पटना की राजनीति में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जब खबर सिर्फ खबर नहीं रहती. वो इतिहास का मोड़ बन जाती है. बिहार में अभी वैसा ही एक मोड़ आया है. नीतीश कुमार. वही नीतीश, जो करीब दो दशक तक बिहार की सत्ता की धुरी बने रहे. कभी गठबंधन बदला, कभी दोस्त बदले, कभी दुश्मन बदले… लेकिन कुर्सी पर चेहरा वही रहा.
नीतीश ने लालू को रोका, अब नीतीश ही हट गए… बिहार में सबसे बड़ा फायदा किसे?
नीतीश कुमार 20 साल बाद बिहार की सीएम कुर्सी छोड़ रहे हैं. उनके राज्यसभा जाने के बाद बीजेपी मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोक रही है. सम्राट चौधरी से लेकर नित्यानंद राय, जनक राम और संजीव चौरसिया तक कई नाम चर्चा में हैं. वहीं दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव के शासनकाल की तुलना में नीतीश राज कैसा था? 20 साल के नीतीश काल का पूरा लेखा जोखा.


अब खबर है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़ने जा रहे हैं. राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो चुके हैं. सोमवार 30 मार्च को MLC पद से इस्तीफा देने के साथ ही इस बदलाव की स्क्रिप्ट लगभग लिखी जा चुकी है.
मतलब साफ है… बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का युग खत्म हो रहा है.
जैसे ही नीतीश के जाने की खबर पक्की होती है, बिहार की राजनीति में वही पुराना सवाल वापस लौट आता है, जो हर सत्ता परिवर्तन के वक्त लौटता है… अब बिहार का मुख्यमंत्री कौन?
खबर ये है कि बीजेपी इस बार सीएम पद पर दावा ठोक रही है. नीतीश के बेटे निशांत राजनीति में आ चुके हैं, लेकिन चर्चाएं हैं कि उन्हें डिप्टी सीएम बनाकर धीरे-धीरे “वारिस” के तौर पर सेट किया जा सकता है.
यानि एक तरफ नीतीश की विदाई. दूसरी तरफ नई पीढ़ी की एंट्री. और तीसरी तरफ बीजेपी की पूरी तैयारी कि अब बिहार की गाड़ी सीधे उसके हाथ में आए.
लेकिन बिहार की राजनीति सिर्फ चेहरा बदलने की कहानी नहीं होती. यहां हर चेहरा अपने साथ जाति का समीकरण, वोट बैंक का गणित और सत्ता का जादू लेकर आता है.
इसलिए कहानी की शुरुआत वहीं से करनी पड़ेगी, जहां से बिहार की राजनीति असल में शुरू होती है.

बिहार की राजनीति का डीएनए: जाति, समीकरण और सत्ता का फार्मूला
अगर बिहार की राजनीति को एक लाइन में समझना हो तो कहा जा सकता है कि यहां सत्ता तक पहुंचने का रास्ता विचारधारा से नहीं, समाज के ढांचे से होकर गुजरता है.
बिहार में कुछ बड़े वोट ब्लॉक हैं, जिनका असर चुनाव की दिशा बदल देता है-
- यादव
- कुर्मी
- कोइरी
- दलित
- महादलित
- अति पिछड़ा वर्ग
- सवर्ण
- मुस्लिम वोट
यही वो जातीय और सामाजिक परतें हैं, जिनके आधार पर बिहार में पार्टियां रणनीति बनाती हैं. यही कारण है कि बिहार का मुख्यमंत्री चुनना सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं होता. ये सामाजिक संतुलन का फैसला होता है.
1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम और यादव यानी MY समीकरण बनाकर सत्ता पर कब्जा किया. और इस समीकरण ने बिहार को एक नए दौर में पहुंचा दिया. सामाजिक न्याय का दौर.
लेकिन इसके साथ-साथ बिहार को दूसरी चीज भी मिली. बदनाम छवि.
लालू युग: सामाजिक न्याय का शोर, और प्रशासन का पतन
लालू यादव का दौर बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए याद किया जाता है. पहली बार सत्ता के गलियारों में वो लोग पहुंचे जो दशकों से हाशिए पर थे. यादव, मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग… एक नई राजनीति खड़ी हुई.
