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नीतीश के बाद बिहार का सीएम कौन? बीजेपी के इन चार नेताओं पर टिकी सबकी नजर

बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है. नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा के बीच अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, इस पर सस्पेंस बढ़ गया है. सम्राट चौधरी, नित्यानंद राय, जनक राम और संजीव चौरसिया जैसे नाम चर्चा में हैं. जानिए बिहार की राजनीति का जातीय गणित, बीजेपी की रणनीति और 2025 चुनाव से जुड़ा पूरा राजनीतिक समीकरण.

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Bihar next CM race 2026
नीतीश का राज्यसभा जाना, बीजेपी की रणनीति और अगला मुख्यमंत्री कौन
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दिग्विजय सिंह
6 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 03:31 PM IST)
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बिहार की राजनीति में इस समय जो हलचल है, वह सामान्य राजनीतिक खबर नहीं है. यह उस दौर का संकेत है जब लंबे समय से कायम सत्ता का संतुलन बदलने वाला है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने राज्यसभा जाने का फैसला कर लिया है और उनका नामांकन भी दाखिल हो चुका है. एक फैसला, लेकिन असर बहुत बड़ा. पटना से दिल्ली तक राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बस यही है कि अब आगे क्या होगा.

और यही वह बिंदु है जहां से कहानी और रोचक हो जाती है, क्योंकि बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी सिर्फ एक प्रशासनिक पद नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक ढांचे का केंद्र होती है.

करीब दो दशकों तक राज्य की राजनीति एक ही धुरी के आसपास घूमती रही. गठबंधन बदले, दोस्त दुश्मन बने, चुनावी समीकरण उलटे-पलटे, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा चेहरा अक्सर वही रहा. अब पहली बार ऐसा लग रहा है कि यह अध्याय खत्म होने के करीब है.

और जैसे ही यह संभावना मजबूत होती है, एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में आ जाता है. बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा?

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नीतीश कुमार के बाद किसे मिलेगी बिहार की कमान? (फोटो- आजतक)

लेकिन यह सवाल जितना सरल दिखता है, असल में उतना है नहीं. क्योंकि बिहार में मुख्यमंत्री चुनना सिर्फ एक नेता तय करना नहीं होता, बल्कि यह सामाजिक समीकरण, चुनावी रणनीति और राजनीतिक संतुलन का बड़ा निर्णय होता है.

यही वजह है कि इस पूरी कहानी को समझने के लिए पहले बिहार की राजनीति का ढांचा समझना जरूरी है.

बिहार की राजनीति का डीएनए

अगर बिहार की राजनीति को एक वाक्य में समझाना हो तो कहा जा सकता है कि यहां सत्ता का रास्ता समाज के ढांचे से होकर गुजरता है.
यानी चुनावी राजनीति कई बार विचारधारा से कम और सामाजिक समीकरणों से ज्यादा तय होती है.

राज्य में कुछ बड़े सामाजिक/जातीय समूह हैं जो चुनावों की दिशा तय करते हैं. 

  • यादव 
  • कुर्मी 
  • कोइरी 
  • दलित 
  • महादलित 
  • अति पिछड़ा वर्ग 
  • सवर्ण 
  • मुस्लिम वोट

इन समूहों का असर इतना गहरा है कि लगभग हर राजनीतिक दल अपनी रणनीति इन्हीं के हिसाब से बनाता रहा है.

यहीं से बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की पहली बड़ी कहानी शुरू होती है. 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम और यादव यानी MY समीकरण के सहारे सत्ता का मजबूत आधार बनाया.

इसके बाद ने लव कुश समीकरण यानी कुर्मी और कोइरी समाज को साथ लाकर एक नया राजनीतिक संतुलन बनाया गया. और इसी सामाजिक गणित के कारण मुख्यमंत्री का चुनाव हमेशा राजनीतिक रणनीति का सबसे अहम फैसला बन जाता है.

अब जब सत्ता परिवर्तन की संभावना दिख रही है तो सवाल उठता है कि किस सामाजिक समीकरण के आधार पर नया चेहरा चुना जाएगा.
यहीं से संभावित चेहरों की चर्चा शुरू होती है.

