
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ चुनाव प्रचार के दौरान. फाइल फोटो.
कमलनाथ और विजय रूपाणी का ऐलान
अब लोकल लोगों के लिए नौकरियां रिज़र्व करने की नई दौड़ शुरू हुई है. मध्य प्रदेश की कमान संभालते ही कमलनाथ के एक बयान ने इस बहस को नए सिरे से गर्म कर दिया है. कमलनाथ ने ऐलान किया कि एमपी में फैक्ट्रियों या कंपनियों में 70 फीसदी नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए रिज़र्व होंगी. ये स्कीम उन कंपनियों पर लागू होगी, जो टैक्स में छूट चाहती हैं. या फिर सरकार से सस्ती दर पर जमीन या बिजली लेती हैं. कमलनाथ के बयान से पहले गुजरात के सीएम विजय रूपाणी ने भी कुछ ऐसी पहल शुरू करने की जानकारी दी थी. विजय रूपाणी ने इसी साल सितंबर में कहा था कि वे ऐसा कानून बना रहे हैं, जिसमें 80 फीसदी नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए रिज़र्व होंगी.
क्या चाहते हैं एमपी-गुजरात के सीएम?
माना जाता है कि दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री यूपी-बिहार और पश्चिम बंगाल के लोगों को टारगेट कर रहे हैं. इन राज्यों से बड़ी तादाद में लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों के लिए जाते हैं. कई बार सूबों के चुनाव के दौरान स्थानीय लोगों को रोजगार न मिलने का मुद्दा उठता है. तब नेता लोकल लोगों को तरजीह देने का वादा कर देते हैं. फिर उसको लागू करने की कोशिश करते हैं. इस तरह के कदम से वे अपने प्रदेश के लोगों का भला करते हुए दिखना चाहते हैं. कमलनाथ का एक बयान देखिए-
'सभी प्रदेशों में अपने लोगों को प्राथमिकता दी जाती है. गुजरात में है. अन्य राज्यों में है. मैं कौन सी नई बात कर रहा हूं. हमने भी वही कहा है.'क्या है दूसरे राज्यों का हाल?
गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी. फाइल फोटो.
1-महाराष्ट्र में 1968 से ही लघु उद्योगों और हैवी इंडस्ट्री में 80 फीसदी नौकरियां लोकल लोगों के लिए रिज़र्व हैं. इसके अलावा राज ठाकरे और शिवसेना जैसी पार्टियों के दबाव में भी स्थानीय लोगों को नौकरियों में तरजीह मिलती है. कुछ दूसरी सुविधाएं भी दी जाती हैं.
2-गुजरात में सितंबर में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने वाला कानून बनाने का ऐलान किया गया है. मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के मुताबिक लोकल लोगों को उद्योगों में 80 फीसदी नौकरियां रिज़र्व रहेंगी. प्रदेश में यूपी-बिहार के लोगों के साथ मारपीट की अभी हाल में कई घटनाएं हुई हैं.
3-कर्नाटक की 2014 की पॉलिसी के मुताबिक सरकारी-प्राइवेट उद्योगों के 70 फीसदी ऊंचे पद स्थानीय लोगों के लिए रिज़र्व रहेंगे. निचले लेवल की नौकरियों में ये रिज़र्वेशन 100 फीसदी तक कर दिया गया है मतलब लेबर-कर्मचारी पूरे के पूरे कर्नाटक के निवासी ही होने चाहिए.
4-तेलंगाना ने तो नौकरी के लिए सूबे को कई जोन में बांट दिया है. हर जोन में 95 फीसदी कोटा लोकल लोगों के लिए फिक्स कर दिया गया है. इसका मतलब ये है कि जो जिस ज़ोन का रहने वाला है, वो अपने जोन में नौकरी पा सकता है. दूसरे ज़ोन में नौकरी नहीं मिलेगी. ऐसे में दूसरे राज्य के निवासी को तो नौकरी शायद ही मिले.
5-हिमाचल प्रदेश में 70 फीसदी नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित हैं. प्रदेश के फार्मा कंपनियों को शुरुआत में इससे बहुत परेशानी भी हुई. असल में उनको लोकल लेवल पर ट्रेंड कर्मचारी नहीं मिल पाते थे. बाद में कंपनियों ने इसका विरोध करना बंद कर दिया.
6-ओडिशा में 2010 में इस तरह की पॉलिसी लागू की गई. प्रदेश के उद्योगों में 90 फीसदी लेबर-कर्मचारी स्थानीय लोग रखे जाते हैं. प्रबंधन के स्तर पर 30 फीसदी और प्रशिक्षित नौकरियों में 60 फीसदी नौकरियां लोकल लोगों के आरक्षित हैं.

फैक्ट्री में काम करते मजदूर. सांकेतिक तस्वीर. रायटर्स.
कुछ और सूबे भी लगे हैं लाइन में
-झारखंड में स्थानीय लोगों को रोजगार देने संबंधी सुझाव देने के लिए एक कमेटी बनाई गई थी. कमेटी ने सुझाव दिया है कि समूह ग और घ की सरकारी नौकरियां 100 फीसदी लोकल लोगों को दी जाएंगी.
-हरियाणा में स्थानीय लोगों को रोजगार देने की मांग अक्सर उठती रहती है. प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल प्राइवेट सेक्टर में 50 फीसदी आरक्षण की मांग करती रही है.
-असम में आसू यानी द ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन पिछले कई साल से स्थानीय लोगों को ही नौकरी देने की मांग करता रहा है. उद्योगों पर लोकल लोगों को नौकरी देने का दबाव रहता है.
क्या ये फॉर्मूला गलत है?
जिस रास्ते पर ये प्रदेश चल रहे हैं, उससे उनको ही नुकसान है. एक रिपोर्ट के मुताबिक बाहरी लेबर वहीं जाते हैं, जहां उनकी डिमांड होती है. इससे स्थानीय उद्योगों को सस्ती दर पर लेबर मिल जाते हैं. और उद्योगों की जरूरत भी पूरी हो जाती है. इससे उद्योगों का कामकाज आसानी से चलता है. और उद्योग भी राज्य को तय वक्त पर और ज्यादा टैक्स अदा करते हैं.
दूसरी ओर, मजदूरों को अच्छी मजदूरी मिल जाती है. इससे उनका जीवन स्तर सुधरता है. चूंकि ऐसे मजदूर उसी प्रदेश में निवास भी करते हैं, तो वो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वहीं खर्च करते हैं. मजदूर अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए और शिक्षा आदि पर पैसा कमाए गए प्रदेश में ही खर्च कर देते हैं.
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