लेकिन इसी दौर में बिहार को देश भर में एक और पहचान मिली. “जंगलराज”. कई लोगों को ये शब्द पसंद नहीं आता. कई इसे राजनीतिक प्रोपेगैंडा कहते हैं. लेकिन बिहार की जमीन पर उस दौर का अनुभव करने वालों के लिए ये शब्द सिर्फ नारा नहीं था.
- उस समय बिहार में आम शिकायतें थीं,
- अपहरण उद्योग फल-फूल रहा था
- अपराधी खुलेआम घूमते थे
- पुलिस और प्रशासन कमजोर दिखते थे
- सड़कें टूट चुकी थीं
- सरकारी अस्पतालों की हालत खराब
- निवेशक बिहार का नाम सुनते ही पीछे हट जाते थे
- पटना और अन्य शहरों में शाम होते ही डर का माहौल
बिहार की पहचान देश में मजाक का विषय बन चुकी थी. ट्रेन में बिहारी मजदूरों को ताना मिलता था. बाहर नौकरी करने गए लोग अपनी पहचान छुपाने लगे थे.

बिहार की सियासत पर करीब से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र का मानना है कि लालू राज में सूबे की सबसे बड़ी समस्या प्रशासनिक अव्यवस्था थी. जिस राजनीतिक आंदोलन को लेकर लालू ने अपनी राजनीति शुरू की थी, वो उसी पर नियंत्रण खो बैठे.
पुष्यमित्र मानते हैं,
चारा घोटाले में लालू के जेल जाने के बाद जब उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं तो बिहार का प्रशासन राबड़ी के दोनों भाई साधू और सुभाष चलाने लगे. उन दोनों जमकर आपराधिक तत्वों को बढ़ावा दिया. जिसके चलते बिहार में ‘जंगलराज’ वाला जुमला चर्चा में आया.
पुष्यमित्र का कहना है कि लालू अगर जेल नहीं गए होते तो शायद राज्य में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति इतनी खराब नहीं होती. मगर वहीं ‘द लल्लनटॉप’ के राजनीतिक संपादक पंकज झा इस बात से सहमत नहीं हैं.
उनका कहना है कि साधू और सुभाष की आड़ में लालू को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती. पंकज झा कहते हैं,
बिहार में कानून-व्यवस्था लागू करने के लिए जो सिस्टम था, लालू ने उसे ध्वस्त करने का काम किया. बिहार के प्रशासनिक इतिहास में उससे पहले कभी नहीं हुआ कि सीएम ऑफिस से डीजीपी और एसएसपी को इग्नोर करके सीधा थानेदार को फोन जाता था.
पंकज झा मानते हैं कि लालू राज में समस्या प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों तरह की थी.
नीतीश कुमार का उदय: जब “जंगलराज नहीं लौटेगा” बिहार का नारा बना
2005 में नीतीश कुमार सत्ता में आए. उनके सामने चुनौती सिर्फ सरकार चलाने की नहीं थी. चुनौती बिहार को दोबारा खड़ा करने की थी.
नीतीश ने एक चीज को सबसे पहले हथियार बनाया. जनता का डर. उन्होंने कहा,
जंगलराज नहीं लौटने देंगे.
और जनता ने भी यही चाहा. लालू के दौर से परेशान जनता को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो कम से कम राज्य को “चलने लायक” बना दे.
यहीं से नीतीश का पहला बड़ा राजनीतिक फायदा शुरू हुआ. उनके पास तुलना के लिए लालू युग था, और जनता के पास उम्मीद के लिए नीतीश.

नीतीश की पहली पारी: कानून व्यवस्था और सड़क का दौर
नीतीश कुमार की शुरुआती सरकारों का सबसे बड़ा फोकस था कानून व्यवस्था. नीतीश ने अपराधियों पर कार्रवाई का संदेश दिया. पुलिस और प्रशासन को फ्री हैंड देने की बात की गई. फास्ट ट्रैक कोर्ट की चर्चा हुई. अपराध नियंत्रण पर सरकार ने राजनीतिक पूंजी लगाई.
बिहार में बदलाव दिखने लगा. सड़कों का निर्माण तेज हुआ. पुल बनने लगे. हाईवे और संपर्क मार्ग बनने लगे. गांवों को शहरों से जोड़ने की कोशिश शुरू हुई.