चर्चा शुरू ही गई है तो एक-एक करके उन सभी चेहरों से रूबरू भी हो लेते हैं, जिसका नाम बिहार के सियासी गलियारों में गूंज रहा है. शुरुआत उस नाम से जो बिहार के मौजूदा डिप्टी सीएम हैं. जी हां, सही पकड़े हैं. बात हो रही है सम्राट चौधरी की.

सम्राट चौधरी: बिहार बीजेपी का उभरता हुआ चेहरा

बिहार बीजेपी में अगर पिछले कुछ वर्षों में किसी नेता का कद सबसे तेजी से बढ़ा है तो उनमें सबसे प्रमुख नाम सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) का माना जाता है. आज वे राज्य की राजनीति में ऐसे नेता के रूप में देखे जाते हैं जिनके पास संगठन का अनुभव भी है और सरकार चलाने का अनुभव भी.

वर्तमान समय में वे बिहार सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं. इससे पहले वो भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं. संगठन और सरकार दोनों में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उनका नाम मुख्यमंत्री की चर्चा में सबसे ऊपर माना जाता है.

संगठन और सत्ता दोनों में सक्रिय भूमिका निभाने की वजह से वे पार्टी के उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिनकी सीधी पहुंच राज्य से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक मानी जाती है.

राजनीतिक यात्रा: तीन दलों का अनुभव

यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा को समझना जरूरी हो जाता है क्योंकि सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर पारंपरिक बीजेपी नेताओं की तरह सीधा नहीं रहा है.

उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल के साथ की थी. उस समय बिहार की राजनीति सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रभाव में थी और उसी दौर में वे उभरते नेताओं में शामिल हुए.

इसके बाद उन्होंने जनता दल यूनाइटेड का रास्ता अपनाया और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले राजनीतिक ढांचे के साथ काम किया.

बाद में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और यहीं से उनका राजनीतिक कद तेजी से बढ़ना शुरू हुआ. बीजेपी में आने के बाद उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं और धीरे धीरे वे राज्य की राजनीति में पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए.

इस पूरी यात्रा ने उन्हें बिहार की तीन अलग अलग राजनीतिक धाराओं को समझने का मौका दिया.

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सम्राट चौधरी: लव-कुश फॉर्मूले में फिट हैं (फोटो- आजतक)
चुनावी राजनीति में भूमिका और प्रभाव

सम्राट चौधरी की राजनीतिक सक्रियता सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं रही बल्कि चुनावी राजनीति में भी उनका प्रभाव दिखाई देता है.

वे कई चुनावी अभियानों में पार्टी के प्रमुख प्रचारकों में शामिल रहे हैं. खास तौर पर ओबीसी मतदाताओं और कुशवाहा समुदाय के बीच उनकी सक्रियता बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है.

2020 के विधानसभा चुनाव के बाद बिहार बीजेपी में जो संगठनात्मक बदलाव हुए, उनमें सम्राट चौधरी को बड़ी जिम्मेदारी देकर यह संकेत दिया गया कि पार्टी उन्हें भविष्य के बड़े नेता के रूप में देख रही है.

मोदी और शाह के साथ समीकरण

बीजेपी की राजनीति में यह अक्सर देखा गया है कि किसी भी राज्य में नेतृत्व का फैसला केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे से जुड़ा होता है. इस संदर्भ में सम्राट चौधरी को केंद्रीय नेतृत्व के भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) की रणनीति में संगठनात्मक नेतृत्व की भूमिका अहम मानी जाती है. और इसी कारण प्रदेश अध्यक्ष के रूप में सम्राट चौधरी की नियुक्ति को भी दिल्ली के भरोसे का संकेत माना गया था.

पार्टी के अंदरूनी सूत्र अक्सर यह मानते हैं कि संगठन में सक्रियता और केंद्रीय नेतृत्व के साथ तालमेल किसी भी नेता के राजनीतिक भविष्य को मजबूत बनाता है.

आक्रामक भाषण शैली

सम्राट चौधरी की राजनीतिक पहचान का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनकी आक्रामक शैली है. राजनीतिक मंचों पर उनके भाषण अक्सर विपक्ष पर सीधे हमले के लिए जाने जाते हैं. 

