया एक बुरी, गंदी बात सरीखा है. इसलिए नहीं! उसे राष्ट्रपति ही कहा जाएगा.
क्यूं हिंदी भाषा इतनी दुर्बल हो गई कि वो प्रेजिडेंट के लिए कोई तटस्थ कोई न्यूट्रल शब्द नहीं खोज पाई?कारण दरअसल ये है कि 'मनुवादी' सोच हमारे विचारों की बाहरी त्वचा में नहीं है कि उसे धोकर निजात पा लो, वो तो हमारे विचारों के डीएनए का हिस्सा हो चुकी अब. भाषा जैसे समाज के सबसे महत्वपूर्ण और कुछ सबसे पुराने 'टूल्स' पर भी उसका कब्ज़ा है. यूं कि ये सब लोगों को इतना नॉर्मल लगता है कि मेरा यह लेख इस मायने में हास्यास्पद लगने लगे कि मैं एक बेकार सी बहस छेड़ रहा हूं.
# सिनेमा का तो पता नहीं किंतु किसी क्षेत्र की भाषा उस समाज का आईना होती है:
भाषाविद कहते हैं कि 'आनंद' शब्द का हिंदी के अलावा किसी और भाषा में कोई अनुवाद नहीं है. क्यूं? क्यूंकि आनंद का कांसेप्ट ही भारत में है. विश्व भर की बाकी संस्कृतियां इस 'मुक्ति' इस 'मोक्ष' इस 'आनंद' से सर्वथा ड्रिपाइव्ड रहती आई हैं. फिर तो इसका मलतब ये हुआ कि हमारी भाषा में राष्ट्र-पत्नी जैसा कोई शब्द इसलिए नहीं है क्यूंकि हमारे समाज को लगा ही नहीं कभी कि कोई महिला भी प्रेसिडेंट बनेगी. कोई तटस्थ शब्द भी इसलिए ही नहीं है क्यूंकि 'राष्ट्रपति' शब्द चुनते वक्त इस बात पर किसी का ध्यान ही नहीं गया होगा कि इसमें 'पति' है. यूं निम्न दोनों ही स्थितियां बुरी हैं:
1) इसका कोई फीमेल काउंटरपार्ट शब्द ही न हो
2) और अगर हो तो वो 'सम्मान-जनक' या 'न्यूट्रल' तो छोड़िए सर्वथा 'अ-सम्मान जनक' लगे.
तो इसलिए यदि हम अपनी संस्कृति, अपने समाज, अपनी भाषा पर इस बात को लेकर गर्व करें कि वहां पर 'आनंद' जैसा कोई शब्द है तो इस बात पर हमें शर्मिंदगी भी होनी चाहिए वहां पर 'राष्ट्र-पत्नी' जैसा कोई शब्द नहीं है.
# भाषा का दोहरा चरित्र यहीं नहीं हर जगह है:
औरत को समाज में 'इज्ज़त' से जोड़कर देखा जा रहा है इसलिए भाषा में उसके ऊपर गालियां बनती रही हैं. यानी पुरुष की भी बेइज़्ज़ती करनी हो तो भाषा में इसका एक मात्र विकल्प अमुक पुरुष से जुड़ी 'महिलाएं' ही हैं. और जब 'भाषा' में उसकी बेइज़्ज़ती हो रही है तो समाज में भी वही रिफ्लेक्ट हो रहा है. आप गौर करेंगे तो ये विश्यस सर्किल, एक कुचक्र है भाषा और समाज के बीच, जिसमें स्त्री और स्त्रीत्व दोनों को ट्रैप कर दिया गया है.
दिक्कत ये नहीं कि स्त्री की बेइज़्ज़ती हो रही है, दिक्कत तो मूलतः ये है कि कोई ऐसा शब्द है ही क्यूं भाषा में जिससे किसी की बेइज़्ज़ती हो.
दिक्कत ये नहीं कि गालियां औरत की अस्मिता का पतन करती हैं, दिक्कत ये है कि औरत की अस्मिता के इतने हाई स्टैंडर्ड रखे ही क्यूं गये हैं कि उनका पतन हो सके.
...कि, जब तक पतन नहीं हुआ तो देवी और हो गया तो पतिता.
ये 'अस्मिता' वाली लिफ्ट 'देवी' वाले सबसे ऊंचे माले और 'पतिता' वाले ग्राउंड फ्लोर के बीच कहीं क्यूं नहीं रुकती?