लोगों को पहली बार लगा कि बिहार में सरकार सिर्फ बयान नहीं दे रही, काम भी कर रही है.
वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र का मानना है कि नीतीश कुमार ने बतौर सीएम अपने पहले कार्यकाल में बिहार के सिस्टम को सुधारा. प्रशासनिक तौरपर छोटे-छोटे सुधार किये.
उस दौर में पुलिस जिसे पकड़ती, वो कानूनी लूप-होल का फायदा उठाकर छूट जाता है. पुष्यमित्र उस दौर को याद करते हुए कहते हैं,
बिहार पुलिस ने अपराधियों पर लगाम कसने के लिए आर्म्स एक्ट को हथियार बनाया. क्योंकि इस कानून में सिर्फ पुलिस अफसर की गवाही पर ही सजा हो जाती थी. इसी का फायदा उठाते हुए पुलिस ने कई बड़े अपराधियों को जेल के अंदर पहुंचा दिया.
पुलिस की इसी मुस्तैदी का असर बिहार में कानून-व्यवस्था के अंदर सुधार के तौरपर देखने को मिला.
‘द लल्लनटॉप’ के राजनीतिक संपादक पंकज झा उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि आर्म्स एक्ट में अपराधियों को अंदर करने के बाद नीतीश का अगला कदम था बेल में खुला घूम रहे अपराधियों को वापस जेल में डालना.
नीतीश के निर्देश पर हर जिले में कमेटी बनीं, जिसका काम था ऐसे अपराधियों की जमानत रद्द करना, जो बेल की आड़ लेकर अपराध कर रहे हैं. इन कमेटियों में जिले के सीजेएम, डीएम और एसपी शामिल थे.
नीतीश का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक: महिलाओं को केंद्र में रखना
नीतीश ने बिहार में महिलाओं को एक नया राजनीतिक रोल दिया.
- पंचायत चुनावों में महिलाओं को आरक्षण
- सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण
- लड़कियों के लिए साइकिल योजना
- स्कूलों में पोशाक योजना
लड़कियों के लिए साइकिल योजना बिहार में सिर्फ योजना नहीं रही. ये सामाजिक बदलाव की प्रतीक बन गई. कई गांवों में लड़कियां पहली बार स्कूल तक पहुंचीं. स्कूलों में लड़कियों की संख्या बढ़ी. और महिलाओं में नीतीश का एक स्थायी वोट बैंक बन गया.
नीतीश की छवि बनने लगी- “सुशासन बाबू”.
बिजली-पानी-शहर: बिहार की नई तस्वीर
नीतीश के दौर में बिहार की तस्वीर बदली. बिजली गांवों तक पहुंची. शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हुआ. कई इलाकों में पानी, नाली, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं पर काम हुआ.
आलोचना ये भी रही कि बिहार में बिजली आई तो सही, लेकिन कटौती और खराब सप्लाई बनी रही. फिर भी, जिस बिहार को पहले अंधेरे का राज्य कहा जाता था, वहां बदलाव महसूस होने लगा.
शराबबंदी: नीतीश का सबसे बड़ा दांव, सबसे बड़ा विवाद
अगर नीतीश के फैसलों में सबसे ज्यादा चर्चा किसी एक फैसले की हुई तो वो था शराबबंदी. उन्होंने इसे महिलाओं की सुरक्षा और परिवार बचाने के नाम पर लागू किया. महिलाओं के एक बड़े वर्ग ने इसका समर्थन भी किया.
लेकिन वक्त के साथ शराबबंदी की दूसरी तस्वीर भी सामने आई,
- अवैध शराब का कारोबार बढ़ गया
- जहरीली शराब से मौतों की घटनाएं
- पुलिस और प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप
- गरीब और छोटे लोग ज्यादा फंसे, बड़े तस्कर बचते दिखे
शराबबंदी एक ऐसा फैसला बन गया, जिसे नीतीश की उपलब्धि भी कहा गया और विफलता भी.

सीनियर जर्नलिस्ट पुष्यमित्र का मानना है कि शराबबंदी से पहले ब्रिदिंग स्पेस नहीं दिया गया. जिसकी वजह से ना सिर्फ अवैध शराब और नकली शराब का धंधा फैला. बल्कि बिहार में ड्रग्स का कारोबार भी फलने फूलने लगा.