खास तौर पर आरजेडी और विपक्षी गठबंधन के खिलाफ वे तीखे राजनीतिक हमले करते रहे हैं. उनकी यह शैली पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें लोकप्रिय बनाती है क्योंकि इससे संगठन में ऊर्जा का माहौल बनता है.

सामाजिक समीकरण: कुशवाहा वोट बैंक

सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी ताकत उनका सामाजिक आधार है. सम्राट चौधरी कोइरी यानी कुशवाहा समुदाय से आते हैं. बिहार की सामाजिक संरचना में यह समुदाय कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाता है.

मध्य और उत्तर बिहार के कई विधानसभा क्षेत्रों में कुशवाहा मतदाताओं का प्रभाव चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है. यही वजह है कि अगर बीजेपी उन्हें मुख्यमंत्री बनाती है तो इसे लव कुश समीकरण की राजनीति के संदर्भ में देखा जाएगा.

बिहार की राजनीति में कुर्मी और कोइरी समुदाय को मिलाकर बना यह सामाजिक समीकरण लंबे समय तक सत्ता की राजनीति में अहम भूमिका निभाता रहा है.

मुरैठा वाला बयान और राजनीतिक प्रतीक

सम्राट चौधरी की एक राजनीतिक छवि भी काफी चर्चा में रही है. कुछ समय पहले उन्होंने सिर पर मुरैठा यानी पारंपरिक पगड़ी बांधकर यह घोषणा की थी कि जब तक नीतीश कुमार सत्ता से हट नहीं जाते तब तक वे इसे नहीं खोलेंगे.

यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश भी था. इस बयान ने उन्हें विपक्ष के खिलाफ आक्रामक नेता के रूप में स्थापित किया और पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पहचान और मजबूत हुई.

उनके पक्ष में जाने वाले फैक्टर

अगर सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को देखा जाए तो कई ऐसे कारक हैं जो उनके पक्ष में जाते हैं.

पहला, वे ओबीसी समुदाय से आते हैं जो बिहार की राजनीति में बड़ा सामाजिक आधार माना जाता है.

दूसरा, संगठन और सरकार दोनों में काम करने का अनुभव उनके पास है.

तीसरा, केंद्रीय नेतृत्व के साथ उनका तालमेल मजबूत माना जाता है.

और चौथा, वे एक ऐसे नेता के रूप में देखे जाते हैं जो विपक्ष के खिलाफ आक्रामक राजनीतिक लड़ाई लड़ सकते हैं.

चुनौतियां और विरोध के तर्क

सम्राट चौधरी की राह पूरी तरह आसान भी नहीं है. उनकी आक्रामक शैली कई बार समर्थकों को पसंद आती है लेकिन गठबंधन की राजनीति में संतुलन बनाना भी जरूरी होता है.

बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री को सिर्फ अपनी पार्टी ही नहीं बल्कि गठबंधन के साथियों और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच भी संतुलन बनाकर चलना पड़ता है.

इसके अलावा बीजेपी के भीतर भी कई वरिष्ठ नेता मौजूद हैं जिनका संगठन में पुराना प्रभाव रहा है. इसी वजह से मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी के अंदर कई नामों पर चर्चा चलती रहती है.

इसलिए चर्चा में बना हुआ है नाम

इन सभी कारणों से सम्राट चौधरी का नाम बिहार के संभावित मुख्यमंत्री की चर्चा में सबसे ऊपर जरूर रहता है. लेकिन अंतिम फैसला सिर्फ लोकप्रियता या आक्रामक शैली से तय नहीं होगा बल्कि पार्टी की व्यापक रणनीति से जुड़ा होगा.

इसी कारण बिहार की राजनीति में उनके साथ साथ दूसरे नेताओं के नाम भी लगातार सामने आते रहते हैं. और उन्हीं नामों में अगला प्रमुख चेहरा है Nityanand Rai, जिनकी राजनीति का सामाजिक आधार और रणनीतिक महत्व अलग तरह की कहानी कहता है.