जीवन तो दो ध्रुवों के बीच में होता है न, दो परफेक्ट के बीच में, तो इस तरह तो स्त्री होने का अर्थ जीवन न होना हुआ.

विकिपीडिया, और हर अन्य जगह प्रेसिडेंट को हिंदी में 'राष्ट्रपति' ही कहा जाता है.
# भाषा में स्त्री:
भाषा में स्त्री की क्या स्थिति है इसे आप धूमिल की इस कविता से जान सकते हैं:
मैंने हरेक को आवाज़ दी है हरेक का दरवाजा खटखटाया है मगर बेकार…यानी भारत के कुछ सबसे संवेदनशील, क्रांतिकारी और सामाजिक कवियों में से एक - धूमिल तक भाषा में 'स्त्री' नहीं बरत पाए. नहीं दोष उनका नहीं. दोष है हमारे डीएनए का, हमारे 'यूज़ टू एटीट्यूड' का. हम जब कांशियस होते हैं, सचेत होते हैं तो सावधानी बरतते हैं. लेकिन जैसे ही 'ऑटो पायलट मॉड' में आते हैं ऐसी भूल कर जाते हैं. क्या पता किसी दिन ये ग़लती मुझसे भी हो जाए. तो ज़रूरत है भाषा का उपयोग करते वक्त अधिक से अधिक सचेत रहने की. ताकि एक दिन हमारी भाषा में 'स्त्रीत्व' अपने सबसे ईमानदार रूप में आ पाए. इसके लिए शुरुआत हम गालियों को अवॉयड करने से कर सकते हैं.
मैंने जिसकी पूंछ उठायी है उसको मादा पाया है.
# स्त्री में भाषा:
स्त्री में भाषा की स्थिति जानने के लिए, फिर एक बड़े लेखक की ओर रुख करते हैं - नायपॉल. उन्होंने एक बार कहा था कि मैं स्त्री का लिखा दूर से ही पहचान लेता हूं. और आगे क्या कहा था ये याद नहीं लेकिन वो स्त्री को उसके लेखन को 'औसत' सिद्ध करने वाला था. होने को उस दिन मुझे लगा कि उन्हें मन्नू भंडारी की राजभोज पढ़नी चाहिए. लेकिन फिर बाद में सोचा कि चाहे नायपॉल तक ये जवाब पहुंचे न पहुंचे लेकिन उनकी ही भाषा में उन्हें जवाब देना चाहिए. यानी कविता में:
सही कहते हो नॉयपॉल 'दूर से ही पहचाने जाते हैं स्त्री के लिखे शब्द'
जैसे खुद स्त्री
स्त्रीत्व की मूल पहचान है - पहचान लिया जाना
यकीनन दोस्तोयेव्हिस्की, तुम्हारे लिए -एकांत मतलब मृत्यु है लेकिन एक स्त्री के लिए मृत्य ही एक मात्र एकांत या शायद वो भी नहीं
उसकी कविता पहचान ली जाएंगी क्यूंकि उन सब में वो स्वयं अवश्य होगी
कविता में कई वक्र होंगे उसकी कमर सरीखे और तुम कहोगे बीच में से टूट गयी लगती है ये कविता
हां क्यूंकि चूल्हे में रखी दाल कई बार हिलाई जानी चाहिए (ये नेरुदा की प्रेम कविताओं में नहीं लिखा कहीं)
और तब जबकि स्त्री के लिए एक माह का मतलब ठीक एक माह नहीं
फिर भी तुम शिल्प और कथ्य जैसे नियमों में बांध कर देखना चाहते हो उन्हें
न! उन्हें नहीं चाहिए किंतु कोई सांत्वना और न ही कोई एडवांटेज़ - स्त्री होने का वो शुद्ध तर्क की बात करेंगी.
कि अगर,
- पहचान ली जाती है स्त्री की कविताएं क्या बची हुई कविताएं भी पहचान न ली जाएंगी इस तरह ?
स्त्री के लिए उतना ही मुश्किल है कविता लिखना जितना तुम सब के लिए मुश्किल है कविताओं में स्त्री लिखना.
Video देखें: कहानी उस जगह की, जिसे अंग्रेज कभी जीत नहीं पाए:











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