लेकिन ‘द लल्लनटॉप’ के राजनीतिक संपादक पंकज झा इस बात से सहमत नहीं हैं कि नीतीश की शराबबंदी योजना में कोई खामी थी. वो इसे विशुद्ध रूप से सामाजिक सुधार मानते हैं. पंकज झा का कहना है,
इसमें कोई शक नहीं कि शराबबंदी के बाद गांव-गांव में कच्ची शराब बनने लगी. साथ ही अवैध शराब की पैरलल इकॉनमी ने भी जन्म ले लिया. लेकिन इसकी वजह से नीतीश की योजना को गलत साबित नहीं किया जा सकता है.
पंकज झा का मानना है कि शराबबंदी को लागू करने में प्रशासनिक सिस्टम ने ठीक से काम नहीं किया. नीतीश तो बस महिलाओं से किया हुआ अपना वादा निभा रहे थे.
नीतीश ने क्या अच्छा किया? वो काम जो इतिहास में याद रहेगा
नीतीश युग को अगर उपलब्धियों में बांटें तो कुछ बातें साफ दिखती हैं:
1) बिहार की छवि बदली: नीतीश ने बिहार को देश में फिर से “चर्चा में” लाया. पहले बिहार मजाक का विषय था. फिर बिहार “विकास मॉडल” की बहस का हिस्सा बना.
2) सड़क और कनेक्टिविटी: बिहार में सड़कें, पुल, संपर्क मार्ग… ये नीतीश के दौर की बड़ी उपलब्धि माने जाते हैं.
3) महिलाओं की भागीदारी: महिलाओं को पंचायत से लेकर नौकरी तक हिस्सेदारी देने का असर लंबे समय तक रहेगा.
4) प्रशासनिक अनुशासन: नीतीश ने लालू युग के मुकाबले प्रशासन को मजबूत किया. अफसरों को काम करने की दिशा मिली.
नीतीश क्या नहीं कर पाए? 20 साल में भी जो सपना अधूरा रह गया
नीतीश के पास समय बहुत था. सत्ता भी बहुत लंबी रही. लेकिन बिहार आज भी कुछ बुनियादी समस्याओं में फंसा हुआ है.
1) रोजगार और उद्योग: बिहार में आज भी पलायन सबसे बड़ी सच्चाई है. रोजगार नहीं बना. उद्योग नहीं आए. बड़े निवेशक बिहार से दूर रहे.
बिहार का युवा आज भी दिल्ली, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र में मजदूरी करता है.
2) शिक्षा की गुणवत्ता: स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी, लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता पर सवाल बने रहे. सरकारी स्कूलों में शिक्षक संकट, संसाधन संकट, व्यवस्था संकट बना रहा.
3) स्वास्थ्य व्यवस्था: अस्पताल बने, योजनाएं बनीं, लेकिन बिहार का सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम आज भी कमजोर है. पटना के बड़े अस्पतालों पर दबाव बढ़ता गया.
4) भ्रष्टाचार का दाग: नीतीश की व्यक्तिगत छवि ईमानदार रही, लेकिन उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे. अफसरशाही के दबदबे की शिकायत भी रही.
नीतीश की सबसे बड़ी कला: दल बदलो, लेकिन कुर्सी मत छोड़ो
नीतीश कुमार को राजनीति में एक और वजह से याद किया जाएगा. उनकी “सत्ता में बने रहने की कला”.
नीतीश ने बार-बार गठबंधन बदले,
- बीजेपी के साथ
- आरजेडी के साथ
- फिर बीजेपी
- फिर आरजेडी
- फिर बीजेपी
ये राजनीति का वो खेल था जिसमें नीतीश कई बार बच निकले. कई लोग इसे अवसरवाद कहते हैं. समर्थक इसे राजनीतिक मजबूरी बताते हैं. लेकिन बिहार में जनता के बीच एक धारणा बन गई. नीतीश कुमार को कुर्सी से हटाना सबसे मुश्किल काम है.
पर यही कला धीरे-धीरे उनकी कमजोरी बन गई. क्योंकि जनता को लगने लगा कि मुख्यमंत्री का फोकस अब बिहार नहीं, सत्ता है.