ये भी पढ़ें: 2026 में NDA-INDIA ब्लॉक के लिए साख की लड़ाई! 5 राज्यों के चुनावों में सरकार बचाने की कवायद

नित्यानंद राय: यादव राजनीति में सेंध लगाने की रणनीति

सम्राट चौधरी के बाद जिस दूसरे नाम की चर्चा बिहार के संभावित मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा होती है, वह हैं नित्यानंद राय (Nityanand Rai). वे इस समय केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री हैं और बीजेपी के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अगर बीजेपी बिहार में कोई बड़ा सामाजिक प्रयोग करना चाहती है तो नित्यानंद राय उस रणनीति के केंद्र में आ सकते हैं.

राजनीतिक शुरुआत और संगठन में उभार

नित्यानंद राय की राजनीतिक यात्रा अपेक्षाकृत सीधी और संगठन आधारित रही है. उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत छात्र राजनीति से की और धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी के संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने लगे. 

बिहार बीजेपी में वे लंबे समय तक संगठन के सक्रिय कार्यकर्ता रहे और इसी दौरान उनकी पहचान एक मेहनती और भरोसेमंद नेता के रूप में बनी. पार्टी के भीतर उनकी छवि ऐसे नेता की रही है जो संगठन की लाइन पर मजबूती से खड़े रहते हैं.

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नित्यानंद: आलाकमान के चहेते! (फोटो- आजतक)
चुनावी राजनीति और जनाधार

नित्यानंद राय का राजनीतिक आधार उत्तर बिहार के इलाकों में मजबूत माना जाता है. वे समस्तीपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं और यहीं से उनका राजनीतिक जनाधार भी विकसित हुआ.

2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भारी मतों से जीत हासिल की थी. इसके बाद उन्हें केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री बनाया गया. केंद्र सरकार में उनकी भूमिका ने उनके राजनीतिक कद को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा दिया.

मोदी शाह का भरोसा

बीजेपी की राजनीति में यह अक्सर देखा जाता है कि जिन नेताओं को केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा मिलता है उनका राजनीतिक कद तेजी से बढ़ता है.
नित्यानंद राय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता है.

गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग में राज्य मंत्री बनना भी इस भरोसे का संकेत माना जाता है. 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर बीजेपी बिहार में ऐसा मुख्यमंत्री चाहती है जिसका सीधा तालमेल दिल्ली से हो तो नित्यानंद राय उस भूमिका में फिट बैठ सकते हैं.

सामाजिक समीकरण: यादव वोट बैंक

नित्यानंद राय की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका सामाजिक आधार है. वे यादव समुदाय से आते हैं. बिहार में यादव मतदाता सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समूह माना जाता है.

दशकों तक यह समुदाय लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की राजनीति का मुख्य आधार रहा है और आरजेडी की ताकत भी इसी सामाजिक आधार पर टिकी रही है.

अगर बीजेपी किसी यादव नेता को मुख्यमंत्री बनाती है तो यह राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश होगा कि यादव मतदाता सिर्फ आरजेडी तक सीमित नहीं हैं.

उनके पक्ष में जाने वाले फैक्टर

अगर नित्यानंद राय की संभावनाओं को देखा जाए तो कई ऐसे कारण हैं जो उनके पक्ष में जाते हैं.

पहला, वे यादव समुदाय से आते हैं जो राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक जातियों में से एक है.

दूसरा, उन्हें केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा प्राप्त माना जाता है.

तीसरा, केंद्र सरकार में मंत्री होने के कारण उनका प्रशासनिक अनुभव भी मजबूत माना जाता है.

संभावित चुनौतियां

हालांकि नित्यानंद राय की राह पूरी तरह आसान नहीं है. राज्य की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले कई नेता यह तर्क देते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के लिए राज्य के संगठन और प्रशासन दोनों का गहरा अनुभव जरूरी होता है.

कुछ विश्लेषक यह भी मानते हैं कि यादव राजनीति में आरजेडी का प्रभाव अभी भी काफी मजबूत है और उस आधार को तोड़ना आसान नहीं होगा.

क्यों चर्चा में है नाम?

इन सब कारणों से नित्यानंद राय का नाम मुख्यमंत्री की संभावित सूची में हमेशा शामिल रहता है. लेकिन मुख्यमंत्री की रेस सिर्फ दो नामों तक सीमित नहीं है. इसी सूची में एक और महत्वपूर्ण नाम आता है जो सामाजिक संतुलन की राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है. और वह नाम है जनक राम (Janak Ram).