मोदी-नीतीश रिश्ता: मजबूरी का गठबंधन, भरोसे की कमी
नीतीश और मोदी का रिश्ता कभी सहज नहीं रहा. 2013 में नीतीश ने मोदी के खिलाफ स्टैंड लेकर बीजेपी से दूरी बनाई. बाद में वापस लौटे.
बीजेपी के लिए नीतीश जरूरी थे क्योंकि बिहार में उनके बिना सत्ता मुश्किल थी. लेकिन बीजेपी को नीतीश पर भरोसा नहीं था. और नीतीश के लिए बीजेपी जरूरी थी क्योंकि आरजेडी के साथ रहने का मतलब अपनी पुरानी “जंगलराज विरोधी” छवि को नुकसान पहुंचाना था.
लिहाजा यह रिश्ता हमेशा खट्टा-मीठा रहा.

बिहार बीजेपी और जेडीयू के लव-हेट रिलेशनशिप पर टिप्पणी करते पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं,
नीतीश ने 2024 के पहले तक बीजेपी को कभी मजबूत नहीं होने दिया. जेडीयू का विशाल मुस्लिम वोटबैंक इस काम में उनकी मदद करता रहा. यही वजह है कि गठबंधन में रहने के बावजूद नीतीश ने लगभग अपने मन से फैसले लिये. कम सीटों के बावजूद सीएम वही बनते रहे.
जहां तक एक दूसरे को बर्दाश्त करने की बात है तो इसके पीछे दोनों दलों की अपनी-अपनी मजबूरियां और अपनी-अपनी जरूरतें थी. वहीं दूसरी तरफ ‘द लल्लनटॉप’ के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा मानते हैं,
बीजेपी कभी बिहार में नीतीश की मजबूरी नहीं रही. सुशासन बाबू ने हमेशा अपनी शर्तों पर शासन किया. यहां तक की आज भी उनकी मर्जी के बिना भाजपा किसी को बिहार का नया सीएम नियुक्त नहीं कर सकती.
नीतीश युग का पतन: जब मुख्यमंत्री थके हुए दिखने लगे
पिछले कुछ वर्षों में नीतीश के शासन में वो ऊर्जा नहीं दिखी, जो शुरुआती सालों में थी. ऐसी कई बातें हुईं, जिनकी वजह से नीतीश चर्चा में तो रहे, मगर अच्छी वजहों से नहीं. मिसाल के तौरपर,
- भाषणों में चिड़चिड़ापन
- योजनाओं में सुस्ती
- सरकार की गति धीमी
- अफसरों पर निर्भरता बढ़ना
- जनता में उत्साह कम होना
लोगों को लगने लगा कि नीतीश अब बदलाव नहीं ला रहे, बस सत्ता चला रहे हैं. और राजनीति में यही सबसे बड़ा खतरा होता है. जब जनता कहने लगे कि “अब नया चाहिए”.
अब बिहार की कुर्सी पर बीजेपी का दावा: 4 नाम, 4 समीकरणअब जब नीतीश हट रहे हैं, तो बीजेपी के लिए ये सुनहरा मौका है कि बिहार में अपना मुख्यमंत्री बैठाए. लेकिन बीजेपी के सामने भी सवाल है,
कौन ऐसा चेहरा हो जो जातीय समीकरण साधे, चुनावी मैदान में उतरे, और दिल्ली का भरोसेमंद हो.
फिलहाल चार नाम चर्चा में हैं.
1) सम्राट चौधरी: लव-कुश फॉर्मूले पर दावेदारीबीजेपी का सबसे आक्रामक और सबसे “रेडी टू फाइट” चेहरा. सम्राट चौधरी फिलहाल बिहार के डिप्टी सीएम हैं. प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. और पिछले कुछ सालों में उनका कद तेजी से बढ़ा है.
ताकत:
बिहार की राजनीति को करीब से जानने वाले कहते हैं कि ऐसी कई बातें हैं जो सम्राट चौधरी के पक्ष में जाती है.
- कुशवाहा/कोइरी समुदाय का मजबूत आधार
- संगठन और सरकार दोनों का अनुभव
- दिल्ली नेतृत्व से करीबी
- आक्रामक भाषण शैली
- विपक्ष के खिलाफ फ्रंटफुट राजनीति
उनका मुरैठा वाला बयान भी याद किया जाएगा, जब उन्होंने कहा था कि नीतीश हटेंगे तब ही मुरैठा खोलेंगे. ये प्रतीकात्मक राजनीति थी, लेकिन बीजेपी के कार्यकर्ताओं में इसका असर गहरा हुआ.
कमजोरी:
हर खूबी अपने साथ कुछ खामी भी लेकर आती है. जानकारों के मुताबिक सम्राट चौधरी की उम्मीदवारी की राह में भी कुछ चुनौतियां मौजूद हैं.
- उनकी आक्रामक शैली गठबंधन राजनीति में मुश्किल बन सकती है
- मुख्यमंत्री बनने के लिए “सर्वमान्य चेहरा” होना जरूरी होता है
- बीजेपी के अंदर पुराने नेताओं की नाराजगी की आशंका

कुल मिलाकर, सम्राट चौधरी बीजेपी के लिए सबसे मजबूत चुनावी चेहरा बन सकते हैं, खासकर अगर पार्टी ओबीसी समीकरण साधना चाहती है.
2) नित्यानंद राय: यादव कार्ड से लालू की राजनीति पर सीधा हमलानित्यानंद राय फिलहाल केंद्र में गृह राज्य मंत्री हैं. और मोदी-शाह के भरोसेमंद माने जाते हैं. उनका सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है उनकी जातीय पहचान. वे यादव समुदाय से आते हैं. और बिहार में यादव मतलब राजनीति की सबसे बड़ी धुरी.
ताकत:
ऐसी 4 बातें हैं जो नित्यानंद राय के पक्ष में जाती हैं,
- यादव वोट बैंक में सेंध लगाने का बड़ा हथियार
- केंद्र सरकार में मंत्री होने से प्रशासनिक अनुभव
- दिल्ली नेतृत्व का भरोसा
- संगठन में मजबूत पकड़
कमजोरी:
मगर केंद्रीय आलाकमान का चहेता होना ही बिहार की सियासत के लिए काफी नहीं हैं. नित्यानंद राय की राह में मुश्किलें भी कम नहीं,
- बिहार के राज्य प्रशासन का प्रत्यक्ष अनुभव सीमित
- यादव वोट बैंक अभी भी आरजेडी के साथ मजबूत जुड़ा है
- राज्य स्तर पर करिश्माई नेता वाली छवि नहीं

कुल मिलाकर, नित्यानंद राय का नाम अगर आगे आता है तो ये बीजेपी का “सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग” होगा.
3) जनक राम: दलित नेतृत्व का दांव, बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंगजनक राम दलित समुदाय से आते हैं. बिहार में दलित-महादलित वोट निर्णायक भूमिका निभाता है. बीजेपी अगर दलित मुख्यमंत्री बनाती है तो ये राजनीतिक संदेश होगा कि पार्टी सिर्फ सवर्ण या ओबीसी नेतृत्व तक सीमित नहीं है.
ताकत:
अब बात जनक राम की उन खूबियों की, जिनके दम पर वो सीएम की रेस में बने हुए हैं,
- दलित वोट बैंक पर मजबूत पकड़ बनाने का मौका
- साफ छवि, विवादों से दूरी
- संगठन के प्रति वफादार नेता
कमजोरी:
लिमिटेशन शब्द से जनक राम भी अछूते नहीं हैं. दलित चेहरा होने के बावजूद उनकी राह में चुनौतियों की कमी नहीं.
- राज्यव्यापी पहचान सीमित
- मुख्यमंत्री के लिए जरूरी मास अपील और प्रभाव कम
- विपक्ष इसे “टोकन दलित कार्ड” कहकर हमला कर सकता है

कुल मिलाकर: जनक राम का नाम बीजेपी के लिए “संतुलन और प्रयोग” का चेहरा हो सकता है.
4) संजीव चौरसिया: शहरी वैश्य चेहरा, संगठन का भरोसेमंद कैडरसंजीव चौरसिया पटना के दीघा से विधायक हैं. बीजेपी के पुराने कैडर माने जाते हैं. उनके पिता गंगा प्रसाद बिहार बीजेपी के बड़े नेता और राज्यपाल रहे.