जनक राम: दलित नेतृत्व का संभावित चेहरा

बिहार में अगर बीजेपी सामाजिक संतुलन की राजनीति को और मजबूत करना चाहती है तो जनक राम का नाम उस रणनीति में अहम माना जाता है.
वे अपेक्षाकृत शांत और लो प्रोफाइल नेता माने जाते हैं, लेकिन संगठन में लंबे समय से सक्रिय हैं.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

जनक राम की राजनीति लंबे समय से बीजेपी के साथ जुड़ी रही है. उन्होंने पार्टी के संगठन में काम करते हुए धीरे धीरे अपना राजनीतिक आधार बनाया.

वे लोकसभा चुनाव जीतकर संसद भी पहुंच चुके हैं और बाद में राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं.

सामाजिक आधार

जनक राम दलित समुदाय से आते हैं. बिहार में दलित और महादलित मिलाकर करीब 16 प्रतिशत आबादी मानी जाती है. यह समुदाय कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाता है.

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जनक राम: पार्टी का दलित चेहरा!
बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग

अगर बीजेपी किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाती है तो यह सामाजिक इंजीनियरिंग का बड़ा प्रयोग माना जाएगा. इसका राजनीतिक संदेश यह होगा कि पार्टी सिर्फ सवर्ण या ओबीसी नेतृत्व तक सीमित नहीं है बल्कि दलित नेतृत्व को भी आगे बढ़ाना चाहती है.

जनक राम का मजबूत पक्ष

जनक राम की छवि अपेक्षाकृत साफ और विवादों से दूर रहने वाले नेता की रही है. वे संगठन के प्रति वफादार माने जाते हैं और पार्टी लाइन पर लगातार काम करते रहे हैं.

जनक राम की चुनौतियां

तमाम अच्छी बातों और मजबूत पक्ष के बावजूद जनक राम के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं. बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री पद के लिए अक्सर ऐसे नेता चुने जाते हैं जिनका राज्य स्तर पर व्यापक राजनीतिक प्रभाव हो.

जनक राम की पहचान अभी भी अपेक्षाकृत सीमित क्षेत्रों तक मानी जाती है. फिर भी सामाजिक संतुलन की राजनीति के कारण उनका नाम संभावित नेताओं की सूची में बना हुआ है. 

लेकिन इस सूची में एक और नाम है जो बीजेपी के पारंपरिक सामाजिक आधार का प्रतिनिधित्व करता है. और वह नाम है संजीव चौरसिया (Sanjeev Chaurasia).

संजीव चौरसिया: संगठन का भरोसेमंद सिपाही

बिहार बीजेपी के भीतर जिस चौथे नाम की चर्चा मुख्यमंत्री की संभावित दौड़ में होती है वह हैं संजीव चौरसिया. वे पटना के दीघा विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं और बीजेपी के पुराने कैडर से आते हैं.

राजनीतिक परिवार और पृष्ठभूमि

संजीव चौरसिया का राजनीतिक संबंध एक स्थापित राजनीतिक परिवार से भी जुड़ा रहा है. उनके पिता गंगा प्रसाद बिहार बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे हैं और बाद में राज्यपाल भी बने.

इस वजह से राजनीति का अनुभव उन्हें शुरुआती दौर से ही मिला.

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संजीव चौरसिया: भाजपा का वैश्य चेहरा
संगठन में भूमिका

संजीव चौरसिया की पहचान एक संगठन आधारित नेता की रही है. वे लो प्रोफाइल रहकर काम करने वाले नेताओं में गिने जाते हैं और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं.

सामाजिक आधार

वे वैश्य समुदाय से आते हैं जो राज्य की सियासत का अहम हिस्सा माना जाता है. यह वर्ग लंबे समय से बीजेपी का मजबूत समर्थक माना जाता रहा है.
शहरी क्षेत्रों में भी इस वर्ग का राजनीतिक प्रभाव देखा जाता है.

उनका पक्ष क्यों मजबूत है?

अगर बीजेपी किसी ऐसे नेता को चुनना चाहे जो विवादों से दूर रहकर प्रशासनिक काम पर ध्यान दे सके तो संजीव चौरसिया का नाम उस श्रेणी में फिट बैठता है.

उनकी छवि अपेक्षाकृत शांत और संतुलित नेता की रही है. 

चुनौतियां

हालांकि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में संजीव चौरसिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी सीमित राजनीतिक पहचान मानी जाती है. राज्य स्तर पर उनका जनाधार अभी भी उतना व्यापक नहीं माना जाता जितना कुछ अन्य नेताओं का है.

इसलिए चर्चा में हैं

फिर भी संगठन में उनकी स्वीकार्यता और वैश्य सामाजिक आधार के कारण उनका नाम मुख्यमंत्री की संभावित सूची में शामिल किया जाता है.
और यही वजह है कि बिहार की राजनीति में इस समय मुख्यमंत्री पद को लेकर चार अलग अलग सामाजिक समीकरणों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता चर्चा में हैं.

इन चारों में से किसकी दावेदारी सबसे मजबूत है

इस सवाल का जवाब जानने के लिए बिहार के सियासी समीकरण को ध्यान से समझना होगा.

बिहार की राजनीति का वास्तविक गणित

जब इन चारों नामों को एक साथ रखकर देखा जाता है तो साफ दिखता है कि यह सिर्फ चार नेताओं की प्रतिस्पर्धा नहीं है. यह दरअसल बिहार की चार अलग अलग राजनीतिक रणनीतियों का प्रतिनिधित्व करता है.

एक तरफ ओबीसी नेतृत्व है, दूसरी तरफ यादव राजनीति में सेंध की रणनीति है, तीसरी तरफ दलित सामाजिक संतुलन का प्रयोग है और चौथी तरफ सवर्ण आधार को बनाए रखने का सवाल है.

यानी मुख्यमंत्री का फैसला सिर्फ व्यक्ति का चयन नहीं बल्कि पूरी चुनावी रणनीति का संकेत होगा. और यहीं से असली राजनीतिक विश्लेषण शुरू होता है.

ओबीसी समीकरण: सम्राट चौधरी का मजबूत दावा

अगर सिर्फ सामाजिक गणित को देखा जाए तो सम्राट चौधरी की दावेदारी काफी मजबूत मानी जाती है.

सम्राट चौधरी की दावेवारी पर लल्लनटॉप के राजनीतिक संपादक पंकज झा कहते हैं कि-

“वे कुशवाहा या कोइरी समुदाय से आते हैं जो बिहार के बड़े ओबीसी समूहों में गिना जाता है. लव (कुर्मी) के बाद कुश (कोइरी) वाले फॉर्मूले में भी फिट बैठते हैं. ऐसे में अगर बीजेपी आलाकमान उन पर दांव खेलता है तो उसकी वजह यही होगी.”

गौरतलब है कि बिहार की राजनीति में लंबे समय तक कुर्मी और कोइरी समुदाय को मिलाकर बना लव कुश समीकरण सत्ता की राजनीति में अहम भूमिका निभाता रहा है.

चूंकि नीतीश कुमार (Nitish Kumar) कुर्मी समुदाय से आते हैं, इसलिए अगर बीजेपी कुशवाहा नेता को आगे करती है तो यह उसी सामाजिक संतुलन की राजनीति का विस्तार माना जाएगा.

इसके अलावा सम्राट चौधरी का संगठन में सक्रिय रहना और राज्य स्तर पर लगातार राजनीतिक बयानबाजी करना भी उनके पक्ष में जाता है.

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यादव राजनीति का मास्टरस्ट्रोक: नित्यानंद राय

अगर बीजेपी बिहार की राजनीति में बड़ा प्रयोग करना चाहे तो नित्यानंद राय का नाम उस रणनीति का हिस्सा बन सकता है. वे यादव समुदाय से आते हैं.

लल्लनटॉप के पॉलिटिकल एडीटर पंकज झा कहते हैं कि 

“अगर नित्यानंद राय को सीएम बनाया जाता है तो यह संदेश सिर्फ सामाजिक नहीं बल्कि राजनीतिक भी होगा कि यादव मतदाता अब सिर्फ एक ही पार्टी के साथ नहीं हैं.”

लेकिन इस रणनीति में जोखिम भी है क्योंकि यादव राजनीति का बड़ा हिस्सा अभी भी आरजेडी के साथ माना जाता है. 