ताकत:
सीएम पद के संभावित दावेदारों की लिस्ट में संजीव चौरसिया का नाम यूं ही शामिल नहीं हो गया. ऐसी कई बातें हैं जो उनके पक्ष में जाती हैं. जैसेकि,
- संगठन में भरोसेमंद छवि
- वैश्य समुदाय का समर्थन
- शहरी वोट बैंक में पकड़
- लो प्रोफाइल और प्रशासनिक स्टाइल
कमजोरी:
ताकते के बाद अब बात कमजोरी की. संजीव चौरसिया की राह में मुश्किलें भी कम नहीं.
- राज्य स्तर पर सीमित जनाधार
- जातीय समीकरण में वैश्य वोट उतना निर्णायक नहीं जितना यादव या कुर्मी-कुशवाहा
- चुनावी चेहरा बनने लायक व्यापक लोकप्रियता नहीं

कुल मिलाकर, संजीव चौरसिया बीजेपी के लिए “सेफ एडमिनिस्ट्रेटर” मॉडल हो सकते हैं, लेकिन चुनावी पोस्टर बॉय बनना चुनौती है.
नीतीश के बेटे की राजनीति: वारिस को सेट करने की कोशिश?
नीतीश के बेटे निशांत का राजनीति में आना बिहार में एक नई कहानी लिख सकता है. क्योंकि अब तक नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू “परिवारवादी” नहीं मानी जाती थी.
अगर बेटे को डिप्टी सीएम बनाया जाता है, तो यह साफ संकेत होगा कि नीतीश अपनी विरासत बचाना चाहते हैं.
लेकिन बिहार में राजनीति सिर्फ वारिस से नहीं चलती. यहां जनता की स्वीकृति जरूरी है. लालू यादव का परिवार इसलिए चल पाया क्योंकि उनके पास मजबूत जातीय वोट बैंक था.

नीतीश के पास व्यक्तिगत करिश्मा था, लेकिन परिवार का वैसा आधार अभी नहीं दिखता. यही वजह है कि यह प्रयोग जोखिम भरा हो सकता है.
नीतीश के जाने से तेजस्वी यादव को फायदा?इस सवाल का जवाब है हां, बहुत हदतक ऐसा संभव है. क्योंकि बिहार की राजनीति में नीतीश हमेशा लालू के खिलाफ दीवार रहे. अगर दीवार हटेगी तो आरजेडी को सीधा नैरेटिव मिलेगा कि देखिए, बीजेपी ने नीतीश को भी हटा दिया.

तेजस्वी यादव के पास पहले से रोजगार, पलायन और युवा वोट का मुद्दा है. नीतीश के हटने से वो और आक्रामक हो सकते हैं.
नीतीश कुमार बिहार के “रीफॉर्मर” थे… फिर “सर्वाइवर” बन गए
नीतीश कुमार का युग बिहार के इतिहास में विरोधाभास की तरह याद किया जाएगा. उन्होंने बिहार को “जंगलराज” वाली छवि से बाहर निकाला. सड़क, बिजली, महिलाओं की भागीदारी जैसे मुद्दों पर काम किया. प्रशासन में अनुशासन लाने की कोशिश की.
लेकिन वो बिहार को उद्योग और रोजगार वाला राज्य नहीं बना पाए. पलायन नहीं रोक पाए. शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता में बिहार आज भी संघर्ष कर रहा है.
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और सबसे बड़ी बात… नीतीश ने जितनी बार गठबंधन बदले, उतनी बार जनता के भरोसे में दरार भी पड़ी. उनकी राजनीति एक समय बिहार को बदलने की राजनीति थी. फिर वो सत्ता बचाने की राजनीति बन गई.
अब नीतीश दिल्ली जा रहे हैं. बिहार में कुर्सी खाली हो रही है. और बिहार की राजनीति में एक नई स्क्रिप्ट लिखी जा रही है. इस स्क्रिप्ट में किरदार चार हैं. सम्राट चौधरी, नित्यानंद राय, जनक राम और संजीव चौरसिया.
अब देखना ये है कि बीजेपी किसे चुनती है. क्योंकि बिहार में मुख्यमंत्री चुनना सिर्फ नाम चुनना नहीं होता. ये बिहार का भविष्य चुनना होता है.
वीडियो: निशांत कुमार ने अपने पिता नीतीश कुमार के बारे में क्या बताया?






