इंडिया टुडे से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र का मानना है कि,

“सम्राट चौधरी सीएम पद के लिए मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहली पसंद हैं. जबकि नित्यानंद राय को आलाकमान का करीबी माना जाता है.”

दलित कार्ड: जनक राम का विकल्प

अगर पार्टी सामाजिक संतुलन की राजनीति को और व्यापक बनाना चाहती है तो जनक राम का नाम सामने आ सकता है. वो ‘रविदास समुदाय’ से आते हैं. 

दलित और महादलित मिलाकर बिहार की आबादी का बड़ा हिस्सा बनाते हैं. बीजेपी पहले भी कई राज्यों में दलित नेतृत्व को आगे बढ़ाकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर चुकी है.

अगर बिहार में ऐसा प्रयोग होता है तो यह सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति का बड़ा उदाहरण माना जाएगा. हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री पद के लिए राज्य स्तर पर व्यापक पहचान भी जरूरी होती है.

वैश्य आधार: संजीव चौरसिया का फैक्टर

चौथा नाम संजीव चौरसिया (Sanjeev Chaurasia) का है जो सवर्ण सामाजिक आधार का प्रतिनिधित्व करते हैं. शहरी क्षेत्रों में उनकी राजनीतिक पहचान बनी हुई है.

बीजेपी का पारंपरिक सामाजिक आधार लंबे समय तक वैश्य मतदाताओं के बीच मजबूत रहा है. ऐसे में अगर पार्टी स्थिर और कम विवादित चेहरा चाहती है तो संजीव चौरसिया जैसे नेता का नाम भी चर्चा में आ सकता है.

अंतिम फैसला किस पर निर्भर करेगा

इन सभी समीकरणों के बावजूद अंतिम फैसला सिर्फ जातीय गणित से तय नहीं होगा. बीजेपी की राजनीति में नेतृत्व का चयन कई अन्य कारकों से भी जुड़ा होता है.

इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं-

  • केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा
  • चुनाव जीतने की क्षमता
  • गठबंधन को संभालने की क्षमता
  • विपक्ष का मुकाबला करने की राजनीतिक शैली.

बीजेपी में अक्सर मुख्यमंत्री का फैसला प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतिक सोच से जुड़ा माना जाता है.

क्या फिर आएगा कोई सरप्राइज

पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी ने कई राज्यों में ऐसे चेहरे मुख्यमंत्री बनाए जिनकी पहले ज्यादा चर्चा नहीं थी. मध्य प्रदेश में मोहन यादव (Mohan Yadav), छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साई (Vishnu Deo Sai) और हरियाणा में नायब सिंह सैनी (Nayab Singh Saini) को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी ने सबको चौंकाया था.

वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं कि

“भाजपा में इस तरह के सरप्राइज अक्सर मिलते रहते हैं. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. कई बार जातीय समीकरणों को ध्यान में रखकर ये फैसला किया जाता है. तो कई बार किस ताकतवर नाम को साइडलाइन करके किसी ऐसे व्यक्ति को कमान थमाई जाती है, जो आलाकमान की हां में हां मिलाने का काम करे”

इस केस में भी एक ट्विस्ट है, पुष्यमित्र कहते हैं,

“अगर कोई सरप्राइज आएगा तो उसके साथ कोई प्रतीकात्मक विशेषता भी जुड़ी होगी. मिसाल के तौरपर जनजाती महिला या अति दलित विधायक.”

इसी वजह से बिहार में भी यह संभावना पूरी तरह खत्म नहीं मानी जाती कि अंतिम समय में कोई ऐसा नाम सामने आए जिसकी अभी चर्चा नहीं हो रही.

इसलिए अभी भी बना हुआ है सस्पेंस

यानी बिहार की राजनीति इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है. चार बड़े नाम चर्चा में हैं. चार अलग अलग सामाजिक समीकरण सामने हैं. और अंतिम फैसला अभी होना बाकी है.

कुर्सी एक है. दावेदार कई हैं. और बिहार की राजनीति में असली कहानी अक्सर आखिरी फैसले के बाद ही सामने आती है.

वीडियो: नीतीश कुमार जा रहे राज्यसभा, बिहार के लोगों के लिए क्या लिख गए?

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